मुद्राराक्षस संकलित कहानियां - मुद्राराक्षस MudraRakshas Sanklit Kahaniyan - Hindi book by - Mudrarakshas
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मुद्राराक्षस संकलित कहानियां

मुद्राराक्षस

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :203
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7243
आईएसबीएन :978-81-237-5335

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कथाकार द्वारा चुनी गई सोलह कहानियों का संकलन...

MudraRakshas Sanklit Kahaniyan - A Hindi Book - by MudraRakshas

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

संकलन की कहानियां

१. फरार मल्लावां माई राजा से बदला लेगी
२. जले मकान के कैदी
३. एहसास
४. एक बंदर की मौत
५. दिव्य दाह
६. प्रतिहिंसा
७. यूसुफ मियां की मृत्यु और प्रधानमंत्री का पानी
८. विस्थापित
९. पैशाचिक
१॰. मुजरा
११. दुर्घटना
१२. हीराबाई नाचेगी
१३. निहत्थे
१४. कटोरी देवी
१५. चिरकुट
१६. मुठभेड़

फरार मल्लावां माई राजा से बदला लेगी


छोटी लाइन वाली गाड़ी मल्लावां माई पर रुकती नहीं है। हां, देखने वालों को लगता है, वह उस तीन-चार सौ गज की समतल पट्टी पर पहुंचकर हल्के से ठिठकती है। पर यह शुद्ध भ्रम है। गाडी वहां से कोई एक कोस आगे मल्लावां खास पर रुकती है। हो सकता है, वह रुकने की तैयारी मल्लावां माई से ही शुरू कर देती हो। सीटी वह हमेशा इसी समतल पट्टी पर पहुंचकर बजाती है, दो बार हिचकी लेकर फिर बहुत तीखे लंबे स्वर में। लोग कहते हैं, वह मल्लावां माई का नाम लेती है। आकाश की तरफ गर्दन उठाकर, खूब लंबी सांस खींचकर।

मल्लावां खास सरकारी नाम है। मल्लावां माई भी जगह का अपना नाम नहीं है। जहां आज मल्लावां माई या उसके गिरते गुए खंडहर हैं, वहीं एक बस्ती हुआ करती थी मल्लावां। ढहती कच्ची दीवारों से अटकी काली, सड़ी बल्लियों और दरवाजों की उखड़ी चौखटों के अवशेष वाली इस उजाड़ जगह से उस पार थोड़े फासले पर जो पक्की इमारत थी, वह भी ढहती दीवारों और बिखरती ईंटों के ढेर में बदल चुकी है।
कहते हैं, इन खंडहरों में दुधारू जानवर कभी नहीं आते। सिर्फ सोमवार की शाम इन खंडहरों से बाहर रेल की पटरी से सटी समतल जमीन पर औरतों का एक झुंड दिखाई देता है। यह झुंड वहां सूरज डूबने के बाद तक ठहरता है और फिर इधर-उधर बिखर जाता है।

हर सोमवार जब सूरज उतरना शुरू करता है, आसपास की गर्द और दरख्तों के रहस्यजाल से औरतें धीरे-धीरे प्रकट होती हैं। वे सब एक ही गीत गाती हैं। लेकिन बहुत देर तक गीत के बजाय अस्पष्ट जंगी आवाजों की गुंजलक-सी ही वहां फैलती रहती है। जैसे बांसों के झुरमुट से हवा उलझ-उलझकर सीत्कार कर रही हो, या जैसे बीन में कोई संपेरा सुर भर रहा हो।
औरतों का वह गीत कई तरफ से आता है और इशी समतल पट्टी के बीचोबीच बने एक बहुत छोटे-से चबूतरे पर इकट्ठा हो जाता है।
गीत बड़ा विचित्र है–असुर दानव सीतला माई को चिट्ठी लिखता है, मैं तुमसे ब्याह करूंगा। सीतला माई असुर दानव को चिट्ठी भेजती हैं, मैं तेरा संहार करूंगी।

