मिट्टी की ओर - रामधारी सिंह दिनकर Mitti Ki Or - Hindi book by - Ramdhari Singh Dinkar
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मिट्टी की ओर

रामधारी सिंह दिनकर

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7545
आईएसबीएन :978-81-8031-415

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प्रस्तुत निबंध संग्रह में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के चौदह आलोचनात्मक निबन्ध संग्रहीत हैं जो वर्तमान हिन्दी साहित्य के विषय पर लिखे गये हैं...

Mitti Ki Or - A Hindi Book - by Ramdhari Singh Dinkar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

राष्ट्रकवि ने इस निबंध संग्रह में इतिहास के दृष्टिकोण से, दृश्य और अदृश्य का सेतु कला में सोद्देश्यता का प्रश्न, हिन्दी कविता पर अशक्तता का दोष, वर्तमान कविता की प्रेरक शक्तियाँ, समकालीन सत्य से कविता का वियोग हिन्दी कविता और छंद, प्रगतिवाद, समकालीनता की व्याख्या, काव्य समीक्षा का दिशा-निर्देशन, साहित्य और राजनीति, खड़ी बोली का प्रतिनिधि कवि, बलिशाला ही हो मधुशाला, कवि श्री शियारामशरण गुप्त, तुम घर कब आओगे कवि इत्यादि विचारोत्तेजक निबंध संग्रहीत हैं।

इतिहास के दृष्टिकोण से


कोलाहल


जब मैंने साहित्य की दुनिया में आँख खोली, तब तक हिन्दी की नई कविता-लता परवान चढ़ चुकी थी। निरालाजी के शब्दों में ‘‘वह कलियाँ लेने लग गई’’ थी; और दो-चार ‘‘सुमन पंखुड़ियाँ भी खोलने लगे’’ थे। ‘पल्लव’, ‘एकतारा’ और ‘निर्माल्य’ तथा ‘परिमल’ की कितनी ही कविताएँ प्रकाशित हो चुकी थीं। श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र का ‘अन्तर्जगत्,’ श्री रामनाथ ‘सुमन’ की ‘विपंची’ और पंडित जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’ की, बाद को ‘अनुभूति’ में संगृहीत होनेवाली कितनी ही कविताएँ प्रमुखता प्राप्त कर चुकी थीं। ‘भारतीय आत्मा’ की पुष्ट वाणी रहस्य के लोक में पहुँचकर धुँधली होती जा रही थी तथा ‘भारत-भारती’ और ‘जयद्रथवध’ के रचयिता ‘झंकार’ के रहस्यमय गीतों की रचना कर रहे थे। भगवती बाबू की वे कविताएँ प्रसिद्ध हो रही थीं जो बाद को ‘मधुकण’ में निकलीं और श्रीमती महादेवी जी वर्मा अध्यात्म के अनन्त आकाश में उड़ जाने को अपना पंख तोल रही थीं। नई धारा के कवियों में से प्रसादजी एक आदरणीय विद्वान् कलाकार के रूप में स्वीकृत हो चुके थे तथा सुभद्राकुमारी चौहान एवं पं. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ नवयुवकों में बहुत ही लोकप्रियता प्राप्त कर रहे थे। इनके अतिरिक्त, नई धारा के होनहार कवियों में पं. गुलाबरत्नजी वाजपेयी ‘गुलाब’, पं. मुकुटधर पांडेय, श्री वंशीधर विद्यालंकार, श्री मंगलप्रसाद विश्वकर्मा, श्री आनन्दिप्रसाद श्रीवास्तव, श्री जगमोहन ‘विकसित’ और श्री गिरिजादत्त शुक्ल ‘गिरीश’ प्रमुख माने जाते थे। श्री सियारामशरणजी गुप्त ‘मौर्य-विजय’ की दुनिया को पीछे छोड़कर प्राचीनता और नवीनता के बीचोबीच, मध्य मार्ग पर, आ गए थे। यह नामावली उन कवियों की है जो शैली और भाव, दोनों ही दृष्टियों से नई कविता की भूमि में आ चुके थे अथवा प्राचीनता से निकलकर उसकी ओर निश्चित रूप से अग्रसर हो रहे थे। जो लोग पिछड़कर या जानबूझकर इस युग से पीछे रह गए थे, खड़ी बोली के उन समर्थ कवियों में पं. नाथूराम शर्मा ‘शंकर’, श्री हरिऔधजी, पं. रामनरेश त्रिपाठी, पं. माधव शुक्ल, पं. रामचरित उपाध्याय, श्री अनूप शर्मा ‘अनूप’ श्री गयाप्रसादजी शुक्ल ‘सनेही’, पं. जगदम्बा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ और ठाकुर गोपालशरण सिंहजी प्रथान थे। इस धारा के कुछ अन्य प्रमुख कवियों में सैयद अमीर अली ‘मीर’, कर्णसिंह ‘कर्ण’, रसिकेन्द्र, गुरुभक्त सिंह ‘भक्त’ और कौशलजी के नाम स्मरणीय हैं। पंडित मातादीन शुक्लजी ‘विदग्ध’ की रचनाएँ प्राचीनता के अधिक समीप पड़ती थीं, किन्तु, विश्वास से वह कविता के नए आन्दोलन के साथ थे। बलिया के श्री रामसिंहासन सहायजी मुख्तार ‘मधुर’ भारतीय आत्मा की राह पर चलकर अद्भुत चमत्कार दिखला रहे थे; किन्तु, उनकी रचनाओं की संख्या बहुत अधिक नहीं थी।

