काला सूरज - मोहन थानवी Kala Suraj - Hindi book by - Mohan Thanvi
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काला सूरज

मोहन थानवी

प्रकाशक : ऋचा इण्डिया पब्लिशर्स प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 81-85277-16-8 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :80 पुस्तक क्रमांक : 7561

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उपन्यास के कथानक में संयोग है, इत्तिफाक हैं, बिछड़ों का मिलन है जो नाटकीय लगते हैं परन्तु क्या जिन्दगी कम नाटकीय होती है...

Kala Suraj - A Hindi Book - by Mohan Thanvi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मोहन थानवी ने बीकानेर में पहला देवनागरी सिन्धी उपन्यास ‘करतार सिंह’ लिखकर अपनी पहचान को विस्तार दिया। थानवी का हिन्दी में यह पहला उपन्यास आपके हाथों में है। ‘करतार सिंह’ में प्रकाशित थानवी के लेखन के प्रति साहित्यकारों की सम्मतियों का हिन्दी अनुवाद :
समाज में बहुत-सी बातें ऐसी हैं जिन्हें हम एक-दूसरे को नहीं कहते। साहित्य-सृजन के माध्यम से यह काम होता है तो समाज और दूसरे लोग भी एक शख्स की दूसरी शख्सियतों से रूप-ब-रू हो रहे हैं। मोहन थानवी के लेखन मैं ऐसी ही बातें हैं।

–राधाकृष्ण चांदवाणी

लेखक ने न खुद भोगा है और न ही उसके किसी नजदीकी का भोगा हुआ है। परायों और अपनों से सुनकर, अपने पात्रों के चेहरों पर उभरी लकीरों को पढ़ा, वाणी में छुपी सिसकियों को पहचाना और उनकी जुंबिश को अपनी जुंबिश बना लिया। इस तरह किसी और का देखा-भोगा लेखक का अपना अनुभव बन गया। यह मोहन थानवी के अंदर बैठे संवेदनाओं से भरपूर लेखक का अक्स जाहिर करता है।

–भगवान अटलाणी

उपन्यास के कथानक में संयोग है, इत्तिफाक हैं, बिछड़ों का मिलन है जो नाटकीय लगते हैं परन्तु क्या जिन्दगी कम नाटकीय होती है ? लेकिन हां, यह मांग गैरवाजिब नहीं है कि हकीकतनिगारी पर पाठक का ऐतबार कायम रहे। ऐसा प्रयत्न जागरूक रचनाकार का होना चाहिए। भाषा की जानकारी और उसका असरकारी सही इस्तेमाल भी रचना की ताकत होती है, रचना को बेहतर बनाती है। एक पत्रकार होने के नाते मोहन थानवी के जेहन में निश्चय ही ये बातें होंगी और अभ्यास से यह ताकत वे हासिल करेंगे, इसमें शक नहीं है।

–हरीश करमचंदाणी

काला सूरज


‘अरे कृष्ण ने तो अर्जुन को गीता-ज्ञान दिया था। आज अर्जुन मिलते कहां हैं। जिसे देखो वही कृष्ण है। ज्ञान देने वाला। अर्जुन कोई बनना नहीं चाहता।’

बिल्लो की नाराजगी जाहिर करने की यह अपनी स्टाइल थी। रूलिंग पार्टी का होते हुए भी वह स्वयं को उपेक्षित महसूस करता था। यूं समाज में उसकी छवि स्वच्छ है लोकिन कुछ लोग उसकी वास्तविकता से भी परिचित हैं। उसे विधानसभा चुनावों में राज्य भर के अन्य विजयी विधायकों की तुलना में सर्वाधिक मत मिले थे लेकिन पार्टी आलाकमान ने मंत्रिमंडल में बिल्लो को स्थान नहीं दिया था। घाव पर नमक यह कि मंत्रिमंडल से बाहर रहकर जनता की सेवा करने संबंधी निर्देश दिए थे। ये निर्देश भी मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक बयान जारी कर उस तक पहुँचाए थे। इससे वह तिलमिला गया था। यही थी बिल्लो की नाराजगी की वजह।

हालांकि पार्टी आलाकमान ने यह सब उसकी छवि के दूसरे पहलू को ध्यान में रखते हुए अपने हित में ही किया था क्योंकि उसे टिकट देकर विजयी बनाने के बाद पार्टी को विपक्षियों के तीक्ष्ण व्यंग्य-बाणों से छलनी होने पड़ रहा था। विपक्षियों में ऐसे लोग भी थे जिनका बिल्लो के काले कारनामों से सीधा वास्ता रहा था। पार्टी आलाकमान को तो यह निश्चित लग रहा था कि बिल्लो अब भी राजनीतिक दृष्टि से न सही, अपनी गतिविधियों के चलते विपक्ष के अनेकानेक नेताओं से संबंध रखता था।

