पठार पर कोहरा - राकेश कुमार सिंह Pathaar Per Kohra - Hindi book by - Rakesh Kumar Singh
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पठार पर कोहरा

राकेश कुमार सिंह

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :244
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 750
आईएसबीएन :81-263-0880-x

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इस उपन्यास में क्षेत्रों के शोषण,उत्पीड़न और अत्याचार के नये-नये दुश्चक्रों के जाल में फँसे जनजातीय मानस को सजग करते उनमें अस्मिता के बीज अँकुराते एक संवेदनशील और दृढ़ इच्छाशक्ति वाले नायक की कथा...

Pathar Per Kohra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


झारखण्ड के वर्तमान जनजातीय जीवन पर लिखा गया एक सशक्त उपन्यास है ‘पठार का कोहरा’। अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद झारखण्ड के जंगलों में एक नयी शोषक संस्कृति का उदय हुआ। यह थी साहू,बाबू और बन्दूक की संस्कृति। आज भी एक निर्धन आदिवासी महाजन के घर में जन्म लेता है,वाबू की बेगारी में खटता है और साहू के कर्ज में मर जाता है। आदिवासी कल्याण की सरकारी योजनाओं का अत्यधिक लाभ शहरी आदिवासियों को ही मिल पाता है,जो वस्तुतः आदिवासी समाज की ‘मलईदार’ परत हैं। प्रस्तुत उपन्यास में इन क्षेत्रों में शोषण,उत्पीड़न और अत्याचार के नये-नये दुश्चक्रों के जाल में फँसे जनजातीय मानस को सजग करते, उनमें अस्मिता के बीज अँकुराते एक संवेदनशील और दृढ़ इच्छाशक्ति वाले नायक की कथा है,साथ ही हताशा में घिरी एक आदिवासी युवती के आत्मसंघर्ष एवं नारी-मुक्ति की कहानी है। अन्त में श्रम,उद्यम और सहभागिता के लिए संघर्षशील जनजाति की यह कथा इस उत्तर की बेचैन खोज भी है कि हिन्दू धर्म के विराट कैनवास पर उनकी क्या जगह है। प्रस्तुत कृति में ऊबड़-खाबड़ झारखण्ड के इस खुरदरे यथार्थ के साथ-साथ लोक-जीवन का तरल स्पन्दन भी है,जंगल के विरूपित होते चेहरे के समानान्तर जीवन और प्रकृति के रिश्तों का सौन्दर्य भी है। नृशंस और ह्रदयहीन स्थितियों के बीच टटके महुवे के फूलों की भीनी महक से तर मानवीय सम्बन्धों की उष्णता भी है। आदिवासी जनजीवन पर औपन्यासिक लेखन का एक सफल सार्थक प्रयास....

शुरू करने से पहले

सोलहवीं सदी से अठारहवीं सदी तक का इतिहास साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा मध्य एशिया, अफ्रीका, वेस्टइण्डीज आदि-आदि को सभ्य, शिक्षित एवं आधुनिक बनाने की आड़ में भूखण्डों को हड़पने का इतिहास रहा है। अविकसित धरती को विकसित, सभ्य और शिक्षित बनाने की ओट में वहाँ के आदिवासियों को लिस्बन के गुलाम बाजार में पशुओं की भाँति खरीदा बेंचा गया। सभ्यता के तत्कालीन अग्रदूतों ने आस्ट्रेलियाई मूल के ‘एफ्रोनिग्राइट्स’ नामक एक पूरी प्रजाति का सफाया कर डाला। ‘रेड-इण्डियन्स’ का समूल नाश कर दिया गया, परन्तु अनेकानेक दमनकारी अभियानों के बावजूद अँग्रेज झारखण्ड के आदिवासियों का मूलोच्छेद करने में असफल रहे। प्रस्तुत उपन्यास की रचना के दौरान आदिवासी क्षेत्रों में आते-आते मैंने महसूस किया कि झारखण्ड के आदिवासी इसीलिए बचे रह सके क्योंकि आदिवासी जनजीवन की जड़े अपनी भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाज, मिथक और आस्थाओं में गहरे तक धँसी थीं- आज भी धँसी हैं।
किसी जाति को खत्म करने के लिए उसकी तीन चीजें नष्ट करनी होती हैं-उस जाति की भाषा, संस्कृति तथा अर्थव्यवस्था !
ईस्वी सन् 1765 में शाह आलम द्वितीय ने बंगाल और उड़ीसा की दीवानी ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी’ को सौंप दी तो झारखण्ड भी अँग्रेजी शासन के अन्तर्गत कर चुकाने वाला एक और राज्य बन गया। अँग्रेजी शासन की हड़पनीति ने झारखण्ड के मूल निवासियों के ‘जल-जंगल-जमीन’ के पारम्परिक अधिकारों को छीनना शुरू कर दिया।