उस समय, आलोचकों में शीर्षस्थान पंडित पद्मसिंहजी शर्मा को प्राप्त था। किन्तु, वे और पंडित कृष्णबिहारी मिश्रजी अपना अधिक समय देव तथा विहारी के लिए व्यय करते थे। नई कविता की खबर लेनेवाले कठिन आलोचक, पं. रामचन्द्रजी शुक्ल थे (जो पीछे चलकर पन्तजी और प्रसादजी के प्रशंसक हो गए) जिन्होंने पाषंड-परिच्छेद नामक कविता में छायावादकालीन रहस्यवादी कवियों की खिल्ली उड़ाई थी और उन्हें ढोर मानकर पाठकों को संकेत दिया था कि इन्हें ‘‘हाँक दो, न घूम-घूम खेती काव्य की चरें।’’ इस प्रहार का बहुत ही गम्भीर एवं समीचीन उत्तर पं. मातादीन शुक्ल ने अपनी ओजस्विनी कविता ‘पाषंड-प्रतिषेध’ में दिया था जिसमें उन्होंने विद्वद्वर शुक्लजी तथा उनके अनुयायियों को रूप से अरूप को ओर जाने की सलाह दी थी।

छायावादी कवियों की ओर से पक्ष-सिद्धि का बीड़ा श्री रामनाथलाल ‘सुमन’, श्री कृष्णदेवप्रदासजी गौड़, पंडित शुकदेवविहारी मिश्र और स्वर्गीय पं. अवध उपाध्याय ने उठाया था। पं. शान्तिप्रियजी द्विवेदी और पं. नन्ददुलारेजी वाजपेयी कुछ बाद को आए, किन्तु, नई कविता की पक्ष-सिद्धि के सम्बन्ध में वाजपेयीजी ने भी बहुत ही महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

