अष्टावक्र महागीता भाग-7 समर्पित स्वतंत्रता - ओशो Ashtavakra Mahageeta bhag-7 Samarpit Swatantrata - Hindi book by - Osho
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अष्टावक्र महागीता भाग-7 समर्पित स्वतंत्रता

ओशो

प्रकाशक : फ्यूजन बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :294
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7273
आईएसबीएन :81-89605-83-6

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अष्टावक्र महागीता भाग-7 समर्पित स्वतंत्रता...

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Ashtavakra Mahageeta bhag-7 Samarpit Swatantrata - A Hindi Book - by Osho

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘जीवन तो जैसा है वैसा ही रहेगा। वैसा ही रहना चाहिए। हां, इतना फर्क पड़ेगा... और वही वस्तुतः आमूल क्रांति है। आमूल का मतलब होता है : ‘मूल से’। ...आमूल क्रांति का अर्थ होता है : जो अब तक सोये-सोये करते थे, अब जाग कर करते हैं। जागने के कारण जो गिर जाएगा, गिर जाएगा; जो बचेगा, बचेगा-लेकिन न अपनी तरफ से कुछ बदलना है, न कुछ गिराना, न कुछ लाना। साक्षी है मूल।

‘मैं वस्तुतः तुम्हें मुक्त कर रहा हूं। मैं तुम्हें क्रांति से भी मुक्त कर रहा हूँ। मैं तुमसे यह कह रहा हूं : ये सब कुछ करने की बाते ही नहीं है। तुम जैसे हो-भले हो, चंगे हो, शुभ हो, सुंदर हो। तुम इसे स्वीकार कर लो। तुम जीवन की सहजता को व्यर्थ की बातों से विकृत मत करो। विक्षिप्त होने के उपाय मत करो, पागल मत बनो !

अनुक्रम


६१. शुष्कपर्णवत जीयो
६२. घन बरसे ३३
६३. महाशय को कैसा मोक्ष ! ६१
६४. एकाकी रमता जोगी ८९
६५. जानो और जागो ११९
६६. अपनी बानी प्रेम की बानी १४८
६७. द्रश्य से द्रष्टा में छलांग १७६
६८. मन तो मौसम सा चंचल २॰४
६९. स्वातंत्र्यात् परमं पदम् २३५
७॰. दिल का देवालय साफ करो २६७


प्रवचन : 61

शुष्कपर्णवत जीयो


11 जनवरी, 1977
अष्टावक्र उवाच

निर्वासनो निरालंबः स्वच्छंदो मुक्तबंधनः।
क्षिप्तः संसारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत्।।197।।
असंसारस्य तु क्वापि न हर्षो न विषादता।
स शीतलमना नित्यं विदेह इव राजते।।198।।
कुत्रापि न जिहासाऽस्ति नाशो वापि न कुत्रचित्।
आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः।।199।।
प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया।
प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानता।। 200।।
कृतं देहेन कर्मेदं न मया शुद्धरूपिणा।
इति चिंतानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न।।201।।
अतद्वादीव कुरुते न भवेदपि बालिशः।
जीवन्मुक्वतः सुखी श्रीमान् संसरन्नपि शोभते।।202।।
नानाविचारसुश्रांतो धीरो विश्रांतिमागतः।
न कल्पते न जानाति न श्रृणोति न पश्यति।।203।।
निर्वासनो निरालंबः स्वच्छंदो मुक्तबंधनः।
क्षिप्तः संसारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत्।।

इन छोटी सी दो पंक्तियों में ज्ञान की परम व्याख्या समाहित है। इन दो पंक्तियों को भी कोई जान ले और जी ले तो हो गया। शेष करने को कुछ बचता नहीं।
अष्टावक्र के सूत्र ऐसे नहीं हैं कि पूरा शास्त्र समझें तो काम के होंगे। एक सूत्र भी पकड़ लिया तो पर्याप्त है। एक-एक सूत्र अपने में पूरा शास्त्र है। इस छोटे से लेकिन अपूर्व सूत्र को समझने की कोशिश करें।
‘वासनामुक्त, स्वतंत्र, स्वच्छंदचारी और बंधनरहित पुरुष प्रारब्धरूपी हवा से प्रेरित होकर शुष्क पत्ते की भांति व्यवहार करता है।’

