अष्टावक्र महागीता भाग-6 न संसार न मुक्ति - ओशो Ashtavakra Mahageeta bhag-6 Na Sansar Na Mukti - Hindi book by - Osho
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अष्टावक्र महागीता भाग-6 न संसार न मुक्ति

ओशो

प्रकाशक : फ्यूजन बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :315
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7272
आईएसबीएन :81-89605-82-8

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अष्टावक्र महागीता भाग-6 न संसार न मुक्ति...

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Ashtavakra Mahageeta bhag-6 Na Sansar Na Mukti - A Hindi Book - by Osho

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जब तक सहारा है तब तक मन रहेगा। सहारा मन को ही चाहिए। आत्मा को किसी सहारे की जरूरत नहीं है। मन लंगड़ा है; इसको बैसाखियां चाहिए। तुम बैसाखी किस रंग की चुनते हो इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। मन को कुछ उपद्रव चाहिए, व्यस्तता चाहिए, आक्युपेशन चाहिए। किसी बात में उलझा रहे। माला ही फेरता रहे तो भी चलेगा। रुपयों की गिनती करता रहे तो भी चलेगा। काम से घिरा रहे तो भी चलेगा। रामनाथ की चदरिया ओढ़ ले, राम-राम बैठकर गुनगुनाता रहे तो भी चलेगा। लेकिन कुछ काम चाहिए। कुछ कृत्य चाहिए। कोई भी कृत्य दे दो, हर कृत्य की नाव पर मन यात्रा करेगा और संसार में प्रवेश कर जाएगा।

अनुक्रम


५१. शून्य की वीणा : विराट के स्वर
५२. तू स्वयं मंदिर है ३९
५३. धर्म अर्थात सन्नाटे की साधना ६६
५४. साक्षी, ताओ और तथाता ९८
५५. परमात्मा हमारा स्वभावसिद्ध अधिकार है १२९
५६. आलसी शिरोमणि हो रहो १६२
५७. तथाता का सूत्र-सेतु है १९१
५८. संन्यास-सहज होने की प्रक्रिया २२१
५९. साक्षी स्वद है संन्यास है २५१
६॰. प्रभु-मंदिर यह देह री २८३


प्रवचन : ५१

शून्य की वीणा : विराट के स्वर


1 दिसंबर, 1976
अष्टावक्र उवाच।

कृतार्थोऽनेन ज्ञानेनेत्येवं गलितधीः कृती।
पश्यंच्छृण्वन्स्पृशजिं घ्रन्नश्नान्नास्ते यथासुखम्।।164।।
शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च।
न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीण संसार सागरे।।165।।
न जागर्ति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति।
अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः।।166।।
सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः सर्वत्र विमलाशयः।
समस्तवासनामुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते।।167।।
पश्यंच्छृण्वनन्स्पृर्शाग्ज घ्रन्नश्नन्गृह्यन्वदन्वव्रजन्।
ईहितानीहितैर्मुक्तो मुक्त एव महाशयः।।168।।
न निन्दति न च स्तौति न ह्वष्यति न कुप्यति।
न ददाति न गृहणाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः।।169।।
कृतार्थोऽनेन ज्ञानेनेत्येवं गलितधीः कृती।
पश्यंच्छृण्वन्स्पृशजिं घ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम्।।

‘इस ज्ञान से कृतार्थ अनुभव कर गलित हो गई है बुद्धि जिसकी, ऐसा कृतकार्य पुरुष देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, सुखपूर्वक रहता है।’
यह जो ज्ञान है कि मैं साक्षी हूं, यह जो बोध है कि मैं कर्ता नहीं हूँ–यही कृतार्थ कर जाता है। बड़ा विरोधाभासी वक्तव्य है। क्योंकि कृतार्थ का तो अर्थ होता है–करके जो तृप्ति मिलती है; कृति से जो अर्थ मिलता; कुछ कर लिया। एक चित्रकार ने चित्र बनाया; चित्र बन गया, तो जो तृप्ति होती है। कृतार्थ का तो अर्थ ऐसा है : तुम एक भवन बनाना चाहते थे, बना लिया। उसे देख कर प्रफुल्लित होते हो कि जो करना चाहा था कर लिया; हजार झंझटें थीं, रुकावटें थीं, बाधाएं थीं–पार कर गए, विजय मिली, वासना पूरी हुई।

