बीच की धूप - महीप सिंह Beech Ki Dhoop - Hindi book by - Mahip Singh
लोगों की राय

उपन्यास >> बीच की धूप

बीच की धूप

महीप सिंह

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :236
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7498
आईएसबीएन :9789380146225

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

142 पाठक हैं

अथक शब्दकर्मी महीप सिंह का एक सामाजिक विचारोत्तेजक उपन्यास...

Beach Ki Dhoop - A Hindi Book - by Maheep Singh

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अथक शब्दकर्मी महीप सिंह का प्रस्तुत उपन्यास ‘बीच की धूप’ इस देश के उस दौर की कहानी कहता है जब लोकतंत्र के मुखौटे में डरी हुई राजनीतिक सत्ता तमाम तरह के अलोकतांत्रिक दंद-फंद के सहारे स्वयं को कायम रखने की कोशिशों में क्रूर से क्रूरतर होती जा रही थी।
सभी आदर्शात्मक शब्द अपनी परिणति में मनुष्य के विरोधी ही नहीं, शत्रु सिद्ध हो रहे थे। विचारधारा और धर्म अंततः यंत्रणा और नरसंहार के कारक बन रहे थे।

इसका विरोध करने के दावे लेकर आने वाले राजनेताओं में कोई गहरी एवं व्यापक अंतर्दृष्टि और दूरदृष्टि नहीं थी।
समाज में प्रगति का अर्थ किसी भी प्रकार अधिकाधिक आर्थिक सुविधाएँ पा लेना भर बनता जा रहा था, जिसके चलते नैतिक-अनैतिक की सीमारेखा का मिटते जाना स्पष्ट लक्षित हो रहा था। सत्ता या सत्ता से निकटता की आकांक्षा संभ्रांत वर्ग को मूल्यगत विवेक से विमुख कर रही थी तो निम्न-मध्य वर्ग को अपराध का ग्लैमर आकर्षित करने लगा था।

इस आतंककारी परिदृश्य में सतह के नीचे खदबदाती कुछ सकारात्मक परिवर्तनकामी धाराएँ अपनी राह खोजने की प्रक्रिया में अवरोधों और हिंसक प्रतिरोधों से टकरा रही थीं। स्त्री की अस्मिता और दलित चेतना ऐसी ही घटनाएँ थीं।
‘बीच की धूप’ में लेखक ने निटक अतीत की उन प्रवृत्तियों को अपनी कलात्मक लेखनी का स्पर्श देकर जीवंत कथा बना दिया है, जो आज की परिस्थितियों के मूल में हैं। यह ‘अभी शेष है’ से आरंभ हुई महीप सिंह की उपन्यास त्रयी का दूसरा चरण भी है और स्वतंत्र उपन्यास भी।

वरिष्ठ लेखक का यह उपन्यास अनेक प्रश्न पाठक के समक्ष रखता है। उनके द्वारा प्रस्तुत मार्मिक, विचारोत्तेजक एवं रोचक कृतियों की श्रृंखला में एक नई कड़ी जोड़ता ‘बीच की धूप’ अविस्मरणीय होने की पात्रता लिए हुए है।

बीच की धूप


बड़े फाटक की छोटी खिड़की से पहले बल्ली बाहर निकला और उसके पीछे रहमत। शाम का झुटपुटा फैल रहा था। दोनों ने एक बार घूमकर पीछे देखा। बड़े दरवाज़े के ऊपर बड़े मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था–डिस्ट्रिक्ट-जेल, उन्नाव।
दोनों धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे।
रहमत बोला–‘‘इस जोल में ये मेरा तीसरा चक्कर है।’’

बल्ली हँसा–‘‘बार-बार एक ही जेल में आने का क्या फायदा ? ये मेरे लिए छठा दरवाज़ा है। इससे पहले मैं कानपुर, रायपुर, पटना, अहमदाबाद और नागपुर की जेलें देख चुका हूँ...हिन्दुस्तान बहुत बड़ा है।’’
‘‘तेरे क्या कहने हैं बल्ली यार, तू सारे हिन्दुस्तान में अपनी मार मारता है। पर मेरे काम का इलाका तो कानपुर से लखनऊ तक है। खुदा की बरकत है... अपना इसी से गुज़ारा हो जाता है।’’
जेल के आसपास का वीरान इलाका छोड़कर दोनों बड़ी सड़क तक आ गए थे।

