महावीर वाणी भाग-2 - ओशो Mahavir Vani Bhag-2 - Hindi book by - Osho
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महावीर वाणी भाग-2

ओशो

प्रकाशक : फ्यूजन बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :570
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7285
आईएसबीएन :81-8419-331-9

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जैसे पर्वतों में हिमालय है या शिखरों में गौरीशंकर, वैसे ही व्यक्तियों में महावीर हैं...

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Mahavir Vani Bhag-2 - A Hindi Book - by Osho

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मैं सभी परंपराओं के शब्दों का उपयोग करता हूं, जो शब्द समझ में आ जाए। कभी पुराने की भी बात करता हूं, शायद पुराने से किसी को समझ में आ जाए। कभी नये की भी बात करता हूं, शायद नये से किसी को समझ में आ जाए। और साथ ही यह भी निरंतर स्मरण दिलाते रहना चाहता हूं कि नया और पुराना सत्य नहीं होता। सत्य आकाश की तरह शाश्वत है। उसमें वृक्ष लगते हैं आकाश में, खिलते हैं, फूल आते हैं। वृक्ष गिर जाते हैं। वृक्ष पुराने बूढ़े हो जाते हैं। वृक्ष बच्चे और जवान होते हैं–आकाश नहीं होता। एक बीज हमने बोया ओर अंकुर फूटा। अंकुर बिलकुल नया है, लेकिन जिस आकाश में फूटा, वह आकाश ? फिर बड़ा हो गया वृक्ष। फिर जराजीर्ण होने लगा। मृत्यु के करीब आ गया वृक्ष। वृक्ष बूढ़ा है, लेकिन आकाश जिसमें वह हुआ है, वह आकाश बूढ़ा है ? ऐसे कितने ही वृक्ष आए और गए, और आकाश अपनी जगह है–अछूता, निर्लेप।
सत्य तो आकाश जैसा है। शब्द वृक्षों जैसे हैं। लगते हैं, अंकुरित होते हैं, पल्लवित होते हैं, खिल जाते हैं, मुरझाते हैं, गिरते हैं, मरते हैं, जमीन में खो जाते हैं। आकाश अपनी जगह ही खड़ा रह जाता है ! पुराने वालों का जोर भी शब्दों पर था और नये वालों का जोर भी शब्दों पर है। मैं शब्द पर जोर ही नहीं देना चाहता हूँ। मैं तो उस आकाश पर जोर देना चाहता हूं जिसमें शब्द के फूल खिलते हैं, मरते हैं, खोते हैं–और आकाश बिलकुल ही अछूता रह जाता है, कहीं कोई रेखा भी नहीं छूट जाती।

महावीर

जैसे पर्वतों में हिमालय है या शिखरों में गौरीशंकर, वैसे ही व्यक्तियों में महावीर हैं। बड़ी है चढ़ाई। जमीन पर खड़े होकर भी गौरीशंकर के हिमाच्छादित शिखर को देखा जा सकता है। लेकिन जिन्हें चढ़ाई करनी हो और शिखर पर पहुंच कर ही शिखर को देखना हो, उन्हें बड़ी तैयारी की जरूरत है। दूर से भी देख सकते हैं महावीर को, लेकिन देर से जो परिचय होता है वह वास्तविक परिचय नहीं है। महावीर में तो छलांग लगा कर ही वास्तविक परिचय पाया जा सकता है।