समय के साथ समस्याओं के सन्दर्भ भले परिवर्तनशील हों परन्तु अपरिवर्तनशील होते हैं उसमें अन्तर्निहित सवाल। बाहरी लोगों द्वारा आदिवासियों का शोषण कमोबेश आज भी जारी है। आजा़दी के वर्षों बाद भी आदिवासियों की समस्याओं और प्रश्नों की स्थितियों में कोई विस्फोटक परिवर्तन नहीं हो सका है। भारतीय ग्रामीण मूल्यों के बदल चुकने की बात वे कर सकते हैं जिन्होंने शहरों से सटे कस्बों या कस्बों से सटे गाँव देखे हैं। वहाँ तो अब गाँव बचा भी नहीं है। झारखण्ड के पचास फीसदी गाँवों में अब भी लालटेनें जलती हैं और बैलगाड़ियाँ चलती हैं। वहाँ की मानवीय संवेदनाएँ सुख-दुख, पर्व-त्योहार, पीड़ा-सन्त्रास... कुछ भी तो नहीं बदला। अभी भी सब कुछ वही है-यथावत्। यही ‘सब कुछ’ मेरे सृजनयज्ञ की समिधा है।
आज झारखण्ड (जैसे अन्य क्षेत्रों) में भी धर्मान्तरण को लेकर आरोप-प्रत्यारोप तय किये जा रहे हैं, परन्तु इतिहास साक्षी है कि झारखण्ड के आदिवासियों का धर्मान्तरण और ‘धर्मान्तरित आदिवासियों को ही सरकारी संरक्षण’ की अँग्रेंजी नीति के विरूद्ध ईस्वी सन् 1881 में ‘सरदार विद्रोह’ फूटा था। ‘गोस्सनर चर्च राँची’ की बपतिस्मा पंजी में क्रम संख्या 5738-282 वर्ष 1868 के सामने बिरसा मुण्डा के पिता सुगना मुण्डा का ईसाई नाम ‘मसीह दास’ तथा क्रम संख्या 5741-285 वर्ष 1868 के सामने बिरसा मुण्डा का धर्मान्तरित नाम ‘दाउद’ इस बात के दस्तावेजी प्रमाण हैं कि झारखण्ड में धर्मान्तरण (चाहे जिस कारण भी हो) होता रहा है। बल्कि सुगना मुण्डा ने तो ‘जल-जंगल-जमीन’ के पारम्परिक अधिकारों की बहाली के बदले बहुसंख्यक आदिवासी समाज के धर्मान्तरण हेतु चर्च से वायदा तक किया था ! आगे चलकर बिरसा ने आदिवासी समाज में चर्च के बढ़ते हस्तक्षेप का प्रतिकार किया और बिरसा की उलगुलान (विद्रोह) में धर्मान्तरण भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा था।

अँग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद झारखण्ड के जंगलों में एक नयी शोषक संस्कृति का उदय हुआ। यह थी साहू ,बाबू और बन्दूक की संस्कृति ! आज भी एक निर्धन आदिवासी महाजन के कर्ज में जन्म लेता है, बाबू की बेगारी खटता है और साहू के कर्ज में ही मर जाता है। आदिवासी कल्याण की सरकारी योजनाओं का अल्पाधिक लाभ शहरी आदिवासियों को ही मिल पाता है जो वस्तुतः आदिवासी समाज की ‘मलाईदार परत’ हैं। झारखण्ड को मात्र राजनीतिक और भौगोलिक आजा़दी की समस्या मानकर एक पृथक् राज्य का जो राजनीतिक हल ढूँढ़ा गया, वह कथित अन्तिम समाधान भी झारखण्डी अस्मिता के प्रश्न का राजनीतिक सरलीकरण ही सिद्ध हुआ।....क्योंकि सच यही है कि झारखणड मात्र राजनीतिक, प्रशासनिक, भौगोलिक या कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह समस्या मूलतः अभावग्रस्त, अवसर रहित, शोषित और प्रताड़ित जनजातीय समाज की है जो उन थोड़े से शक्तिसम्पन्न और गैर आदिवासी लोगों की लिप्सा का शिकार रहे हैं, जिन्होंने झारखण्ड के बीहड़ो में अपना सामन्ती साम्राज्य स्थापित कर रखा है। आर्थिक तानाशाही ने झारखण्ड के आदि निवासियों के रहन-सहन, संस्कार, सोच और परम्पराओं को ही विरूपित नहीं किया वरन् पूरे जनजातीय समाज के स्नायुतन्त्र को ही तोड़-मरोड़ डाला है। ब्रिटिशकालीन ‘इण्डिया’ से स्वतन्त्र भारत तक पूँजीवाद व्यवस्था के अतिचार ने झारखण्ड के वन और वनचरों का जैसा निर्मम दोहन किया है उसका औपनिवेशिक इतिहास तो इतिहासकारों ने कभी लिखना चाहा ही नहीं। प्रस्तुत उपन्यास की परिकल्पना से लेकर इसके तीसरे और अन्तिम प्रारूप तक पहुँचने में लगे दो-ढाई वर्षों में जब-जब मैंने झारखण्डी गाँवों की नब्ज टटोली तो यही पाया कि यहाँ तो एक पूरा तन्त्र ही विकसित हो चुका है।

