मेरे राम मेरी रामकथा - नरेन्द्र कोहली Mere Ram Meri Ramkatha - Hindi book by - Narendra Kohli
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मेरे राम मेरी रामकथा

नरेन्द्र कोहली

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :159
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7499
आईएसबीएन :978-93-5000-116

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रामायण की कथा आरंभ होती है क्रौंच-वध से...

Mere Ram Meri Ramkatha - A Hindi Book - by Narendra Kohli

रामकथा के पहले खंड ‘दीक्षा’ का लेखन शायद 1973 ई. में आरंभ हुआ था। वह मेरे मन में कब से उमड़-घुमड़ रहा था, यह कहना कठिन है। मेरी रामकथा के सारे खंड 1975 ईं. से 1979 ईं. के बीच प्रकाशित हुए थे। तब से ही बहुत सारे प्रश्न मेरे सामने थे–कुछ, दूसरों के द्वारा पूछे गए और कुछ मेरे अपने मन में अंकुरित हुए। बहुत कुछ वह था, जो लोग पूछ रहे थे और कुछ वह भी था, जो मैं अपने पाठकों को बताना चाहता था। यही कारण है कि समय-समय पर अनेक कोणों से, अनेक पक्षों को लेकर मैं अपनी सृजन प्रक्रिया और अपनी कृति के विषय में सोचता, कहता और लिखता रहा। अंततः उन, सारे निबन्धों, साक्षात्कारों, वक्तव्यों और व्याख्यानों को मैंने एक कृति के रूप में प्रस्तुत करने का मन बनाया। मैं रामकथा के लेखन के नेपथ्य के विषय में सब कुछ कह देना चाहता था। वस्तुतः मैंने लिखने से पहले इन प्रश्नों पर उतना विचार नहीं किया था, जितना पाठकों, आलोचकों और साक्षात्कर्ताओं के प्रश्नों ने मुझे सोचने के लिए बाध्य किया। उन प्रश्नों के उत्तर खोजते-खोजते बहुत सारी बातें मेरे सामने स्पष्ट हुईं। इस प्रकार जो मंथन मेरे मन में हुआ, वह सारा का सारा इस पुस्तक के रूप में आपके सामने है। मैंने ‘अभ्युदय’ में कथा और चरित्रों को वह रूप क्यों किया, वह तर्क इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत है। रामकथा से मेरा सम्बन्ध, उसका आकर्षण, अपने युग का उससे तादात्म्य, उसका संदेश, उसका महत्त्व जिस रूप में मैं समझ पाया, वह सब इस पुस्तक में कह दिया है। प्रश्न फिर भी रहेंगे। प्रश्न नहीं रहेंगे तो भविष्य की रामकथा कैसे लिखी जाएगी।

 

–नरेन्द्र कोहली

 

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हमारा परिवार न तो हिंदीभाषी था और न ही हिंदी साहित्य से उसका कोई विशेष परिचय था। रामचरितमानस से मेरा पहला संपर्क अहिंदीभाषी विद्यार्थी के रूप में पढ़ी जाने वाली हिंदी की पाठ्य-पुस्तक में संकलित तुलसी का वर्षाऋतु वर्णन पढ़ने से हुआ। अब सोचता हूँ तो लगता है कि मैं उन पंक्तियों के कारण कम, अपने शिक्षक यादव जी द्वारा उनके जाए जाने से अधिक प्रभावित हुआ था। यद्यपि यादव जी का कंठ सुरीला नहीं था, न ही उन्हें संगीत का कोई विशेष अभ्यास ही प्रतीत होता था; फिर भी अपने अभ्यासवश उन्होंने उन पंक्तियों को उसी लय में गाया, जिसमें सामान्यतः घरों में रामचरितमानस का पाठ किया जाता है। उसके पश्चात् मैंने अपनी बड़ी बहन के पास रामचरितमानस का अयोध्याकांड देखा था। वे बी.ए. में पढ़ रही थीं और अयोध्याकांड उनके पाठ्यक्रम में था। मुझे याद है कि जब मुझे यह ज्ञात हुआ कि यह सारा ग्रंथ उसी शैली में गाया जा सकता है, जिसमें यादव जी ने वर्षाऋतु वर्णन गाया था, तो मैं अपनी बहन के पीछे ही पड़ गया कि वे उसे उसी शैली में गाएँ। यहाँ तक कि जब वे दोहे को उस लय में नहीं गाती थीं, तो भी मैं प्रतिवाद करता था। उनके साथ-साथ कुछ चौपाइयों को गाने का प्रयत्न मैंने भी किया किंतु न तो भगवान ने मुझे संगीत की वैसी समझ दी है, न गाने की क्षमता। तो न मैं कभी उसे ढंग से गा पाया; और न ही रामचरितमानस के अंश मुझे कंठस्थ हो पाए।
कॉलेज में जब मैंने हिंदी साहित्य को अपने अध्ययन के विषय के रूप में चुना, तो पाठ्यक्रम में मुझे बालकांड के आरंभिक अंश पढ़ने को मिले। उन्हें पढ़ने के प्रयत्न में प्रायः मुझे नींद आ जाया करती थी। मुझे आज भी याद है कि मैंने अपने गुरु डॉ. सत्यदेव ओझा से यह कहा था कि रामचरितमानस अत्यंत उबाऊ ग्रंथ है, जिसे पढ़ने का प्रयत्न करते हुए, मुझे नींद आ जाती है। उत्तर में उन्होंने रामचरितमानस की वे सारी पंक्तियाँ उद्धृत की थीं, जिनमें रामचरितमानस के पाठ के मार्ग में आने वाली बाधाओं का वर्णन था।