बिल्लो यानी बालाराम। इस समय वह परोक्ष रूप से विपक्ष के रूलिंग पार्टी के विरुद्ध जारी बयानों को श्रीकृष्ण के उपदेश बताता हुआ बयानबाजी करने वालों को लताड़ रहा था। परोक्ष में विपक्ष के बयानों को तोड़ स्वरूप मानों शब्दों के बाण चलाकर लोगों को अपने और अपनी पार्टी के पक्ष में कर रहा था मगर अपरोक्ष रूप से आलाकमान को घायल करना चाहता था। महज सत्ता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए।

मंच पर आकर्षण का केन्द्र बने बिल्लो ने समारोह में आए लोगों से कहा–विपक्षी हमें ज्ञान दे रहे हैं कि अकाल राहत कार्य तरतीब से किए जाएं। मैं उनसे पूछता हूं–अरे जब आप सत्ता में थे तब आपकी तरतीब कहां चली गई थी। दोस्तों, आप लोगों ने मुझे चुनकर विधानसभा में भेजा। राज्य में सबसे अधिक वोटों से जीतने वाला बनाया।
यहां वह अपनी बात कहने से भी चूका नहीं। हां, उसका तरीका दूसरों से भिन्न भी नहीं था। उसने कहा–मुझे मंत्री बनने की चाह नहीं है। मैं तो आपकी सेवा करना चाहता हूं।

समाज को अपनी बातों के लच्छों में लेना ऐसे लोगों को बखूबी आता है। इसी खूबी के दम पर ही तो ये लोग राज-सुख भोगते हैं। बिल्लो भी लोगों को ऐसे लच्छों में लपेटकर वहां एक पंथ दो काज कर रहा था। अपने समर्थन में लोगों को मंत्री बनाने की मांग की आवाज बुलंद करने के लिए उकसा रहा था तो आलाकमान के प्रति अपनी रुष्टता को भी सार्वजनिक कर रहा था। विपक्षियों का हवाला देता अपनी भड़ास निकाल रहा था। राजनीतिक चालों से वाकिफ नहीं बल्कि बिल्लो स्वयं इस क्षेत्र का शातिर है।

उसने घाघ राजनीतिज्ञ की तरह रटेरटाए लफ्जों को चाशनी में डुबोते कहा–मैं तो पार्टी का अदना-सा सिपाही हूँ। आप सभी जानते हैं, मुझे राजनीति करनी नहीं आती। मुझे जैसा कहा जाएगा करूंगा। आपकी समस्याओं को मैं बिना कुर्सी को भी हल कराने की कोशिश करूंगा।
वह यहाँ भी अपनी चाटुकारिता को बयां करने से रह नहीं पाया। बोला–कुर्सी नहीं है तो क्या हुआ। पार्टी मेरे साथ है। आप सभी मेरे साथ हैं। बस, कुछ समय अधिक लग सकता है। वादा करता हूं, आपके काम जरूर होंगे।

तालियों से समारोह स्थल गूंज उठा।
बिल्लो ने मुस्कराकर समीप खड़े अपने प्रिय भाई तोलाराम को देखा जो स्वयं उसे ही निहार रहा था। यह अवसर था अल्पसंख्यक वर्ग के लिए कच्ची बस्ती में बने सामुदायिक केन्द्र के लोकार्पण समारोह का।

कपिल बच्चन दैनिक समाचार पत्र ‘सियासत’ के रिपोर्टर की हैसियत से अपने संपादकजी के निर्देश पर वहां कवरेज के लिए मौजूद थे। कपिल बच्चन क्राइम रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है। क्राइम रिपोर्टिंग करते हुए उसे एक साल से अधिक समय हो चुका है और लगभग तभी से वह बिल्लो के कुछ ऐसे आपराधिक कारनामों को जानता है जो अखबार में छपने से रह गए। इसकी वजह रही बिल्लो के विरुद्ध पुख्ता सबूत न होना। हालांकि जितनी जानकारी उपलब्ध हुई उसे ज्यों का त्यों छापा गया लेकिन वह उसके विरुद्ध कार्यवाही के लिए पर्याप्त सिद्ध नहीं हो सकी। इससे कपिल को भ्रम भी हुआ कि कहीं उसका अखबार इस मामले में गफलत में रहकर उसी के विश्वास पर गलत सूचनाएँ तो नहीं छाप रहा। लेकिन कपिल को कई बार स्वयं पुलिस वालों ने बिल्लो के बारे में ऐसी बातें बताई और अन्य लोगों से भी उसके बारे में ऐसी ही बातें सुनी तो उसे अपनी धारणा बदलनी पड़ी। उसने एक-दो बाल पुलिस अधिकारियों से इस बारे में बात भी की थी।