लाओत्सु के जीवन में उल्लेख हैः कि वर्षों तक खोज में लगा रह कर भी सत्य की कोई झलक न पा सका। सब चेष्टाएं कीं, सब प्रयास, सब उपाय, सब निष्फल गए। थक कर हारा–पराजित एक दिन बैठा है–पतझड़ के दिन हैं–वृक्ष के नीचे। अब न कहीं जाना है, न कुछ पाना है हार पूरी हो गई। आशा भी नहीं बची है। आशा का कोई तंतु-जाल नहीं है जिसके सहारे भविष्य को फैलाया जा सके। अतीत व्यर्थ हुआ, भविष्य भी व्यर्थ हो गया है, यही क्षण बस काफी है। इसके पार वासना के कोई पंख नहीं कि उड़े। संसार तो व्यर्थ हुआ ही, मोक्ष, सत्य, परमात्मा भी व्यर्थ हो गए हैं।

ऐसा बैठा है चुपचाप। कुछ करने को नहीं है। कछ करने जैसा नहीं है। और तभी एक पत्ता सूखा वृक्ष से गिरा। देखता रहा गिरते पत्ते को–धीरे-धीरे, हवा पर डोलता वृक्ष का पत्ता नीचे गिर गया। हवा का आया अंधड़, फिर उठ गया पत्ता ऊपर, फिर गिरा। पूरब गई हवा तो पूरब गया, पश्चिम गई तो पश्चिम गया।

और कहते हैं, वही उस सूखे पत्ते को देख कर लाओत्सु समाधि को उपलब्ध हुआ। सूखे पत्ते के व्यवहार में ज्ञान की किरण मिल गई। लाओत्सु ने कहा, बस ऐसा ही मैं भी हो रहूं। जहां ले जायें हवाएं, चला जाऊं। जो करवाए प्रकृति, कर लूं। अपनी मर्जी न रखूं। अपनी आकांक्षा न थोपूं। मेरी निजी कोई आकांक्षा ही न हो। यह जो विराट का खेल चलता, इस विराट के खेल में मैं एक तरंग मात्र की भांति सम्मिलित हो जाऊं। विराट की योजना ही मेरी योजना हो और विराट का संकल्प ही मेरा संकल्प। और जहां जाता हो यह अनंत, वहीं मैं भी चल पडूं; उससे अन्यथा मेरी कोई मंजिल नहीं। डुबाए तो डूबूं, उबारे तो उबरूं। डुबाए तो डूबना ही मंजिल; और जहां डुबा दे वहीं किनारा।
और कहते हैं, लाओत्सु उसी क्षण परम ज्ञान को उपलब्ध हो गया।

यह सूत्र, पहला सूत्र अष्टावक्र का–निर्वासनो। हिंदी में अनुवाद किया गया : वासनामुक्त। उतना ठीक नहीं। निर्वासना का अर्थ होता है। वासनाशू्न्य; वासनामुक्त नहीं। क्योंकि मुक्त में तो फिर भाव आ गया, कि जैसे कुछ चेष्टा हुई है। मुक्त में तो भाव आ गया, जैसे कुछ संयम साधा है। मुक्त में तो भाव आ गया अनुशासन का, योग का, विधि-विधान का। मुक्त का तो अर्थ हुआ, जैसे कि बंधन थे और उनको तोड़ा है। जैसे कि कारागृह वास्तविक था और हम बाहर निकले हैं।

नहीं, वासनाशून्य–निर्वासनो। वासना-रहित; मुक्त नहीं, वासनाशून्य। जिसने वासना को गौर से देखा और पाया कि वासना है ही नहीं। ऐसे वासना के अभाव को जिसने अनुभव कर लिया है। फर्क को समझ लेना। फर्क बारीक है।
यहीं योग और सांख्य का भेद है। यहीं साधक और सिद्ध का भेद है। साधक कहता है, साधूंगा, चेष्टा करूंगा; बंधन है, गिराऊंगा, काटूंगा, लड़ूंगा। उपाय से होगा। विधि-विधान, यम-नियम, ध्यान-धारणा–विस्तार है प्रक्रिया का; उससे तोड़ दूंगा बंधन को।
सिद्ध की घोषणा है कि बंधन है नहीं। उपाय की जरूरत नहीं है। आंख खोल कर देखना भर पर्याप्त है। जो नहीं है उसे काटोगे कैसे ?

