ललमनियाँ - मैत्रेयी पुष्पा Lalmaniyan - Hindi book by - Maitreyi Pushpa
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ललमनियाँ

मैत्रेयी पुष्पा

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :150
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7539
आईएसबीएन :81-7016-312-9

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रनवीर ने पहले ही कह दिया था कि गाँव की अन्य औरतों की तरह अब तुम सिर पर डलिया-तसला धरे नहीं सोहातीं। आखिर प्रधान की पत्नी हो...

Lalmaniyan - A Hindi Book - by Maitreyi Pushpa

आज कोई भी कथा-पत्रिका, कथा-संकलन बिना मैत्रेयी पुष्पा के रचनात्मक योगदान के अधूरा माना जाता है और आज की कहानी का कोई सर्वेक्षण इनके जिक्र के बिना अपूर्ण है। अपनी हर कथा-रचना के साथ विषय-वैविध्य और परिपक्वता का परिचय देता कथाकार का यह दूसरा कहानी-संग्रह पाठकों तक पहुँचाते हुए किताबघर प्रकाशन उम्मीद करता है कि इस संग्रह को भी वही चर्चा और प्रशंसा हासिल होगी जो इन कहानियों के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन के दौरान हुई थी।

अनुक्रम

  • फैसला
  • सिस्टर
  • सेंध
  • अब फूल नहीं खिलते...
  • रिजक
  • बोझ
  • पगला गयी है भागवती !
  • छाँह
  • तुम किसकी हो बिन्नी ?
  • ललमनियाँ

  • फैसला


    आदरणीय मास्साब,
    सादर प्रणाम !
    शायद आपने सुन लिया हो। न सुना होगा तो सुन लेंगे। मेरा पत्र तो आज से तीन दिन बाद मिल पाएगा आपको।
    चुनाव परिणाम घोषित हो गया।
    न जाने कैसे घटित हो गया ऐसा ?

    आज भी ठीक उस दिन की तरह चकित रह गयी मैं, जैसे जब रह गयी थी–अपनी जीत के दिन। कभी सोचा न था कि मैं प्रधान-पद के लिए चुनी जा सकती हूँ।
    कैसे मिल गये इतने वोट ?
    गाँव में पार्टीबन्दी थी। विरोध था। फिर...?

    बाद में कारण समझ में आ गया था, जब मैंने सारी औरतों को एक ही भाव से आह्लादित देखा। उमंगों-तरंगों का भीतरी आलोड़न चेहरों पर छलक रहा था।
    ब्लाक प्रमुख की पत्नी होने के नाते घर-घर जाकर अपनी बहनों का धन्यवाद करना जब सम्भव नहीं हो सका तो मैं ‘पथनवारे’ में जा पहुँची।

    आप जानते तो हैं कि हर गाँव में पथनवारा एक तरह से महिला बैठकी का सुरक्षित स्थान होता है। गोबर-मिट्टी से सने हाथों, कंडा थापते समय, औरतें अकसर आपबीती भी एक-दूसरे को सुना लेती हैं।
    हमारे सुख-दुखों की सर्वसाक्षी है यह जगह।
    वैसे मेरा पथनवारे में जाना अब शोभनीय नहीं माना जाता।

    रनवीर ने पहले ही कह दिया था कि गाँव की अन्य औरतों की तरह अब तुम सिर पर डलिया-तसला धरे नहीं सोहातीं। आखिर प्रधान की पत्नी हो।
    वे प्रमुख बने तो बंदिशों में कुछ कसावट आ गयी। और जब मैं स्वयं प्रधान बन गयी तो उनकी प्रतिष्ठा कई-कई गुना ऊँचे चढ़ गयी।

    वे उदार और आधुनिक व्यक्तित्व के स्वामी माने जाने लगे। अन्य गाँव की निगाहों में हमारा गाँव अधिक ऊँचा हो गया। और मैं गाँव की औरतों से दूरी बनाये रखने की हिदायत तले दबने लगी।
    पर मेरा मन नहीं मानता था, किसी न किसी बहाने बहुंच ही जाती उन लोगों के बीच।
    रनवीर कहते थे, अभी तुम्हारी राजनैतिक उम्र कम है, वसुमती। परिपक्वता आएगी तो स्वयं चल निकलोगी मान-सम्मान बचाकर।