पहाड़ों, नदी-नालों, पगडण्डियों, लालटेनों, बैलगाड़ियों, नावों, वन्य जीवों और उनसे भी उग्र और हिंसक होता मनुष्य........देहात की धूल फाँककर मैंने काफी कुछ देखा। लगा कि ‘न्यूटन’ के तीव्रगति से घूमने वाले ‘रंग-चक्र’ के इन्द्रधनुषी रंग घुलमिल कर एकाकार हो रहे हैं। अपराध, जनसेवक, आम आदमी के व्यक्तिगत झगड़े, सवर्ण-असवर्ण संघर्ष, सामाजिक-आर्थिक वैषम्य से उपजे वर्ग संघर्ष, असहाय पुलिस की अकर्मण्यता, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, अधिकारियों की सन्दिग्ध भूमिकाएँ, गाँवो में उपयुक्त जलवायु पाकर पनपते कथित आन्दोलनकारी संगठनों का सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप, वर्ग-संघर्ष से उपजे संगठनों के नामों का बेजा लाभ उठाकर लूटमार करते बेरोजगार युवकों की उपद्रवी सेनाएँ, चुनावी महासमर के मोहरों में परिवर्तित होता अपराधी युवा वर्ग....नागरीय जीवन से कतई पृथक् एक लोमहर्षक और खतरनाक दुनिया है जंगल की !

भारतीय बुद्धिजीवी समाज के जिन लेखकों ने आदिवासी जनजीवन पर लिखा है उनमें से अधिकांश ने हर एक गैर-आदिवासी को खलनायक के रूप में ही चित्रित करने की रूढ़ि का अनुगमन किया है। इस रूढ़िवादी लेखन ने आदिवासी क्षेत्रों के बाहर हर गैर-आदिवासी को ‘दीकू’ (डाकू/दिक्कत करने वाला बाहरी घुसपैठिया)के रूप में स्थापित कर एकरस, एकतरफा और एकांगी सोच को विकसित किया है जबकि नये परिप्रेक्ष्य में इस सम्बन्ध को पुनः परिभाषित करने तथा आदिवासी-गैर-आदिवासी के बीच की आदिम खाई को पाटने की फौरी जरूरत है।
प्रस्तुत उपन्यास के माध्यम से मैंने एक प्रयास किया है। यह प्रयास कितना सार्थक हो सका है इस बारे में मुझे सुधी पाठकों और मर्मज्ञ आलोचकों की राय की विकल प्रतीक्षा है।

1.

जंगल यहाँ से शुरू होता है
‘‘बहुत जहरीला होता है कौमनिस्ट दीकू....!’’
‘दीकू’...यानी वह व्यक्ति जो जन्मना जंगल का वासी न हो। जो जंगल के बाहर का हो। गैर-आदिवासी हो। ‘दीकू’...यानी वह जो दिक्कत का कारण बने। दिक्कतें पैदा करे।
बचपन और कैशोर्य की सन्धिरेखा पर खड़ी किशोरी रूदिया को देखते ही साहू गगनबिहारी की आँखों में गिरगिट जैसी चमक जाग उठती है।
हीरा है हीरा....! आह रे जोबन...! आह रे रूप...!! जैसे जंगल में गिरा पड़ा हो कोई हीरा अनमोल...!
जब गिरगिट किसी लचकती पतली टहनी की फुनगी पर खिले फूल पर बैठी तितली को पंख नचाते-इतराते देखता है तो पंखों के खुलने-सिमटने के साथ-साथ गिरगिट की आँखें भी छोटी-बड़ी होती रहती हैं। जीभ लटपटाती है, पर तितली को पकड़ने का साहस नहीं जुटा पाता गिरगिट ! पतली टहनी पर पहुँचते ही गिर मरेगा।