मंत्र

नमोकार को जैन परंपरा ने महामंत्र कहा है। पृथ्वी पर दस-पांच ऐसे मंत्र हैं जो नमोकार की हैसियत के हैं। असल में प्रत्येक धर्म के पास एक महामंत्र अनिवार्य है, क्योंकि उसके इर्द-गिर्द ही उसकी सारी व्यवस्था, सारा भवन निर्मित होता है।
ये महामंत्र करते क्या हैं, इनका प्रयोजन क्या है, इनसे क्या फलित हो सकता है ?
मंत्र आभामंडल को बदलने की आमूल प्रक्रिया है। आपके आसपास की स्पेस, और आपके आसपास का इलेक्ट्रोडायनेमिक फील्ड बदलने की प्रक्रिया है। और प्रत्येक धर्म के पास एक महामंत्र है। जैन परंपरा के पास नमोकार है।
महामंत्र स्वयं के आसपास के आभामंडल को बदलने की कीमिया है। और अगर कोई व्यक्ति दिन-रात जब भी उसे स्मरण मिले तभी नमोकार में डूबता रहे तो वह व्यक्ति दूसरा ही व्यक्ति हो जाएगा। वह वही व्यक्ति नहीं रह सकता जो होता है।
विश्व के किसी धर्म ने ऐसा महामंत्र, इतना सर्वांगीण, इतना सर्वस्पर्शी मंत्र विकसित नहीं किया है। यह मंत्र अनूठा है बेजोड़ है।
नमोकार नमन का सूत्र है। यह पांच चरणों में है। समस्त जगत में जिन्होंने भी कुछ पाया है, जिन्होंने भी कुछ जाना है, जिन्होंने भी कुछ जीया है, जो जीवन के अंतर्तम गूढ़ रहस्य से परिचित हुए हैं, जिन्होंने मृत्यु पर विजय पाई है, जिन्होंने शरीर के पार कुछ पहचाना है–उन सबके प्रति नमस्कार। इस नमन के बाद ही, इस झुकने के बाद ही आपकी झोली फैलेगी और महावीर की संपदा उसमें गिर सकती है।

प्रस्तावना

आप आए, नई ज़िंदगी आ गई।
बेख़ुदी में नई ताज़गी आ गई।
पहले अल्फ़ाज़ की थी सजावट महज,
शायरी में हसीं सादगी आ गई।
रुढ़ियों में, रवाज़ों, में जो कैद था,
दिल अब आज़ाद, आवारगी आ गई !
पहले पीता था, लेकिन नहीं रिंद था,
आपको जो पीया, रिंदगी आ गई !
पहले ‘तन्मय’ जो मुनकिर था, बदनाम था,
आपसे जो मिला, बंदगी आ गई !

अपने एक अज़ीज़ के लिए कही गई मेरी यह ग़ज़ल अज़ी़ज़ों के अज़ीज़, प्रियतमों के भी प्रियतम ओशो के लिए कहीं अधिक मौजूं है।
प्रिय के संबंध में जहां अतिशयोक्ति का आरोप संभव है, वहां जिसने ओशो को जाना है, उसके द्वारा अत्यल्पोक्ति का आरोप ही लगाया जाएगा। ओशो के समग्र व्यक्तित्व को भाषा के किन्हीं भी शब्दों के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। भाषा असमर्थ हो जाती है।

प्रथम भाग कि प्रस्तावना में कह चुका हूं, मैं एकदम नास्तिक था। सौभाग्यवश ओशो से जुड़ा, उनके प्रेम में पड़ा तो आस्तिक हो गया–बंदगी आ गई। उन्हें पीया तो एक आंतरिक मस्ती का मजा आ गया। अब चिंताएं सर पर से निकल जाती हैं; जीने की कला सिखाने के ओशो विशेषज्ञ हैं, बर्शते कि दिल को आवारा बनाने का साहस हो। ओशो की समस्त देशनाओं को यदि किसी एक शब्द में व्यक्त करना पड़े तो वह शब्द होगा ‘प्रेम’, किंतु शब्द प्रेम नहीं, भाव–अनुभूति।

प्यार से बढ़कर नहीं आराध्य कोई,
प्यार पूजा, प्यार में, परमात्मा का वास है।
प्यार जो करता वही आस्तिक जगत में,
प्यार सच्चा धर्म है, विश्वास है !
पूजता तो मैं तुम्हें हूं मीत मेरे,
मूर्ति मंदिर और मस्जिद, सब बहाने हैं।
मैं हृदय के रक्त से लिखता तुम्हें हूं,
ये ग़ज़ल, ये गीत तो सारे बहाने हैं।