सुकवि-किंकर नाम से आचार्य द्विवेदीजी ने छायावाद पर जो आक्रमण किया था उससे नई धारा के कवि और उनके प्रशंसक बहुत ही क्षुब्ध हो उठे थे तथा कई वर्षों तक वे इसका बदला पुराने कवियों की अनुचित निन्दा और छायावाद की अतिरंजित प्रशंसा करके लेते रहे। संघर्ष का जहर इस प्रकार फैला कि छायावाद-आन्दोलन के अग्रणी तथा शील और सौकुमार्य्य की मूर्ति, पं. सुमित्रानन्दनजी पन्त की भी धीरता छूट गई तथा उन्होंने अपनी पुस्तक ‘वीणा’ की भूमिका (जो पीछे निकाल दी गई) में आक्रमण का उत्तर काफी कटुता और अहंकार से दिया। अष्टादश हिन्दी-साहित्य सम्मेलन के अवसर पर जब साहित्य-विषयक मंगलाप्रसाद-पुरस्कार ‘पल्लव’ पर नहीं दिया जाकर श्री वियोगी हरिजी की ‘वीर-सतसई’ पर दिया गया, तब तो युवकों की धीरता ही जाती रही और उन्होंने अशिष्टतापूर्वक वयोवृद्ध विद्वानों को साहित्य का ठूँठ कहना आरम्भ कर दिया। उस साल के निर्णायकों में से एक, पं. शुकदेवविहारी मिश्र ही ऐसे थे जिन्होंने ‘पल्लव’ के पक्ष में अपना मत दिया था तथा उदारतापूर्वक पन्तजी के सम्बन्ध में यह लिखा था कि ‘‘मैं हिन्दी में केवल नवरत्नों को ही महाकवि मानता आया हूँ, किन्तु ‘पल्लव’ को पढ़कर मुझे ऐसा ज्ञात होता है कि यह बालक भी महाकवि है।’’

जहाँ तक मुझे याद है, प्रामाणिक विद्वानों में से केवल मिश्रजी ने ही ‘पल्लव’ की मुक्त-कंठ से, प्रशंसा की थी और उसके बाल कवि को हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ दस कवियों की पंक्ति में बैठने योग्य बताकर नए आन्दोलन को बहुत बड़ा नैतिक उत्थान दिया था। बाकी, प्रायः सब-के-सब, नई कविता और विशेषतः ‘पल्लव’ की भूमिका से चिढ़े हुए थे तथा नए कवियों क अविनीत स्वभाव एवं अहंकारी व्यक्तित्व से घबड़ाते थे। कारण कुछ अंशों में मनोवैज्ञानिक भी था। छायावाद के आन्दोलन ने एक नए प्रकार की कविता को ही जन्म नहीं दिया था, प्रत्युत्, उसने कवि भी नए व्यक्तिवाले ही पैदा किए थे। छायावाद से पहलेवाली कविता जिस प्रकार समूह के सामने बोधगम्य और आदर में झुकी हुई थी, उसी प्रकार, उसके कवि भी विनीत और सुशील थे। किन्तु, अब जो विद्रोह आरम्भ हुआ था उसकी उद्दंडता कविता तक ही सीमित नहीं थी, अपितु, उसका आभास, कवियों के व्यक्तित्व में भी मिलता था।

छायावादी कवि भाषा, भाव, शैली और रहन-सहन की परम्परा, सब कुछ के खिलाफ बगावत करते हुए आए थे और स्वाभाविक ही था कि उनकी बातचीत, भाषण और काव्य-चर्चा, पुस्तक की भूमिका, यहाँ तक कि मित्रों के साथ पत्र-व्यवहार में भी वैयक्तिक अहंकार की दुर्विनीत चिनगारियाँ अनायास ही चमक उठें। कुछ मूर्धन्य कवियों को छोड़कर, उनमें प्रायः सब-के-सब अत्यन्त भावुक, कोमलताप्रिय, समादरेच्छुक और सबसे पहले अपने आपको प्यार करनेवाले जीव थे। उनके आगमन के साथ हिन्दी में, शायद, पहले-पहल, कवियों की एक अलग जाति बनने लगी और लक्षण ये प्रकट होने लगे कि हिन्दी के कवि कदाचित् दूर से ही पहचाने जाने के योग्य हो जाएँगे। लम्बे केश, निर्लोम आकृति, औसत से अधिक लम्बे कपड़े, स्त्रैण प्रसाधनों की ओर आसक्ति, कृत्रिम मुखमुद्रा, बातचीत में बनावट, साधारण बातों में भी साहित्यिक भाषा का प्रयोग, जनसाधारण की औसत रुचि एवं विश्वासों की उपेक्षा, दूसरों की मान्यताओं का अनावश्यक विरोध, आदि कितने ही अनुभवों में उनकी वैयक्तिकता प्रत्यक्ष होने लगी और समाज में एक धारणा होने लगी कि औसत लोगों के झुंड में ये कवि नहीं खप सकते। बात भी कुछ ऐसी ही थी, क्योंकि, इनमें से अधिकांश कवि अपने प्रशंसकों के ही बीच रहना पसन्द करते थे, तटस्थ तथा अधिक प्रशंसा नहीं करनेवाले लोगों की संगति इन्हें अप्रिय और असह्य थी।

