पंचतंत्र - नरेन्द्र शर्मा Panchatantra - Hindi book by - Narendra Sharma
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पंचतंत्र

नरेन्द्र शर्मा

प्रकाशक : मनोज पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :187
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7559
आईएसबीएन :978-81-8133-493

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‘पंचतंत्र’ विश्व कथा-साहित्य को संस्कृत भाषा की अनूठी देन है। शिक्षाशास्त्र में इसकी भूमिका को पूरे विश्व ने सराहा है, तभी तो विश्व की बीस से भी अधिक भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ है।

Panchatantra - A Hindi Book - by Narendra Sharma

‘पंचतंत्र’ विश्व कथा-साहित्य को संस्कृत भाषा की अनूठी देन है। शिक्षाशास्त्र में इसकी भूमिका को पूरे विश्व ने सराहा है, तभी तो विश्व की बीस से भी अधिक भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ है।

विष्णु शर्मा, जो इस ग्रंथ के रचयिता हैं, अपने प्रतिज्ञा-वाक्य में कहते हैं–‘कथाओं के बहाने मैं नीति के गूढ़ रहस्यों को कहूँगा।’ व्यवहार में भी इस सत्य की पुष्टि होती है। दूसरे का अहित किए बिना अपना काम कैसे संवारा जाएं और कैसे उसे सीख दी जाए, जो दूसरों का अहिता करता है–ऐसी कुशलता प्राप्त करने के कई सूत्र बिखरे हुए हैं इस पुस्तक से।
 
मूल ग्रंथ को आधार बनाकर विभिन्न कथाओं को सरल-सुगम भाषा में ऐसे पिरोया गया है कि आपको लगेगा ही नहीं कि आप किसी ग्रंथ का रूपांतर पढ़ रहे हैं।

पाप और पुण्य

‘‘अरे मित्र–आओ हम से डरो मत...हम घर आए मेहमान की सेवा करना अपना धर्म समझते हैं। हम इस जंगल के राजा हैं...तुम यहां निर्भय होकर रहो...कोई तुम्हारी ओर आंख उठाकर भी नहीं देखेगा।’’
मगर सामने खड़े शेर को देखकर तो जैसे ऊंट की जान ही सूखी जा रही थी। वह सोच रहा था कि क्या यह सच कह रहा है ?

मधुपुर का यह जंगल इस क्षेत्र का सबसे बड़ा जंगल माना जाता था। अक्सर लोग इस जंगल को पार करते हुए डरते थे क्योंकि इसमें कई किस्म के खूनी जानवर रहते थे, जिनमें अधिकांश नरभक्षी थे।

इसी जंगल में एक शेर भी रहता था, जिसके तीन स्वार्थी मित्र भी थे–एक गीदड़, एक भेड़िया और एक कौआ, इन तीनों ने शेर से इसलिए मित्रता की थी कि शेर जंगल का राजा था, उससे मित्रता करते से कोई शत्रु उनकी ओर आंख उठाकर भी नहीं देख सकता था। यही कारण था कि वे तीनों शेर की हर बात मानते थे, उसकी हां में हां मिलाने के लिए तैयार रहते।

एक बार–एक ऊंट अपने साथियों से बिछुड़कर इस जंगल में आ गया, इस घने जंगल से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा था, पीठ पर बोझा और साथ में घना जंगल। ऊंट बेचारे का तो बुरा हाल हो रहा था वह सोच रहा था कि कहां जाए, किधर जाए, दूर-दूर तक उसे कोई नजर नहीं आ रहा था।

इत्तफाक की बात थी कि उस ऊंट पर शेर के इन तीनों मित्रों की नजर पड़ गई। गीदड़ तो चालाकी और होशियारी में अपना जवाब नहीं रखता, उसने जैसे ही इस मोटे-ताजे ऊंट को जंगल में अकेला भटकते देखा तो उसके मुंह में पानी भर आया। उसने भेड़िये और कौए से कहा, ‘‘दोस्तों ! यदि शेर इस ऊंट का मार दे तो हम कई दिनों तक आनन्द से बैठकर अपना पेट भर सकते हैं। कितने दिन आराम से कट जायेंगे, हमें कहीं भी शिकार की तलाश में नहीं भटकना पड़ेगा।’’

भेड़िये और कौए ने मिलकर गीदड़ की हां में हां मिलाई और उसकी बुद्धि की प्रशंसा करते हुए बोले–‘‘वाह...वाह...दोस्त, क्या योजना बनाई है, इस परदेसी ऊंट को तो शेर दो मिनट में मार गिराएगा, वह इसका सारा मांस कहां खा पाएगा, बाकी सब माल तो अपना ही होगा।’’

गीदड़, भेड़िया और कौआ खूब कुटिलता से हंसने लगे, उन तीनों के मन में कूट-कूटकर पाप भरा हुआ था। सीधा-सादा ऊंट बेचारा, क्या जाने कि इस संसार में लोग कैसे-कैसे पाप करते हैं। तीनों षड्यंत्रकारी मिलकर अपने मित्र शेर के पास पहुंचे और बोले–‘‘आज हम आपके लिए एक शुभ समाचार लेकर आए हैं।’’
‘‘क्या समाचार है मित्रों, शीघ्र बताओ।’’