अधिकारियों का तर्क था कि किसी के बारे में समाज विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहने या आपराधिक कार्यों में संलग्न रहने की अपुष्ट जानकारी होना अलग बात है और उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना एकदम अलग बात। इसके लिए सबूत चाहिए। कपिल को लालफीताशाही में बंधे ऐसे अफसरों के तर्क गलत भी नहीं लगे। फिर पिछले दो दशक में बिल्लो ने अपनी छवि समाजसेवी की बना ली थी। समाज के एक वर्ग विशेष के अधिकांश लोग उसे अपने लिए रॉबिन हुड सरीखा समझते थे जबकि हकीकत जानने वाले गिनती के ही लोग थे। उस गिनती के लोगों में भी अधिकांश लोग परोक्ष या अपरोक्ष रूप से बिल्लो के सहयोगी थे।

कपिल को मालूम है कि देश में बोफोर्स, चारा, तहलका जैसे कांडों के बाद और न जाने कितने कांड ऐसे हैं जिनको राजनीतिक हलकों ने मजह राजनीतिक मुद्दा बनाकर रख दिया। ऐसे में बिल्लो जैसे व्यक्तित्व समाज पर अपना साया गहरा रहे हों तो कोई बड़ी बात नहीं। फिर उसे उजागर करने वालों को अपना भविष्य भी अंधकारमय दिखने लगता है।
कपिल ने समारोह में इधर-उधर नजर दौड़ाई, दो-ढाई सौ लोगों का हुजूम वहां था। शाम का समय और अवकाश का दिन। ऐसे समारोहों के अभ्यस्त बना दिए गए अल्पसंख्यकों को मालूम था, बिल्लो के जाते ही लोकार्पित सामुदायिक केन्द्र मदिरालय में परिवर्तित हो जाएगा। इसलिए उन्हें जितना बेसब्री से बिल्लो के आने का इंतजार था अब उतनी ही अधीरता से वे उसके वहां से जाने की प्रतीक्षा वे कर रहे थे।

वहां का माहौल देखता और बिल्लो के भाषण में कृष्ण के वर्णन को याद करता कपिल सोच रहा था, महाभारत को पांच हजार साल से अधिक समय बीत गया लोकिन समाज कृष्ण-अर्जुन संवाद में उलझा हुआ दिखता है। व्यक्ति-व्यक्ति का अंतर्द्वन्द्व, भीतर हो रहा महाभारत कभी खत्म नहीं होगा। कृष्ण-अर्जुन को ज्ञान देता रहेगा। अर्जुन कोई बनना नहीं चाहता इसलिए निशाना साधने की बात ही बेतुकी लगने लगी है। निशाने तो कई है, साधक नहीं। यह भी अचंभे की ही बात है कि कोई विदेशी हमें महाभारत की प्रामाणिकता बताता है, हम मानते हैं। हम हैं कि बुक शैल्फ में धूल से अटी ग्रंथावली को अपनी विरासत बताकर ही गौरवान्वित हो रहे हैं। कपिल को लगा, इन लोगों को तो अभी बिल्लो के जाने की प्रतीक्षा है ताकि वे कांच की बोतल में नाचती रंगीनी हलक में उंडेल सकें या थैली में भरे तिलस्म के अपने अंदर भर लें ताकि वास्तविकता में भोग रहे कष्टों को भूल सुखों की अनुभूति में जीएं। उसे लगा उन लोगों के पीने-पिलाने का दौर शुरू होने से पहले ही वह कई पैग गटक गया है। उसने सिर झटका और इधप-उधर नजर दौड़ाई।

बिल्लो के भाषण के बाद मंच के कार्यकर्ता मिठाई बांट रहे थे। बिल्लो के संरक्षण में चलने वाले निजी स्थानीय चैनल के कर्ताधर्ता कालू भाई समारोह की कवरेज करने में जुटे थे। कालू भाई को कैमरा की आंख से झांकते देख कपिल को न जाने क्यों कुढ़न-सी हुई। ऐसे चैनल ही तो जनता को गुमराह करने वाले बिल्लो सरीखे कंसों के बयानों को मिठास से भरी ताजा महकती जलेबी की मानिंद परोसते हैं। अर्जुन बनने का उपदेश देने वाले बिल्लो जैसे लोगों की छवि को स्वच्छ और प्रभावी बनाने में ऐसे चैनलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यह अलग बात है कि ऐसे चैनलों का संचालन ही अपरोक्ष रूप से अपने ही संरक्षण में बिल्लो सरीखे लोग करते हैं।