आज छायावाद-युग की कविता अपने कवियों के व्यक्तित्व से भिन्न हो गई है। अब उसके कवि भी वयशाली और विनीत हो गए हैं। इसके सिवा, उनकी विद्या-बुद्धि एवं अध्यवसाय की भी काफी जाँच हो चुकी है और समाज उनका आदर करने लगा है। किन्तु, उस समय अविनीत वैयक्तिकता से पूर्ण उनके व्यक्तित्व और तदनुरूप उनके काव्य को देखकर जनता बहुत ही रूष्ट हो गई थी तथा अपने कवियों के अहंकार का जवाब उन्हें अनेक प्रकार से चिढ़ाकर देने लगी थी। पंडित महावीर प्रदास द्विवेदी ने नए कवियों की भाषा-सम्बन्धी हास्यास्पद भूलों का जिक्र बड़ी ही कठोरता से किया था औऱ यह उपदेश दिया था कि कविगण कविता आरम्भ करने से पूर्व, कम-से-कम, सिद्धान्त-कौमुदी को तो भली-भाँति पढ़ लिया करें।

कुछ प्रौढ़ साहित्यिकों एवं जनता के विशाल समुदाय ने छायावादी कवियों का प्रतीकात्मक नाम ‘अनन्त की ओरजी’, ‘लम्बे बालजी’ तथा ‘छायावादीजी’ रख दिया था। नए साहित्यकारों का क्रोध जनता की ओर कम मुड़ता था। इसके मूल में यह भाव था कि जनता तो, अन्ततः, साहित्य के नेताओं का ही अनुसरण करती है। हमारी उपेक्षा और अनादर के प्रधान कारण ये सिंहासनस्थ वृद्ध साहित्यिक ही हैं। अतएव अपने निबन्धों में वे हृदय का सारा विष इन वयवान् साहित्यकारों पर ही उँड़ेलते थे। कलकत्ते के ‘नारायण’ में श्री गुलाबरत्नजी वाजपेयी ‘गुलाब’ ने लिखा था– सो जाओ हे वृद्ध विकल !

इस प्रचंड अन्धड़ के सम्मुख
ग्रीष्मकाल की वायु विफल।

बूढ़े भी चुप नहीं थे। उनके सबसे मुखर प्रतिनिधि काशी के लाला भगवानदीनजी तथा मुंगेर के पंडित जगन्नाथ प्रसादजी चतुर्वेदी थे। चतुर्वेदीजी तो, स्वभावतः ही, हास्यप्रिय जीव थे, छायावाद ने उन्हें हास्य-सृष्टि के कितने ही नवीन विषय बता दिए थे। वे सभा-सम्मेलनों में निरालाजी के छन्दों की पैरोडी बनाकर लोगों को हँसाया करते थे और बात-बात में छायावाद पर कोई-न-कोई ताना कसते ही रहते थे।
छायावाद पर दो व्यंग्य ‘सुधा’ में भी छपे थे। एक का आरम्भ था–

किसने छायावाद चलाया, किसकी है यह माया ?
हिन्दी-भाषा में यह न्यारा शब्द कहाँ से आया ?

