मिट्टी का तेल तथा अन्य कहानियाँ - ओम सोमानी Mitti Ka Tel Tatha Anya Kahaniyan - Hindi book by - Om Somani
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मिट्टी का तेल तथा अन्य कहानियाँ

ओम सोमानी

प्रकाशक : सुभद्रा पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7507
आईएसबीएन :9788189399177

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ओम सोमानी की 12 समकालीन कहानियों का संग्रह...

Mitti Ka Tel Tatha Anya Kahaniyan - A Hindi Book - by Om Somani

वास्तव में खाने की खुशबू से उसकी भूख और तेज हो रही थी। करुणा घी, तेल व मसालों का भरपूर प्रयोग कर रही थी। पति, दिन के समय में घर पर होता है तो वह दिन पत्नी के लिए त्यौहार से कम नहीं होता है। करुणा ने भी उस दिन खूब मन लगाकर उत्तम खाना बनाया था। मनोज के पूछने पर वह शालीनता पूर्वक बोली, ‘‘खाना एकदम तैयार है बस थाली में लगा रही हूँ।’’

कुछ ही पलों में करुणा खाने की थाली लेकर रसोई से प्रकट हुई। सबसे पहले मनोज की नजर उसके चेहरे पर पड़ी। दिन की भरपूर रोशनी में उसे करुणा को देखने का अवसर कम ही मिलता था। गुलाब के फूल की तरह उसका गोरा चेहरा खिला हुआ था। फूलों की ही तरह उसके चेहरे पर लाली थी। उसके होंठ रस भरे थे, निचले होंठ पर सौंफ का एक दाना चिपका हुआ था। लगता था सौंफ का वह दाना भी उसके होंठों के रस का पान करना चाहता हो। मनोज सोच रहा था सौंफ के दाने में करुणा के होंठों का रस अवश्य मिश्रित होगा। वह उस सौंफ के दाने को खाने के लिए लालायित हो गया। करुणा ने बालों को खींचकर पीछे बाँधा हुआ था जिससे उसका पूरा मुखड़ा स्पष्ट दिखता था। जिससे वह और भी कमनीय लग रही थी।

करुणा मनोज के सामने रखी तिपाई पर थाली रखने के लिए झुकी तो मनोज को उसके तन की खुशबू के सामने खाने की खुशबू नगण्य लगी।
करुणा थाली रखकर उसके सामने बैठ हई और बोली, ‘‘खाइए।’’ मनोज के सामने खाना आया तो वह खाने को देखने के बजाय करुणा के चेहरे को निहारने लगा। उसे ऐसे देखते जान करुणा मुस्करा कर चंचलता पूर्वक बोली, ‘‘क्यों घूर रहे हो ? चुपचाप खाइए नहीं तो ऐसे ही ठंडा हो जाएगा !’’

अनुक्रम

  • मिट्टी का तेल
  • करुणा
  • ब्रह्मास्त्र
  • एक रविवार
  • पुरस्कार
  • वृक्ष का आशीर्वाद
  • चरण स्पर्श
  • आधा कमरा
  • वनवास
  • वह चली गई
  • बंदर और लंगूर
  • दान और एरियर

  • मिट्टी का तेल


    प्रायः लगभग 8.30 बजे होंगे। प्रकाश कुमार व नीरज वर्मा तम्बू के बाहर रखी हुई लोहे की फोल्डिंग कुर्सियों पर बैठे हुए थे। वे दोनों भू-वैज्ञानिक थे। प्रकाश कुमार सीनियर व नीरज वर्मा जूनियर था। उनके सामने एक लोहे का फोल्डिंग टेबल भी रखा हुआ था।
    काबुल पाल यानि बड़े तम्बू के पीछे की तरफ एक डबल फ्लाई तम्बू अर्थात् छोटा तम्बू लगा हुआ था। उसी में खाना बनता था। वहीं से आ रही स्टोव की शूँ-शूँ की आवाज एवं पराठों की सुगन्ध से वातावरण भोजनमय हो रहा था।

