ग्लोबल गाँव के देवता - रणेन्द्र Global Gaon Ke Devta - Hindi book by - Ranendra
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ग्लोबल गाँव के देवता

रणेन्द्र

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :100
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7493
आईएसबीएन :9788126318346

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आदिवासियों-वनवासियों के जीवन का सन्तप्त सारांश...

Global Gaon Ke Devta - A Hindi Book - by Ranendra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कथाकार रणेन्द्र का उपन्यास ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ वस्तुतः आदिवासियों-वनवासियों के जीवन का सन्तप्त सारांश है। शताब्दियों से संस्कृति और सभ्यता की पता नहीं किस छन्नी से छन कर अवशिष्ट के रूप में जीवित रहने वाले असुर समुदाय की गाथा पूरी प्रामाणिकता व संवेदनशीलता के साथ रणेन्द्र ने लिखी है। ‘अनन्य’ और ‘अन्य’ का विभाजन करनेवाली मानसिकता जाने कब से हावी है। आग और धातु की खोज करनेवाली, धातु पिघलाकर उसे आकार देनेवाली कारीगर असुर जाति को सभ्यता, संस्कृति, मिथक और मनुष्यता सबने मारा है। रणेन्द्र प्रश्न उठाते हैं, ‘बदहाल ज़िंदगी गुज़ारती संस्कृतविहीन, भाषाविहीन, साहित्यविहीन, धर्मविहीन। शायद मुख्यधारा पूरा निगल जाने में ही विश्वास करती है।... छाती ठोंक ठोंककर अपने को अत्यन्त सहिष्णु और उदार करनेवाली हिन्दुस्तानी संस्कृति ने असुरों के लिए इतनी जगह भी नहीं छोड़ी थी। वे उनके लिए बस मिथकों में शेष थे। कोई साहित्य नहीं, कोई इतिहास नहीं, कोई अजायबघर नहीं। विनाश की कहानियों के कहीं कोई संकेत्र मात्र भी नहीं।’

‘ग्लोबल गाँव के देवता’ असुर समुदाय के अनवरत जीवन संघर्ष का दस्तावेज़ है। देवराज इन्द्र से लेकर ग्लोबल गाँव के व्यापारियों तक फैली शोषण की प्रक्रिया को रणेन्द्र उजागर कर सके हैं। हाशिए के मनुष्यों का सुख-दुख व्यक्त करता यह उपन्यास झारखंड की धरती से उपजी महत्त्वपूर्ण रचना है। असुरों की अपराजेय जिजीविषा और लोलुप-लुटेरी टोली की दुरभिसन्धियों का हृदयग्राही चित्रण।

ग्लोबल गाँव के देवता


नियुक्ति-पत्र देखकर ख़ुश होऊँ कि उदास होऊँ, समझ में नहीं आ रहा। लम्बी बेरोज़गारी, बदहाली, उपेक्षा, अपमान की गाढ़ी काली रात के बाद रौशनी आयी थी। मैं अब नौकरीशुदा था। यह ख़ुशी की बात थी। एक तरफ़ बहुत ही ख़ुशी की बात, मन बल्लियों उछलने को कर रहा था। दूसरी तरफ़ जिस स्कूल में पोस्टिंग हुई थी उसे देखकर दिल डूबा जा रहा था। बरवे ज़िला ही हमारे घर से ढाई-तीन सौ किलोमीटर दूर था। उस पर प्रखंड कोयलबीघा का भौंरापाट। पहाड़ के ऊपर, जंगलों के बीच वह आवासीय विद्यालय। पीटीजी गर्ल्ज रेज़िडेंशियल स्कूल। प्रिमिटिव ट्राइव्स, आदिम जनजाति परिवार की बच्चियों के लिए आवासीय विद्यालय में विज्ञान-शिक्षक। क्या पोस्टिंग थी ! ख़ुश होने के बदले माथा पीटने का मन होने लगा। मेरे ही साथ ऐसा क्यों होता है ? माँ पिछली रोटी खिलाती रही है शायद।