‘‘महाराजा ! हमारे जंगल में एक बहुत बड़ा ऊंट आया हुआ है। शायद वह काफिले बुछुड़ गया है, और अपने साथियों के बिना भटकता फिर रहा है। यदि आप उसका शिकार कर लें तो आनन्द आ जाए। आह ! क्या मांस है उसके शरीर पर, मांस से भरा पड़ा है उसके शरीर, देखा जाए तो अपने जंगल से मांस से भरे शरीर वाले जानवर हैं ही कहां ? केवल हाथियों के शरीर मांस से भरे रहते हैं, मगर हाथी अकेले आते ही कहां हैं, जब भी आते हैं, झुंड के झुंड, उन्हें मारना कोई सरल बात नहीं।’’

शेर ने उन तीनों की बात सुनी और फिर अपनी मूछों को हिलाते हुए गुर्राया–‘‘ओ मूर्खों ! क्या तुम यह नहीं जानते कि हम इस जंगल के राजा हैं। राजा का धर्म है न्याय करना, पापा और पुण्य के दोषों तथा गुणों का विचार करके पापी को सजा देना, पूरी प्रजा को सम्मान की दृष्टि से देखना, मैं भला अपने राज्य में आए उस ऊंट की हत्या कैसे कर सकता हूं ? घर आए किसी भी मेहमान की हत्या करना पाप है। इसलिए तुम जाकर इस मेहमान को सम्मान के साथ हमारे पास लाओ।’’

शेर की बात सुनकर उन तीनों को बहुत दुःख हुआ, उन तीनों ने भविष्य के इतने सपने देखे थे, खाने का कई दिनों का प्रबंध, ऊंट का मांस...सब कुछ इस शेर ने चौपट कर दिया था। यह कैसा मित्र था जो पाप और पुण्य के चक्कर में पड़कर मित्रता को भूल गया...वे मजबूर थे, क्योंकि उन्हें पता था कि शेर की दोस्ती छोड़ते ही उन्हें कोई नहीं पूछेगा, मरते क्या न करते वाली बात थी।

अब तीनों मिलकर उस भटकते हुए ऊंट के पास पहुंचे और उसे अपने मित्र तथा जंगल के राजा की ओर से मित्रता का संदेश देते हुए कहा कि हमारे राजा ने आपको घर बुलाया है, आज रात आप हमारे राजा के घर ही भोजन करेंगे।

ऊंट तो बेचारा इस जंगल में कब का भटक रहा था, थकान के कारण उसका बुरा हाल हो रहा था, जैसे ही उसने यह सुना कि शेर ने उसे अपने घर पर बुलाया है तो वह डर के मारे कांप उठा, क्योंकि उसे पता था कि शेर मांसाहारी जानवर है और जंगल का राजा भी, उसके सामने जाकर तो कोई भी नहीं बच सकता।
उसकी आंखों में मौत के साये थिरकने लगे।

मौत उसके चारों ओर नाच रही थी। शेर की बात न मानना भी मौत है, मानने में भी मौत का डर है, यदि इन दोनों से बच निकलने में वह सफल भी हो गया तो इस जंगल में ही भटकता फिरेगा और कोई भी जंगली जानवर उसे मारकर खा जाएगा।

इसलिए उसने निर्णय कर लिया कि वह शेर के निमंत्रण को स्वीकार कर लेगा, आगे जो होगा देखा जाएगा। मन ही मन में यह सब सोचता हुआ ऊंट शेर के पास पहुंच गया, उसका मन अब भी अंदर से डरा हुआ था, वह बार-बार सोच रहा था कि कहां यह खूनी जंगल का राजा शेर और कहां मैं ऊंट...।

शेर ने घर आए मेहमान का मित्र की भांति स्वागत किया, तो ऊंट का भी भय जाता रहा और उसने अपनी शरण में पनाह देने का उसे बहुत-बहुत धन्यवाद दिया, शेर ने हंसकर कहा, ‘‘मित्र ! तुम बहुत दूर से आने के कारण काफी थके हुए लगते हो, इसलिए मेरा गुफा में ही आराम कर लो, मैं और मेरे साथी तुम्हारी लिए भोजन का प्रबंध करने जाते हैं।’’

समय बहुत बलवान है। किस पल क्या हो जाए कुछ पता नहीं चलता, शेर शिकार के लिए निकला तो गीदड़, तो भेड़िया और कौआ भी उस के साथ थे, वे तीनों शेर के पीछे-पीछे चल रहे थे, शेर सबसे आगे थे।

तभी सामने से एक बहुत ही मोटा-ताजा खूनी किस्म का मस्त हाथी आ निकला। शेर को शिकार की तलाश थी। वह हाथी को देखते ही पूरी ताकत से दहाड़ा।
हाथी डरा नहीं, बल्कि वह लड़ने के लिए तैयार हो गया और देखते ही देखते दोनों ही एक-दूसरे पर टूट पड़े।