‘‘तनिक एस्नो-पौडर-काजर लगा ले रूदिया....तनिक बाल काढ़कर फीता...थोड़ा आलता-बिन्दी, फिर गोड़ धोकर पानी फेंक दे तो गोड़धोवन से नहाकर शहराती छौंड़ियों की काया कंचन हो जाय ! बेईमान दैव ने थोड़ी कंजूसी कर दी। साँवला रंग दे दिया। थोड़ी गोराई भी दे देता तो...? ऐसे ही रूप पर तो फुरेरी लगती है। तनिक गोर होती तो एकदम जुलुम...!’’
रूदिया की आँखों से चबाते, आँखों से निगलते, आँखों से पीते साहू ने आँखें गोल-गोल फैलाते हुए कहा, ‘‘बाघ, भालू, गीध, कौए और सियार से भी ज्यादा खतरनाक होता है दीकू, और दीकूओं में भी सबसे जहरीला होता है कौमनिस्ट...!’’
कोई और ऐसी बात बोलता तो गजलीठोरी का कोई आदमी उसकी बात पर कान नहीं देता, पर साहू ‘कोई’ नहीं है। साहू की बात बेबात नहीं होती। गजलीठोरी ही क्या, जंगल का कोई आदमी जंगल के बाहर उतनी दूर तक नहीं जाता जितनी दूर-दूर तक साहू जाता है। जंगल के लोग बहुत गये तो डालटनगंज, बरकाकाना, राय-खेलारी, बरवाडीह या हद से हद राँची तक ! पर साहू दूर-दूर के देश तक चला जाता है। तेल-नमक, साबुन-सोड़ा, मसाले-दवाइयाँ खरीदने ! जहाँ चार पैसे कमाने लायक माल मिले और लाभ अधिक हो, पन्सारी तो जाएगा ही।

तुपकाडीह रेलवे स्टेशन से जो कच्ची सड़क भीतर गहरे जंगल की ओर जाती है, उसी सड़क के किनारे मील के पत्थर के पास साहू की पन्सारी की दुकान है ! दस किलोमीटर पीछे है तुपकाडीह। आगे है जंगल....! छिटपुट बसी बस्तियाँ हैं पहाड़ों की जड़ तक, फिर आगे घना जंगल और जंगल....!
तुपकाडीह में रेलवे स्टेशन है, रेल कामगारों की आवासीय कॉलोनी है। दो-चार क्वार्टर्स....! कुछ हटकर छोटी-मोटी बस्ती है जहाँ सप्ताह में दो दिन खुले मैदान में हाट लगती है। मंगलवार और शुक्रवार को।
इन दो दिनों के अलावा यदि खरीददारी करनी हो तो तुपकाडीह में बनियों की दुकानें हैं, पर भोथरी छुरी से गला काटते हैं बनिये। हर चीज दस-बीस पैसे महँगी...! साहू फिर भी कम मुनाफाखोर है। नरेटी नहीं रेतता। ऊपर से उधार-पैंच देने में भी आनाकानी नहीं करता।

वैसे बनवासियों की जरूरतें हैं भी कितनी ? अनाज, किरासन तेल, नमक, सस्ते कपड़े, लोहा-लकड़ी के सामान, घी-गुड़-शक्कर...आदिवासियों द्वारा जंगल से इकट्ठी की गयी चीजें-मसलन शहद, पत्तल-दोने, लकड़ी के लट्ठे-गट्ठर, चींटें, भोज्य पक्षी, मछलियाँ और...हँड़िया (चावल की मदिरा)। शुक्रवारी या मंगरवारी हाट में ही सबकुछ मिल जाता है।
जंगल के भीतर जाने वालीकच्ची सड़क गजलीठोरी गाँव के बीच से गुजरती है। आगे फिर कोई पन्सारी की दूकान नहीं है, सो इस सड़क के राहगीर इस आखिरी दुकान की उपेक्षा नहीं कर सकते ।
साहू की दुकान में इस समय भीड़ नहीं होती। इक्का-दुक्का ग्राहक ही आता है पर साँझ को यहाँ जमघट-सा लग जाता है। कभी-कभी तो कचकच भीड़...!
भीतर सामान देते साहू के पास कई लोग खड़े हैं। अपनी बारी आने की प्रतीक्षा करते। बैठनेवालों का भी ध्यान रखता है साहू। वह दुकान के सामने की जमीन से घास छिलवा कर रोज सवेरे गोबर-पानी से धरती लिपवाता है। एक छोटी बेंच भी पड़ी रहती है दुकान के बाहर।

