अष्टावक्र महागीता भाग-9 अनुमान नहीं, अनुभव - ओशो Ashtavakra Mahageeta bhag-9 Anuman Nahin Anubhav - Hindi book by - Osho
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अष्टावक्र महागीता भाग-9 अनुमान नहीं, अनुभव

ओशो

प्रकाशक : फ्यूजन बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :344
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7275
आईएसबीएन :81-89605-85-2

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Ashtavakra Mahageeta bhag-9 Anuman Nahin Anubhav - A Hindi Book - by Osho

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भय से मुक्त हो कर अपूर्व जीवन के फूल खिलते हैं। भय से दबे रह कर सब जीवन की कलियां बिन खिली रह जाती हैं, पंखुड़ियां खिलती ही नहीं। भय तो जड़ कर जाता है। तो मैं जानता हूं तुम्हारी तकलीफ। लेकिन तुम भय से बचने के लिए उत्सुक हो तो कभी न बच पाओगे। मैं तुमसे कहता हूं : भय को जानो, देखो–है; जीवन का हिस्सा है। आंख गड़ा कर भय को देखो, साक्षात्कार करो। जैसे-जैसे तुम्हारी आंख खुलने लगेगी और भय को तुम ठीक से देखने लगोगे, पहचानने लगोगे–कहां से भय पैदा होता है–उतना ही उतना भय विसर्जित होने लगेगा, दूर हटने लगेगा। और एक ऐसी घड़ी आती है अभय की, जब कोई भय नहीं रह जाता। मृत्यु तो रहेगी, शरीर मरेगा, मन बदलेगा, सब होता रहेगा, लेकिन तुम्हारे अंतस्तल में कुछ है शाश्वत-सनातन छिपा, जिसकी कोई मृत्यु नहीं। उसका थोड़ा स्वाद लो। साक्षी में उसका स्वाद मिलेगा। उसके स्वाद पर ही भय विसर्जित होता है : और कोई उपाय नहीं है।

प्रवचन : ८१

अध्यात्म का सारसूत्रः समत्व


31 जनवरी, 1977
अष्टावक्र उवाच।

न शांतं स्तौति निष्कामो न दुष्टमपि निंदति।
समदुःखसुखस्तृप्तः किंचित् कृत्यं न पश्यति।।258।।
धीरो न द्वेष्टि संसारमात्मानं न दिदृक्षति।
हर्षामर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति।।259।।
निःस्नेहः पुत्रदारादौ निष्कामो विषयेषु च।
निश्चिंत स्वशरीरेऽपि निराशः शोभते बुधः।।260।।
तुष्टिः सर्वत्र धीरस्य यथापतितवर्तिनः।
स्वच्छंदं चरतो देशान्यत्रास्तमितशायिनः।।261।।
पततूदेतु वा देहो नास्य चिंता महात्मनः।
स्वभावभूमिविश्रांतिविस्मृताशेषसंसृतेः।।262।।
अकिंचनः कामचारो निर्द्वंद्वश्छिन्नसंशयः।
असक्तः सर्वभावेषु केवलो रमते बुधः।।263।।

ख मत तू यह कि तेरे
कौन दाएं कौन बाएं
तू चला चल बस, कि सब
पर प्यार की करता हवाएं
दूसरा कोई नहीं, विश्राम
है दुश्मन डगर पर
इसलिए जो गालियां भी दे
उसे तू दे दुआएं
बोल कड़वे भी उठा ले
गीत मैले भी घुला ले
क्योंकि बगिया के लिए
गुंजार सबका है बराबर
फूल पर हंसकर अटक तो
शूल को रोकर झटक मत
ओ पथिक ! तुझ पर यहां
अधिकार सबका है बराबर