खूनी जानवरों का युद्ध भी देखने योग्य था, अन्त में दोनों लहूलुहान हो गए। हाथी तो अपनी जान बचाकर भाग निकला और शेर बुरी तरह घायल हो गया, उसके दांत भी हिलने लगे थे। जख्मी शेर अब कहां शिकार कर सकता था, उसके मित्र तो उससे केवल खाने की ही मित्रता रखते थे, उन्होंने एक दिन शेर के पास जाकर कहा, ‘‘हे जंगल के राजा ! आप भूखे क्यों मरते हैं। देखो, हमारे पास यह ऊंट है, ऐसे अवसर पर इसे ही मारकर खा लें, जब तक हम इससे पेट भरेंगे, तब तक आप भी ठीक हो जाएंगे।’’

‘‘नहीं...नहीं...मैं घर आए मेहमान की हत्या नहीं कर सकता, घर आया मेहमान तो ईश्वर का रूप होता है, मैं भूखा मर जाऊंगा, परन्तु यह पाप नहीं करूंगा।’’

गीदड़ ने जब देखा कि शेर उनकी बात मानने नावा नहीं है और पाप और पुण्य के चक्कर में फंस गया है, तो उसने सोचा कि कोई नई चाल चलनी पड़ेगी, जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे, यही सोचकर उसने अपने दूसरे शैतान मित्र कौए के कान में अपने मन की बात कही, तो उसकी इस चाल को सुनकर वह खुशी से उछल पड़ा। तब कौए ने भेड़िये को भी गीदड़ की सारी चाल बता दी।

फिर क्या था, तीनों मिलकर ऊंट के पास पहुंचे और गीदड़ ने बड़े प्यार से प्रणाम करते हुए उसकी कुशलता पूछी।
‘‘मैं तो आप लोगों और अपने मित्र की कृपा से बहुत प्रसन्न हूँ, आप लोग अपनी कहो, कैसे हो ?’’

‘‘भाई ! हमारा हाल मत पूछो, हम तो बहुत बड़ी मुसीबत में फंसे हुए हैं। हमारा जीना ही कठिन हो रहा है, शायद एक-दो दिन में ही हम और हमारा राजा शेर, हम सब मर जाएंगे।’’

‘‘क्यों...ऐसी कौन-सी बात हो गई कि तुम सब मर जाओगे ? नहीं...नहीं, मित्र ऐसा नहीं होगा, मैंने आपका नमक खाया है, मैं शेर के बचाने के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार हूँ।’’

‘‘देखो मित्र, शेर जख्मी भी है और भूखा भी, तुम तो जानते हो कि मांस के बिना उसका पेट नहीं भरेगा, वह तुम्हें इसलिए नहीं मारेगा, क्योंकि तुम उसके मेहमान हो, हां यदि तुम स्वयं शेर के पास जाकर यह कह दो कि मैं खुशी से अपने आपको तुम्हारे हवाले करता हूं, ऐसे अवसर पर दोस्त ही दोस्त के काम आता है। तो शेर शायद मान जाए, लेकिन एक शर्त यह भी है...।’’
‘‘क्या ?’’

‘‘तुम से पहले हम शेर को यह कहेंगे कि वह हमें खाकर अपना पेट भर ले, यदि इस शेर इस बात को मान गया तो तुम्हें कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी, तुम्हारी जान बच जाएगी, फिर हमारे बाद तुम शेर की सेवा करोगे, बोलो यह शर्त मंजूर है ?’’

‘‘हां दोस्तों, मुझे मंजूर है। मैं अपने मित्रों के साथ हूं, उनकी हर बात मानने को तैयार हूं। तुम लोगों ने ही तो मुझे सहारा देकर मेरी जान बचाई है। अब यदि मैं इस जान को अपने मित्र पर कुर्बान कर दूं तो मुझे इसका कोई दुःख नहीं होगा।’’

ऊंट की यह बात सुनकर तीनों बहुत खुश हुए। गीदड़ ने भेड़िए को आंख से इशारा करके धीरे से कहा–‘फंस गया मूर्ख।’
अब चारों इकट्ठे होकर जख्मी शेर के पास पहुँचे, शेर बेचारा गुफा के अंदर भूखा-प्यासा पड़ा था, शरीर पर इतने घाव थे कि दर्द के मारे उसका बुरा हाल हो रहा था।

‘‘आओ मेरे मित्रो, आओ, पहले यह बताओ कि हमारे भोजन का कोई प्रबंध हुआ या नहीं ?’’
‘‘नहीं महाराज ! हमें इस बात का बहुत दुःख है कि हम सब मिलकर भी आपके खाने का प्रबन्ध नहीं कर सके, लेकिन अब हम आपको भूखा नहीं मरने देंगे...।’’ कौए ने आगे बढ़कर कहा।

‘‘लेकिन यह कैसे संभव हो सकता है ?’’ शेर ने कौए की ओर देख कर पूछा।
‘‘महाराज ! आप मुझे खाकर अपनी भूख मिटा लें, इससे अच्छी बात और क्या होगी कि मेरा यह तुच्छ शरीर आपके किसी काम आ जाए।’’

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