तो कृतार्थ शब्द का तो साधारणतः ऐसा अर्थ होता है–करने से जो सुख मिलता है। अकृतार्थ वही है जिसने किया और न कर पाया; हारा, पराजित हुआ, गिर गया–तो विषाद से भर जाता है। लेकिन अष्टावक्र की भाषा में, ज्ञानियों की भाषा में कृतार्थ वही है जिसने यह जाना कि कर्ता तो मैं हूं ही नहीं। जो कर्ता बन कर ही दौड़ता रहा वह लाख कृतार्थ होने की धारणाएं कर ले–कभी कृतार्थ होता नहीं। एक चीज बन जाती है, दूसरी को बनाने की वासना पैदा हो जाती है। एक वासना जाती नहीं, दस की कतार खड़ी हो जाती है। एक प्रश्न मिटता नहीं, दस खड़े हो जाते हैं। एक समस्या से जूझे कि दस समस्याएं मौजूद हो जाती हैं। इसे कहा है संसार-सागर। लहर पर लहर चली आती है। तुम एक लहर से जूझो, किसी तरह एक को शांत करो, दूसरी आ रही है। लहरों का अनंत जाल है। इस भांति तुम जीत न सकोगे।
एक-एक समस्या से लड़ कर तुम कभी जीत न सकोगे–यह बहुमूल्य सूत्र है।

साधारणतः मनुष्य की बुद्घि ऐसा सोचती है, एक-एक समस्या से सुलझ लें।
मेरे पास लोग आते हैं। कोई कहता है, क्रोध की बड़ी समस्या है; क्रोध को जीत लूं तो बस सब हो गया। कोई कहता है, कामवासना से पीड़ित हूं, जाती नहीं; उम्र भी गई, देह भी गई लेकिन वासना अभी भी मंडराती है; बस इससे छुटकारा हो जाए तो मुझे कुछ नहीं चाहिए। कोई लोभ से पीड़ित है, कोई मोह से पीड़ित है, किसी की और समस्याएं हैं। लेकिन अधिकतर ऐसा होता है कि जब भी कोई एक समस्या लेकर आता है तो वह एक खबर दे रहा है–वह खबर दे रहा है कि वह सोचता है : समस्या एक है। एक दिखाई पड़ रही है अभी, पीछे लगी कतार तुम्हें तभी दिखाई पड़ेगी जब यह एक हल हो जाए। क्यू लगा है। तो तुम किसी तरह क्रोध को हल कर लो, तो तुम अचानक पाओगे कि कुछ और पीछे खड़ा है। क्रोध ने नया रूप ले लिया, नया ढंग ले लिया।

पश्चिम में मनस्विद इसी चेष्टा में संलग्न हैं : एक-एक समस्या को हल कर लो। जैसे कि समस्याएं अलग-अलग हैं ! वैसी दृष्टि ही गलत है। सब समस्याएँ इकट्ठी जुड़ी हैं–एक जाल है।
देखा मकड़ी का जाला ? एक धागे को हिला दो, पूरा जाल हिलता है ! ऐसा समस्याओं का जाल है, संयुक्त है। क्रोध लोभ से जुड़ा है, लोभ मोह से जुड़ा है, मोह काम से जुड़ा है–सब चीजें संयुक्त हैं। तुम एक को हल न कर पाओगे। एक को हल करने चलोगे, कभी न हल कर पाओगे, क्योंकि अनेक हैं समस्याएं; एक-एक करके चले, कभी हल न होगा। यह तो ऐसा ही होगा जैसे कोई चम्मच-चम्मच पानी सागर से निकाल कर सागर को खाली करने की चेष्टा करता हो। यह तो तुमने बहुत छोटा मापदंड ले लिया। इस विराट को तुम हल न कर पाओगे।

इसलिए पूरब ने एक नई दृष्टि खोजी : क्या कोई ऐसा उपाय है कि हम सारी समस्याओं को एक झटके में समाप्त कर दें। इंच-इंच नहीं, टुकड़ा-टुकड़ा नहीं, पूरी समस्या को हल कर दें। समस्या मात्र उखड़ जाए। लहर से न लड़ें; उस हवा को ही बहना बंद कर दें, जिसके कारण हजारों लहरें उठती हैं।
वही सूत्र है साक्षी का : तुम समस्याओं को हल मत करो; तुम समस्याओं के पीछे खड़े हो जाओ। तुम बस देखो। तुम्हारी दृष्टि अगर थिर हो गयी तो समस्याएं गिर जाएंगी। क्योंकि समस्याएं पैदा होती हैं तुम्हारी दृष्टि की अथिरता से। तुम्हारी दृष्टि का कंपन ही समस्याओं को पैदा करता है।