‘‘अब तेरा क्या इरादा है ?’’ रहमत ने पूछा।
‘‘इरादा...?’’ बल्ली ने अपने हाथ का बैग सड़क की पुलिया पर रख दिया और बोला–‘‘पहले तो कानपुर जाऊँगा... आगे की ऊपर वाला जाने।’’
‘‘कानपुर में तो तरे माँ-बाप रहते हैं ?’’ रहमत ने पूछा।

‘‘हाँ, बाप है...सौतेली माँ है...सौतेले भाई-बहन हैं। नाना-नानी, मामा-मामी, मौसा-मौसी जैसे कितने ही रिश्तेदार हैं।’’
‘‘और बीवी...?’’
‘‘बीवी भी थी...पर...खैर, छोड़ इस बात को।’’

उसने कसकर अँगड़ाई ली। दोनों हाथों की उँगलियों को एक-दूसरे में फँसाकर उन्हें चटकाया। बोला–‘‘मियाँ रहमतउल्ला, सारा बदन टूट रहा है। पिछले पंद्रह-बीस दिन से एक बूँद भी नसीब नहीं हुई। कुछ जुगाड़ करो ना !’’
‘‘सरदार बलजीत सिंह जी, आज इसका जुगाड़ हो पाना बहुत मुश्किल है।’’ रहमत बोला–‘‘जुम्मे के दिन यहाँ सारे ठेके बंद रहते हैं।’’

‘‘तब खाक है तुम्हारा इलाका।’’ बल्ली बोला–‘‘चलो, कानपुर चलो, जिस दिन कहो उस दिन, जिस वक्त कहो उस वक्त, जितनी कहो उतनी दारू पैदा करके दिखा दूँ।’’
‘‘तू मुझे ज्यादा जोश न दिला।’’ रहमत ने अपना फटा बैग उठाते हुए कहा–‘‘अगर तुझे पीना है तो चल...कुछ इंतजाम करता हूँ।’’
बस पकड़कर दोनों कानपुर आ गए।

बल्ली के घर में घुसते ही पिता जीवन सिंह ने पहला सवाल किया–‘‘इस बार कितने दिन गुज़रे जेल में...?’’
बल्ली अपना बैग एक कोने में टिकाकर कुर्सी पर बैठ चुका था। रहमत के साथ मिलकर वह आधी बोतल ठर्रा पी चुका था। उसकी मोटी-मोटी आँखें सुर्ख हो चुकी थीं। वह कुछ जवाब दे इससे पहले उसकी माँ गुलवंत पानी का गिलास रखती हुई पति से बोली–‘‘इतने दिन बाद बेटा घर आया है। आते ही उस पर सवालों की बौछार कर दी। उसे पानी तो पी लेने दो।’’
‘‘बहुत कमाई करके आया है ना...।’’

उसके दोनों छोटे भाई-बहन बिट्टू और बन्नी ‘वीर जी...वीर जी’ कहते हुए उससे लिपट रहे थे।
‘‘चल, हाथ-मुँह धो ले...रोटी खा ले।’’ गुलवंत उसका बैग उठाती हुई बोली।
रात हो चुकी थी। सब लोग खाना खा चुके थे। अरहर की दाल और भिंडी की सब्जी के साथ चार रोटी खाकर बल्ली चारपाई पर औंधा जा गिरा। कितने दिन बाद उसे घर का खाना नसीब हुआ था।