केवल इलेक्ट्रोनिक्स मीडिया ही नहीं बल्कि प्रिंट मीडिया में भी बिल्लो जैसे लोगों ने अपने पैर पसारने की कोशिशें की हैं और अपने लोगों को समाज को गुमराह करने क लिए अखबारनवीस की पदली दिलाने में भी वे पीछे नहीं रहना चाहते। स्मारिकाओं, विज्ञान पुस्तिकाओं और वर्ग विशेष के लिए साप्ताहिक, पाक्षित या मासिक पत्र के नाम पर अपने प्रशस्ति गान के लिए अपने ही खास लोगों को ये समाजकंटक पत्रकार का दर्जा दिलाते हैं। ऐसे ही कुछ कथित अखबारनवीसों को ऐसे कामों में महारथी बनाने की मुहिम भी बिल्लो यदाकदा चलता है। इसके लिए उसने प्रवक्ता नियुक्त कर अखबारों में बयानबाजी करने और परिशिष्ट छपवाकर अपना पशस्तिगान करने का रास्ता निकाल लिया है।

कपिल ने शुक्र मनाया कि बेरोजगारी से जूझते हुए उसने समाज-विरोधी कामों से किनारा ही रखा वरना न जाने वह आज किस दलदल में होता। बेरोजगारों का दर्द उसे मालूम है क्योंकि वह खुद जब काम की तलाश में रहा तो अव्वल तो काम नहीं मिला, मिला तो बिल्लो सरीखे लोगों का ऐसा आधिपत्य दिखाई दिया। उसने भगवान का धन्यवाद अदा किया कि पत्रकारिता में अभी सच्चे लोगों का आधिपत्य है। सचाई से मुंह मोड़ने वालों से परे पत्रकारिता का क्षेत्र आज इसीलिए घर-घर में अपना अस्तित्व बनाए है। चाहे टीवी-रेडियो के माध्यम से या अखबार से, समाज का प्रत्येक व्यक्ति सूचना-संसार में प्रवेश से ही अपने दिन की शुरुआत करता है।

कपिल अपने बारे में सोचने लगा कि उसे भी ठीकठाक जगह दैनिक ‘सियासत’ में काम मिल गया। तनख्वाह भी अच्छी है, समाज में रुतबा भी है और सबसे बड़ी बात है पिछले साठ साल से निकलने वाला उसका अखबार भले ही प्रसार संख्या में नवोदित अखबारों के मुकाबले पिछड़ा हुआ है लेकिन पाठकों का उस पर विश्वास जमा है कि जिसे अखबार के संपादकजी और संचालक अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं। उसके संपादक रबरों को तोड़–मरोड़कर सिक्के के दूसरे पहले को दबाते नहीं बल्कि जो पहलू समाज और देश के हित में नहीं है उसे उजागर करते हैं। वे अपने पाठकों को सचाई से वाकिफ करवाते हैं।

बिल्लो और तोलाराम इस समय कपिल के पास ही खड़े थे। वे मंच से उतरकर सीधे कपिल की ओर ही आए थे। वे उसे ‘सियासत’ के क्राइम रिपोर्टर के नाते जानते थे। उनकी समझ में कपिल राजनीति से कोसों दूर रहने वाला समान्य आदमी था जो पेट भरने के लिए पत्रकार बना था और यह सही बात थी। लेकिन बिल्लो यह सही बात भी जानता था कि उसका अखबार ‘सियासत’ सचाई को किसी भी दशा में छुपाया नहीं। इसका अनुभव उसे बखूबी है। वह अपने खिलाफ ‘सियासत’ में छपी खबरों और संपादकीय को पढ़ता रहा है। उसे मालूम है उनमें सचाई के अलावा और कुछ नहीं है। बावजूद इसके सरकार या सत्ता–लौलुप विपक्ष के साथी उसके कुछ नहीं बिगाड़ सके। वह विपक्ष के लोगों से यारी रखता है, उन्हें साथी मानता है मगर उनसे सावधान भी रहता है। यह भी उसे अखरता था कि वह स्वयं भी ‘सियासत’ का कुछ नहीं बिगाड़ सका है। इन्हीं ख्यालों से तिलमिलाए बिल्लो ने सामान्य बातचीत के चलते कपिल को संकेत दिया कि आने वाले कुछ दिन सत्ता के गलियारे में हलचल मचाने वाले होंगे। कपिल ने उसकी बात को लीड खबर में स्थान पाने की लालसा समझा और भूल गया। उसे क्या पता था, बिल्लो का यह एक वाक्य आने वाले 18 दिन में उसे मीडिया जगत में चर्चित बना देने वाला सिद्ध होगा।

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