दूसरे में ये पंक्तियाँ थीं–

मत पीछे पड़ो बंगाली कवियों के तुम,
कवि-सम्राट हों या बाप हों सम्राटों के।

बूढ़ो को कुछ अधिक लिखना नहीं पड़ा। एक तो इस मजाक में वे कलम लेकर उतरने में शरमाते थे; दूसरे, सारा श्रोता-समुदाय ही उसके साथ था। जो काम लिखकर नहीं कर सकते थे, वही काम, बड़ी ही सुगमता के साथ, जनता कवियों को चिढ़ाकर कर रही थी। समाज में अव्यावहारिक एवं कृत्रिम बातें बोलनेवाला मनुष्य का नाम ही ‘छायावादी’ पड़ गया था और काफी गम्भीर लोग भी कभी-कभी ऐसा मजाक कर बैठते थे। कितने ही छायावादी कवियों के सम्बन्ध में तरह-तरह की गप्पें उड़ाई जाती थीं और लोग उनके सम्बन्ध में मनगढ़न्त कथाएँ कहने में रस पाते थे।

एक बार ‘सुधा’ में ही पाँच प्रकार के कवियों के कार्टून छपे थे जिनमें से क्षीण-काय, दीर्घकेश, पल्लवधारी एक उद्ग्रीव ‘अनन्त की ओरजी’ की भी तसवीर थी। एक-दूसरे कार्टून में ‘भग्नतरी’ पर चढ़े हुए एक बोतलधारी कविजी थे जो ‘उस पार’ पहुँचने के लिए ‘शून्य’ से कुछ निवेदन करने की मुद्रा में विराजमान थे।

अज्ञात-कुल-शीलता का भ्रम


द्विवेदी-युग से आती हुई विनयशील इतिवृत्तात्मकता के मुकाबिले में अपने अहंकारी व्यक्तित्व एवं धुँधली वाणी के साथ अचानक उठ खड़ा होनेवाला छायावाद हिन्दी-भाषी जनता को अजनबी-सा लगा। चारों ओर से आवाज आई, ‘‘अज्ञात-कुल-शीलस्य वासो देयो न कस्यचित्।’’ किसी ने कहा, यह रवीन्द्रनाथ का अनुकरण है; किसी ने कहा, यह अंग्रेजी के रोमांटिक कवियों का प्रभाव है; किसी-किसी के कहने का यह भी अभिप्राय था कि साहित्य रहस्यवादी साधु बनकर जनता को ठगना चाहता है।

जब से हिन्दी में प्रगतिवाद के नाम पर एक नए आन्दोलन का आविर्भाव हुआ है, तब से कुछ लोग यह भी कहने लगे हैं कि छायावाद जीवन से पलायनवाद का रूपक था; आकाश को क्रान्ति के बादलों से आच्छन्न देखकर छायावादी कवि डरकर जीवन से कल्पना के देश में भाग गए थे। छायावाद की स्थापना के समय, उसके समर्थन जो दलीलें दी जाती थीं उनमें भी कभी-कभी राजनीतिक दुरवस्थाओं की चर्चा रहती थी; आलोचक, प्रायः ही, कहा करते थे कि वर्तमान जीवन दुःख और निराशा से परिव्याप्त है; यह उसी का प्रतिबिम्ब कविता में निराशा, असन्तोष और दुःखानुभूति बनकर बोल रहा है।

इसके सिवा कुछ ऐसी बातें भी कही जाती थीं जिनसे छायावाद और भी दुर्बोध हो जाता था। उदाहरणार्थ, कुछ लोग कहते थे कि ‘‘यह ‘सान्त’ का ‘अनन्त’ से मिलने का प्रयास है; कवि प्रकृति के कण-कण में एक अज्ञात सत्ता का बिम्ब देख रहा है; विन्दु सिन्धु से मिलने को व्यग्र है; यह दुःखानुभूति आध्यात्मिक विरह की है और व्यष्टि समष्टि में समा जाने को बेचैन हो रही है।’’ स्पष्ट ही, ये लक्षण रहस्यवादी कवि के होने चाहिए थे; और छायावाद के रहस्यवादी दृष्टिकोण को कुछ लोगों ने प्रमुखता दी भी। किन्तु, प्रत्येक आलोचक कलम उठाकर गम्भीर होते ही कह देता था कि रहस्यवाद इस कविता की कोई बड़ी विशेषता नहीं है। छायावाद के


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