माँ की आत्मा के लिए अमृत - जैक कैनफ़ील्ड, मार्क विक्टर हैन्सन, जोनिफ़र रीड होथोर्न, मार्सी शिमॉफ़ Maa Ki Atma Ke Liye Amrit - Hindi book by - Jack Canfield, Mark Victor Hansen, Jennifer Read H
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माँ की आत्मा के लिए अमृत

जैक कैनफ़ील्ड, मार्क विक्टर हैन्सन, जोनिफ़र रीड होथोर्न, मार्सी शिमॉफ़

प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :272
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7430
आईएसबीएन :9788183221122

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एक देवदूत चुपके से स्वर्ग से निकला और इस पुरानी दुनिया में नीचे चला आया। वह खेत और जंगल, शहर और गांवों में घूमने लगा...

Maa Ki Atma Ke Liye Amrit - A Hindi Book - by Jack Canfield, Mark Victor Hansen, Jennifer Read

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘‘मातृत्व ज़िंदगी का सबसे ज़्यादा अभिभूत कर देने वाला अनुभव है। चिकन सूप फ़ॉर द मदर्स सोल इस अनमोल अनुभव की ख़ुशबू से ओतप्रोत है।’’

–क्रिस एवर्ट
टेनिस चैंपियन

प्रेम


प्यार सबकी पहुँच में रहने वाला एक सदाबहार फल है।

मदर टेरेसा

ममता की उड़ान


माँ का प्यार किसी बात को असंभव नहीं मानता।

पैडोक

जब मैं अपनी सहेली कैरोल डे के साथ 26 अप्रैल, 1975 को अपनी पुरानी वीडब्ल्यू बग गाड़ी में सैगोन की धूल भरी सड़कों से गुज़र रही थी, तब मुझे पूरा विश्वास था कि हम दोनों ही आयोवा की घरेलू महिलाओं जैसे लग रहे थे। तीन महीने पहले, जब कैरोल और मैंने तीन-तीन वियतनामी अनाथ बच्चों को उनके अमेरिकी परिवारों तक पहुँचाने की स्वीकृति दी थी, तब तक यात्रा रोमांचक मगर सुरक्षित लग रही थी। मेरे पति मार्क और मैंने पहले से ही भविष्य में एक अनाथ बच्चे को गोद लेने का आवेदन-पत्र दे रखा था। हम सभी किसी न किसी तरह इन बच्चों की ज़िंदगी में कुछ बदलाव लाना चाहते थे। मगर कैरोल और मैं भला कहाँ जानते थे कि जब हम यहाँ पहुँचेंगे तो सैगोन घेराबंदी में होगा ?
शहर से तीन मील से भी कम की दूरी पर बम गिर रहे थे और अभी भी नागरिक अपनी कारों, ठेलों और पीठ पर अपना सामान लादे हमारे आस-पास से निकलकर भागते जा रहे थे। लेकिन, हमें लेने आई फ़्रेंड्स ऑफ़ द चिल्ड्रन ऑफ़ वियतनाम (एफ़सीवीएन) की निदेशिका चेरी क्लार्क डरी हुई कम और उत्साहित ज़्यादा थीं। जबसे हम वहाँ पहुँचे थे, वे हम पर अप्रत्याशित समाचारों की बौछार किए जा रही थीं।

‘‘क्या तुमने सुना कि राष्ट्रपति फ़ोर्ड ने इन बच्चों को बचाने के इरादे से एक विशाल यान की स्वीकृति दे दी है ? तुम लोग अब छह अनाथ बच्चों की जगह 200 अनाथ बच्चों को घर लेकर जाओगी !’’ कैरोल और मैंने एक-दूसरे की ओर हैरत से देखा।
‘‘कल हम एक वायुयान भरकर बच्चों को यहाँ से निकालने में कामयाब रहे। आख़िर वक़्त पर वियतनामी सरकार ने इंकार कर दिया, लेकिन तब तक यान उड़ान भर चुका था। इस तरह 150 बच्चे सेन फ़्रांसिस्को सुरक्षित पहुँच गए !’’ चेरी बताए जा रही थी।

एफ़सीवीएन क्रेद्र में जो दृश्य हमने देखा, उसके लिए हम बिलकुल तैयार नहीं थे। उस फ़्रेच भवन के फ़र्श का हर इंच कंबलों और दरियों से भरा हुआ था और हर एक पर बच्चे पड़े थे–कई सौ बच्चे, रोते हुए या नन्हें बच्चे–हर कोई अनाथ या परित्यक्त।
हालाँकि जेट लैग हम पर हावी हो रहा था, फिर भी हमने उन बच्चों को अगली उड़ान के लिए तैयार करने का संकल्प ले लिया था। हमारी उड़ान अगले दिन की पहली उड़ान थी। हर बच्चे को कपड़ों, मेडिकल जाँच और एक वैधानिक नाम की ज़रूरत थी। वियतनामी और अमेरिकी स्वयंसेवक चौबीस घंटे सेवा में जुटे हुए थे।