    ईसुरिया बकरियों का रेवड़ हाँकती हुई उधर ही आ निकली थी, आप जानते होंगे, मैंने जिक्र तो किया था उसका कि वह कितना निश्छल, कितना मुखर है।
    यह भी बताया था कि मैं और वह इस गाँव में एक दिन ही ब्याहकर आये थे।
    आप हँस पड़े थे मास्साब, यह कहते हुए कि नेह भी लगाया तो गड़रिया की बहू से ! वाह वसुमती !

    बड़ी चौचीती नजर है उसकी। जब तक मैंने घूँघट उलटकर गाँव के रूख-पेड़ों, घर-मकानों, गली-मोहल्लों को निहारा ही था, तब तक उसने हर द्वार-देहरी की पहचान कर ली। हर आदमी को नाप-जोख लिया। शरमाना-सकुचाना नहीं है न उसके स्वभाव में।
    गाँव के बड़े-बुजुर्गों के नाम इस तरह लेती है, जैसे वह उनकी पुरखिन हो। ऊँच-नीच, नाते-रिश्ते, जात-कुजात के आडम्बरों से सर्वथा मुक्त है।

    वह खड़ी-खड़ी आवाज मारने लगी, ‘‘ओ बसुमतियाऽऽ...! रत्नी की ! रनवीर की दुलहन ! ओ पिरमुखिनी !’’
    सब हँस पड़ीं।
    बोलीं, ‘‘वसुमती, लो आ गयी सबकी अम्मा दादी ! टेर रही हैं तुम्हें। हुंकारा दो प्रधान जी।’’
    वह हाथ में पकड़ी पतली संटी फटकारती, बकरियों को पिछियाती हुई हमारे पास ही आ गयी।

    झमककर बोली, ‘‘पिरधान हो गयीं अब तो ! चलो सुख हो गया।’’
    किसी ने खास ध्यान नहीं दिया।
    संटी उठकर जोर से बोलने लगी, ‘‘एऽऽ, सब जनी सुनो, सुन लो कान खोलकें ! बरोबरी का जमाना आ गया। अब ठठरी बँधे मरद माराकूटी करें, गारी-गरौज दें, मायके न भेजें, पीहर से रुपइया पइसा मँगवावें, क्या कहते हैं कि दायजे की पीछें सतावें, तो बैन सूधी चली जाना बसुमती के ढिंग।

    ‘‘लिखवा देना कागद।
    ‘‘करवा देना नठुओं के जेहल।
    ‘‘ओ बसुमतिया ! तू रनवीरा की तरह अन्याय तो नहीं करेगी ? कागद दाब तो नहीं लेगी ?’’
    सलिगा ने हमारे हाथ-पाँव तोरे, तो हमने लीलो के लड़का से तुरन्त कागद लिखवाया था कि सिरकार दरबार हमारी गुहार सुनें।

    रनवीर ने को हमने खुद पकड़ाया था जाकर।
    उन दिनों सलिगा हल-हल काँपने लगा था। हाथ तो क्या, उलटी-सूधी जुबान तक नहीं बोल पाया कई दिनों तक। सारे जाने रन्ना ने कादग दबा लिया सलिगा सेर बनकें चढ़ा आया छाती पर।
    बोला, ‘‘जेहल करा रही थी हमारी ? हत्यारी, हमने भी सोच लई है कि चाहे दो बकरियाँ बेंचनी पड़ें, पर तेरे कागद की ऐसी-तैसी।’’

    संटी फेंककर ईसुरिया ने अपनी बाँहें फैला दीं। सलूका उघाड़ दिया, गहरी खरोचों और घावों को देखकर सखियों के होंठ उदास हो गये। खिलते चेहरों पर पाला पड़ गया, मास्साब ! हँसी-दिल्लगी ठिठुरकर ठूँठ हो गयी !
    गोपी ने हँसने का उपक्रम किया।