तो गहरे में एक ही समस्या है कि तुम अंधे हो। गहरे में एक ही समस्या है कि तुम्हारी दृष्टि थिर नहीं। गहरे में एक ही समस्या है कि तुम्हारी आँखों में अँधेरा है, या तुमने पलक खोलने की कला नहीं सीखी। उस एक को हल कर लो।
तो पूरब में हम कहते हैं : ‘एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए।’ यह सदियों की अनुभूति का निचोड़ है इन सीधे-सादे वचनों में : एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए। तो तुम खंड-खंड मत साधना, नहीं तो कभी जीत न पाओगे; पत्ती-पत्ती मत काटना, अन्यथा वृक्ष कभी गिरेगा नहीं। जड़ को काट डालना। जड़ है अहंकार। जड़ है तादात्म्य। जड़ है इस बात में कि मैंने मान रखा है कि मैं देह हूं, जो कि सच नहीं। मैं देह नहीं हूं। मैंने मान रखा है कि मैं मन हूं, जो कि सच नहीं है। इन झूठों की मान्यताओं के कारण फिर हजार झूठों की कतार खड़ी हो गई है। तुम मूल झूठ को हटा लो, तुम आधारशिला को खींच लो–यह ताशों का भवन जो खड़ा है, तत्क्षण गिर जाएगा। तुम आधार से जूझ लो। तुम अनेक से मत लड़ो। यह अनेक गुरियों के बीच पिरोया हुआ एक ही धागा है। तुम एक-एक गुरिए से सिर मत मारो। तुम उस एक धागे को खींच लो, यह माला बिखर जाएगी। यह माला बचेगी नहीं। और तुम एक-एक गुरिए से लड़ते रहे और भीतर का धागा मजबूत रहा, तो तुम जीत न पाओगे। गुरिए अनंत है। तुम्हारी सीमा है। तुम्हारा समय है। तुम्हारी क्षमता...। गुरिए अनंत हैं। क्या-क्या हल करोगे ? मनुष्य-जाति हल करने में लगी है।

दुनिया में दो ही तरह के लोग हैं। एक, जो समस्याओं को अलग-अलग हल कर रहे है; और एक, जो समस्याओ के मूल के प्रति जाग रहे हैं। जो मूल के प्रति जागता है, जीत जाता है। देख लो खड़े हो कर। जरा भी चुनाव मत करो। क्रोध है–सही, रहने दो; तुम दूर खड़े होकर क्रोध को देखने वाले बन जाओ। की द्रष्टा का थोड़ा स्मरण करो। काम है, लोभ है–द्रष्टा का स्मरण करो। तुम चकित होओगे। तुम धन्य-भाव से भर जाओगे। जैसे ही तुम क्रोध को गौर से देखोगे, क्रोध जाने लगा। तुम्हारे देखते-देखते क्रोध का धुआं विलीन हो जाता है और अक्रोध की परम शांति छुट जाती है। तुम्हारे देखते-देखते वासना कहां खो गई पता नहीं चलता–और एक निर्वासना का रस बहने लगता है।

‘साक्षी के ज्ञान से कृतार्थ अनुभव कर गलित हो गई है बुद्धि जिसकी...।’
यह शब्द ‘गलितधीः’ बड़ा महत्वपूर्ण है। यह ध्यान की परिभाषा है। यह अनिर्वचनीय का निर्वचन है। जो नहीं कहा जा सकता है, उसकी तरफ बड़ा गहरा संकेत है। गलितधीः–जिसकी बुद्धि गल गई। ध्यान यानी गलितधीः–जिसकी बुद्धि गल गई।

बुद्धि क्या है ? सोच-विचार ऊहापोह, प्रश्न-उत्तर, चिंतन-मनन, तर्क-वितर्क, गणित-भाग। बुद्धि का अर्थ है : मैं हल कर लूंगा। ‘बुद्धि गल गई’ का अर्थ है : मेरे हल किए हल नहीं होता है। सच तो यह है जितना मैं हल करना चाहता हूं उतना उलझता है। मेरे हल करने से ही उलझन बढ़ी जा रही है।
गलितधीः का अर्थ है कि मैं अपने को हटा लेता हूं, मैं हल न करूंगा; जो है, जैसा है, रहने दो। मैं बीच से हटा जाता हूं। और चमत्कार घटित होता है : तुम्हारे हटते ही सब हल हो जाता है। क्योंकि मौलिक रूप से तुम्हीं कारण हो उलझाव के।
कभी तुमने देखा कि जिस समस्या के साथ तुम जुड़ जाते हो वहीं हल मुश्किल हो जाता है !