अगले दिन हमें पता चला कि एक दिन पहले को अवैधानिक उड़ान के विरोध में हमारी एजेंसी की उड़ान को सबसे पहले नहीं जाने दिया जाएगा। हम तभी जा पाएँगे जब वियतनाम सरकार हमें अनुमति देगी। चेरी ने शांत भाव से कहा, ‘‘हम इंतज़ार और प्रार्थना करने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकते।’’ हम सभी जानते थे कि अमेरिकियों और सैगोन के अनाथ बच्चों के लिए समय बहु कम था।
इसी बीच कैरोल और मैं दूसरे स्वयंसेवकों के साथ मिलकर ऑस्ट्रेलिया जाने वाली एक अन्य उड़ान के लिए बच्चों को तैयार करने लगे। उसे अनुमति मिल चुकी थी।

उस तपती गर्मी में हमने बच्चों को वॉक्सवैगन गाड़ी में चढ़ाया, जिसकी बीच की सीट को निकाल दिया गया था। मैं एक सीट पर बैठ गई और मेरे पैर के चारों तरफ लगभग 21 बच्चे थे। बाकी स्वयंसेवक भी इसी प्रकार बैठे हुए थे।
जब हम एयरपोर्ट पर पहुँचे तो वहाँ पर ट्रेफ़िक रुका हुआ था। हमारे सामने एक बड़ा-सा काला बादल आसमान की तरफ़ उठ रहा था। जैसे ही हम गेट से अंदर आए, हमने एक भयानक अफ़वाह सुनी : अनाथ बच्चों को लेकर उड़ा पहला प्लेन, जिस पर जाने के लिए हम बार-बार विनती कर रहे थे, उड़ान भरने के साथ ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।

यह सच नहीं हो सकता था। हमने इस बात पर विश्वास नहीं किया। बच्चों को उनकी आज़ादी की उड़ान के लिए तैयार करते समय हमारे पास चिंता करने का समय भी नहीं था। कैरोल और मैं एक-दूसरे का हाथ थामे प्लेन को उड़ान भरते हुए देख रहे थे। जैसे ही प्लेन ने उड़ान भरी, हम ख़ुशी से नाच उठे। कम से कम एक प्लेन भरकर बच्चे आज़ाद हो चुके थे।
लेकिन हमारी यह ख़ुशी थोड़ी ही देर रह पाई। जब हम लौटकर आए तो सभी बड़े लोग दुःख से सकते में थे। चेरी ने हमारी शंकाओं को यक़ीन में बदलते हुए हक़ीक़त बयान की। कई सौ नन्हे बच्चे और उनके साथ के स्वयंसेवक उस प्लेन के फटने के साथ मारे गए। कोई नहीं जानता था कि उस प्लेन को बम से उड़ाया गया था या गोली से।

स्वयंसेवक और नन्हे बच्चे ! कौन ऐसा नीच काम कर सकता था ? क्या दोबारा भी ऐसा करेंगे ? मैं बैंच पर बैठकर सुबकने लगी। उस प्लेन के गिरने के साथ ही मेरी आस्था भी टूटने लगी थी। मुझे ये लगने लगा था कि अब मैं अपने पति और बेटियों को कभी नहीं देख पाऊँगी।
उस दिन शाम को चेरी ने मुझे बुलाया। विस्मित कर देने वाली घटनाओं के बीच भी, जो उसने मुझसे कहा, मैं उसके लिए तैयार नहीं थी, ‘‘जो काग़ज़ात तुम साथ लाई हो, उनमें किसी बच्चे को गोद लेने के क़ाग़ज भी हैं। तुम किसी बच्चे को दिए जाने का इंतज़ार करने की बजाय किसी एक बच्चे को जाकर ख़ुद क्यों नहीं चुन लेतीं ?’’