    मुस्कराने का अभिनय करती हुई बोली, ‘‘क्या बक रही है तू ? कोई सुन लेगा तो कह न देगा पिरमुख जी से ?’’
    वह तुरन्त दयनीयता से उभर आयी।
    ‘‘सुन लो ! सुनाने के लिए ही कह रहे हैं। रनवीर एक दिन चाखी पीसेगा, रोटी थापेगा। और हमारी बसुमती, कागद लिखेगी, हुकुम चलाएगी, राज करेगी।

    ‘‘है न बसुमती ?
    ‘‘साँची कहना, तू ग्यारह किलास पढ़ी है न ? और रनवीर नौ फेल ? बताओ कौन हुसियार हुआ ?’’
    ‘‘अब दिन गये कि जनी गूँगी-बहरी छिरिया बकरिया की नाई हँकती रहे। बरोबरी का जमाना ठहरा। पिरधान बन गयी न बसुमती ? इन्द्र गाँधी का राज है। बोलो इन्दा गाँधी की जै।’’

    गोपी डपटने लगी, ‘‘सिर्रिन, इन्द्रा गाँधी तो कब की मर चुकीं। राजीव गाँधी का राज है।’’
    ‘‘मर गयीं ?
    ‘‘चलो, तो भी क्या हुआ। मतारी बेटा में कोई भेद होता है सो ? एक ही बात ठहरी।’’
    ‘‘क्यों जी, झल्लूस कब निकलेगा ?’’ उसे सहसा याद हो पड़ा।

    ‘‘रन्ना पिरधान बना था तब कैसी रौनक लगी थी। माला पहरायीं थीं। झंडा लेकर चले थे लोग। रन्ना ने तो कंधा-कंधा चढ़कें परिकम्मा की थी गाँव की ?’’
    सरूपी ने उसे फिर समझाया, ‘‘ओ बौड़म रन्ना-रन्ना करे जा रही है ? पिरमुख जी सबसे पहले तेरी जेहल कराएँगे।’’
    उसने लापरवाही से सिर झटका, ‘‘लो, सुन लो सरूपिया की बातें ! रन्ना क्या, तेरा ससुर गजराज भी नहीं कर सकता हमारी जेहल। तेरा जेठ पन्ना भी नहीं कर सकता। है न बसुमती !’’

    झुंड में से कोई बोल पड़ी, ‘‘काहे को मुँही लगती हो इस सरगपताल के। ओ ईसुरिया, तेरी छिरियाँ, वे निकल गयीं खेत में।’’
    ‘‘ओ मोरी दइया...!’’ वह संटी फटकारती दौड़ने लगी।
    सवेरे की घाम रसोई के ओटले पर रही होगी। चूल्हा जलाकर मैंने तवा रखा ही था। हाठ आटे में सने थे।
    कोई छाया-सी द्वार पर दिखी।

    सही अनुमान लगाती, तब तक तो आवाज आने लगी, ‘‘ओ बसुमती ऽऽ! बसुमतिया ऽऽ!’’
    ईसुरिया थी।
    ‘‘पंच्याती चौंतरे पर दुरगा बैठा है ! पन्ना देख रहा है ! तेरी सौं बसुमती, सारे पंच तेरी परतिच्छा में !’’ वह खुशी से खिल रही थी।
    मैंने तुरन्त कुसुमा को बुलाया। वह बोली, ‘‘तुम जाओ भाभी हम बना देंगे रोटी।’’

    सभा में जाने लगी तो औरतें किवाड़ों की झिरी से झाँकने लगीं। शायद यह देखने के लिए कि मैं घूँघट डालकर जा रही हूँ या पर्दा त्यागकर।
    माथे पर साड़ी का किनारा। न घूँघट था न खुला चेहरा।

    रास्ते में गोपी मिल गयी। ईसुरिया को छेड़ने लगी, ‘‘वसुमती भाभी तो सभी में जा रही हैं, तू कहाँ जा रही है ईसुरिया ?’’
    वह तमक गयी, ‘‘चल ! गोपिया की बच्ची ! हम बसुमती के सेकटरी ठहरे। सभा में जा रहे हैं। पंचों को टोकते नहीं हैं।’’
    ‘‘छिरियाँ कहाँ गयीं आज ?’’