चैतन्य का जो अंतिम शिखर है, वहां सब स्वीकार है। जैसा है वैसा ही स्वीकार है। अन्यथा की कोई मांग नहीं है।
जब तक अन्यथा की मांग है, संसार शेष है। जब तक ऐसा लगे कि ऐसा होता तो अच्छा होता, ऐसा न होता तो अच्छा होता, तब तक मन कायम है। तब तक संसार जारी है।
जब ऐसा लगे कि जैसा है वैसा ही शुभ है, जैसा है ऐसा ही हो सकता था, जैसा है ऐसा ही होना था, जैसा है ऐसा ही होना चाहिए था; जो है, उसके साथ जब तुम्हारे स्वर संपूर्ण रूप से तालमेल खा जाते हैं, तो समर्पण, तो संन्यास, तो संसार समाप्त हुआ, तो तुम हुए जीवनमुक्त।
जहां तथाता परिपूर्ण है; जहां जरा सी भी, इंच भर भी रूपांतरण की कामना नहीं–न बाहर, न भीतर, जहां इस क्षण के साथ पूरी समरसता है, वहीं शांति है। वहीं सम्यकत्व है।
पहला सूत्र–

देन शांतं स्तौति निष्कामो न दुष्टमपि निंदति।
समदुःखसुखस्तृप्तः किंचित् कृत्यं न पश्यति।।

‘निष्काम पुरुष को न तो शांत पुरुष के प्रति कोई स्तुति का भाव पैदा होता’... महात्मा को देख कर भी निष्काम पुरुष के मन में कोई स्तुति का भाव पैदा नहीं होता... ‘और दुष्ट को देखकर निंदा का भाव पैदा नहीं होता।’
तुम महात्मा की स्तुति करते हो, क्योंकि तुम महात्मा होना चाहते हो। स्तुति हम किसकी करते हैं ? स्तुति हम उसी की करते हैं, जैसे हम होना चाहते। निंदा हम किसकी करते हैं ? निंदा हम उसी की करते हैं जैसे हम नहीं होना चाहते। निंदा हम उसी की करते हैं जैसे हम चाहते हैं कि न हों और पाते हैं कि हैं। और स्तुति हम उसी की करते हैं जैसे हम चाहते हैं कि हों, सोचते भी हैं कि हैं और अभी हैं नहीं। स्तुति है अपने भविष्य की, निंदा है अपने अतीत की।

ईसाई फकीरों में बड़ा प्रसिद्ध वचन है : ‘हर संत का अतीत है और हर पापी का भविष्य है।’ जो आज संत है, कल अतीत में पापी था। इसलिए हर संत का अतीत है। और अतीत संतत्व से भरा हुआ नहीं हो सकता। और हर पापी का भविष्य है। आज जो पापी है, वह कल संत हो जाएगा, हो सकता है। तो जब तुम किसी की स्तुति करते हो, तब तुम क्या कर रहे हो, तुमने कभी सोचा ? राजनेता गांव में आया, तुम चले ! तुम सोचते हो तुम महान नेता के दर्शन करने को जा रहे हो, तुम गलती में हो। तुम्हारे मन में भी राजपद का मोह है। तुम भी चाहते हो पद हो, प्रतिष्ठा हो... जो तुम्हें नहीं हो सका है और किसी और को हो गया है, चलो कम से कम उसके दर्शन कर आएं !

एक होटल में एक आदमी भीतर प्रविष्ट हुआ। बड़ा मजबूत आदमी, ऊंचा-तगड़ा। उसने एक गिलास शराब पी ली और जोर से चिल्ला कर कहा, है किसी की ताकत कि जरा आजमाइश कर ले ? लोग सिकुड़ कर और डर कर बैठ गए। फिर उसने चिल्ला कर कहा कि कोई दमदार नहीं, कोई मर्द नहीं, सब नामर्द बैठे हैं ? एक छोटा सा आदमी उठा। लोग तो चकित हुए कि यह छोटा आदमी किसलिए उठ रहा है ! यह तो इसको चकनाचूर कर देगा !!

लेकिन वह छोटा आदमी ‘कराते’ का जानकार था। उसने जाकर दो-चार हाथ मारे, वह जो बड़ा तगड़ा आदमी था, क्षण भर में जमीन पर चारों खाने चित हो गया। और वह छोटा आदमी उसकी छाती पर बैठ गया और बोला, बोलो क्या इरादा है ! देखा मर्द ? वह बड़ा आदमी, मजबूत आदमी बड़ा हैरान हो गया। उसने कहा, आखिर भाई तू है कौन ? तो उसने कहा मैं वही हूं, जो तुमन सोचते थे कि तुम हो जब तुम होटल में भीतर आए थे। जो शराब पीकर तुमने सोचा कि तुम हो, मैं वही हूं। कुछ कहना है ?