तो दुनिया में दो तरह के लोग हैं : एक, संसार में बंधन है ऐसा मान कर तड़फ रहे हैं। एक, संसार का बंधन तोड़ना है ऐसा मान कर लड़ रहे हैं। और बंधन नहीं हैं। ऐसा समझो कि रात के अंधेरे में राह पर पड़ी रस्सी को सांप समझ लिया है। एक है, जो भाग रहा है; पसीना-पसीना है। छाती धड़क रही है, घबड़ा रहा है कि सांप है। भागो ! बचो ! और दूसरा कहता है, घबड़ाओ मत। लकड़ियां लाओ मारो। एक भाग रहा है, एक सांप को मार रहा है। दोनों ही भ्रांति में हैं। क्योंकि सांप है नहीं; सिर्फ दीया जलाने की बात है। न भागना है, न मारना है। रोशनी में दिख जाए कि रस्सी पड़ी है तो तुम हंसोगे।
अष्टावक्र की सारी चेष्टा तीसरी है : रोशनी। आंख खोल कर देख लो। थोड़े शांत बैठ कर देख लो। थोड़े निश्चल-मन होकर देख लो। कहीं कुछ बंधन नहीं है। वासना है नहीं, प्रतीत होती है। फिर प्रतीति को अगर सच मान लिया तो दो उपाय हैं : संसारी हो जाओ या योगी हो जाओ; भोगी हो जाओ या योगी हो जाओ। भोगी हो गए तो भागो सांप को मान कर तड़फो। योगी हो गए तो लड़ो।

अष्टावक्र कहते हैं, इन दोनों के बीच में एक तीसरा ही मार्ग है, एक अनूठा ही मार्ग है–न भोग का, न त्याग का; देखने का, द्रष्टा का, साक्षी का। जागो !
इसलिए मैं निर्वासना का अनुवाद वासनामुक्त न करूंगा। निर्वासना में जो व्यक्ति है वह वासनामुक्त है यह सच है, लेकिन अनुवाद ‘वासनामुक्त’ करना ठीक नहीं। क्योंकि वह भाषा योगी की है–वासनामुक्त। वासनाशून्य, वासनारिक्त, निर्वासना–जिसने जान लिया कि वासना नहीं है। जाग कर देखा और पाया कि कारागृह नहीं है; नहीं था, नहीं हो सकता है। जैसे रात सपना देखा था–पड़े थे कारागृह में, हथकड़ियां पड़ी थीं, और सुबह आंख खुली। जाना कि झूठ था सब। जाना कि सपना था। अपना ही माना था। अपना ही निर्मित किया था।

लेकिन लोग सपनों में खो जाते हैं। अपने सपनों की तो छोड़ो. दूसरों के सपनों में खो जाते हैं। अपना पागलपन प्रभावित करता है यह तो ठीक ही है, दूसरा भी पागल हो रहा हो तो तुम आवेष्टित हो जाते हो।
मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन अपने एक मित्र के साथ, कड़ी धूप है और वृक्ष की छाया में बैठा है। झटके से उठ कर बैठ गया और कहने लगा कि प्रभु करे कभी वे दिन भी आएं। आएंगे जरूर। देर है, अंधेर तो नहीं है। जब अपना भी महल होगा, सुंदर झील होगी, घने वृक्षों की छाया होगी। विश्राम करेंगे वृक्षों की छाया में। झील पर तैरेंगे। और ढेर की ढेर आइसक्रीम !
मित्र भी उठ कर बैठ गया। उसने कहा, एक बात बड़े मियां, अगर मैं आऊं तो आइसक्रीम में मुझे भी भागीदार बनाओगे या नहीं ? मुल्ला ने कहा, इतना ही कह सकते हैं कि अभी कुछ न कह सकेंगे। अभी कुछ नहीं कह सकते। अभी तुम बात मत उठाओ। उस आदमी ने कहा, चलो छोड़ो आइसक्रीम। वृक्ष की छाया में तो विश्राम करने दोंगे झील पर तो तैरने दोगे। मुल्ला सोच में पड़ गया। उसने कहा कि नहीं अभी तो इतना ही कह सकते हैं कि अभी हम कुछ नहीं कह सकते।

वह आदमी बोला, अरे हद हो गई ! वृक्षों की छाया में विश्राम भी न करने दोगे ? नसरुद्दीन ने कहा, आदमी कैसे हो ? आलस्य की भी सीमा होती है। अरे, अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाओ, मेरे घोड़ों पर क्यों सवार होते हो ? न कोई महल है, न कोई झील है, अपने घोड़े भी नहीं दौड़ा सकते ? इसमें भी उधारी ? इसमें भी तुम मेरे घोड़ों पर सवार होते हो ?
आदमी पर खुद की कल्पना तो चढ़ ही जाती है, दूसरों की भी चढ़ जाती है। आदमी इतना बेहोश है। तुम पर अपनी महत्वाकांक्षा तो चढ़ ही जाती है, दूसरे की महत्वाकांक्षा भी चढ़ जाती है। महत्वाकांक्षी के पास बैठो, कि तुम्हारे भीतर भी महत्वाकांक्षा सरसरी लेने लगेगी। संक्रामक है। हम बेहोश हैं।

