ताओ उपनिषद भाग-6 - ओशो Tao Upanishad bhag-6 - Hindi book by - Osho
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ताओ उपनिषद भाग-6

ओशो

प्रकाशक : फ्यूजन बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :427
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7266
आईएसबीएन :978-81-288-2078

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ओशो द्वारा लाओत्से के ‘ताओ तेह किंग’ पर दिए गए 127 प्रवचनों में से अंतिम 21 (एक सौ सात से एक सौ सत्ताईस) अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन...

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Tao Upnishad bhag-6 - A Hindi Book - by Osho

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रेम आत्मा का भोजन है। प्रेम आत्मा में छिपी परमात्मा की ऊर्जा है।
चीन की रहस्यमयी ताओ परंपरा के उद्गाता लाओत्से के वचनों पर ओशो के इन प्रस्तुत प्रवचनों के मुख्य विषय-बिंदु :
*वास्तविक प्रेम क्या है ?
*प्रेम कब कारागृह बनता है और कब मुक्ति ?
*स्वस्थ जीवन के लिए क्या आधार हों ?
*असंघर्ष के महत परिणाम।

जैसे शरीर और अस्तित्व के बीच श्वास ने जोड़ा है तुम्हें वैसे ही प्रेम की तरंगें जब बहती हैं तभी तुम परमात्मा से जुड़ते हो। उस जुड़ने में ही पहली बार तुम्हें अपने होने के यथार्थ का पता चलता है।
इसलिए प्रेम से महत्वपूर्ण कोई दूसरा शब्द नहीं। प्रेम से गहरी दूसरी कोई अनुभूति नहीं।
प्रेम के अतिरिक्त तुम न केवल अपने को अकारण पाओगे, न केवल व्यर्थ पाओगे, बल्कि तुम हजारों आंखों में अनुभव करोगे कि तुम एक दुर्घटना हो, तुम्हारा होना एक अपशकुन है, कोई तुम्हारे कारण सौभाग्य से नहीं भरा है, तुम्हारे कारण सब तरफ दुर्भाग्य के चिह्न हैं।

भूमिका


ओशो की किताब, उपनिषद पर मनन, और भूमिका हेतु मेरा चयन ? यह तो कोई मेल ही नहीं हुआ। लेकिन जैसा कि सारे ओशो प्रेमी जानते हैं, विचार यात्रा में ओशो सबके साथ हैं, सबसे उनका मेल है। शायद इसीलिए अवसर मुझे मिल रहा है। हमारे यहां बिना किताब पढ़े भूमिका लिखने का फैशन रहा है। मैं यह अपराध तो नहीं कर कर रहा हूं, लेकिन किताब पढ़कर जो पंक्तियां सूझीं वो प्रस्तुत कर रहा हूं :–
‘‘यदि मेरे कारण
किसी अपने या पराए को कई कष्ट होता है
और मेरा मन उसे महसूस करता है
तो, स्वयं को बचाने के लिए
कष्टों को नियति और
स्वयं को निमित्त मान लेता है
कृष्ण की उपस्थिति तो मैं आंखें मूंदकर मान लेता हूं
लेकिन मेरे मन के श्वेत और श्याम पक्ष
यह कह-कहकर आपस में लड़ते हैं
कि नियति हो या निमित्त
पूरी गीता कहां पढ़ते हैं ?’’

ओशो और लाओत्से में साम्य है। दोनों ने प्रकृति को, आदमी को खूब पढ़ा है। स्वयं को मथकर विचार दिए हैं। इसीलिए पंक्तियां, विचार हृदय पर अंकित हो जाते हैं।

*जीवन की संपदा मुफ्त नहीं मिलती, कुछ चुकाना पड़ेगा।
*विक्षिप्तता और विमुक्तता ये दो छोर हैं, बीच में खड़े हो तुम।
*तुम्हारे साधु पुरुष छोटी-छोटी बातों में तुम्हें सुख नहीं लेने देते, क्योंकि वे बड़े कठोर हैं।
*अपने केंद्र स्वयं हो जाओ तब जीवन में क्रांति संभव है।
*सृजन है असली बल, लेकिन दिखाई नहीं पड़ता, क्योंकि वह जल की तरलता जैसा है।
*जो प्रथम होने की दौड़ में लग जाएगा वह परमात्मा के राज्य में अंतिम रह जाएगा।
*संप्रदाय मृत घटना है।
*संत सत्ता से ऊपर होना चाहिए।
*भय से कुछ भी नष्ट नहीं होता, सिर्फ दब जाता है।
*समाज कृत्य की फिक्र करता है, तुम्हारी अंतरात्मा की नहीं।
*जिस दिन तुम अपने को पहचान लेते हो, अचानक तुम सारे अस्तित्व को पहचान लेते हो।
*जानने के दावे सिर्फ अज्ञानी करते हैं।
*जागना ही जानना है, जागने की क्षमता तुम्हारी आत्मा की क्षमता है।