ऐसा समझो, किसी डाक्टर की पत्नी बीमार है। आपरेशन करना है। बड़ा सर्जन है डाक्टर, लेकिन अपनी पत्नी का आपरेशन न कर सकेगा। क्या अड़चन आ गई ? न मालूम कितनी स्त्रियों का आपरेशन किया है ! कभी हाथ न कंपे। अपनी पत्नी को टेबल पर लिटाते ही हाथ कंपते हैं। क्यों ? अपनी है ! जुड़ गया। एक तादात्म्य बन गया : ‘यह स्त्री मेरी पत्नी है, कहीं मर न जाए ! कहीं भूल-चूक न हो जाए ! आखिर मैं आदमी ही हूं ! बचा पाऊंगा, न बचा पाऊंगा !’ दूसरी स्त्रियों के आपरेशन किए थे, तब ये सब बातें नहीं थीं। तब वह शुद्ध सर्जन था। तब कोई तादात्म्य न था। तब बड़ी तटस्थता थी। तब वह सिर्फ अपना काम कर रहा था। कुछ लेना-देना न था। बचेगी न बचेगी, बच्चों का क्या होगा, क्या नहीं होगा–यह सब कोई चिंता न थी। वह बाहर था। उसने अपने को जोड़ा नहीं था। इस पत्नी के साथ उसने अपने को जोड़ लिया : ‘यह मेरी है।’ बस, यह मेरे के भाव ने समस्या खड़ी कर दी।

तो बड़े से बड़े सर्जन को भी अपने बच्चे या अपनी पत्नी का आपरेशन करना हो, तो किसी और सर्जन को बुलाना पड़ता है, चाहे नंबर दो के सर्जन को बुलाना पड़े, उससे कम हैसियत का हो सर्जन; लेकिन खुद हट जाना पड़ता है, क्योंकि तादात्म्य है।
जिस चीज से तुम जुड़ जाते हो वहीं समस्या खड़ी हो जाती है। जिस चीज से तुम हट जाते हो वहीं समस्या हल हो जाती है। इसे तुम अपने जीवन में पहचानना, परखना। जहां समस्या खड़ी हो, वहां गौर से देखना। तुम जुड़ गए हो। जरा छिटको। जरा अलग होओ। इस अलग हो जाने का नाम ही साक्षी है। और जुड़ कर फिर तुम हल करना चाहते हो ! आदमी की बड़ी सीमा है। जगत विराट है। समस्या बड़ी है। और हमारे पास बड़ी छोटी बुद्धि है। है ही क्या हमारे पास बुद्धि के नाम पर ? कुछ विचारों का संग्रह। इसी के आधार पर हम जीवन की इस महालीला को हल करने चले हैं।

ऐसा समझो कि एक चींटी आदमी के जीवन को समझना चाहे, तो तुम हंसोगे। तुम कहोगे, पागल हो जाएगी। ऐसा समझो कि एक चींटी गीता पर सरक रही है और गीता को समझने की चेष्टा करना चाहे, तो तुम हंसोगे। तुम कहोगे, पागल हो जाएगी। लेकिन अपनी तो सोचो। हमारी हैसियत इस विराट विश्व पर चींटी से कुछ ज्यादा है ? शायद चींटी तो गीता को समझ भी ले, क्योंकि गीता और चींटी में बहुत बड़ा अंतर नहीं है। अनुपात, बहुत बड़ा भेद नहीं है। लेकिन हममें और विराट विश्व में तो अनंत भेद है। इतना विराट है यह विश्व और हम इतने छोटे हैं ! हम इससे ही नापने चले हैं। हम अपने छोटे-छोटे विचारों को लेकर कल्पना कर रहे हैं कि जगत के रहस्य को हल कर लेंगे। यहीं भूल हुई जा रही है। हल तो कुछ भी नहीं होता, उलझन बढ़ती जाती है।

हमने जितना हल किया है उतनी उलझन बढ़ गई है। एक तरफ से हल करते हैं, दूसरी तरफ से उलझन बढ़ जाती है।
पश्चिम में एक नया आंदोलन चलता है, इकॉलॉजी–कि प्रकृति को नष्ट मत करो, अब और नष्ट मत करो। हालांकि हमने कोशिश की थी हल करने की। हमने डी. डी. टी. छिड़का, मच्छर मर जाएं। मच्छर ही नहीं मरते, मच्छरों के हटते ही वह जो जीवन की श्रृंखला है उसमें कुछ टूट जाता है। मच्छर किसी श्रृंखला के हिस्से थे। वे कुछ काम कर रहे थे।


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