और, बड़े मज़े की बात है, कि प्रेमीजन को प्रेम में जिस आनंद का अनुभव होता है, उसका जन्म, वस्तुतः पीड़ा से अतृप्ति से होता है। जितना प्यास बुझती नहीं है, तत्काल उससे कई गुनी बढ़ जाती है। किंतु, प्यार का स्वाद जिसे लग जाता है, वह फिर बाज़ नहीं आता।

प्यार के इस दर्द का अपना मजा़,
जो अछूते रह गए इस रोग से,
वे न समझेंगे इसे !
यार की तस्वीर नज़रों में फिरे,
गुनगुनाहट कंठ में आने लगे;
भावना रूपांतरित हो शब्द में,
छंद अपने आप बन जाने लगे;
गीत गाने का अलग अपना मज़ा,
किंतु, जिनके ओंठ थिरके ही नहीं,
वे न समझेंगे इसे !

ओशो के अनुसार चाहे महावीर हों, चाहें बुद्ध, चाहे मीरा, चाहे जीसस, सबके संदेश का सार प्रेम ही है। महावीर की अहिंसा, बुद्ध की करुणा; मीरा का नृत्य या उसकी दीवानगी, जीसस की सेवा–सभी मूलतः प्रेम ही हैं, शब्दों का अंतर है।
अब, बाहर से महावीर को समझेंगे तो लगेगा, इस व्यक्ति से प्रेम का क्या संबंध ? बिलकुल रूखे-सूखे, एकदम शांत, मौन, आत्म-केंद्रित। मेरी समझ है कि महावीर का प्रेम केंद्र से परिधि की ओर प्रवाहित है। इसीलिए परिधि तक आते-आते एकदम ठंडा-सा प्रतीत होने लगता है–न होने के बराबर–ऊष्मा-विहीन। ऐसा ही बुद्ध का प्रेम यानी करुणा है। जीसस या मीरा का प्रेम, परिधि से केंद्र की ओर गतिशील है, प्रवाहमान है, इसलिए बाहर बहुत-बहुत व्यक्त है–सेवा-शुश्रुवा के रूप में अथवा नृत्य के रूप में, व्यथा की अभिव्यक्ति के रूप में। मीरा की दीवानगी या मस्ती बाहर से बहुत तीव्र, बहुत ऊष्मामय। वही मस्ती भीतर, केंद्र पर पहुंच कर महावीर की भांति ही मौन और शांत हो जाती है।

मीरा का प्रेम व्यक्ति केंद्रित है। महावीर के प्रेम में फैलाव है। इसलिए मीरा का प्रेम दिखाई पड़ जाता है, महावीर का नहीं।
महावीर के गहन प्रेम की गहराई से जो वीणा निःसृत हुई, उसे पंडित नहीं समझ सके। वे महावीर का त्याग, उनकी तपस्या, महल और उनके द्वारा छोड़ी गई संपत्ति के हिसाब-किताब में ही उलझे रहे। कारण स्पष्ट है। उनके पास तो मीरा में दृश्य प्रेम को समझने का चित्त भी नहीं होता, फिर महावीर के अदृश्य प्रेम को वे मूढ़ समझ ही कैसे सकते हैं ? महावीर को, महावीर के प्रेम को समझने के लिए जिस चित्त की, जिस चेतना की अपेक्षा है, वह पहली बार ओशो के रूप में हमें सुलभ हुई है।

एक प्रज्ञापुरुष दूसरे प्रज्ञापुरुष के वचनों की सही-सही व्याख्या मात्र इसीलिए कर पाने में सक्षमता को प्राप्त नहीं हो सकता कि वह समान कोटि का है, उसके लिए अभिव्यक्ति की परिपूर्णता अनिवार्य है।
ओशो ने महावीर : मेरी दृष्टि में’ कहा है कि महावीर बारह वर्ष तक जो जड़वत मौन में रहे, वह जैसा कि पंडित कहते हैं, मोक्ष के लिए उनकी साधना नहीं थी, बल्कि वह महावीर की साधना, अभिव्यक्ति की साधना थी। क्योंकि महावीर का प्रयास था कि न केवल चेतन तक उनका संदेश पहुंचे, बल्कि जड़ से भी उनका सम्वाद हो सके और उसके विकास को भी त्वरा मिले।