    ‘‘छिरियाँ चराने सलिगा चला गया। जान गया अब, कि मरद और औरत बरोबर हो गये, बेटा, अब चलो छिरियाँ चुगाने।
    हम चबूतरे के समीप पहुँचने ही वाले थे कि रनवीर आते दिखाई दिये।
    वे लपकते कदमों से हमारे पास आकर रुके। मुख पर आश्चर्य की रेखाएँ थीं और नाक तथा होंठ कठोर मुद्रा में अकड़े हुए।
    बोले, ‘‘कहाँ ?’’

    उत्तर ईसुरिया ने दिया, ‘‘पिरमुख जी, हम पंचायत में जा रहे हैं। अगाई छोड़ो। रास्ता दो।’’
    उसके कहे वाक्यों को सुनकर वे मुझसे मुखातिब हुइ, ‘‘घर चलो तुम।’’
    ईसुरिया मुँह बाए खड़ी रह गयी। कुछ ही क्षणों में सम्भलकर बोली, ‘‘टोका-टाकी न करो पिरमुख जी। चलने दो हमें।’’
    रनवीर की त्यौरियाँ झुलस आयीं।

    ‘‘सुन नहीं रही बसुमती तुम ?’’
    उनकी आग्नेय दृष्टि मेरे पाँवों को जलाने लगीं। उमंग गतिहीन हो गयी।
    ईसुरिया अड़ी खड़ी थी। उसकी ओर मैंने समझदार संकेत किया कि लौट चलने में ही मंगल है।
    उसने मुझे विचित्र भाव से घूरा और विवश भाव से मेरे पीछे-पीछे खिचड़ आयी।

    लौटकर मैं बर्तन समेटने लगी। कुसुमा के अनकहे प्रश्नों का उत्तर मेरे पास नहीं था। घुटन ज्यों कि त्यों ठहरी हुई थी सीने में।
    ईसुरिया आँगन में बैठी बड़बड़ा रही थी, ‘‘लो, हद्द हो गयी कि नहीं ? हौदा पर तो बसुमती और राज करे रनवीर ! अरे अपनी पिरमुखी सम्भारें। पिरधानी से अब इन्हें क्या मतलब ?’’

    कुसुमा से नहीं रहा गया, ‘‘मतलब कैसे नहीं है ? रामकिसुन कुम्हार से रुपइया वसुल करने हैं। बनीसिंह को बचन दे रखा होगा। भाभी जाती तो क्या मालूम उलटा हो जाता फैसला।’’
    बेचारे रामकिसुन ने छान-छप्पर के कारण अपना बैल बेच डाला था कि बिन छत के कैसे रहे चौड़े में। बनीसिंह राच्छत, पहले तो बैल खरीद ले गया और खलिहान उठाते ही आ गया लौटाने। कहता है यह मरघिल्ला बैल उसे नहीं चाहिए। लौटाओ रुपइया।

    अब कहाँ से आवें रुपइया ? छान बेच दे क्या ? छान बिकती है क्या ? कौन करे न्याय ?
    रनवीर तो गरीब को ही मारेंगे। तुम चली जातीं तो बच जाता कुम्हार का।
    ईसुरिया भारी कदमों से लौट गयी अपने घर।
    मास्साब, मेरा आत्मा में किरचें चुभती रह गयीं।

    लौटकर रनवीर ने खूब समझाया था, ‘‘पंचायती चबूतरे पर बैठती तुम सोभा देती हो ? लाज-लिहाज मत उतारो। कुल-परम्परा का ख्याल भी नहीं रहा तुम्हें ? औरत की गरिमा आढ़-मर्यादा से ही है। फिर तुम क्या जानो गाँव में कैसे-कैसे धूर्त हैं ?’’
    उस दिन के बाद पंचायती चबूतरे से प्रधान की टेर निरन्तर उठती रही। लोग जानते थे कि रनवीर इस बात को पसन्दर नहीं करते, फिर भी बुलाने चले आते।

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