ये तो केवल कुछ शब्द मोती हैं, खजाना हासिल करना हो तो सागर में गहरे उतरना होगा। अब आप हैं, किताब है, और मोती खोजने की आपकी क्षमता !–तीनों का प्रणाम।

सुभाष काबरा

अनुक्रम


१॰७. मेरे तीन खजाने : प्रेम और अन-अति और अंतिम होना
१॰८. प्रेम को सम्हाल लो, सब सम्हल जाएगा २७
१॰९. परमात्मा परम लयबद्धता है ४७
११॰. श्रेष्ठता वह जो अकेली रह सके ६५
१११. असंघर्ष : सारा अस्तित्व सहोदर है ८५
११२. आक्रामक नहीं, आक्रांत होना श्रेयस्कर है १॰३
११३. मुझसे भी सावधान रहना १२५
११४. संत को पहचानना महा कठिन है १४३
११५. मूर्च्छा रोग है और जागरण स्वास्थ्य १६३
११६. संत स्वयं को प्रेम करते हैं १८१
११७. मुक्त व्यवस्था–संत और स्वर्ग की २॰१
११८. अभय और प्रेम जीवन के आधार हों २२१
११९. राजनीति को उतारो सिंहासन से २४१
१२॰. धर्म का सूर्य अब पश्चिम में उगेगा २५९
१२१. जीवन कोमल है और मृत्यु कठोर २८१
१२२. संत संसार भार को देता है, और बेशर्त ३॰१
१२३. निर्बल के बल राम ३२३
१२४. प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए जिम्मेवार है ३४३
१२५. राज्य छोटा और निसर्गोन्मुख हो ३६१
१२६. परमात्मा का आशीर्वाद बरस रहा है ३८१
१२७. प्रेम और प्रेम में भेद है ४॰१


मेरे तीन खजाने : प्रेम और अन-अति और अंतिम होना


आँखें जब अंधेरे की आदी हो जाएं तो प्रकाश अंधकार जैसा मालूम होगा। अंधेरे में ही तुम जीए हो; तो आज अचानक सूरज द्वार पर आ जाए तो उसकी चकाचौंध में तुम्हारी आंखें बंद ही हो जाएंगी। प्रकाश को समझने के लिए प्रकाश की यात्रा, प्रकाश का स्वाद, प्रकाश का जीवन में प्रशिक्षण चाहिए।

परमात्मा को खोजने बहुत लोग निकलते हैं, लेकिन परमात्मा अगर तुम्हें राह पर मिल जाए–और बहुत बार मिलता है–तो तुम उसे पहचान न पाओगे। तुम उसे पहचानोगे कैसे ? तुमने अब तक जो जाना है उससे तो वह बिलकुल भिन्न है। तुम्हारा अब तक जो भी ज्ञान है उस ज्ञान से तो उस परमात्मा को तुम बिलकुल भी न पहचान पाओगे।
दो ही उपाय हैं। अगर तुमने अपना ज्ञान पकड़ा तो परमात्मा सामने भी होगा तो दिखाई न पड़ेगा। दूसरा उपाय है, अगर तुमने अपना ज्ञान छोड़ दिया तो परमात्मा सामने न भी हो तो भी सब तरफ वही दिखाई पड़ेगा। तुम्हारी ज्ञान की पकड़ तुम्हें अंधा बनाए हुए है।

इसलिए जब भी कभी किसी व्यक्तित्व में परमात्मा की ज्योति उतरती है तो हम उसे पहचान नहीं पाते। अन्यथा जीसस को सूली पर चढ़ाने की जरूरत क्या थी ? और जिन्होंने जीसस को सूली पर चढा़या उनको भी भ्रांति है कि वे परमात्मा के खोजी और प्रेमी हैं। न केवल यही, बल्कि उन्हें लगता है कि जीसस परमात्मा का दुश्मन है।
जीसस को वे न पहचान पाए, परमात्मा को तो कैसे पहचानेंगे ! जीसस तो एक किरण हैं उसकी, वह भी पहचानी न जा सकी, तो जब समग्र सूर्य तुम्हारे सामने होगा तब तो तुम बिलकुल अंधे हो जाओगे। तुम्हें सिवाय अंधकार के और कुछ भी दिखाई न पड़ेगा।