ओशो की अभिव्यक्ति की कोई साधना है या नहीं, मुझे नहीं मालूम। किंतु, इतना मैं अवश्य अनुभव करता हूं कि अभिव्यक्ति पर ओशो का जो कमांड है, जो अधिकार है ‘न भूतो, न भविष्यति’ की उक्ति उस पर पूरी तरह घटित होती है। प्रसंग है, इसलिए कह रहा हूं। शब्द चाहे अंग्रेजी का हो, चाहे हिंदी का, चाहे उर्दू का; ओशो को उसकी व्युत्पत्ति का पता है। लैटिन से आया या ग्रीक से; उसका रूप क्या था, अर्थ क्या था; ओशो बतलाएंगे। यही बात संस्कृत, प्राकृत, अरबी, फ़ारसी, सभी के लिए लागू होती है। महावीर के दुरूह पारिभाषिक शब्दावली की आत्मा की गहराई में यदि ओशो न उतारते तो हम उससे अपरिचित ही रह जाते।
 
ओशो के अनुसार मार्ग दो ही हैं : एक महावीर का, एक मीरा का। महावीर का मार्ग आक्रमण का है, मीरा का समर्पण का। महावीर ने इसीलिए ईश्वर को इनकार कर दिया। मीरा ने कृष्ण को परमात्मा का प्रतीक बना लिया। महावीर ‘तू’ को मिटा कर ‘मैं’ को बचाते हैं, मीरा ‘मैं’ को मिटा कर ‘तू’ को बचने देती है। दोनों मार्गों की मंजिल एक ही है : ‘अद्वैत’। महावीर का मार्ग पौरुष का, साहस का, निर्भीकता का, असुरक्षा का...। इसके विपरीत मीरा का मार्ग स्त्रैण चित्त वाले व्यक्ति का, दूसरे के संरक्षण का, आश्रय का...। महावीर जैसे वृक्ष हैं–स्वनिर्भर; मीरा, जैसे लतिका है–पर-निर्भर। यों समझें कि एक छोटा बच्चा है। मां की उंगली छोड़ कर बीहड़, निर्जन मार्ग पर अकेला चल पड़े; आपदाओं, बाधाओं से जूझता हुआ, अंत में गंतव्य तक पहुंच जाए–यह महावीर का मार्ग है। इसके विपरीत, बच्चा मां को अपनी उंगली पकड़ा दे; निश्चिंतता के साथ, मां के सहारे, उसके संरक्षण में, हंसता-खेलता हुआ वहीं पहुंच जाए–यह मीरा का मार्ग।