हम जब स्तुति करते किसी की, तो किसी बहुत गहरे तल पर अचेतन मन में हम अपने ही भविष्य की तलाश कर रहे हैं, जैसा हम होना चाहते हैं। इसलिए जो आदमी राजनेता के दर्शन को जाता है वह संत के दर्शन को नहीं जाएगा। या अगर संत के भी दर्शन को जा रहा हो तो इस आदमी के मन में राजनीति और धर्म का कोई भेद ही नहीं है। जिसकी भी प्रतिष्ठा है ! यह प्रतिष्ठित होना चाहता है, कैसे प्रतिष्ठा मिलेगी इसकी इसे कोई चिंता नहीं है। यह अपने अहंकार की पूजा चाहता है। चाहे राजनेता होकर मिल जाए, चाहे महात्मा होकर मिल जाए, इसे अहंकार पर आभूषण चाहिए।

तुम जब स्तुति करते हो किसी की, तो तुमने अपनी मांग जाहिर की, तुमने अपनी वासना प्रकट की–ऐसा मैं होना चाहता हूं। नहीं हो पाया, मजबूरी है; लेकिन उसे तो देख आऊं जो हो गया है ! उसके चरण में तो श्रद्धा के फूल चढ़ा आऊं कि मैं तो हार गया लेकिन तुम हो गए, चलो, कोई तो हो गया ! मगर यह घटना घट सकती है, इसके लिए आँख भर कर देख तो आऊं ! जब तुम बुद्ध के पास जाते हो बुद्ध के चरणों में सिर झुकाते हो, तब भी तुम यही कह रहे हो। मैं तो न हो सका, मैं तो खो गया मार्गो में, अनंत थे मार्ग, राह न मिली, मैं तो कांटों में उलझ गया, आप पहुंच गए। आपके दर्शन ही कर लूं, आंख इतने से ही भर लूं। इतना तो भरोसा आ जाए कि भला मैं भटक गया, लेकिन भटकाव अनिवार्य नहीं है। पहुंचना हो सकता था–कोई पहुंच गया है।

या तुम जब किसी की निंदा करते हो। बर्ट्रेड रसल ने लिखा है कि अक्सर ऐसा होता है कि जब कोई आदमी किसी बात की बहुत निंदा करता हो, तो जरा उस आदमी को गौर से देखना। समझो कि यहां किसी की जेब कट जाए, और एक आदमी जोर से चिल्लाने लगे, पकड़ो, मारो, कौन है चोर, ठिकाने लगा देंगे ! उस आदमी को पहले पकड़ लेना। बहुत संभावना तो यह है कि यह आदमी चोर है, इसी ने जेब काटी है। चोर बहुत जोर से चिल्लाता है। जोर से चिल्लाने के कारण दूसरों को भरोसा आ जाता है कि कम से कम यह तो चोर नहीं हो सकता। चोर होता तो यह चिल्लाता ! चोर होता तो यह चोरी के इतने खिलाफ कैसे होता ! इसलिए जो होशियार चोर है, वह चोरी के खिलाफ चिल्लाता है, शोरगुलमचाता है, और इसी तरह बच जाता है। कोई सीधा सा आदमी डर के मारे अगर चुपचाप सिकुड़ा खड़ा रह जाए कि कहीं ऐसा न हो कि कोई हम पर शक कर ले, वह पकड़ लिया जाएगा। जो शोरगुल कर रहा है, उसे तो कौन पकड़ेगा !

बर्ट्रेड रसल ने लिखा है कि जो आदमी जिस बात की जितनी निंदा करे, समझना कि भीतर गहरे में उसका कोई न्यस्त स्वार्थ है। या तो वह पाता है कि मैं ऐसा हूं, या तो वह डरा हुआ है कि कहीं जाहिर न हो जाए... तुम्हारे तथाकथित साधु-संन्यासी कामवासना की इतनी निंदा करते हैं उसका कुल कारण इतना है, कामवासना उनके भीतर बड़ी लहरें व तरंगें ले रही है। वे स्त्री से पीड़ित व परेशान हैं। इसलिए तुम्हारे शास्त्र स्त्रियों को गाली दिए जाते हैं। वे जो शास्त्र लिखने वाले हैं, जरूर कहीं न कहीं स्त्री से बहुत पीड़ित रहे होंगे। उनके सपने में स्त्री उनको सता रही होगी। स्त्री उनका पीछा कर रही है। वे स्त्री से भाग गए हैं। जिससे कोई भाग जाता है, उससे कभी भाग नहीं पाता। जिससे भागे, उससे उलझे रह जाओगे। वे जो तुम्हारे शास्त्रकार तुमसे कहते हैं, धन से बचो, धन में पाप है, समझ लेना उनका लोभ अभी भी धन में लगा है। अन्यथा, इतनी निंदा का कोई कारण न था।