गाँव के ही चाचा के समधी थे विधायक रामाधार बाबू। दूसरे दिन सवेरे-सवेरे सवा सेर लड्डू के पैकेट के साथ हाज़िर। ‘‘आप ही के आशीर्वाद से नौकरी भेंटायी है, अब पोस्टिंग भी लड़का का ठीक-ठीक जगह हो। आप ही को तो कृपा करनी है।’’ बाबूजी, विधायकजी के सामने घिघिया रहे थे।

‘‘देखिए समधी ! बड़ा भरोसा से आये हैं। बचवा की शादी-वादी भी होनी है। कहाँ-जंगली इलाक़ा में रहेगा ? कहाँ बहुरिया को रखेगा ? आपका एतना रसूख है।’’ यह चाचा थे।
‘‘देखो भाई ! गुप्ताजी। कहाँ हैं पी.ए. साहब, हो !’’
‘‘जी सर ! हियें हैं।’’

‘‘अरे ! ख़ुद समधीजी आये हैं। लड़का कहाँ जाएगा जंगली इलाक़े में। राजधानी या अपने ज़िले के आसपास पोस्टिंग करवानी है। किसको फोन किया जाए ? शिक्षा सचिव को ?’’
‘‘नहीं सर ! कल्याण विभाग के निदेशक, मिश्राजी से ही काम चल जाएगा।’’
‘‘लगाइए। बाक़ी अभी कहाँ भेटाएँगे लोग। ऐसा कीजिए, आज सचिवालय जाना है। रोड सिक्रेटरी से मुलाक़ात के बाद याद दिलाइएगा। आज डायरेक्टर से फाइनल करला देते हैं। आप लोग निश्चिन्त होकर नहाइए-खाइए। आज ई काम हो जाएगा।’’ विधायकजी का बड़ा ठोस आश्वासन था।

हम सब ख़ुश लौट आये, किन्तु ज्वाइनिंग की आख़िरी तारीख़ 30 जून तक कुछ हो नहीं सका।
थक-हारकर, उदास-निराश, बस-ट्रेकर बदली करते और आख़िरी में बॉक्साइट वाले ट्रक पर लदकर पहाड़ के घुमावदार रास्तों से चढ़ता भौंरापाट स्कूल पहुँचा। एक तो गर्ल्ज स्कूल, उस पर सारी टीचर्स लेडीज़। हेडमिस्ट्रेस के अलावा दो टीचर्स थीं। हाँ ! किरानी बाबू मर्द थे। उन्हें देखकर थोड़ी राहत मिली। कैम्पस में टीचर्स क्वार्टर्स की हालत खस्ता थी। आज तक कोई उनमें रहा ही नहीं था। हेडमिस्ट्रेस और टीचर्स शहर से आती-जाती थीं। साहू बाबू सखुआपाट बाज़ार में रहते थे।
मकड़ी के जाले, धूल-धक्कड़ और सड़-से गये किवाड़-खिड़कियाँ। कोने वाले क्वार्टर में लेडी पिऊन थी। उसने की झाड़ूकश के साथ मिलकर दिन भर में एक क्वार्टर रहने लायक़ साफ़-सुथरा कर दिया। ज्वाइनिंग के बाद भी मेरा ध्यान अभी भी विधायकजी पर ही लगा हुआ था। तीन बजे तक स्कूल बन्द हो गया। हेडमिस्ट्रेस और टीचर्स के सखु्आपाट के आगे से आख़िरी बस पकडनी थी। साहूजी के साथ साइकिल पर बैठकर मैं भी सखुआपाट पहुँचा। स्कूल से चार-पाँच किलोमीटर। हालाँकि सवेरे भी ट्रक से इधर से ही गुज़रा था पर ध्यान नहीं दे सकता था। अच्छा-ख़ासा बाज़ार था। बगल में ही शिंडाल्को माइंस का ऑफ़िस और क्वार्टर्स थे। कई अफ़सर और स्टाफ़ रहते थे। अन्य कई छोटी बॉक्साइट कम्पनियों के ऑफि़स भी आसपास ही थे। ग्रामीण बैंक, सरकारी स्वास्थ्य केन्द्र, कई सरकारी भवन, छोटे-मोटे होटल, परचून-किराने की दुकानें, पान-चाय की गुमटियाँ, यानी अच्छी-ख़ासी चहल-पहल। नीचे से आनेवाले ख़ाली ट्रक और अलग-अगल खदानों से ब़क्साइट भरकर आनेवाले ट्रकों का पड़ाव भी था। सखुआपाट। शिंडाल्को ऑफ़िस से चालान लेने में टाइम लगता, तब तक बा़ज़ार में चहल-पहल बढ़ी रहती। साहूजी मेरा सामान्य ज्ञान बढ़ा रहे थे। मेरे कानों में बस कुछ अल्फ़ाज गिर रहे थे। मैं सुन रहा था कि नहीं, मुझे भी पता नहीं लग रहा था। मेरे प्राण तो एस.टी.डी. बूथ में अटके हुए थे। रोज़ सुबह-शाम घर और विधायकजी के पी.ए. गुप्ताजी से बात करने का नशा हो गया था।