अब, एक संयोग देखिए। महावीर जो पौरुष के अप्रतिम प्रतीक हैं, उनके साथ एक दुर्घटना घट गई। महावीर का धर्म जैनों के–बनिया-व्यापारियों के हाथ पड़ गया, जो अपनी कायरता, अपनी हिसाबी-किताबी मनोवृत्ति और सुरक्षितता-प्राप्ति की अथक चेष्टा के लिए जग-जाहिर हैं। गैर-जैनों ने महावीर को जैनों के माध्यम से समझने का प्रयत्न किया, फलतः वे महावीर को ही गलत समझ बैठे। महावीर के अनुयायियों ने अपने हास्यास्पद आचरण एवं व्यवहार से उनकी देशनाओं की दुर्गति कर दी। महावीर की अहिंसा उनकी कायरता के लिए ढाल बन गई। महावीर के वचनों के अर्थों के अनर्थ हो गये। सर्वाधिक हास्यास्पद बनाया, सब से अधिक हानि पहुंचाई, महावीर की हूबहू नकल करने वाले साधु-संन्यासियों ने, कार्बन कापियों ने। कहां महावीर की अनारोपित, स्वाभाविक निर्दोष नग्नता और कहां इन तथाकथित साधुओं की आरोपित, साधी गई, सप्रयास नग्नता। इस नग्नता के मूल में अहंकार है, महत्वाकांक्षा है। एक दिगंबर मुनि को मैं जानता हूं, एक तुकबंदी करने वाले जैन कवि ने उन्हें ‘आधुनिक महावीर’ कहा अपनी एक कविता में, और वे हैं कि स्वीकार कर रहे हैं। एक और जैन मुनि है, वे ललितपुर के निकटस्थ एक गांव के हैं, आजकल वे राजस्थान में हैं। उनके जाने कितने पत्र मेरे पास आ चुके हैं। मैं उत्तर देने योग्य भी उन्हें नहीं पाता। अब, उनका एक लेटेस्ट पत्र आया है। इसमें उन्होंने मुझे लिखा है :
‘‘...आपको समय होता, तो यहां पधारते, कुछ चर्चा होती, यथा वर्तमान मुनियों में मेरा स्थान।’’

कितनी भोंड़ी आत्म-श्लाघा और अहंकार है। असल में जैसा कि इनके पहले के पत्रों से स्पष्ट है, ये चाहते हैं, मैं इनकी जीवनी लिख कर साबित कर दूं कि इनसे बड़ा त्यागी, तपस्वी और विद्वान जैन मुनि कोई दूसरा नहीं है। इन बेचारों पर तरस ही खाया जा सकता है।
ओशो को महावीर पर बोलते हुए सुन कर अथवा उनकी ‘महावीर-वाणी’ को पढ़ कर पहली बार यह संभव हुआ है कि गैर-जैन भी महावीर में उत्सुक हुए हैं और जैनों के आचरण और व्यवहार के कारण उन्होंने महावीर के संबंध में जो ग़लतफहमियां पाल रखी थीं, वे दूर हो रही हैं। ठीक वैसे ही, जैसे ओशो को अन्यान्य प्रज्ञापुरुषों पर बोलता हुआ सुन कर ओशो के प्रेमी जैन बंधु उन प्रज्ञापुरुषों में उत्सुक हुए हैं।

जैन, जो महावीर द्वारा प्रतिपादित अनेकांत के दावेदार हैं, इन अनेकांत का ढिंढोरा पीटने वालों, अनेकांत को जीवन में उतारने का दावा करने वालों को ही जब मैं देखता हूं कि वे ओशो द्वारा व्याख्यायित ‘महावीर-वाणी’ में उत्सुक नहीं हैं, तब बहुत पीड़ा होती है। सही कहूं तो अनेकांत को तो ओशो के संन्यासी और लाखों-लाखों प्रेमी ही जीवन में, व्यवहार में उतार रहे हैं, सभी प्रज्ञापुरुषों को प्रेम करके। अनेकांत के प्रति जैनों की उपेक्षा को देख कर मुझे उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर डॉ. बशीर बद्र का एक शेर याद आता है :

सुबह के दर्द को, रातों की चुभन को भूलें,
किसके घर जाएं कि उस वादाशिकन को भूलें;
और तहज़ीबे-गमे-इश्क निभा दें कुछ रोज़,
आखरी वक्त है, क्या अपने चलन को भूलें।