ऐसा लगा जैसे मेरी सबसे बुरी आशंका और दिली तमन्ना एक ही दिन सच हो रहे थे। अगर मैं अपनी बेटियों के लिए उनके नए भाई को घर ले आऊँ, तो क्या वे ख़ुशी से झूम नहीं उठेंगी ? लेकिन मैं किस बच्चे को चुनूँ ? अपने होंठों पर प्रार्थना लिए मैं बग़ल वाले कमरे में गई।

जब मैं उन बच्चों की भीड़ में घूम रही थी, तो एक नन्हा-सा बच्चा सिर्फ़ एक डायपर पहने हुए घुटनों के बल चलता हुआ मेरे पास आया। जैसे ही मैंने उसे गोद में उठाया, वह मेरे कंधे पर अपना सिर टिकाते हुए मुझसे लिपट सा गया। मैं उसे अपनी बाँहों में लिए हुए सारे कमरे में हर बच्चे को छूकर देखती रही। ऊपर का हॉल भी नन्हे बच्चों से भरा हुआ था। मैं जब धीमी आवाज़ में एक ही सही निर्णय लेने के लिए प्रार्थना करने लगी, तो यह नन्हा बच्चा मुझसे और भी लिपट गया। उसकी हल्की-हल्की साँसें मेरे दिल में घर कर गईं।
मैंने धीरे से उससे कहा, ‘‘हैलो मिशेल, मैं तुम्हारी माँ हूँ।’’

अगले दिन हमें यह ख़ुशख़बरी मिली कि हमारी उड़ान को उसी दोपहर के लिए अनुमति मिल गई है। सभी स्वयंसेवकों ने मिलकर बचे हुए 150 बच्चों को तैयार किया।
एक पुरानी सिटी बस में एक-एक सीट पर तीन-चार बच्चों को रखा गया। हमें हवाई अड्डे के कई दौरे लगाने थे। अपने पहले दौरे में कैरोल और मैं साथ-साथ आए। हमें फिर एक बुरी ख़बर सुनने को मिली वियतनामी राष्ट्रपति थियू ने हमारी उड़ान रद्द कर दी थी। कैरोल और मैंने मिलकर उस झुलसाती गर्मी में बच्चों को पास के गंदे झोपड़े में ले जाने में मदद की। क्या हम कभी यहाँ से नहीं निकल पाएँगे ? क्या हम सैगोन की इस घेराबंदी में मारे जाएँगे ?

आख़िरकार एफ़सीवीएन का एक कार्यकर्ता रॉस भागा-भागा आया और बोला, ‘‘राष्ट्रपति थियू ने सिर्फ एक उड़ान की अनुमति दी है और उसे तुरंत ही जाना है। जल्दी से इन बच्चों को प्लेन में भरो और तुम दोनों भी यहाँ से जाओ।’’ उसने कैरोल और मुझसे कहा। हमें यहाँ से जाने का मौक़ा मिल गया था !
मैंने कहा, ‘‘नहीं मैं अपने छोटे बेटे को अगली ट्रिप के लिए केंद्र में छोड़कर आई हूँ। मुझे जाकर उसे लाना होगा।’’
रॉस बोला, ‘‘ली एन, तुम हालात देख रही हो। जितनी जल्दी हो सके यहाँ से निकल जाओ। मैं वादा करता हूँ कि तुम्हारे बेटे को तुम तक पहुँचाने की पूरी कोशिश करूँगा।’’

हालात पर मेरी नज़र थी। ‘‘मैं मिशेल के बिना यहाँ से नहीं जाऊँगी।’’
रॉस ने कहा, ‘‘तो फिर जल्दी करो। मैं जितनी देर हो सकेगा, प्लेन को रोके रखने की कोशिश करूँगा, लेकिन हम दूसरे बच्चों के अवसर इस तरह बर्बाद नहीं कर सकते।’’

मैं बस की तरफ़ दौड़ी। ड्राइवर भीड़ के बीच में से बस को बेतहाशा दौड़ाता हुआ ले गया और उसने मुझे केंद्र से एक मील दूर उतार दिया। मेरी चप्पल टूट गई और मेरी एड़ियों पर उसका स्ट्रैप बार-बार लग रहा था। मैंने दौड़ते हुए ही चप्पल उतार दी। केंद्र की सीढ़ियाँ लगभग दौड़ते हुए चढ़ते समय मेरा बदन बुरी तरह दर्द कर रहा था।
वो प्लेन... मैंने हाँफते हुए कहा। चेरी ने मुझे कुर्सी पर आराम से बैठाते हुए कहा, ‘‘मैं जानती हूँ। मैंने अभी-अभी एयरपोर्ट से फ़ोन पर बात की है।’’

‘‘और ?’’
‘‘प्लेन तुम्हारा इंतज़ार करेगा !’’ चैरी ने हँसते हुए कहा।
मैंने हाँफते हुए भी मुस्करा दी।
‘‘सिर्फ यही नहीं, हम इस उड़ान में और भी बच्चों को ले जा सकते हैं–और एक दूसरी उड़ान की भी स्वीकृति मिल गई है।’’


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