    वे लोग नाश्ते के परोसने का इन्तजार कर रहे थे। बिहारी (खाना बनाने वाला लड़का) प्लेटें, चम्मच, गिलास आदि टेबल पर सजा चुका था। पानी से भरा एक गन्दा-सा प्लास्टिक का जग भी रखकर गया था।
    कुछ ही देर में बिहारी, सब्जी एवं गरम-गरम पराठों के साथ हाजिर हो गया। प्रकाश और नीरज ने नाश्ता करना प्रारम्भ किया। पराठों की सुगन्ध से उन लोगों की भूख पहले ही से प्रज़्वलित हो रही थी।

    चार-चार पराठों का हेवी नाश्ता करने के बाद ही दोनों ही ने बिहारी को और पराठें न लगाने के लिए कह दिया।
    प्रकाश उस गन्दे से प्लास्टिक के जग से पानी को गिलास में उड़ेलने लगा। उस जग की गन्दी हालत देख उसे बिहारी पर क्रोध आ रहा था। प्रकाश ने उसी क्षण बिहारी को आवाज दी, ‘‘बिहारी, इधर आना।’’
    प्रकाश की आवाज सुन बिहारी तम्बू से बाहर आया और प्रकाश के सामने खड़ा हो गया। प्रकाश ने उसे देखते ही पूछा, ‘‘यह जग कितना गन्दा हो रहा है, कभी साफ नहीं करते हो क्या ?’’

    बिहारी ने सहमते हुए कहा, ‘‘धोया था साहब, पिछली बार दिल्ली से बड़े साहब आए थे तब धोया था।’’
    यह सुनकर प्रकाश का क्रोध और भी बढ़ गया, ‘‘तुम्हें पता है सक्सेना साहब कब आए थे ? पूरा डेढ़ महीना हो गया है।’’
    बिहारी बोला, ‘‘जी सर।’’ प्रकाश ने उसी समय उसे सख्त निर्देश दिया और कहा, ‘‘अब से जग रोज साफ होना चाहिए, अन्दर से और बाहर से दोनों तरफ, समझे !’’
    बिहारी, ‘‘जी सर’’ कहकर चला गया और चाय बनाने लगा।

    कुछ ही देर में वह एक थाली में दो कप चाय लेकर आया। एक कप की डंडी टूटी हुई थी। टूटी डंडी वाले कप को नीरज ने उठा लिया, जो कि जूनियर था।
    लगभग 9.15 बज चुके थे। मनोहर ड्राईवर हाथ में खुली हुई जीप की लोग-बुक लेकर उन दोनों के समीप आता हुआ दिखाई दिया।

    पास आते ही उसने बारी-बारी से दोनों भू-वैज्ञानिकों को ‘गुड मार्निंग’ कहा। नीरज ने गुड मोर्निंग का उत्तर स्पष्ट रूप से, गुड मोर्निंग कहकर ही दिया। लेकिन प्रकाश ने हल्के से होंठों को हिलाकर केवल ‘मर्निंग’ कहा और उससे पूछा ‘‘नाश्ता वगैरह कर लिया है न !’’
    मनोहर ने बड़े अदब से कहा, ‘‘जी साहब नाश्ता हो गया है, मैं तैयार हूँ।’’ कहते हुए उसने खुली हुई लोग-बुक प्रकाश के सामने लगे टेबल पर रखी दी।

    प्रकाश ने लोग-बुक के निर्धारित कॉलम भर लिए और अपने हस्ताक्षर कर दिए। नीरज ने भी प्रकाश के हस्ताक्षर के ठीक नीचे अपने हस्ताक्षर कर दिए।
    मनोहर ने गाड़ी के बोनट को कपड़े से पोछा, फिर उसे खोलकर ऑइल गेज से ऑइल चेक किया और रेडिएटर का ढक्कन खोल उसमें पानी देख लिया।
    उसके बाद वह ड्राइविंग सीट पर बैठा, हीटर से इंजिन को गर्म किया और फिर आँख बन्द कर ईश्वर का स्मरण करते हुए चाबी को घुमाया।