मीलों तक पसरे पहाड के ऊपर का यह चौरस इलाक़ा मन को और उचाट कर रहा था। छिटपुट जंगल बाक़ी ख़ाली दूर-दूर तक फैले उजाड़-बंजर से खेत। बीच-बीच में बॉक्साइट की खुली खदानें। जहाँ से बॉक्साइट निकाले जा चुके थे वे गड्ढे भी मुँह बाये पड़े थे। मानो धरती माँ के चेहरे पर चेचक के बड़े-ब़डे धब्बे हों। कोई ढंग से बोलने-बतियाने वाला नहीं। शाम होते ही सन्नाटा उतर आता। बिजली आती-जाती रहती। पिऊन एतवारी की भलमनसाहत थी कि मेरी भी रोटी सेंक दिया करती। उसका आदमी माइनर था, खान-मज़दूर। खट कर, पी-पाकर आता, खाता और चुपचाप सो जाता। ऐसा चुप्पा आदमी मैंने नहीं देखा। हालाँकि सवेरे नहाने-धोने उसी के साथ जंगल में थोड़ा नीचे उतरकर एक सोते तक जाता लेकिन वह रास्ते भर या तो दतवन चबाता रहता या खैनी भरे रहता। बात करने से उसे परहेज़ था। हालाँकि बहुत बोलने-बतियाने की मेरी भी आदत नहीं थी। घर पर माँ-बहनें मुन्ना की जगह घुन्ना ही कहकर पुकारती थीं। कभी-कभी लगता कि एतवारी के बढ़-चढ़कर मदद करने से वह अन्दर-ही-अन्दर ग़ुस्साया हुआ है। नयी जगह, अनजाने लोग, डर लगता। और मैं भी एतवारी से कम-से-कम ही मतलब रखता। हाँ और न में काम चलाने की कोशिश करता। हालाँकि बच्चियों का हॉस्टल भी कैम्पस में ही था। अलग मेस भी। खाना पकानेवाली दो रसोईदारिनें थीं, जो भौंरापाट गाँव की ही थीं। किन्तु बच्चियों के हॉस्टल की ओर रात में खाने जाना मुझे किसी तरह ठीक नहीं लगा, सो एतवारी की ही रोटी की व्यवस्था चलती रही।