सामान नापते-देते साहू को बतरस करने की आदत है।
जब माल उठाने जंगल से बाहर निकलता है साहू तो असियाकोस बनारस तक निकल जाता है। भर बैलगाड़ी सामान लादे गजलीठोरी लौटता है तो बाहरी दुनिया से ढेर सारी नयी-नयी बातें भी साथ लाता है। अजब-गजब के किस्से ....! अजगुत-अजगुत बातें बताता है साहू। ऊपर से अखबार भी तो बाँचता है।
हफ्ते-भर के अखबार का मोटा पोथा मंगरवारी बाजार के रोज गिरता है साहू की दुकान पर। इसीलिए तो देश-देशान्तर का इतना हाल जानता-बताता है साहू, जैसे की आज वाली बात...। जहरीले दीकू कौमनिस्ट की बात....! रूदिया साहू की बात सुन दुविधा में पड़ गयी।
कान में घुस जाने वाले कनघुसरा साँप से लेकर हिरण-कोटारी को साबुत लील जानेवाले अजगर तक के बारे में जानती है रूदिया। कनघुसरा कभी देखा भले न हो, पर होरहोरवा, धमिनवाँ, डोड़वा, करैत, गेहुँमन-सब तरह के साँप वह देख चुकी है। कइयों को तो मारा भी है।

रूदिया का बाप जतरा मुण्डा पहान है गजलीठोरी का। गाँव का प्रधान पुजारी...! जतरा मुंडा कहता है-‘दुनिया के सभी जीवों में सबसे जहरीला होता है शंखचूड़...!’
शंखचूड़ यानी काला नाग, जिसके फन पर खड़ाऊँ जैसा छापा होता है, पर साहू तो कुछ और ही कह रहा है।
‘‘कोमनिस का फन कितना बड़ा होता है साहू ?’’ पूछ ही डालती है रूदिया, ‘‘पलाशपत्ते से भी बड़ा ?’’
गरम मसाले की पुड़िया हातु मुण्डा (मुखिया) की बेटी देवन्ती को थमाता साहू ठठाकर हँसने लगा।...‘‘तुम लोगों से तो कुछ बतियाना भी मोसकिल। समझाना तो ढेला पीसकर तेल काढ़ने के बराबर....!’’
‘‘बतियाते रहना बाद में, पहले हमारा तेल तो नाप दो...।’’ धानुक उतावला हो उठा है।
‘‘हाँ भाई, तुम्हारा तेल भी....’’

चीकट तेल की बोतल में टीन की कीप पिरोकर टीन के मापक से मिट्टी का तेल बोतल में ढालने लगा साहू।
‘‘तेल के बाद हमारा सोडा।’’ कोई बाहर से बोला।
‘‘हमारा चोकर...!’’ दूसरी आवाज उठी।
‘‘एक पइला नीमक...!’’ तीसरी आवाज आयी।
‘‘मसीन नहीं हैं भइया, आदमीन हैं, हम भी। टैम तो लगेगा ही’’
‘‘तो जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ न फिर...!’’
साहू की दूकान पर ऐसी कचर-पचर कोई नयी बात नहीं, रोज का किस्सा है। ढलती साँझ में हर किसी को हड़बड़ी होती ही है।
किसी को नमक चाहिए, किसी को तेल। किसी को दियासलाई तो किसी को गाय की सानी के लिए खल्ली। किसी को घुटनों के दर्द में मालिश के लिए खपड़बिच्छे का तेल या भेंड़ का घी। कोई तो चूल्हे पर कढ़ाई चढ़ाकर साग छौंकने का पंचफोरन खरीदने पहुँचा है।

सबकी गाड़ी ही छूट रही है पर साहू है कि निर्विकार भाव से सौदा-सुलुफ निपटाता लपेट-लपेटकर बतियाते जा रहा है।
बोतल में जरूरत भर तेल ढालने के बाद बोतल का ढक्कन हाथ से टटोलते साहू ने रूदिया को बतायाः
‘‘कोमनिस्ट का फन-उन नहीं होता रे। वह भी देखने में हमारे-तुम्हारे जैसा होता है।’’
‘‘आदमिन जैसा ?’’ रूदिया के साथ खड़ी मलतिया ने पूछा।
‘‘आदमिन जैऽऽसा क्या रे ? जैसे सभी दीकू आदमिन होते हैं, वैसा ही कोमनिस्ट भी होता है। पर खाँटी कोमनिस्ट दीकू होता है बड़ा जहरीला।’’
साहू की बतकुच्चन सुनता धानुक झुँझला उठा, ‘‘हमार बोतलवा ऐने बढ़ाव न साहू।’’
‘‘ढकना खोज रहे हैं बुढठोंठू।’’ ‘‘ढकना नहीं है हमारे बोतल में...बोतल दो।’’ धानुक ने हाथ आगे बढ़ाया। फिर बोतल थामते हुए बोला, ‘‘उ आदमीन तो होता है न ? तो कोमनिस्ट हो चाहे जो भी, आदमीन में कौनो जहर-माहुर नहीं होता।’’
धानुक तेल की बोतल झुलाता दुकान से बाहर निकल गया।