    जीप स्टार्ट हो गई थी।
    ड्राइवर के चेहरे पर विजयी मुस्कान थी। प्रकाश व नीरज के चेहरों पर भी आत्म सन्तोष स्पष्ट झलक रहा था। एक ही प्रयास में जीप स्टार्ट हो जाए तो समझना चाहिए वह भू-वैज्ञानिक भाग्यशाली है।
    पिछले 4-5 दिनों से गाड़ी खराब थी। यहाँ तक कि प्रकाश व नीरज को भी कभी-कभी धक्का लगाने में शरीक होना पड़ता था। कल ही गाड़ी रिपेयर करवाई थी। पूरा दिन लग गया था।

    इस उपलब्धि पर सबके चेहरों पर हर्ष दिखाई दे रहा था। लेकिन चिन्ताओं का कभी कहीं अन्त होता है। एक चिन्ता खत्म हो तो दूसरी आगे लाईन में तैयार ही रहती है।
    बिहारी ने कल शाम को ही अल्टीमेटम दे दिया था कि मिट्टी तेल का स्टोक मात्र एक-दो दिन का ही रहा है। उसके बाद खाना बनाना सम्भव नहीं होगा।

    प्रकाश ने बनिए की दूकान से पाँच लीटर मिट्टी तेल खरीदा था। बहुत महँगा था। सरकारी रेट से तीन गुना ज्यादा, आधा लीटर कम भी दिया होगा। वह नुकसान तो अलग ही था। एक बार वहाँ से खरीद लिया यह सोचकर कि जब तक उतना मिट्टी तेल चलेगा तब तक सरकारी रेट से खरीदने का परमिट मिल ही जाएगा।
    लेकिन यह भी दुर्भाग्य ही था कि वह मिट्ट का तेल भी खत्म होने आ रहा था और परमिट मिलने का कोई आसार ही दिखाई नहीं दे रहा था।

    प्रकाश और नीरज कलेक्टर कार्यालय में खाद्य अधिकारी से मिलने हेतु पिछले दस दिनों से चार बार गए थे। हर बार वह अनुपस्थित था। उसके कार्यालय में दूसरे लोगों से पूछने पर पता चलता था कि वह किसी महत्त्वपूर्ण बैठक में है अथवा कहीं दौरे पर गया है।
    आज बिहारी के अल्टीमेटम को ध्यान में रखते हुए उन्होंने सबसे पहले मिट्टी तेल का काम करने का निश्चय किया।

    नियमानुसार नीरज सबसे पहले ड्राईवर के पास वाली जगह पर जाकर बैठ गया। और प्रकाश भी नीरज के पास वाली जगह अर्थात् तीन की सीट में बाईं तरफ प्रकाश, बीच में नीरज और दाईं तरफ ड्राइवर। यह लगभग एक नियम ही है कि जो जूनियर है उसे बीच में ही बैठना होता है।
    दो सिंटिलोमीटर भी रख लिए ताकि अवसर मिलने पर कुछ काम भी कर सके। वैसे सर्वे करने जाओ अथवा न जाओ कुछ भू-वैज्ञानिक सिंटिलोमीटर जीप में रख ही लेते हैं। न जाने कब जरूरत पड़ जाये !

