आशा का सवेरा - बराक ओबामा Aasha Ka Savera - Hindi book by - Barack Obama
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आशा का सवेरा

बराक ओबामा

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :247
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7427
आईएसबीएन :978-81-7315-728

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The Audacity of Hope का हिंदी अनुवाद...

Aasha Ka Savera - A Hindi Book - by Barack Obama

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बराक ओबामा के अमेरिका के राष्ट्रपति बनते ही पूरे विश्व में एक आशावाद का संचार हो गया। इसका कारण था समाज के हर अंग के प्रति उनका चिंतन और सोच। उनकी मान्यता है कि प्रत्येक बच्चे को अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए—और यह केवल एक हवाई वादा बनकर ही नहीं रह जाना चाहिए; सभी बच्चे कॉलेज की पढ़ाई करने में भी सक्षम होने चाहिए, चाहे उनके माता-पिता धनाढ्य न हों। वे सुरक्षा चाहते हैं—अपराधियों और आतंकवादियों से। वे चाहते थे स्वच्छ वायु, स्वच्छ जल और अपने बच्चों के साथ कुछ समय बिताना। और जब वे बूढ़े हो जाएँ तो गरिमा व सम्मान के साथ सेवानिवृत्त हो सकें।

भूमंडलीकरण और विस्मयकारी प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों, गलाकाट राजनीति और अनवरत सांस्कृतिक युद्धों के इस युग में सर्वसम्मति बनाकर और मिल-जुलकर काम करने से ही समस्याओं का समाधान होगा। सरकारें हर समस्या हल नहीं कर सकतीं। परंतु अपनी प्राथमिकताओं को थोड़ा सा बदलकर हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि प्रत्येक बच्चे को जीवन में आगे बढ़ने का उचित अवसर मिले, ताकि वह उन चुनौतियों का सामना कर सके, जो एक राष्ट्र के रूप में हम सभी के सामने खड़ी हैं। समाज के सभी वर्गों के बीच सामंजस्य बिठाकर अभाव और कमियों को दूर करने के लिए आशावाद का संचार करनेवाली कृति है आशा का सवेरा।

पुरोवाक

उस बात को लगभग दस वर्ष बीत गए हैं, जब मैंने किसी राजनीतिक पद के लिए चुनाव लड़ा था। उस समय मैं पैंतीस वर्ष का था। लॉ स्कूल छोड़े हुए चार वर्ष बीत चुके थे, हाल ही में शादी हुई थी और जीवन को लेकर सामान्यतः अधीर था। इलिनॉइस सीनेट में एक सीट पर चुनाव होना था और यह सोचकर कि नागरिक अधिकारों के एक वकील के रूप में मेरा काम और एक सामुदायिक संगठन के रूप में बिताए समय के दौरान मेरे जो संपर्क बने थे, वे मुझे एक जिताऊ उम्मीदवार बनाते थे, कई मित्रों ने मुझे वह चुनाव लड़ने की सलाह दी। अपनी पत्नी के साथ चर्चा करने के बाद मैं दौड़ में शामिल हो गया और वह करने में जुट गया, जो पहली बार चुनाव लड़नेवाला हर प्रत्याशी करता है–मैंने हर उस व्यक्ति से बात की, जो मुझे सुनने के लिए तैयार था। मैं ब्लॉक स्तर के क्लबों की बैठकों, चर्च के सामाजिक कार्यक्रमों, ब्यूटी शॉप्स और हेयर कटिंग सैलूनों में गया। यदि दो व्यक्तियों को सड़क किनारे खड़े होकर बातें करते देखता तो अपनी प्रचार-सामग्री उन्हें देने के लिए सड़क पार करके उन तक पहुँचता। और जहाँ-जहाँ भी मैं गया, मैंने उन्हीं दो सवालों के ही स्वरूप का सामना किया।