उनचास हाथी और पचास घोड़े लेकर असुर दानव आया था। देवी के हाथ में ढाल और तलवार थी। देवी लड़ते-लड़ते मठ में समा गई। असुर मर गया। हे भवानी देवी–हे शीतला माई !
औरतें गाती हैं, बहुत ऊंचे स्वर में, लेकिन सभी अलग अपनी लय में। इसलिए समवेत गायन जैसा कुछ नहीं होता। दूर पर कहीं बहुत-सी तलवारों के देर तक टकराने जैसी आवाज गूंजती है। धुंधलका होते-होते तलवारों के टकराने की यह आवाज फिर बिखरने लगती है और वहां से आखिरी औरत के गायब होने तक बांसों में उलझती हवा की सनसनी जैसी सुनाई देती रहती है। हो सकता है मेरे जैसे आदमी को हर गाँव थोड़ा असामान्य ही लगे, पर मल्लावां निश्चय ही ऐसी जगह है, जहाँ खड़े होकर सहज बिल्कुल नहीं रहा जा सकता। मैंने रातों को वहां अंधेरा कुछ ज्यादा ठहरा हुआ, लगभग जमा हुआ-सा पाया और आदमी खुश्क होकर बुझे दीए की तरह खामोश।

मुझे अब महसूस हुआ, रामेश्वर बाबू में भी दरअसल यही आदत रही होगी। मुझे हमेशा लगता रहा है कि रामेश्वर मितभाषी हैं। अक्सर दो-चार शब्दों से ज्यादा कभी नहीं बोलते। कार्यकारिणी या राष्ट्रीय परिषद की धुआंधार बैठकों में भी बहत ज्यादा जरूरी होने पर ही एक-दो वाक्य बोलते हैं। उनके साथ कई बार लंबी यात्राएँ भी की हैं। यात्राओं के दौरान मैंने उन्हें बातचीत के लिए उत्सुक कभी नहीं पाया।
वे महासंघ के उपाध्यक्ष हैं। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की यूनियन के अध्यक्ष हैं। उनकी यूनियन के सदस्यों को उन पर अंधविश्वास है। एक बार उनके सदस्यों की एक सभा में उन पर भाषण देने के लिए दबाव डाला गया। वह भाषण मुझे आज भी याद है, क्योंकि चार के अलावा पांचवां वाक्य वे नहीं बोले थे।

सहसा मैं इनके इस तरह मितभाषी होने का रहस्य जान गया। खामोशी तो उन्हें अपने परिवेश से मिली थी।
चारपाई पर लेटे हुए वे इस समय भी इतने ही खामोश थे। सुबह से वे सिर्फ तीन बार अपने हमेशा जैसे संकेत-वाक्यों में बोले थे। मेरे आने पर उन्होंने लेटे-लेटे नमस्कार किया और पूछा, ‘वहां सब ठीक ?’
मैंने उन्हें संक्षेप में यूनियन की स्थिति बता दी। सुनकर वे चुप हो गए। बस। दागदार मत्थे वाले हथौड़े से तांबे की मोटी चादर को लापरवाही से पीटकर गढ़े-से उनके चेहरे पर यातना की कमजोरी के बावजूद हमेशा जैसी भिंची मुस्कराहट बनी हुई थी। मुझे कसमसाते देखकर उन्होंने धीरे से पूछा, ‘गर्मी ?’

वहां गर्मी थी। हवा थमी होने की वजह से घुटन भी थी, जो एक बेचैनी-सी पैदा करती थी। मपर मैं भरसक अपनी इस असुविधा को जाहिर नहीं होने देना चाहता था।
मल्लावां नाम की इस जगह की यह मेरी तीसरी यात्रा थी। बिना किसी पूर्व योजना के। तीनों ही यात्राएँ लगभग अनायास ही हुई थीं, लेकिन मैं भाग्यवादी होता तो अब तक जरूर यह विश्वास कर चुका होता कि कहीं न कहीं इन यात्राओं के आयोजन में मल्लावां माई का हस्तक्षेप है।


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