    लगभग 30-40 मिनिट में वे ग्वालियर पहुँच गए थे। कलेक्टर कार्यालय बाड़ा में था। वह सबसे पुराना और भीड़ वाला क्षेत्र था, अतः बाड़ी बहुँचते-पहुँचते और आधा घंटा लग गया।
    वे दोनों कलेक्टर कार्यालय में सीधे खाद्यअधिकारी के विभाग में पहुँचे। हमेशा की तरह खाद्य अधिकारी अपनी कुर्सी पर नहीं था।
    बगल में बैठे एक क्लर्क से पूछा तो उसने कहा, ‘‘अतिरिक्त जिलाधीश ने बुलाया है वहीं गए हैं, आप बैठिए कुछ ही देर में आ जाएँगे।’’

    प्रकाश ने आज पहले ही से निश्चय कर रखा था कि आज तो काम करके ही जाना है अतः वह सामने रखी एक पुरानी-सी कुर्सी पर बैठ गया।
    नीरज ने भी सोचा कि उसे भी बैठने की जगह ढूँढ़नी चाहिए, उसने इधर-उधर देखा, अन्य कुर्सी नहीं थी, अतः वह बाहर आया, बाहर एक बेंच रखी थी, वह उसी पर बैठ गया।
    खाद्य अधिकारी के टेबल पर आर.के. श्रीवास्तव नाम की लकड़ी की नेम प्लेट रखी थी।

    वह नेम प्लेट बहुत उपयोगी वस्तु थी। अधिकारी का परिचय दर्शाने के साथ-साथ वह पेपर वेट एवं लाईन बनाने के लिए मिट्टी का भी काम करती थी। अतः वह एक महत्त्वपूर्ण अविष्कार था।
    प्रकाश और नीरज, श्रीवास्तव का इन्तजार करने लगे। इसी बीच प्रकाश ने भारत सरकार के लेटर हेड पर खाद्य अधिकारी के नाम मिट्टी के तेल के परमिट का एक पत्र भी बना लिया। 100 लीटर मिट्टी तेल के लिख दिया जिससे सारी झंझट ही खत्म हो जाए।
    उन्हें वहाँ बैठे-बैठे लगभग दो घंटे बीत गए। खाद्य अधिकारी तब भी नहीं पहुँचा।

    प्रकाश ने उस क्लर्क से इस बीच तीन-चार बार पूछ लिया कि श्रीवास्तव जी कब आएँगे। एक-दो बार तो उसने भद्र पुरुष की भाँति जवाब दे दिया कि काम में फँस गए होंगे, आते ही होंगे। उसके बाद उसका अभद्र होना स्वाभाविक था। और फिर तो वह स्वयं भी उठकर चला गया।
    लंच के समय वह फिर आया, अपना लंच बॉक्स लेने, उसी समय फोन की घंटी बजी। जाते-जाते उस क्लर्क ने फोन उठाया। श्रीवास्तव का फोन था। वह कुछ पूछ रहा था। क्लर्क ने तभी बता दिया कि परमाणु वाले बैठे हुए हैं, क्या कहना है ? श्रीवास्तव ने फोन पर निर्देश दे दिया कि उन्हें कहें कि मैं लंच के बाद मिलूँगा।

    क्लर्क ने वह निर्देश प्रकाश को सुना दिया। प्रकाश व नीरज को भी लंच करना था। अतः उस क्लर्क के साथ-साथ वे भी वहाँ से बाहर निकले।
    सबसे पहले वे दोनों जीप के पास पहुँचे। मनोहर जीप में ही सो रहा था। नीरज ने उसे हिलाकर जगाया। वह हड़बड़ाकर उठा।
    प्रकाश ने उसे कहा, ‘‘हम थो़ड़ी देर में आ रहे हैं तुम यहीं रुकना।’’

    मनोहर ने कहा, ‘‘कहीं जाना है तो बैठिए सर, मैं ही छोड़ देता हूँ।’’
    प्रकाश ने कहा, ‘‘नहीं, नहीं, यहीं पास में ही जा रहे हैं, पैदल ही जाएँगे।’’
    प्रकाश ने मनोहर को यह नहीं बताया कि वे लोग लंच के लिए जा रहे हैं। मनोहर स्वयं समझदार था। वह समझ गया कि गाड़ी से नहीं जा रहे हैं तो जरूर खाना खाने ही जा रहे होंगे।

