प्रपंचतंत्र - संतोष खरे Prapanchtantra - Hindi book by - Santosh Khare
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प्रपंचतंत्र

संतोष खरे

प्रकाशक : मेधा बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :86
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7599
आईएसबीएन :978-81-8166-297

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भूतपूर्व मंत्री ने अपने अनुभव और भ्रष्टतंत्र की वास्तविकता का निचोड़ इन कथाओं के माध्यम से नेता-पुत्रों को बताया जिससे उनके ज्ञानचक्षु खुल गये...

Prapanchtantra - A Hindi Book - by Santosh Khare

भूतपूर्व मंत्री ने अपने अनुभव और भ्रष्टतंत्र की वास्तविकता का निचोड़ इन कथाओं के माध्यम से नेता पुत्रों को बताया जिससे उनके ज्ञानचक्षु खुल गये। वे भ्रष्टतंत्र का एक ज़रूरी हिस्सा बन गये और अपने देश में यथास्थिति बनाये रखने की दिशा में योगदान देने लगे। उसे इस काम का समुचित पारिश्रमिक मिला अर्थात् अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी का टिकट मिल गया। वह चुनाव जीतकर विधायक और कुछ दिनों बाद मंत्री बन गया। जिस नेता ने उसे टिकट दिलवाया था उसे पार्टी से निष्कासित करवा दिया और अपने क्षेत्र का सर्वेसर्वा बन गया। जो लोग भ्रष्टतंत्र वाले देश के नेता बनना चाहते हों उन्हें इन कथाओं को पढ़कर उन पर अमल करना चाहिए, सफलता मिलने की गारंटी है।

कथा आरम्भ


नगर में एक धन-सम्पन्न व्यक्ति रहता था। उसने दलाली, रिश्वतखोरी, टैक्सचोरी आदि के माध्यम से पर्याप्त धन अर्जित किया था किन्तु उसे संतोष नहीं था। वह राजनीति के जरिये भी धन कमाना चाहता था। उस देश में राजसेवा, खेती, विद्या, सूद और व्यापार के अतिरिक्त, राजनीति भी धनोपार्जन का एक श्रेष्ठ साधन था।

यही सोचकर उस व्यक्ति ने अपने दो विश्वस्त अनुचरों को राजनीति में उतारने का निश्चय किया। उसने एक को सत्तादल में तथा दूसरे को विरोधी दल में महत्त्वपूर्ण स्थान दिलवाया। आये दिन उनके भाषण, प्रदर्शन और वक्तव्य प्रसारित करवाये। आयाराम और गयाराम नामक दोनों अनुचर अब नेताओं के पक्के चमचे बन चुके थे। दोनों अपने स्वामी के हितों की रक्षा तो करते ही थे। स्वयं के लिए भी उन्होंने पर्याप्त धनोपार्जन कर लिया। शीघ्र ही आयाराम सत्ताधारी दल का विधायक बन गया और गयाराम विरोधी दल का नेता।

उस नगर के पुराने नेता आयाराम से भयभीत हो गये। लोगों के स्थानान्तरण करवाकर, लाइसेंस या परमिट दिलवाकर अर्जित किये गये धन से आयाराम की सेहत भी बन गयी थी। घर में पत्नी और बच्चों के अलावा उसकी तीन-चार रखैलें विभिन्न स्थानों में रहती थीं। आयाराम पूरी सुख-सुविधा के साथ जीवन बिताने लगा था। पुराने नेता प्रकट में कुछ नहीं कहते थे किन्तु मन ही मन उससे भयभीत रहते थे। उनके दो पुराने चमचे थे मनसुख और कनछेदी। जब उन्होंने अपने स्वामी का यह हाल देखा तो वे आश्चर्य में पड़ गये। धुरन्धर और अनुभवी नेता का भयातुर होना सचमुच बड़े अचम्भे की बात थी।
 
मनसुख ने कहा–‘‘यार ! हमारा नेता तो बड़ा अनुभवी और घाघ है। सभी दल वाले उसका लोहा मानते हैं पर क्या कारण है कि वह इस आयाराम से भयभीत रहता है ?’’

कनछेदी ने उत्तर दिया–‘‘भाई ! कारण कुछ भी हो, हमें क्या ? दूसरों के काम में हस्तक्षेप करना ठीक नहीं। जो ऐसा करता है उसका राजनीति में वही हाल होता है जैसा दरबारी लाल के साथ हुआ।’’

मनसुख ने पूछा–‘‘यह क्या बात कही तुमने ?’’
कनछेदी ने कहा–‘‘सुनो।’

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