असल में तो निंदा का कोई कारण ही नहीं है। परमज्ञानी को न तो कोई स्तुति है, न कोई निंदा है। न तो वह महात्मा के चरणों में फूल चढ़ाने जाता और न निंदक के सिर पर अंगारे रखने जाता, जूते मारने जाता। बुरे को जूते नहीं मारता, भले का सम्मान नहीं करता। अगर कोई भला है, तो भला; अगर कोई बुरा है, तो बुरा। जैसा है, वैसा है।
इस बात को थोड़ा समझना। यह परम दशा की व्याख्या है। जैसा है, वैसा है। राम राम हैं, रावण रावण है। जैसा है, वैसा है। नीम कड़वी है और आम मीठा है। क्या तो नीम की निंदा और क्या आम की प्रशंसा ! क्या सार है ? कांटा कांटा है, फूल फूल है। जो जैसा वैसा। इसमें रत्ती भर आकांक्षा नहीं है, आकांक्षा का कोई संबंध नहीं है।
न शांतं स्तौति निष्कामो।

जो स्वयं निष्काम हो गया है, वह शांत व्यक्ति की भी स्तुति नहीं करता। जब निष्काम ही हो गया, तो अब तो शांति की भी कामना नहीं है। तो स्तुति का क्या प्रयोजन ! न दुष्टमपि निंदति।
और न दुष्ट की निंदा करता। निंदा में भी दुष्टता है। तुम जब किसी की निंदा करते हो तब भी उसमें दुष्टता ही छिपी हुई है। निंदा में भी तुम चोट पहुंचाने की चेष्टा कर रहे हो। निंदा करके तुम स्वयं ही निंदित हो गए। न तो स्तुति का कुछ अर्थ है, न निंदा का कुछ अर्थ है। निष्काम व्यक्ति न पक्ष में है, न विपक्ष में। निष्काम व्यक्ति का कोई आग्रह नहीं है। निष्काम व्यक्ति अनाग्रही है।
‘वह दुख और सुख में समान है। सब स्थितियों में तृप्त। और उसको करने को कुछ भी नहीं बचा है।
समदुःखसुखस्तृप्तः।

दोनों में समभाव आ गया है। इस समभाव की ही सारी खोज है इस देश में। जैन इसे कहते हैं, सम्यकत्व। लेकिन बात सम की है। बुद्ध कहते हैं, संतुलन, सम्यक। बात सम की है। हिंदू कहते हैं, समाधि-सम, आधि। बात सम की है। अगर एक छोटा सा शब्द चुनना हो जिसमें पूरे पूरब की मनीषा समा जाती हो तो वह, सम। सम का अर्थ है, जिसके मन में न अब इधर डोलना रहा, न उधर डोलना रहा। न जो बाएं झुकता, न दाएं झुकता। क्योंकि इधर झुके तो खाई, उधर झुके तो कुआं। झुके कि भटके। जो झुकता ही नहीं। जो मध्य में खड़ा हो गया है। जो थिर हो गया, अकंप। समता, सम्यकत्व, समाधि।
अंग्रेजी में भी, यूनानी-लैटिन में भी संस्कृत का यह सम शब्द बच रहा है। इसने अनेक थोड़े फर्क रूप में लिए हैं, लेकिन बच रहा है। अंग्रेजी के शब्दों में ‘सिन्थेसिस’ में जो सिन है, वह सम का ही रूप है। ‘सिम्फोनी’ में। ‘सिनाप्सिस’ में। जहां-जहां सिन प्रत्यय है, वह सम का ही रूप है।

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