    प्रकाश को ग्वालियर में कभी नाश्ता अथवा खाना खाना हो तो इंडियन कॉफी हाउस में ही जाता था। वह रेस्टोरेंट वहाँ से पास ही था। वहाँ पहुँचते ही एक वर्दीधारी वेटर ने एक खाली स्थान की तरफ इशारा किया। वे दोनों वहीं जाकर बैठ गए। वह वर्दीधारी वेटर जिसके सर सफेद पगड़ी और उस पर लाल कलगी भी थी, ठंडे पानी के दो गिलास लेकर आया। उस वेटर का चेहरा गोलमटोल व अत्यधिक चमकदार था। उसने सामने प्रकाश व नीरज के मड़ियल, धूप से काले हुए चेहरों को देखकर लगता था कि दोनों किसी अकाल पीड़ित क्षेत्र से आ रहे हों।

    उस वेटर से प्रकाश ने कहा, ‘‘दो थाली।’’ वेटर ने पूछा, यद्यपि वह पूछना नहीं चाहता था, और ओर्डिनेरी थाली ही लाने वाला था फिर भी पूछा, ‘‘सर, ओर्डिनेरी अथवा स्पेशल।’’
    प्रकाश ने बिना नीरज से पूछे ही कह दिया, ‘‘ओर्डिनेरी ही लाओ।’’ वह वेटर गर्दन हिलाता हुआ गया और कुछ ही देर में दो थाली लेकर आ गया। दोनों ने बड़े आराम से खाना खाया। बीच में भी वेटर आया और पूछा, ‘‘और कुछ आर्डर करना है सर !’’

    प्रकाश ने कहा, ‘‘नहीं, कुछ नहीं, बिल ले आओ।’’
    वह वेटर भूरे रंग के एक मजबूत फोल्डर में बिल ले आया और साथ ही सौंफ व शक्कर की कटोरियाँ भी ले आया।
    120 रुपए का बिल था। नीरज ने 150 रु. निकालकर उस फोल्डर में रख दिए। वह वेटर पैसे ले गया और चेंज लेकर पुनः आया। इसी दरमियान प्रकाश 3-4 चम्मच सौंफ व 2-3 चम्मच शक्कर खा गया। नीरज मन ही मन सोच रहा था साहब को जल्द ही अपना शुगर टेस्ट करवा लेना चाहिए।

    नीरज ने फोल्डर खोलकर देखा, दो दस-दस के नोट थे और दो पाँच-पाँच के सिक्के थे। नीरज ने पाँच का सिक्का वहीं छोड़ पच्चीस रुपए अपनी जेब में रख लिए। उस वेटर ने झुककर नमस्कार किया और पाँच रुपए अपनी जेब में रख, फोल्डर, अपने हाथ में लिए चला गया। प्रकाश ने नीरज को घूरकर देखा और दोनों वहाँ से निकल पड़े।
    बिना कहीं और समय गँवाए वे दोनों अपने कार्य क्षेत्र अर्थात् खाद्य अधिकारी के कार्यालय में पहुँच गए। उस समय ठीक 2 बजे थे।

    खाद्य अधिकारी, श्रीवास्तव अभी नहीं पहुँचा था। वह क्लर्क भी वहाँ नहीं था।
    प्रकाश ने वहीं बैठकर इन्तजार करने के मन बनाया लेकिन उसने देखा कि वह जिस टूटी कुर्सी पर बैठा था वह वहाँ से गायब थी। इसलिए मजबूरन उसे बाहर रखी बैंच पर आकर बैठना पड़ा, वहाँ नीरज पहले ही से बैठा हुआ था।
    थोड़ी ही देर में वह क्लर्क भी आ पहुँचा। वह बाहर बैठे प्रकाश को घूरकर देखता हुआ अन्दर चला गया।
    दस-पन्द्रह मिनट के इन्तजार के बाद ही एक अति दुबला-पतला-सा, गंजा आदमी आता हुआ दिखाई दिया। वह व्यक्ति खाद्य अधिकारी की कुर्सी पर जाकर बैठ गया।

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