‘‘ऐसा अजीब नाम आपको कैसे मिला ?’’ और फिर, ‘‘आप देखने में तो एक भले आदमी लगते हो। फिर आप राजनीति जैसे गंदे और भ्रष्ट क्षेत्र में क्यों आना चाहते हो ?’’
इस सवाल से मैं परिचित था, जो बरसों पहले मुझसे पूछे गए सवालों का ही एक प्रतिरूप था, जब मैं कम आमदनीवाले इलाकों में काम करने के लिए पहली बार शिकागो आया था। वह एक दोषदर्शी मानसिकता का सूचक था, जो न केवल राजनीति बल्कि सार्वजनिक जीवन की धारणा को ही संदेह की दृष्टि से देखती थी, एक दोषदर्शी प्रवृत्ति, जो–कम-से-कम दक्षिणी भाग के उन इलाकों में, जिनका प्रतिनिधित्व मैं करना चाहता था–तोड़े गए वायदों की एक पीढ़ी से पुष्ट हुई थी।
जवाब में मैं आमतौर पर मुसकराकर सिर हिलाता और कहता कि मैं उनके संदेहवाद को समझता हूँ; परंतु यह भी सच है कि राजनीति की एक और परंपरा थी–और हमेशा रही है–एक परंपरा, जो देश की स्थापना से लेकर शानदार नागरिक अधिकार आंदोलन के दिनों तक रही। एक परंपरा, जो इस सीधे-सादे विचार पर आधारित है कि हम सबके हित एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और यह कि जो चीज हमें बाँधे रखती है, वह उससे बढ़कर है, जो हमें एक-दूसरे से अलग करती है और यह कि अगर काफी संख्या में लोग इस विचारधारा में विश्वास करें और उस पर अमल करें तो हम भले ही प्रत्येक समस्या का हल न खोज पाएँ, परंतु कुछ सार्थक जरूर कर सकते हैं।

वह एक प्रभावशाली भाषण था, मैंने सोचा। और यद्यपि मुझे इस बात का पूरा विश्वास नहीं है कि जिन लोगों ने वह सुना था, वे भी उतने ही प्रभावित हुए थे, उनमें से काफी लोगों ने मेरी संजीदगी और इलिनॉइस सीनेट में मेरे युवा हाव-भावों को सराहा।

छह वर्ष बाद, जब मैंने अमेरिकी सीनेट का चुनाव लड़ने का फैसला किया, तब मैं अपने प्रति इतना आश्वस्त नहीं था।
सब तरह से देखने पर कैरियर के मामले में मेरी पसंद कारगर प्रतीत होती थी। राज्य सीनेट के दो कार्यकालों के दौरान अल्पमत में रहकर मेहनत करने के बाद डेमोक्रेट्स ने उस पर कब्जा कर लिया था और मैंने इलिनॉइस में मृत्युदंड व्यवस्था में सुधार से लेकर राज्य में बच्चों के लिए स्वास्थ्य कार्यक्रमों तक कई विधेयक सफलतापूर्वक पास कराए। मैंने यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो लॉ स्कूल में पढ़ाना जारी रखा था और उस काम में मुझे आनंद आता था, साथ ही मुझे अकसर शहर में कई जगह भाषण देने के लिए आमंत्रित किया जाता था। मैंने अपनी आजादी, प्रतिष्ठा एवं विवाह बचाए रखे थे और ये सब उस क्षण खतरे में पड़ गए थे, जब मैंने राज्य की राजधानी में कदम रखा था।

परंतु जीवन के बीतते वर्षों ने अपना काम किया था। उसका कुछ भाग तो मैं समझता हूँ, बस बढ़ती उम्र के साथ जुड़ा हुआ था; क्योंकि यदि आप ध्यान दें तो हर गुजरता वर्ष आपको अपनी कमियों, अँधियारे बिंदुओं, बार-बार सामने आनेवाली उन वैचारिक आदतों, जो वंशानुगत भी हो सकती हैं और परिस्थितिजन्य भी, परंतु जो लगभग निश्चित रूप से समय के साथ और भी बदतर होंगी उतनी ही निश्चितता के साथ जितनी मार्ग में चलते हुए अचानक कोई अवरोध आ जाने से आपके कूल्हों में दर्द के प्रति आपको और अधिक जागरूक बना देगा। मुझमें उनमें से एक कमी जो साबित हो गई थी, वह थी एक स्थायी बेचैनी। जीवन में चाहे जितना अच्छा घटित हो रहा हो, ईश्वर के वे वरदान जो ठीक मेरे सामने थे, उन्हें स्वीकार करने में असमर्थता। यह एक ऐसी कमी है, जो आधुनिक जीवन में सर्वव्याप्त है और मैं समझता हूँ, अमेरिकी चरित्र में भी वह समाई हुई है तथा वह किसी और क्षेत्र में इतनी स्पष्टता से दिखाई नहीं देती जितनी राजनीति में। राजनीति इस प्रवृत्ति को सचमुच प्रोत्साहित करती है या केवल उन्हीं लोगों को आकर्षित करती है जिनमें यह प्रवृत्ति हो, यह स्पष्ट नहीं है। किसी ने एक बार कहा था कि प्रत्येक व्यक्ति या तो अपने पिता की गलतियों की भरपाई कर रहा होता है–और मैं समझता हूँ कि मेरी इस खास बुराई की यह एक सबसे अच्छी व्याख्या हो सकती है।