साहू की बतरस में कोई बूढ़ा रूचि लेता भी नहीं। फालतू की बतरस, निठल्ले का लुकमा....! क्या करेंगे बूढ़े नयी दुनिया की नयी-नयी बातें जानकर ? जानभर लेने से कुछ नया हो जाएगा ? कुछ बदल जाएगा गजलीठोरी में ? पर नये छौंड़े-छौंड़ियों को रसगर गप्प से खूब भरमाता है साहू।
धानुक की बातों से रूदिया के मन की दुविधा भी तिरोहित हो चुकी थी। अब उसे भी हड़बड़ी थी। बोला,‘‘अब हमारा सोडा...?’’
कपड़े धोने का पाउडर खुला बिकता है साहू की दुकान पर...सोडा ! रूदिया ने अभी बात पूरी भी नहीं की थी कि बाहर स्टैण्ड पर साइकिल टिकाकर बनासकाँठा चर्च का माली सोमता टेक्का दुकान में प्रविष्ट हुआ।
‘‘दो दर्जन नहाने का साबुन...नीबू की महकवाला और कपड़े धोने का पौडर...पहिया छाप।’’ सोमता ने सामान का नया आदेश दिया।

बनासकाँठा गाँव के लोग साहू को फूटी आँख नहीं सुहाते। साहू का वश चले तो न तो वह बनासकाँठा वालों को अपनी देह का मैल बेचे, न ही देह का ज्वर भी उधार दे, पर साहू ठहरा बनिया ! बनिये का मित्र होता है लाभ और शत्रु...नुकसान ! लाभ देनेवाली दुधारू गइया की तो लताड़ भी भली !
गाहक की जेब से रुपया निकालना बनिये का धर्म है। सो व्यवहार और व्यापार में फर्क समझता है साहू। सोमता की ओर खींसे निपोरते हुए बोलाः
‘‘एक मिन्ट में समान बन्हाँ जाएगा टेक्का साहेब !’’
साहब....! अपने लिए साहब का सम्बोधन पाकर सोगता की छाती थोड़ी ऊँची हो गयी। गद्गद भाव और गर्वित आँखों से सोमता ने दुकान में उपस्थित लोगों पर दृष्टि फिरायी।
नीबू की महकवाला खूब महँगा साबुन और पहिया छाप कपड़े धोने का पाउडर नसीब वाले को ही खरीदना नसीब होता है। अपने लिए न सही, पर खरीद तो रहा है सोमता ही।

‘‘साइकिल पेरते आये हो, पसीना दिख रहा है लिलार पर। थोड़ी साँस तो लो टेक्का साहेब, तब तक पाव भर जीरा दे लें।’’
बाहर रखी खाली बेंच पर बैठकर कुर्ते की आस्तीन से पसीना पोंछने लगा सोमता।
पक्का होशियार पन्सारी है साहू। उसकी दुकान में कोई ग्राहक बिना रूपया दिये बाहर नहीं निकल सकता। हर ग्राहक का एकआध सामान निकाल कर उसे फाँस लेता है। ग्राहक फँसाए रखने का ढब तो तुपकाडीह के बनिये साहू से सीखें। कई ग्राहकों को एक साथ बझाए रखना भी एक कला है।
लोहितवर्णी साँझ ढल चुकी है। पीली आँखोंवाली साँझ के माथे पर डूबते सूर्य का जो कुंकुमी रंग का टीका होता है, उस सौभाग्य टीके के अस्त होते ही आनेवाली मनहूस स्याही से घबराने लगते हैं-वनवासी ग्राहक और जंगल के राहगीर ।
साहू ने ताखे पर धरी तेल की कुप्पी में जलती माचिस की तीली छुआई ही थी कि रूदिया ने फिर याद दिलाया, ‘‘तब से हल्ला कर रहे हैं साहू तुमने अभी तक हमारा सोडा नहीं.....’’

‘‘हाँ-हाँ, तेरा सोडा भी देते हैं रे, पर पहले तुझे यह बताना भी तो है कि कितना जहरीला होता है कौमनिस्ट ।’’
‘‘हमें क्या करना है जानकर ? हमें तो सोडा दो कि हम जाएँ।’’ रूदिया अतिशय विलम्ब से झुँझलाने लगी।
‘‘जान ले रे, जान ले। फिर न कहना, जानते-बूझते भी साहू ने चेताया नहीं। कौमनिस्ट जो यहाँ आनेवाला है न, वही होगा यहाँ का नया मास्टर।’’ साहू जल्दी-जल्दी सोमता का सामान निकालकर गत्ते के डिब्बे में डालने लगा।
रूदिया मुँह बिचकाए साहू को ताकती रही। क्या नया बताया साहू ने ? कुछ भी तो नहीं। यह तो रूदिया को पहले से पता है कि पुराने मास्टर की बदली हो गयी है। यह तो सारे गजलीठोरी को पता है- कोई नया मास्टर आयेगा। अब आयेगा तो आवे ! इससे रूदिया को क्या ?

