101 अमर कथाएँ - प्रेमकिशोर शर्मा 101 Amar Kathayein - Hindi book by - Premkishore Sharma
लोगों की राय

कहानी संग्रह >> 101 अमर कथाएँ

101 अमर कथाएँ

प्रेमकिशोर शर्मा

प्रकाशक : परमेश्वरी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7381
आईएसबीएन :978-93-80048-18

Like this Hindi book 10 पाठकों को प्रिय

309 पाठक हैं

101 अमर कथाएँ...

B101 Amar Kathayein - A Hindi Book - by Premkishore Sharma

1
आनंद की लहरें


संत तालमुद के बारे में यह प्रसिद्ध था कि जो भी उनके पास जाता, आनंदित होकर लौटता। एक बार एक अमीर व्यक्ति उनके पास आया और हमेशा आनंदित रहने का उपाय पूछने लगा। उस समय संत एक वृक्ष के नीचे बैठे चिड़ियों को दाना चुगा रहे थे। चिड़ियों की प्रसन्नता के साथ वे खुद भी आनंद-विभोर हो रहे थे।

संत ने अमीर व्यक्ति से कहा, ‘‘संसार में प्रसन्न होने का एक ही तरीका है—दूसरों के सुख में तल्लीन हो जाओ और दुःख को मिटाने में जी-जान से जुट जाओ।’’
अमीर व्यक्ति यह सुनकर प्रसन्न हो गया। प्रसन्नता का रहस्य मिल गया था। संत को प्रणाम किया और अपना धन जरूरतमंदों की सेवा में समर्पित कर दिया।

एक दिन देखा कि वह अमीर व्यक्ति भी संत के समान चिड़ियों को दाना चुगा रहा है। संत ने प्रेम से उसके कंधे पर हाथ रखा और उसके साथ वे भी चिड़ियों को दाना चुगाने लगे।
सचमुच सच्चे आनंद की वर्षा में वे आनंदित होकर सच्चा सुख भोग रहे थे। उनके हृदय में हिलोरें ले रही थीं आनंद की लहरें।

2
आत्मज्ञान


एक संत के पास एक याचक आया। याचक को किसी ने बता दिया था कि संत के पास पारसमणि है। पारसमणि, जिसमें लोहे से स्पर्श करते ही सोना बना देने की अद्भुत शक्ति थी।
याचक बोला, ‘‘सुना है, आपके पास लोहे को सोना बना देने वाली पारसमणि है ?’’
‘‘हाँ, तुमने ठीक सुना है।’’
‘‘फिर मुझे वह पारसमणि कुछ दिनों के लिए दे दीजिए। मैं उसका उपयोग करके आपको लौटा दूँगा।’’

‘‘ठीक है, तुम जब तक चाहो तब तक अपने पास उस पारसमणि को रख सकते हो।’’ संत ने कहा।
‘‘क्या मैं उस पारसमणि को सदैव अपने पास रख सकता हूँ ?’’
‘‘हाँ, रख सकते हो।’’

‘‘क्या आपका पारसमणि से कोई मोह नहीं है ?’’
‘‘पारसमणि से कैसा मोह ! मेरे पास संतोषरूपी पारसमणि है। इसके आगे संसार की सभी पारसमणियाँ बेकार हैं।’’
‘‘संतोषरूपी पारसमणि की क्या विशेषता है ?’’

‘‘संतोषरूपी पारसमणि से आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है और आत्मज्ञान से बढ़कर संसार में कोई धन नहीं है। सोना बना देने वाली पारसमणि से सोना तो बन जाएगा, किंतु आत्मज्ञान सदा-सदा के लिए लुप्त हो जाएगा। आत्मज्ञान ईश्वर की ओर ले जाने वाला प्रकाश है। अब बताओ, तुम्हें कौन-सी पारसमणि चाहिए ?’’

सुनकर याचक का मन बदल गया। उसने आत्मज्ञानरूपी पारसमणि को चुन लिया। याचक धन्य हो गया और संत ने उसे अपना शिष्य बना लिया।

3
अंधकार और उजाला


एक बार एक संत के आगे एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया, ‘‘जलते हुए दीपक की बाती सफेद, उसमें घी का रंग भी सफेद, उसकी लौ लाल और दीपक भी काला नहीं, फिर दीपक के जल जाने के बाद काजल क्यों होता है ?’’

सुनकर संत मुस्कराए और बोले, ‘‘अच्छा, पहले यह बताओ कि दीपक क्यों जलाया जाता है ?’’
उत्तर दिया, ‘‘उजाले के लिए।’’
‘‘उजाला तभी आता है जब अंधकार मिट जाता है और अंधकार का रंग है काला। बस, इसी में छिपा है आपके प्रश्न का उत्तर—जो जैसा निगलेगा, वैसा ही उगलेगा।’’

4
तपस्वी और राजा


एक तपस्वी एक राजा के यहाँ पहुँचे। राजा प्रसन्न हो गए। महल में आए तपस्वी का अतिथियों की तरह स्वागत-सत्कार किया। तपस्वी अगले दिन जाने को हुए तो राजा ने कहा, ‘‘चलते-चलते आपको जो प्रिय हो, माँग लीजिए, मैं आपको उपहार में दे दूँगा।’’

तपस्वी बोले, ‘‘आपके मन में जो सबसे प्रिय वस्तु हो, उसे ही दे दीजिए।’’
राजा बोले, ‘‘कहिए तो अपना राज्य आपको सौंप दूँ ?’’
‘‘यह तो प्रजा का है, आप तो इसके संरक्षक हैं।’’ तपस्वी ने कहा।
‘‘तो फिर हाथी, घोड़े, शाही खजाना ?’’ राजा ने फिर कहा।

प्रथम पृष्ठ

लोगों की राय

No reviews for this book