बल्ली को अपनी माँ की धुँधली-धुँधली याद है। वह छह साल का था। बस्ता उठाकर स्कूल जाता था। उसकी माँ उसे पास बैठाकर पढ़ाती थी। वह बीमार पड़ गई। डॉक्टर ने कहा, उसे टाइफाइड हो गया है। जीवन सिंह साइकिल की ट्यूब में पंचर लगाने का काम करता था। सभी सगे-सम्बन्धी भी उस ऊसर ज़मीन जैसे थे, जिसमें इधर-उधर उगी हरियाली जंगली पौधों जैसी थी। बल्ली की माँ का इलाज खैराती अस्पताल में हो रहा था। बुखार एक दिन कुछ कम होता तो दूसरे दिन तेज़ हो जाता। लोग कहते–‘यह मियादी बुखार है, मियाद पूरी करके जाएगा।’ बुखार अपनी मियाद पुरी करके बल्ली की माँ को भी अपने साथ लेता गया।

बल्ली को साइकिल के पहिए को एक छोटी छड़ी की मदद से सड़क पर दौड़ाने और पीछे-पीछे खुद दौड़ने का शौक था। अचानक माँ मर गई तो वह गुमसुम-सा हो गया। चारों ओर मचे कोहराम में सभी चीख-चीखकर रो रहे थे। वह सबको सूनी-सूनी आँखों से देख रहा था। उसका मन हुआ कि वह पहिया उठाए और छड़ी से उसे दौड़ाना शुरू कर दे।
लेकिन आज ऐसा नहीं हो सकता था। वह देख रहा था कि औरतें बहुत-रो-पीट रही हैं। उसकी नानी अपनी छाती पीटती हुई मुँह से कुछ बोलती भी जा रही थी।

आदमी अर्थी बनाने में लगे हुए थे।
उसका साइकिल का पहिया एक कोने में लुढ़का पड़ा था।
उसके नाना-नानी ने बड़ी कोशिश की कि वह स्कूल जाता रहे। घर से वह बस्ता लेकर निकलता। नहर के किनारे वह अपने जैसे दूसरे लड़कों के साथ कंचे खेलता। जीवन सिंह दिन-भर मेहनत करके कुछ पैसे कमाता। घर में उसी बूढ़ी माँ थी। घर लौटकर वह उसके लिए, बल्ली के लिए और अपने लिए रोटियाँ सेंकता। सुबह दुकान पर जाने से पहले उसे यब सब करना पड़ता। उसे पता लग चुका था कि बल्ली स्कूल न जाकर नहर के किनारे आवारा लड़कों के साथ कंचे खेलता रहता है। वह उसे अपने साथ दुकान ले जाने लगा।

उन्हीं दिनों रहमत से उसकी जान-पहचान हो गई। उसकी कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। उसके बाप अमानुल्ला की घड़ियों की मरम्मत की छोटी-सी दुकान थी। पुरानी से पुरानी घड़ियों को ठीक करने का वह माहिर समझा जाता था। रहमत ने एक उर्दू स्कूल में पाँचवीं तक पढ़ाई की, फिर स्कूल जाना छोड़ दिया। अमानुल्ला की उसे आगे पढ़ाने में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। वह चाहता था कि उसका बेटा भी घड़ीसाज़ बन जाए और दो पैसे कमाने लगे। उसकी तीन बेटियाँ भी थीं, जिनकी चिंता उसे हमेशा सताती रहती थी।

अमानुल्ला के पास उसी मुहल्ले के लाला धनीराम की बड़ी कीमती घड़ी ठीक होने के लिए आई। उनके हाथ से वह घड़ी ज़मीन पर गिर गई थी। उसने उसे ठीक कर दिया और उस पर अपने मेहनताने का टैग लगाकर अपनी मेज़ की दराज़ में रख दिया।

लालाजी या उनका कोई आदमी बहुत दिन तक घड़ी लेने नहीं आया। अमानुल्ला रहमत को अपने साथ बैठाकर काम सिखाता था। वह जब भी अपनी दराज़ खोलता, उसे वह घड़ी नज़र आ जाती। उसने सोचा, कोई ग्राहक मरम्मत के लिए घड़ी देकर भूल गया है। एक दिन जब अमानुल्ला किसी काम से गया हुआ था और रहमत उसकी कुर्सी पर बैठा हुआ था, उसने दराज़ में से उस घड़ी को निकाला और उसे उलट-पलटकर देखने लगा। पता नहीं उसे क्या सूझा, उसने घड़ी को अपनी निक्कर की जेब में डाल लिया।