स्कूल में ग्रीष्मावकाश में मैं गीता प्रेस द्वारा प्रकासित वाल्मीकीय रामायण का हिंदी अनुवाद पढ़ चुका था। मुझे ऐसा लगा था कि जहाँ तक कथानक का संबंध है, अनेक स्थलों पर मैं तुलसी की तुलना में वाल्मीकि से अधिक सहमत हो जाता हूँ। घर में पिता जी ने उर्दू में पंडित राधेश्याम की रामायण मंगवा रखी थी। वे स्वयं यदा-कदा उसी का पाठ किया करते थे। उन्होंने शायद कभी उसके कुछ अंश स्वयं पंडित राधेश्याम से सुने थे। उन्हें वह रामायण बहुत प्रिय थी। हिन्दी अथवा संस्कृत न जानने के कारण वाल्मीकि तथा तुलसी के ग्रंथों को हिंदी या संस्कृत में पढ़ना उनके लिए संभव नहीं था। इसी बाध्यता में वे पंडित राधेश्याम की रामायण उर्दू में पढ़ा करते थे। बाद के वर्षों में उन्होंने ओम् पत्रिका द्वारा प्रकाशित तुलसी का रामचरितमानस फारसी लिपि में ही मंगवा लिया था; किंतु हिंदी शब्दावली के उच्चारण से परिचित न होने के कारण अवधी के शब्दों का उच्चारण उनके लिए सदा ही एक समस्या बना रहा।

मैंने बी.ए. ऑनर्स तथा एम.ए. की परीक्षाओं के लिए अपने पाठ्यक्रम में रामचरितमानस के कुछ अंश पढ़े। विद्वान् गुरुओं ने तुलसी के काव्य और दर्शन को पर्याप्त विस्तार से समझाया। उस काव्य का सौंन्दर्य मन को प्रभावित भी करता था; किंतु यह बात मेरे मन से कभी नहीं गई कि सब कुछ मैं अपने पाठ्यक्रम के लिए पढ़ रहा हूँ। जीवन में उस काव्य के साथ मेरा कोई तादात्म्य हुआ हो, ऐसा तब तक कभी नहीं लगा था। एक तो अवधी में मेरी स्वतंत्र रूप से कोई गति नहीं थी। प्रायः पंक्तियों का अर्थ टीका से देख कर याद रखना पड़ता था। तुलसी का आदर्शवाद अपनी युवावस्था में तनिक भी आकर्षक नहीं लगता था। अब समझ में आता है कि युवावस्था अपने प्रखर अहंकार में बहुत सारी बातों को नहीं समझती, नहीं मानती। जब मन कुछ शालीन हो जाता है और बुद्धि निर्मल होती है, तब जाकर भगवान की कृपा अध्यात्म और आदर्श कुछ-कुछ समझ में आने लगते हैं।