ललितपुर, जहां एक जैन घर में मेरा जन्म हुआ, एक जैन बहुल नगर है–जैनों की पूरे देश में बहुत कम संख्या की दृष्टि से। मैं बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति का था। घरवालों को देखा करता था कि सुबह-सुबह नहा-धोकर मंदिर चले जा रहे हैं दर्शन करने। हाथ में द्रव्य लिए। यह द्रव्य प्रायः सबसे सस्ता चावल होता है। मंदिर से दर्शन या पूजा-पाठ करके आने वालों को देखता था और गौर करता था कि कहीं कोई भीतरी बदलाहट इनमें होती है या नहीं। पाता था, कि उलटा हो रहा। धार्मिक होने का दंभ और अहंकार एक ओर, और, दूसरी ओर क्रोध, लोभ, लालच, झूठ में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि...। धार्मिक सास मंदिर से घर आते ही, किसी छोटी बात पर बहू पर आग बबूला हो रही है और तरह-तरह से उसकी ‘मंगल-कामना-युक्त’ शब्द उच्चार रही है। ऐसे ही धार्मिक बहू मंदिर से लौटी और सास को मानो कच्चा चबा जाने को तैयार है। पुरुष भी इससे भिन्न नहीं। मंदिरों में जैन-पंचायत की संभाएं कर रहे हैं और ‘निश्चयनय’ और ‘व्यवहारनय’ के गुटों में बंट कर एक-दूसरे से लड़ने-मरने को तैयार हैं।

कोई इस भ्रम में न पड़े कि यह जो कुछ मैं कह रहा हूं, वह केवल जैनों पर ही घटित है। वह तो क्योंकि बात महावीर की है और चूंकि जैन अपने को महावीर का दावेदार मानते हैं, इसलिए विशेष रूप में उन्हीं का जिक्र किया अन्यथा तो दुनिया के हर तथाकथित धार्मिक का, चाहे वह हिंदू हो, चाहे मुसलमान, चाहे ईसाई, चाहे बौद्ध, यही हाल है। उसकी कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है। मेरा खयाल है कि इसके लिए जनसाधारण का दोष नहीं है, असल अपराधी तो पंडित-पुरोहित, मुल्ला-मौलवी, पोपऔर पादरी हैं। वे ही जनसाधारण को बाह्य क्रिया-कांड में उलझाए रहते हैं। इससे उनकी दूकानें चलती हैं। यदि वे भीतर की यात्रा पर जोर देने लगें तो वे बेरोजगार हो जाएंगे। अब, क्योंकि एक मात्र ओशो हैं, जिनका सर्वाधिक जोर ध्यान पर, भीतर की यात्रा पर है; इसलिए दुनिया के पंडित-पुरोहितों, कठमुल्लाओं और पादरियों ने परस्पर एक अलिखित, अघोषित षड्यंत्र ओशो के विरुद्ध कर रखा है, और वे और किसी बात में चाहे न केवल असहमत हों, बल्कि एक-दूसरे का खून पी जाने में भी संकोच न करें, किंतु बात जब ओशो की होती है तो सभी संगठित नज़र आते हैं। इनके संगठन को सत्ता का सहारा भी अनायास मिल जाता है, क्योंकि ओशो राजनीतिकों, राजनेताओं के नकली मुखौटों को भी निर्ममतापूर्वक खींचते रहते हैं। इस प्रकार स्थिति यह बन गई है कि सारी दुनिया में केवल वही लोग ओशो के प्रेम में पड़ रहे हैं, जिनके पास एक आंतरिक दृष्टि है, जो साहसी हैं और सरल भी, जिनके अंदर किसी न किसी प्रकार की सृजनात्मकता है। सही है कि उनकी संख्या दिन पर दिन बढ़ रही है, फिर भी विश्व की आबादी की तुलना में वह शायद सदैव कम ही रहेगी। ज्यों-ज्यों एक ओर ओशो रूपी सूर्य के प्रकाश से संस्पर्शित होकर थोड़े से लोगों में ज्योति की हलकी सी किरण झलकने लगी है, त्यों-त्यों दूसरी ओर सारे धूर्त, ढोंगी और पाखंडी भी अधिक से अधिक संगठित होते जा रहे हैं :

संगठित सारे अंधेरे हो गए हैं,
एक मेरा दीप कब तक टिमटिमाए,
तुम हटाए !
आंधियों ने संधि कर ली पतझरों से
अल्पमत में हो गई हैं अब बहारें,
बाग़ के दुश्मन बने खुद बाग़बां अब,
प्रश्न यह है–बुलबुलें किसको पुकारें !
पद-प्रतिष्ठा बांट ली है उल्लुओं ने,
कोकिलाएं आत्म हत्या कर रही हैं,
इस चमन को कौन मरने से बचाए।
संगठित...!!