एक रात किरानी बाबू के साथ भी सखुआपाट में ठहरकर देखा। क्वार्टर था कोयलबीघा अंचल कार्यालय के हल्का कर्मचारी का। ख़ुद रहता नहीं था, किराये पर उठा रखा था। क्वार्टर की दूसरी कोठरी में इतना शोरगुल, हो–हंगामा, देर रात में मार-पीट। नींद हराम हो गयी। मालूम हुआ ठेकेदार अंसारी साहब हैं और उनकी एक रखनी है रामरति। दोस्त-यार जुटते हैं। दारू-शारू चलती है। चढ़ जाती है तो मारपीट के बाद महफ़िल टूटती है। रोज़ रात की यही रूटीन–तीन सौ पैंसठों दिन, बिना नागा। आगे का इंटरेस्ट हो तो उसकी भी व्यवस्था। रुलाई-धुलाई के बाद ज़िन्दा ब्लू फ़िल्म, बिना टिकट। फुल बल्ब-लाइट, किवाड़-खिड़की खुल्ला। कोई लाज-लिहाज़ नहीं इन दोनों को। साहूजी का रिकार्ड चालू था।

हालाँकि शहर से दूर, पहाड़ के ऊपर जंगल-खदानों के बीच भौंरापाट में रहते एक हफ़्ता घसीटते-घसीटते गुज़र गया। किन्तु अभी तक मन राजधानी में विधायक-आवास में ही अटका था। क्लास की बच्चियों की तो छोड़िए, अपनी हेडमिस्ट्रेट और टीचर्स का भी ठीक से परिचय नहीं जान पाया था। आँख मूँदने पर उनके चेहरे भी ठीक से ध्यान में नहीं आते थे। किरानी बाबू और एतवारी से ही, कह सकते हैं, थोड़ी-बहुत जान-पहचान हुई थी। मन एकदम नहीं लगता था। शाम सबसे बोझिल होती। अँधेरा उतरते सखुआपाट से भौंरापाट स्कूल तक जाने के लिए ट्रक भी नहीं मिलते। सो रोज़ शाम कैम्पस में ही गुज़ारनी होती। झींगुरों की झनझनाहट को कभी-कभी एतवारी के बच्चों की चिल्ल-पों या हॉस्टल की बच्चियों के धौल-धप्पे दूर किया करते। जैसे-जैसे रात उतरती, झींगुरों का गान आर सियारों की पुकार भारी पड़ती जाती। मन भीगे कम्बल-सा भारी होने लगता। उचाटपन तन-मन पर छाने लगता। घर की याद में आँखें डबडबाई लगतीं। लगता, कब खूँटा उखाड़ूँ और भाग निकलूँ।

उस दिन सवेरे सात-आठ बजे-जंगल से पझरा-सोता से नहा, लौटकर कपड़े बदल रहा था कि कोई गिरता-पड़ता, किवाड़, बाल्टी से टकराता हड़बड़ा कर मेरी कोठरी में घुसा और मुझसे लिपट गया।
एकाएक उसके कमरे में गिरते-पड़ते घुसने और लिपटने से मैं घबरा गया, किन्तु वह ख़ुद भय से काँप रहा था। कुछ सेकेंड ही लगे होंगे मुझे सँभलने में। उसे ठीक से थाम, चौकी पर बिठाया, पीने को पानी दिया। तब ग़ौर से देखा। अट्ठाइस-तीस की उम्र का ख़ूब गोरा-चिट्टा आदमी। सफ़ेद धोती और क्रीम कलर का पोलिएस्टर कुर्ता। चेहरे और सिर पर चोट के निशान थे। कई जगहों से ख़ून छलक रहा था। सिर से रिसता ख़ून चेहरे से होकर बह रहा था। धोती तो बुरी तरह फट चुकी थी, कुर्ता भी खोंचाया।

कमरे में अजाना आदमी और हालत भी समझ के परे। कैसे बात शुरू करूँ ? अभी सोच ही रहा था कि एतवारी आ गयी।
‘‘अरे ! ई तो दादा हैं। लालचन दादा। हमरे गाँव नवा अम्बाटोली के प्रधान, बैगा बाबा के बड़े लालचन असुर।’’ एतवारी भी उनकी हालत देखकर घबरा-सी गयी।


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