एम.ए. के पश्चात् नौकरी, विवाह और संतान के जन्म इत्यादि की घटनाएँ, जीवने में कुछ तेजी से घट गईं। पहली बच्ची का जन्म अगस्त में हुआ और नवंबर के अंतिम दिनों में उसकी मृत्यु हो गई। अगले दिसंबर में मेरे जुड़वाँ बच्चों का जन्म हुआ–एक पुत्र और एक कन्या का। कन्या चौबीस दिनों की होकर चल बसी। पुत्र को सवा महीने के पश्चात् ही हम अस्पताल से घर ला पाए। वह अब भी स्वस्थ नहीं रहता था। निरंतर डाक्टरों और अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ते थे। उस मानसिक, शारीरिक, भावात्मक और आर्थिक परेशानी के दौर में मुझे किसी ने प्रतिदिन रामचरितमानस का पाठ करने का परामर्श दिया था। अब स्मरण नहीं कि वे सज्जन कौन थे; क्योंकि उन दिनों जो भी मिलता था, उससे पुत्र के स्वास्थ्य की चर्चा होती ही थी। कोई उसके रोग की अधिक जानकारी देता था; कोई किसी दवा का नाम बताता था; कोई किसी नए डाक्टर का परिचय देता था; कोई ज्योतिषी के पास भेजता था; कोई तांत्रिक उपचाय करने के लिए कहता था; उसी प्रकार किसी ने भक्ति का मार्ग सुझाया था। मैंने उन दिनों एलोपैथी और होम्योपैथ डाक्टरों की औषधियों से लेकर, पूजा और हवन इत्यादि तक, सब कुछ किया था। इसलिए रामचरितमानस का पाठ करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं हुई। सोचा, यदि इससे कोई लाभ होता है तो बहुत अच्छा, नहीं तो इसी बहाने एक श्रेष्ठ काव्यग्रंथ का पारायण हो जाएगा, जिसे मैं और किसी बहाने से आज तक ढंग से पढ़ नहीं सका था।

मैंने रामचरितमानस का पारायण आरंभ किया। मन में भक्ति कितनी थी कह नहीं सकता; किंतु याचना अवश्य थी। उसे सकाम भक्ति कह सकते हैं। किंतु सकाम भक्ति मुझे भक्ति का उपहास ही लगती है, भक्ति का पाखंड अथवा चाटुकारिता। कामना से किसी भी रूप में इंकार नहीं कर सकता था। आरंभिक दिनों में शायद मेरा ध्यान न काव्य पर था न दर्शन पर। इस बहाने केवल किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करता रहा। इतना अवश्य है कि मेरा यह पारायण अत्यंत नियमित था। अपवाद केवल वे ही दिन होते थे, जब मैं प्रातः अपने घर में नहीं होता था। समय बीतता गया और क्रमशः मेरा पुत्र स्वस्थ होता गया। परिणामतः उस पारायण में मेरी रुचि कम होती गई। आस्था भी कम होती गई। स्वार्थवश किए गए कार्य में ऐसा होना ही था। तब मैंने अनुभव किया कि मैं पाठ तो करता हूँ, किंतु मेरे मन में भक्ति का वह उद्वेलन नहीं है, जो सामान्यतः ऐसा पारायण के साथ जुड़ा होना चाहिए। प्रातः नहा-धो कर मैं बहुत थोड़े देर के लिए यह पाठ किया करता था। और उस समय भी मस्तिष्क पर यह बोझ होता था कि देर हो रही है। अभी कॉलेज भी जाना है, या कुछ अन्य कार्य भी करने हैं। भागमभाग के इस त्वरित पाठ में तुलसी के काव्य का भी क्या आनंद ले सकता था; किंतु रामकथा की घटनाओं की पुनरावृत्ति मेरे मन में लगातार हो रही थी। दिन के किसी न किसी कालखंड में मेरा मन उन घटनाओं का चर्वण भी करता था और मैं यह अनुभव करता था कि अनेक स्थानों पर मेरा मन तुलसी द्वारा चित्रित उन घटनाओं के साथ अपना तादात्म्य नहीं कर पाता। उन चरित्रों में मैं उसी रूप में नहीं देख पाता, जिसमें तुलसी उनका चित्रण करते हैं। तुलसी के लिए वह सारी कथा अध्यात्म के रंग में रंगी हुई थी; और मेरा मन अध्यात्म से परिचित ही नहीं था। मैं अध्याय को सर्वथा एक ओर कर, उन घटनाओं को अत्यंत लौकिक धरातल पर ग्रहण कर उनका भौतिक अर्थ ही करता था। मेरे मन में एक सामानांतर कथा थी, जो तुलसीदास की अपेक्षा वाल्मीकि के अधिक निकट तो थी ही, अपनी समकालीन घटनाओं से भी उनका कुछ तादात्म्य बैठता था। 1971 ईं. में बांग्लादेश की स्वतंत्रता का युद्ध हुआ। उस युद्ध में मेरी गहरी रुचि थी। इसलिए उसके संबंध में समाचारपत्रों में प्रकाशित होने वाली सूचनाओं को मैं बहुत रुचि से पढ़ता था। उसी संदर्भ में समाचारपत्रों में यह समाचार भी छपा था कि पाकिस्तानी सेना अत्यंत व्यवस्थित ढंग से सूचियाँ बना-बना कर बांगलादेश के बुद्धिजीवियों की हत्या कर रही थी। उनकी इच्छा थी कि बांगलादेश का एक-एक बुद्धिजीवी समाप्त कर दिया जाए और बांगलादेश के जन सामान्य को बौद्धिक नेतृत्व मिलने की कोई संभावना ही शेष न रहे। तब पहली बार मेरा मन स्पष्ट रूप से समझ पाया कि रावण के नेतृत्व में राक्षस, दंडकवन के ऋषियों का मांस क्यों खा रहे थे। अब तक ऋषियों के वध की घटनाएँ, राक्षसों की क्रूरता को चित्रत करने का साधन मात्र थीं; किंतु अब वे मानव समाज के दलित-दमित वर्ग को पिछड़ा बनाए रखने के लिए उसे बौद्धिक नेतृत्व से वंचित करने के क्रूर षड्यंत्र की प्रतीक थीं। अब वे घटनाएँ पौराणिक युग के किसी कथा की विचित्र कड़ियाँ न होकर हमारे अपने युग का यथार्थ हो गई थीं। वे घटनाएँ मेरे लिए मात्र सूचनाएँ न होकर, मेरी संवेदना का अंग हो गई थीं। बचपन से सुनी और पढ़ी हुई रामकथा की घटनाएँ कुछ-कुछ जीवंत होने लगी थीं; और उनमें से मानवता के शाश्वत संघर्ष के कुछ नए अर्थ खुलने लगे थे।