दो-चार दिन तक कोई पूछताछ नहीं हुई। एक दिन लालाजी अपनी घड़ी लेने आ गए। अमानुल्ला ने दराज़ में घड़ी नहीं देखी तो बहुत घबरा गया। अपने जीवन में उसने इतनी कीमती घड़ी की मरम्मत नहीं की थी। अगर घड़ी खो गई तो...? उसके हाथ काँपने लगे और माथे पर पसीना आ गया।

‘‘लालाजी, आप इतने दिन आए नहीं...मरम्मत की हुई जिन घड़ियों को ग्राहक काफी दिन तक लेने नहीं आते, उन्हें महफूज़ रखने के लिए मैं घर ले जाता हूँ। आपको एक बार फिर आने की ज़हमत उठानी होगी। कल मैं उसे ले आऊँगा।’’
लालाजी चले गए। रहमत का सुबह से ही कुछ पता नहीं था। अमानुल्ला ने झटपट दुकान बढ़ाई और घर आ गया। उसकी बीवी और तीनों लड़कियाँ आश्चर्य से उसे देख रही थीं। अमानुल्ला ने रहमत की टीन की संदूकची फफोलनी शुरू कर दी। उसकी निक्कर की जेब में वह घड़ी पड़ी हुई थी।

नुसरत उससे पूछना चाहती थी, पर वह कुछ नहीं बोला और चारपाई पर लेट गया। एक मज़बूत बेंत ढूँढ़कर उसने सिरहाने रख ली।
नमाज का वक्त हो गया था। वह उठा और बिना कुछ बोले पास की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने चला गया। जब वह घर वापस आया तो रहमत आया हुआ था।

उसने उसे एक नज़र देखा और चारपाई के पास रखी बेंत को उठाकर उसे बेतहाशा पीटने लगा।
नुसरत और लड़कियों के लिए यह सब कुछ बहुत अप्रत्याशित था। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसे क्या हो गया है। नुसरत ने उसे पकड़ने की बहुत कोशिश की। लड़कियाँ ‘अब्बा...अब्बा’ चीखती हुई रहमत को बचाने की कोशिश करने लगीं। उसने सबको झटककर दूर फेंक दिया। बेंत की मार से रहमत चीख भी रहा था और रो भी रहा था, लेकिन अपने आप को बचाने की कोई कोशिश नहीं कर रहा था। वह सारी बात समझ चुका था।

रहमत को मारते-मारते अमानुल्ला बुरी तरह हाँफने लगा। वह चारपाई पर लेटकर लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा। लड़कियाँ बुरी तरह सहमी हुई थीं। उन्होंने अपने बाप का ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा था।
नुसरत बेटे को पिछले कमरे में ले गई।
‘‘तूने क्या किया है...? तेरे अब्बा तुझसे इतने खफा क्यों हैं...? इतने गुस्से में मैंने उन्हें कभी नहीं देखा...।’’

रहमत कराह रहा था।
समुद्र में जैसे एक ज्वार आया था जो किनारे पड़े हुए मूँगों को समेटकर वापस मुड़ चुका था। किनारे के रेत के घरौंदे भी टूटकर बह गए थे।
दूसरे दिन अमानुल्ला दुकान पर चला गया। लड़कियाँ स्कूल चली गईं। नुसरत घर के काम में लगी हुई ने थी। रहमत ने एक प्लास्टिक बैग में कुछ कपड़े डाले और चुपचाप घर से बाहर निकल गया। उसकी निक्कर में दो-तीन रुपयों की रेज़गारी पड़ी हुई थी।

वह रेलवे स्टेशन पहुँचा। प्लेटफॉर्म पर झाँसी मेल खड़ी थी। उसे मालूम था कि इस गाड़ी के दो डिब्बे झाँसी में कटकर दिल्ली से बम्बई जाने वाली पंजाब मेल में जुड़ेंगे। वह उन्हीं में से एक डिब्बे में दुबककर बैठ गया। बिना टिकट यात्रा करते, टिकट-चेकरों से लुकते-छिपते वह किसी तरह बम्बई के विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन तक पहुँच गया।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book