....पर मास्टर तो कई आये-गये, साहू ने कभी इतना नहीं चेताया जितना कि इस बार !
कौमनिस्ट...! आदमी का जहर....!! कुछ नयी बात तो है जरूर, तभी तो ऐसा कर रहा है साहू ?
‘‘नया मास्टर बंगाली है। बंगाली का मतलब समझे बहिरू बूढ़ा ? बंगाल देश का आदमी !....एक तो बंगाल की माटी छिनार, ऊपर से कौमनिस्ट। समझो, माघ में बरसात...ले जड़इया...!
‘‘तो क्या हुआ ?’’ बहिरू ने पूछा
‘‘मीठा-मीठा बतियाकर मानुष को बहकाने में बहुत चल्हांक होता है कौमनिस्ट ! मेरी न मानो तो सोमता से पूछ लो।’’
‘‘ऐं.....? हाँ...हाँ-हाँ।’’ बिना कुछ जाने-समझे सोमता ने अपने ज्ञानी होने का प्रभाव जमाने हेतु हुंकारी भर डाली।
‘‘देखा ? चर्चा में रहने से सोमता कितना होशियार हो गया और तुम सब रह गये जंगली के जंगली भुच्चड़....!’’
एक दो ग्राहकों को निपटाकर पैसे अपनी काठ की सन्दूकची में डालने के बाद साहू इस बार सचमुच रूदिया का सोडा नापने लगा। आँखें नपने पर नहीं, रूदिया पर लगी हैं। नाप रही हैं रूदिया को।

बाजार से इस बार नयी कुर्ती के लिए छींट का कपड़ा खरीदा है रूदिया ने। धोने के बाद चढ़ गया है कपड़ा। छोटी पड़ गयी कुर्ती में कसमस-कसमस रूदिया की छातियों पर आँखें गड़ाये सोडा नाप रहा है साहू।
रूदिया की मुस्कान, जैसे मोतियों-भरी पके आम की फाँक....! एक बार आँख से आँख लड़ जाय तो नौ महीने तक करेजे में ठोर मारता रहे कठफोड़वा...!
सोडा नापकर थैली में गिरह लगायी साहू ने।
साहू कोई जिंस तौलता नहीं है। हर चीज नापता है। काठ के कई पइले (मापक) हैं साहू के पास।
साहू की दुकान में तौल के भाव कुछ भी नहीं बिकता ! गिनती के भाव बिकता है या फिर पैसे के भाव।
एक रूपये का तेल, आठ आने का लहसुन, तीस पैसे का जीरा...चार आने का नमक ! पैसों के हिसाब से कई छोटे-बड़े काठ के कटोरे यानी पइले रखता है साहू।

रूदिया को सोडा थमाते साहू ने रूदिया की जानकारी में कुछ और जोड़ाः
‘‘बहुत बतियाती है न तू, इसलिए चेता रहे हैं तुझे रे रूदिया ! मुँह न लगाना नये मास्टर से। आदिवासी मन (जन) को खूब सारा रूपया कमाने का सपना दिखाता है कौमनिस्ट।’’
‘‘खाली सुपना ? कि सच्चो...?’’ सामान बँध जाने से इत्मीनान महसूसती रूदिया आँचल के छोर में तुड़ा-मुड़ा बँधा रूपया खोलने लगी।
‘‘झूठमूठ रे’’ साहू ने बताया, ‘‘खाली सपना। सपना दिखाकर तुझे ले भागेगा बंगाल। वहाँ जोत देगा हथठेला में...गाड़ी में ।’’