1972 ईं. में मेरा उपन्यास आतंक प्रकाशित हुआ। उसमें एक भीरु अध्यापक को नायक बना कर देश में चारों ओर फैले हुए विभिन्न प्रकार के आतंक का चित्रण किया गया था। उस उपन्यास पर एक गोष्ठी हुई तो अनेक लोगों के माध्यम से कुछ शिकायतें उभर कर सामने आईं। मित्रों ने कहा कि जिस आतंक का चित्रण उसमें किया गया है, वह तो यथार्थ है; किंतु उससे लड़ने के लिए कोई संबल उस उपन्यास में नहीं है। वह हमें इस अंधकार से लड़ने का कोई हथियार नहीं देता; कोई मार्ग नहीं सुझाता, मन में कोई आशा नहीं जगाता। शिकायत ठीक ही थी। आरंभ में तो उस उपन्यास का नाम मैंने ‘डरा हुआ उजाला’ ही रखा था। वह तो प्रकाशक को भाया नहीं, इसलिए नाम बदलना पड़ा। उन लोगों को तो उत्तर मैंने गोष्ठी में दिया, वह तो दिया ही; किंतु मैं अपने-आप से पूछता रहा कि आखिर ऐसा क्यों हुआ ? और यदि ऐसा हुआ तो अब उसका समाधान क्या है ? मेरे मन का तर्क-वितर्क बार-बार इन तत्यों पर जाकर अटक जाता था कि हमारे समाज में राजनीतिक प्रभुओं के संरक्षण में पलने वाले अपराधियों का आतंक कुछ इतना प्रबल है कि कोई उससे लड़ने का साहस नहीं करता। जो न्याय चाहता है, वह दुर्बल है। जो देखता, सोचता, और समझता है, उसमें इतना साहस नहीं है कि वह अपराधियों से दो-दो हाथ करे। ऐसे में उजाला डरा-सहमा ही तो रहेगा। आशा जगाने के लिए सर्वथा काल्पनिक पात्र को ही जन्म देना पड़ेगा; और ऐसे पात्र के माध्यम से जो कथा रची जाएगी, वह शुद्ध फंतासी होगी। मैं अब तक अपना व्यंग्य उपन्यास ‘आश्रितों का विद्रोह’ लिख चुका था; और उसका प्रकाशन भी हो चुका था। वह व्यंग्य के पाठकों में लोकप्रिय भी हुआ था; किंतु सामान्य पाठक ऐसी फंतासियों में अपनी रुचि का अभाव पाता था। ऐसी स्थिति में आशा की किरण या तो विदेशी पात्रों से उधार ली जा सकती थी; या अपने इतिहास और पुराणों से। उस समय भी मेरा मन लौट-लौट कर उन विश्वामित्र की ओर गया था, जिन्होंने रामकथा में सबसे पहले राक्षसी आतंक का सामना किया था; और उस आतंक से लड़ने के लिए स्वयं को अक्षम पाकर वे राम को माँगने के लिए दशरथ के दरबार में पहुँचे थे।


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