निर्वासना का अर्थ होता है : अब कल्पना के रंग चढ़ते नहीं। अब आकांक्षाएं प्रभावित नहीं करतीं। अब महत्वाकांक्षाओं के झूठे सतरंगे महल प्रभाव नहीं लाते। टूट गए वे इंद्रधनुष। कितने ही रंगीन हों, जान लिए गए, पहचान लिए गए। झूठे थे।
अपनी ही आँखों का फैलाव थे। अपनी ही वासना की तरंगे थे। कहीं थे नहीं; और हम नाहक ही उनके कारण सुखी और दुखी होते थे।

निर्वासना का अर्थ है : वासना नग्न देख ली गई और पाई नहीं गई। शून्य हो गया चित्त। निर्वासनो निरालंबः। निरालंब के लिए हिंदी में अनुवाद किया जाता है : स्वतंत्र, वह भी ठीक नहीं है। निरालंब का अर्थ होता है निराधार। स्वतंत्र में थोड़ी भनक है लेकिन सच नहीं है, पूरी-पूरी नहीं। स्वतंत्र का अर्थ होता है : अपने ही आधार पर, अपने ही तंत्र पर। निरालंब का अर्थ होता है : जिसका कोई आधार नहीं–न अपना, न पराया। आधार ही नहीं, जो निराधार हुआ।
अष्टावक्र कहते हैं कि जब तक कुछ भी आधार है तब तक डगमगाओगे। बुनियाद है तो भवन गिरेगा। देर से गिरे, मजबूत होगी बुनियाद तो; कमजोर होगी तो जल्दी गिरे, लेकिन आधार है तो गिरेगा। सिर्फ निराधार का भवन नहीं गिरता। कैसे गिरेगा, आधार ही नहीं ! आधार है तो आज नहीं कल पछताओगे, साथ-संग छूटेगा। सिर्फ निराधार नहीं पछताता। है ही नहीं, जिससे साथ छूट जाए, संग छूट जाए। कोई हाथ में ही हाथ नहीं।

परमात्मा तक का आधार मत लेना; ऐसी अष्टावक्र की देशना है। क्योंकि परमात्मा के आधार भी तुम्हारी कल्पना के ही खेल हैं। कैसा परमात्मा ? किसने देखा ? कब जाना ? तुम्हीं फैला लोगे। पहले संसार का जाल बुनते रहे, निष्णात हो बड़ी कल्पना में; फिर तुम परमात्मा की प्रतिमा खड़ी कर लेते हो। पहले संसार में खोजते रहे, संसार से चूक गए, नहीं मिला। नहीं मिला क्योंकि वह भी कल्पना का जाल था, मिलता कैसे ? अब परमात्मा का कल्पना-जाल फैलाते हो। अब तुम कृष्ण को सजा कर खड़े हो। अब उनके मुंह पर बांसुरी रख दी है। गीत तुम्हारा है। ये कृष्ण भी तुम्हारे हैं, यह बांसुरी भी तुम्हारी, यह गुनगुनाहट भी तुम्हारी। ये मूर्ति तुम्हारी है और फिर इसी के सामने घुटने टेक कर झुके हो। ये शास्त्र तुमने रच लिए हैं और फिर इन शास्त्रों को छाती से लगाए बैठे हो। ये स्वर्ग और नरक, और यह मोक्ष और ये इतने दूर-दूर के जो तुमने बड़े वितान ताने हैं, ये तुम्हारी ही आकांक्षाओं के खेल हैं।

संसार से थक गए लेकिन वस्तुतः वासना से नहीं थके हो। यहां से तंबू उखाड़ दिया तो मोक्ष में लगा दिया है। स्त्री के सौंदर्य से ऊब गए, पुरुष के सौंदर्य से ऊब गए तो अप्सराओं के सौंदर्य को देख रहे हो। या राम की, कृष्ण की मूर्ति को सजा कर श्रृंगार कर रहे हो। मगर खेल जारी है। खिलौने बदल गए, खेल जारी है। खिलौने बदलने से कुछ भी नहीं होता। खेल बंद होना चाहिए।

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