इसलिए ज्ञानी अक्सर अज्ञानियों के बीच महा अज्ञानी मालूम पड़ता है। ऐसा ही समझो कि तुम सब अंधे होओ और एक आंख वाला व्यक्ति भूल-चूक से पैदा हो जाए। तो सारे अंधे मिल कर या तो उसकी आंखें फोड़ देंगे, क्योंकि वे बरदाश्त न कर सकेंगे। और अंधों का तर्क यह होगा कि कभी तुमने सुना है कि आंख वाला आदमी होता है ! जरूर प्रकृति की कहीं कोई भूल हो गई है। अंधा ही होता है आदमी; आंखों में कहीं कुछ भूल है।

यही ज्ञानियों के साथ हमारा व्यवहार रहा है। हम पूजते हैं उन्हें जब वे मर जाते हैं, क्योंकि मृत्यु की भाषा हम समझते हैं। जीवन की भाषा का हमें कुछ भी पता नहीं। जब उन्हें कब्रों में दफना देते हैं, तब हमारे पूजा के फूल बड़े मुखर हो उठते हैं, तब हमारे अर्चना के दीये जलने लगते हैं। क्योंकि अब हम समझ सकते हैं; कब्र में जो मौत है वह हमारी समझ में आ सकती है कब्र में सिर्फ अंधेरा है; अंधेरे के हम आदी हैं। हम मृत्यु में ही जीते रहे हैं; जीवन को हमने कभी जाना नहीं। जीवन हमारी आशाओं में रहा है, सपनों में, लेकिन उसकी कोई प्रतीति हमें कभी हुई नहीं। हम केवल मृत्यु से भयातुर, मृत्यु से घिरे कंपते हुए जीए हैं। मृत्यु को हम समझ सकते हैं। इसलिए जैसे ही कोई ज्ञानी व्यक्ति मर जाता है, हजारों उसकी कब्र की पूजा पर संलग्न हो जाते हैं; मंदिर-मस्जिदें खड़ी होती हैं, गुरुद्वारे बनते हैं। और जब ज्ञानी जीवित होता है तब सिर्फ लोग पत्थर ही फेंकते है, तब सिर्फ लोग निंदा ही करते हैं।

गणित साफ है। जब ज्ञानी जीवित होता है तुमसे उसका कोई तालमेल नहीं बैठता। तुम अंधेरे के निवासी हो; वह रोशनी की खबर लाया। यह शब्द तुमने कभी सुना नहीं। शब्द भी सुना हो तो इस शब्द के रहस्य को तुमने कभी अनुभव नहीं किया। वह किसी अनजान देश से आया है; वह कुछ अजनबी बातें कह रहा है। और उन बातों पर भरोसा करना खतरनाक है। खतरनाक इसलिए है कि अगर तुम उन बातों पर भरोसा करोगे तो तुम्हारी जो सुव्यवस्थित गुलामी है वह खंड-खंड हो जाएगी; जो तुम्हारा सुव्यवस्थित अंधकार है...। अंधकार में तुमने अपना घर बना लिया है। अंधकार को तुमने खूब साज-संवार लिया है। तुमने अंधकार को खूब सजावट और श्रृंगार से भर लिया है। तुम भूल ही गए हो कि यह अंधकार है। तुमने अपनी जंजीरों पर भी हीरे-माणिक लगा लिए हैं, और तुमने उनको आभूषण मान लिया है। तुमने अपनी मृत्यु को भी जीवन समझ रखा है।