बहरहाल, यह उसी बेचैनी का परिणाम था कि वर्ष 2000 के चुनावी चक्र में मैंने कांग्रेस की एक सीट के लिए एक सिटिंग डेमोक्रेटिक सदस्य को चुनौती देने का फैसला किया। यह एक सुविचारित फैसला नहीं था और उस दौड़ में मैं बुरी तरह पिछड़ गया–एक ऐसी पराजय, जो आपको इस सच्चाई से रूबरू कराती है कि आपने जो कुछ प्लान किया था, जीवन उसे वैसे ही फलीभूत करने के लिए बाध्य नहीं है। डेढ़ वर्ष बाद उस पराजय का जख्म पर्याप्त रूप से भर जाने पर मैंने एक मीडिया कंसल्टेंट के साथ लंच किया, जो कुछ समय से मुझे राज्य स्तर के एक पद हेतु चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था। वह लंच वर्ष 2001 में सितंबर के आखिरी में किसी एक दिन के लिए तय किया गया।
‘‘क्या आप महसूस नहीं करते कि राजनीतिक हालात बदल चुके हैं ?’’
सलाद का एक टुकड़ा उठाते हुए उसने कहा।

‘‘आपका मतलब क्या है ?’’ उसका मतलब अच्छी तरह समझते हुए भी मैंने पूछा। हम दोनों की नजर पास रखे समाचार-पत्र पर पड़ी। उसके मुखपृष्ठ पर ही ओसामा बिन लादेन का चित्र था।
‘‘बहुत बुरी बात है, नहीं ?’’ सिर हिलाते हुए उसने कहा। सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण ! क्या आप अपना नाम नहीं बदल सकते ? मतदाताओं के मन में इसी प्रकार के संदेह हैं। यदि आपका कैरियर शुरुआती दौर में होता तो आप कोई उपनाम रख लेते। परंतु अब...’’ उसकी आवाज टूट गई और वेटर को बिल लाने का इशारा करने से पहले उसने क्षमायाचना की मुद्रा में अपने कंधे उचकाए।

मुझे भी शक था कि उसकी बात सच थी और यह अहसास मुझे खाए जा रहा था। अपने कैरियर में पहली बार मैंने उम्र में अपने से छोटे राजनीतिज्ञों को वहाँ कामयाब होता देखने, जहाँ मैं असफल रहा था, मुझसे बड़े ओहदों पर पहुँच जाने और मुझसे बढ़कर कुछ कर दिखाते हुए देखने की ईर्ष्या अनुभव की। राजनीति के सुख–बहस का रोमांच, हस्तियों से हाथ मिलाने और लोगों की भीड़ में उतर जाने की आदिम गर्मजोशी–इस लाइन के छोटे दर्जे के कामों जैसे चंदे की भीख माँगना, निर्धारित समय से दो घंटे बाद, समाप्त हुए समारोह के बाद घर पहुँचने के लिए लंबा रास्ता तय करना, वाहियात खाना और बासी वायु तथा उस बीवी के साथ फोन पर उखड़ी सी बातचीत, जो अब तक किसी तरह मेरा साथ दे रही थी, लेकिन अब वह बच्चों को अकेले पालते हुए तंग आ चुकी थी और मेरी प्राथमिकताओं पर सवाल उठाने लगी थी, के आगे फीके पड़ गए थे। यहाँ तक कि सदन से जुड़े काम, नीति-निर्धारण–जो मुझे राजनीति में लाए थे, बहुत रुटीन और टैक्सों, रक्षा सरोकारों, जन-स्वास्थ्य तथा रोजगार जैसी बृहत्तर लड़ाइयों, जो राष्ट्रीय स्तर पर लड़ी जा रही थीं, से बहुत कटे हुए–से लगने लगे। मैंने जो रास्ता चुना था, उस पर मेरे ही मन में संदेह घर करने लगे। मैं उस तरह महसूस करने लगा जैसे मैं समझता हूँ, एक अभिनेता या एथलीट तब महसूस करता होगा, जब तक सपना पूरा करने के लिए वर्षों तक लगन से काम करने या वर्षों तक कई ऑडिशनों के बीच वेटर का काम करने और बहुत छोटे स्तरों पर काम करते रहने के बाद उसे पता चलता है कि वह उस अंतिम पड़ाव तक पहुँच गया है, जहाँ तक उसकी प्रतिभा या किस्मत उसे ला सकती थी। सपना तो अब पूरा नहीं होगा और अब उसके सामने दो ही विकल्प हैं–एक परिपक्व व्यक्ति की तरह इस सच्चाई को स्वीकार कर ले तथा समझदारी से भरा कोई और काम पकड़ ले या सच्चाई से इनकार करते हुए एक कटु, झगड़ालू और कुछ दयनीय-सा आदमी बनकर जीता रहे।



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