‘‘काहे ? बैल नहीं होते बंगाल में ?’’ रूदिया ने आँखों में मछली जैसा कोरदार काजल काढ़ा है। मछलियाँ फड़फड़ायीं।
‘‘होते काहे नहीं पर वहां घोड़ा-बैल नहीं खींचते गाड़ी...आदमीन ही खींचता है।’’
‘‘तुमने देखा है आदमीन को गाड़ी खींचते ?’’ बूढ़े भरथरी ने टोक दिया।
‘‘और क्या गढ़कर कथा सुना रहे हैं ? आपन आँख से देखे हैं तभी तो...! थकने लगता है आदमीन तो सोंटा मार-मार के चूतर लाल कर देता है बंगाली। बाम (दाग) उखाड़ देता है। कहता है-चोलछे-चोलबे...चोलछे-चोलबे...’’
साहू ने मुँह टेढा़कर बांग्ला बोलने और सोंटा चलाने का हास्यास्पद अभिनय किया तो रूदिया की हँसी फूट पड़ी। साहू भी ठठाकर हँसने लगा।
‘‘ऐसा काहे बोलता है बंगाली ?’’ सोमता ने खड़े होकर पूछा।
‘‘माने यह कि मरो चाहे जियो, जो चलता है वही चलेगा यहाँ। आदमीन ही जोताता है हथठेला में, सो जोताता रहेगा...चलो अपना सामान सँभालो।’’

गत्ते के डिब्बे में बँधा सामान साइकिल के पीछे कैरियर में दबाकर सोमता सीट पर सवार हुआ और गजलीठोरी के कई नौजवानों की आँखों में साइकिल के लिए उम्मीद के बीज बोता पैडल मारता बनासकाँठा की ओर निकल गया।
गजलीठोरी के बाहरी ग्राहकों को साँझ का झुटपुटा होते-होते निपटा देना साहू की नीति है। अब जो लोग दुकान पर बच गये थे, वे अपने गाँव वाले ही थे। हाँ, रूदिया जरूर चली गयी थी।
श्यामवर्णी रूदिया की देह से पुटुस के खिले फूलों की खटमिट्ठी गन्ध फूटती है। रूदिया के दुकान से चले जाने के बाद भी देर तक हवा में डोलती रहती है उसकी देहगन्ध....!
रूदिया के जाते ही साहू की आँखों की ऊर्जा भी हाथों में ही आ सिमटी। तेजी से सौदे निपटाने लगा साहू। पइले से नाप-नापकर झटपट सामान ग्राहकों को सौंपने और पैसे वसूलने में व्यस्त हो गया।
साहू की दुकान के नियम-कानून दूसरे शहराती या कस्बाई दुकानों जैसे नहीं हैं।

गाँव देहात के गरीब-गुरबा लोग दस-पाँच रूपये तक का सौदा नकद खरीदने की क्षमता रखते हैं। इससे ऊपर कीमत बढ़ जाती है तो देहात की नकदी क्रयशक्ति क्षीण होने लगती है। तब काम आती है आदिम बाजार व्यवस्था की वस्तु-विनिमय की नीति। विनिमय की शक्ति मुद्रा से वस्तु में स्थानान्तरित हो जाती है।
एक गज कपड़े के बदले एक मुर्गी ! छोटे कठौते-भर अनाज के लिए एक बीसी यानी बीस अण्डे ! गुड़-चीनी लेनी हो तो बराबर माप में शहद चुकाना होता है। ऐसी और भी कई मापक इकाइयाँ हैं जंगल में।
वनवासियों को भी इस वस्तु-विनिमय में ही सुविधा दिखती है। नकद पैसों की जरूरत पड़ने पर उन्हें अपने वनोपज बेचने तुपकाडीह के बनियों की शरण में जाना पड़ता है या फिर डालटनगंज, बरवाडीह या बरकाकाना की गलियों-कॉलोनियों में फेरी लगानी पड़ती है।

गजलीठोरी वालों के पास समय का तोड़ा तो है ही, ऊपर से रेल के टिकट का खर्चा भी तो है। टिकट न लें तो रेल-पुलिस के सिपाहियों को रूपये देने पड़ते हैं। आमद-खर्च जोड़ने बैठें तो ‘नौ की लकड़ी, नब्बे खर्चा’ वाला मामला हो जाता है।
शहर-बाजार की समझ न होने के कारण आदिवासी शहरों में प्रायः ठगे भी जाते हैं। कभी निमोंछिये शहराती लौंडे भी धौंस-रौब दिखाकर सोने जैसी चीजें कौड़ियों के मोल उठा लेते हैं। कुल मिलाकर जंगल के बाहर व्यापार करने जाने में हजार झमेले हैं। साहू तो अपने जंगल का अपना ही आदमी है।
शहर से कतराते फिरने वाले वनवासी जन सदा साहू के लिए स्वागत के पात्र हैं। शहर से घबराने वालों के लिए तुपकाडीह के बनियों से अपेक्षाकृत ज्यादा भला और ईमानदार साहू कहीं ज्यादा अपना भी तो है। ईमानदार कुछ कम भी हो तो क्या ? परायों के हाथों लुटने से अच्छा है साहू के हाथों ही लुटें। सम्बन्ध तो बना रहता है और आड़े-गाढ़े समय में यही सम्बन्ध काम आता है जंगल में।


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