अगर तुम ज्ञानी की बात सुनोगे तो खतरा यही है कि वह तुम्हें अस्तव्यस्त कर देगा। वह तुम्हारी सारी व्यवस्था को तोड़ देगा। तुम्हारी सारी सुरक्षा की नीवें हिल जाएंगी। और तुमने जो भवन बड़ी मेहनत से बनाया है जन्मों-जन्मों में, अगर तुमने ज्ञानी का एक शब्द भी सुन लिया तो तुम पाओगे कि वह रेत का भवन है–अब गिरा, तब गिरा। तुमने ताश के पत्तों का घर बना लिया है। तुम उसके भीतर बड़े प्रसन्न हो। पता चल जाए कि ताश का घर है, तुम फिर कैसे प्रसन्न रह पाओगे ? फिर दूसरे और असली घर की खोज पर निकलना होगा। और यात्रा दुर्गम है। और कभी कोई पहुंचता है; हजारों चलते हैं, एकाध पहुंचता है।

इसलिए सरल यही है तुम्हारे अज्ञान में कि तुम कह दो इस ज्ञानी को कि यह मूढ़ है, पागल है। यह तुम्हारे बचने का उपाय है। यह तुम्हारी सुरक्षा है। जब तुम ज्ञानी को कह देते हो कि मूढ़ है, तब तुम अपनी मूढ़ता को बचा लेते हो। जब तुम ज्ञानी को कह देते हो पागल है, तब तुम अपने पागलपन को बचा लेते हो। क्योंकि तुम दो में से कोई एक ही सही हो सकता है, दोनों नहीं। अगर बुद्ध सही हैं, अगर क्राइस्ट सही हैं, अगर मैं सही हूं, तो तुम गलत हो। और समझौता यहां न चलेगा। या तो मैं सही हूं, या तुम सही हो। ज्ञानी का कोई समझौता अज्ञानी से नहीं हो सकता। क्या समझौता करोगे ? कैसे मिलाओगे अंधेरे और रोशनी को ? कभी कोशिश की है ?

लोग कहते हैं, पानी में तेल नहीं मिलाया जा सकता। लेकिन यह भी हो सकता है कि पानी में तेल किसी तरकीब से मिला लिया जाए, लेकिन अंधेरे में रोशनी कैसे मिलाओगे ? अंधेरा अभाव है प्रकाश का। तो अभाव को भाव से कैसे मिलाओगे ? प्रकाश होता है तो अंधेरा हो नहीं सकता; अंधेरा होता है तो प्रकाश हो नहीं सकता। दोनों अलग-अलग ही हो सकते हैं। उनके बीच कोई समझौता नहीं है।

एक ही उपाय है : अगर तुम ज्ञानी को सुनने को राजी हो जाओ; एक क्षण भी मौका दो, जरा सा झरोखा खोलो अपने हृदय का। तो तुम मुश्किल में पड़ोगे। क्योंकि तुम्हारे बनाए हुए सब घर झूठे हो जाएंगे, तुम्हारे बनाए हुए सारे इंतजाम व्यर्थ हो जाएंगे। तुमने जो सजावट की है वह सारी सजावट तुमने कागज के घर में कर रखी है। वह घर गिरेगा। वह घर गिर ही रहा है। उस घर में आग लगने वाली है। उस घर में आग लगी ही है। अगर तुम ज्ञानी की सुनोगे तो तुम्हें अपने इन घरघूलों को छोड़ कर बाहर आना होगा। वह तुम्हें खुले आकाश का निमंत्रण देता है। वह तुम्हें स्वतंत्रता के लिए पुकारता है। परम मोक्ष की तरफ उसका इशारा है। डर लगता है। अज्ञात में जाने में भय पकड़ता है। जिन रास्तों पर हम चले नहीं, उन पर वह बुलाता है। जिन मार्गों को हमने कभी छुआ नहीं, उन पर निमंत्रण देता है। और कोई नक्शा नहीं है उन मार्गों का कि तुम्हें आश्वस्त किया जा सके। उन मार्गों को कोई भी पूरा जान नहीं पाया है कि नक्शे बनाए जा सकें।

परमात्मा के नक्शे कभी भी न बनाए जा सकेंगे। क्योंकि वह कोई जड़ वस्तु नहीं है; गत्यात्मक है, प्रतिपल रूपांतरित हो रहा है, प्रतिपल पूर्ण से पूर्णतर की तरफ जा रहा है। तो केवल साहसी ही आ सकते हैं इस अभियान में। तो फिर तुम क्या करोगे अपने भय को ? अपनी कायरता को कैसे छिपाओगे ? क्योंकि यह स्वीकार करने में भी पीड़ा होती है कि मैं कायर हूं। यह स्वीकार करने में भी अहंकार को बड़ी चोट पहुंचती है कि मैं अज्ञानी हूं।