किंतु, हम जो ओशो के प्रेमी हैं, उनसे जुड़े हैं, उन्हें निराश होने का कोई कारण नहीं। हम तो ओशो के संदेश को देश और काल की सीमाओं के पार पहुंचाने के अपने प्रयत्न अबाध रूप से करते ही रहें। किसी शायर के अनुसार :

उनका जो फ़र्ज़ है, वह अहले सियासत जानें,
अपना पैग़ाम मुहब्बत है, जहां तक पहुंचे।

अंत में ओशो के चरणों में मैं अपना यह भाव-नमन प्रस्तुत करके इस प्रस्तावना को समाप्त करता हूं :

चंदा-सा तन, सूरज-सा मन, बाहें विशाल !
नयनों की अपलकता में बंदी महाकाल।
तुम पृथ्वी भर के फूलों की अनुपम सुगंध,
सर्जन के मौलिक महाकाव्य के अमर छंद।
तुम मूर्तिमान उपनिषद, वेद, गीता, कुरान,
अभिनव तीर्थंकर, पैंग़ंबर, तुम महाप्राण

अनुक्रम


१. समय और मृत्यु का अंतर्बोध (अप्रमाद-सूत्र : १)
२. अलिप्तता और अनाशक्ति का भावबोध (अप्रमाद-सूत्र : २)
३. एक ही नियम : होश (प्रमाद-स्थान-सूत्र : १)
४. सारा खेल काम-वासना का (प्रमाद-स्थान-सूत्र : २)
५. ये चार शत्रु (कषाय-सूत्र)
६. अकेले ही है भोगना (अशरण-सूत्र)
७. यह निःश्रेयस का मार्ग है (पंडित-सूत्र)
८. आप ही हैं अपने परम मित्र (आत्म-सूत्र : १)
९. साधना का सूत्र : संयम (आत्म-सूत्र : २)
१॰. विकास की ओर गति है धर्म (लोकतत्व-सूत्र : १)
११. आत्मा का लक्षण है ज्ञान (लोकतत्व-सूत्र : २)
१२. मुमुक्षा के चार बीज (लोकतत्व-सूत्र : ३)
१३. पांच ज्ञान और आठ कर्म (लोकतत्व-सूत्र : 4)
१४. छह लेश्याएं : चेतना में उठी लहरें (लोकतत्व-सूत्र : ५)
१५. पांच समितियां और तीन गुप्तियां (लोकतत्व-सूत्र : ६)
१६. कौन है पूज्य ? (पूज्य-सूत्र)
१७. राग, द्वेष, भय से रहित है ब्राह्मण (ब्राह्मण-सूत्र : १)
१८. अलिप्तता है ब्राह्मणत्व (ब्राह्मण-सूत्र : २)
१९. वर्णभेद जन्म से नहीं, चर्या से (ब्राह्मण-सूत्र : ३)
२॰. भिक्षु की यात्रा अंतर्यात्रा है (भिक्षु-सूत्र : १)
२१. अस्पर्शित, अकंप है भिक्षु (भिक्षु-सूत्र : २)
२२. भिक्षु कौन ? (भिक्षु-सूत्र : ३)
२३. कल्याण-पथ पर खड़ा है भिक्षु (भिक्षु-सूत्र : ४)
२४. पहले ज्ञान, बाद में दया (मोक्षमार्ग-सूत्र : १)
२५. संयम है संतुलन की परम-अवस्था (मोक्षमार्ग-सूत्र : २)
२६. अंतस-बाह्य संबंधों से मुक्ति (मोक्षमार्ग-सूत्र : ३)
२७. संन्यास प्रारंभ है, सिद्धि अंत (मोक्षमार्ग-सूत्र : ४)


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