इसलिए जो भी ज्ञान का संदेश लेकर तुम्हारे द्वार पर दस्तक देता है वह तुम्हारे अहंकार पर चोट करता है। जो भी तुम्हारे पास लेकर आता है ज्ञान बांटने को वही तुम्हें दुश्मन जैसा मालूम पड़ता है। क्योंकि अगर तुम ज्ञान लेते हो तो तुम अज्ञानी थे। अगर तुम उसका निमंत्रण स्वीकार करते हो तो अब तक तुमने जो यात्राएं कीं वे व्यर्थ ही गईं, उनमें कोई भी तीर्थयात्रा न थी; अब तक तुम भटके। अगर तुम गुरु को स्वीकार करते हो तो उस स्वीकार में यह छिपा है कि अनंत-अनंत जन्मों तक तुमने जो यात्रा की वह तुम्हारी भटकन थी, भटकाव था। गुरु को स्वीकार करने का अर्थ है : जन्मों-जन्मों के अहंकार को छोड़ देना।
बहुत कठिन है। अहंकार तर्क खोजता है। अहंकार कहता है, यह आदमी मूढ़ मालूम होता है।

मैंने सुना है, एक सूफी कथा है कि एक आदमी परम गुरु की तलाश में था। बीस वर्षों तक उसने खोज की। न मालूम कितने गुरुओं के पास गया। लेकिन कुछ न कुछ भूल उसने निकाल ही ली। गुरु में कुछ न कुछ कमी मालूम पड़ी। कोई गुरु हंसता हुआ मिला। तो उसने सोचा, यह भी कोई गुरु हो सकता है ! गुरु तो गंभीर होते हैं। हमारे पास शब्द है : गुरु-गंभीरता। उसने कहा, यह भी कोई गुरु हो सकता है जिसके चेहरे पर आनंद की जरा भी झलक नहीं ! ऐसा हर जगह उसने कुछ न कुछ खोज लिया। कोई गुरु उपवास करता था। तो उसने सोचा, यह तो आत्मघात है। और कोई गुरु ठीक से खाता-पीता था। तो उसने कहा, यह तो निपट भोगी है। बीस वर्ष अनेकों गुरुओं के पास गया, लेकिन परम गुरु, परफेक्ट मास्टर, नहीं मिल सका।

बीस साल बाद थक गया। मौत भी करीब आने लगी। इसलिए मापदंड उसने थोड़े शिथिल कर लिए, कि अब तो मरने के करीब आ रहा हूं, अब तो थोड़ा कमोबेश भी मिल जाए, अठारह-उन्नीस भी चलेगा। न हुआ बीस, लेकिन अब मौत करीब आ रही है। तो जब उसने अपने मापदंड थोड़े शिथिल किए, एक गुरु मिल गया, जो उसे लगा कि परिपूर्ण है। सब तरफ से जांच-परख करके उसने भरोसा कर लिया।

एक दिन सुबह जाकर गुरु के चरणों में उसने निवेदन किया कि मैं परम गुरु की तलाश में था; बीस साल भटका; अंततः आप मिल गए; मेरी यात्रा पूरी हुई। क्या आप परम गुरु हैं ? गुरु ने कहा, अगर मैं कहूं हूं, तो वही कारण बन जाएगा मेरे परम गुरु न होने का; अगर मैं कहूं नहीं हूं, तो जब खुद ही कह रहा हूं कि नहीं हूं तो सवाल ही कहां उठता है लेकिन अब तुमने पूछ ही लिया है तो मुझे पता नहीं कि मैं परम गुरु हूं कि नहीं हूँ, लेकिन ऐसी मेरी ख्याति है; लोग कहते हैं। ऐसा लोग कहते हैं कि यह परम गुरु है। तो उसने कहा, ठीक, अब मैं भी थक गया हूं खोजते-खोजते, और आप ने भी मुझे डरा दिया। लेकिन अब बहुत हो गयी खोज, अब मौत करीब आती है, तो मैं तो स्वीकार करने को राजी हूं। मैं परम गुरु की तलाश में था, आप मिल गए, मुझे शिष्य की तरह स्वीकार कर लें।
उस गुरु ने कहा, यह जरा मुश्किल है ?

शिष्य ने कहा, क्यों मुश्किल है ? मैं मरने के करीब आ गया।
तुम्हारी मृत्यु से मेरा क्या लेना-देना मैं परम शिष्य की तलाश में हूं।

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