रत्न कैसे बदलता है आपका भाग्य - बसंत कुमार सोनी Ratna Kaise Badalta Hai Aapka Bhagya - Hindi book by - Basant Kumar Soni
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रत्न कैसे बदलता है आपका भाग्य

बसंत कुमार सोनी

प्रकाशक : भगवती पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :159
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 763
आईएसबीएन :81-7775-045-3

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रत्नों के बारे में वैज्ञानिक आधार पर पूर्ण जानकारी एवं रत्नों के बारे में फैलाये गये भ्रामक तथ्यों का निवारण...

Ratna Kaise Badalta Hai Aapka Bhagya -A Hindi Book by Basant Kumar Soni

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पत्थरों का मानव जीवन में उतना ही महत्व है जितना फाँसी में रस्सी का और बन्दूक में गोली का होता है।
मानव जीवन की शुरूआत को हम देखते हैं तो हमें मालूम पड़ता है कि मनुष्य के मकान पत्थरों के होते हैं। भोजन प्राप्त करने के लिये हथियार के रूप में भी पत्थरों का उपयोग होता था। अग्नि पैदा करने के लिये पत्थरों को काम में लाया जाता था। समय बदलता गया। काल परिस्थिति के अनुसार मनुष्य का मस्तिष्क विकसित हुआ और वह रंग-बिरंगे पत्थरों से प्रवाहित हुआ। उनका कम मात्रा में मिलना ही उनकी कीमत बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार था। रत्न कैसा भी हो, मन को आनन्द प्रदान करता है।

मानव जीवन को सुखमय जीने के तीन प्रकार की ऊर्जा की आवश्यकता होती है। एक उर्जा हमें भोजन के द्वारा प्राप्त होती है। दूसरी ऊर्जा हमें सूर्य से प्राप्त होती है। तीसरी ऊर्जा हमें रत्नों के द्वारा प्राप्त हो सकती है। शरीर में जिस ग्रह की ऊर्जा कम हो उसे ध्यान मे रखकर हुए रत्न का निर्धारण किया जाता है। रत्न पहनने के पश्चात वह आकाश मण्डल से अनुकूल तरंगे एकत्रित कर शरीर में भिजवाता है। एक प्रकार से हम कह सकते हैं कि रत्न एंटिना का कार्य करता है।

वर्तमान समय में ज्योतिष के क्षेत्र में पाखण्डी लोग शामिल हो गये हैं जो न तो ज्योतिष जानते हैं, न रत्न को जानते हैं। सिर्फ लोगों को कैसे ठगना है यह अच्छी तरह जानते हैं। मीठी-मीठी बातों में उलझाकर या बड़े-बड़े अनिष्ट होने के डर दिखाकर ठगते हैं।

रत्नों की पहचान सामान्य व्यक्ति के वश में नहीं है। रत्न सम्बन्धी अभी तक प्राप्त पुस्तकों में पूर्णजानकारी का अभाव देखने पर इस पुस्तक को लिखने की इच्छा जाग्रत हुई। इस हेतु कई प्रकार की कठिनाईयों को झेलते हुए मध्यप्रदेश, आन्ध्रप्रदेश, उड़ीसा छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में, नक्सवादी क्षेत्रों में घूमते हुए रत्न खदानों एवं विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों का अध्ययन किया। इस कार्य के दौरान ऐसे कई आश्चर्यजनक अनुभव प्राप्त हुए जिनका वर्णन करना संभव ही नहीं है, वर्तमान में उनके बारे में सोचने पर स्वयं को भी विश्वास नहीं होता है किन्तु वह भी आँखों देखा सच था। मेरा दावा है कि पृथ्वी के गर्भ में भी ऐसे कई रत्न छुपे हुए हैं जिनकी जानकारी जन साधारण को अभी तक उपलब्ध ही नहीं है।

रत्नों की हमें पूर्ण जानकारी न हो तो किसी विश्वसनीय व्यक्ति रत्नों पर निरन्तर शोध कार्य चलता रहता है। हमारे कार्यालय में रत्न टेस्टिंग की आधुनिक मशीने मसस्त उपकरण है। इसलिये संस्थान द्वारा दिये गये रत्न पूर्ण रूप से असली ही होते हैं।

रत्नों के बारे में वैज्ञानिक आधार पर पूर्ण जानकारी एवं रत्नों के बारे में फैलाये गये भ्रामक तथ्यों को इस किताब के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया गया है। हमारा पूरा प्रयास यह है कि इस पुस्तक को पढ़कर आप जान सकें कि कौन-सा रत्न आपकी समस्या का समाधान कर सकेगा या कौन-सा रत्न आपका भाग्य बदल सकता है। फिर भी कुछ कमियाँ इस पुस्तक में भी महसूस की जा सकती है। आप लोगों के पत्रों एवं सुझावों के माध्यम से अगला संस्करण परिष्कृति करके प्रकाशित किया जावेगा।

इस पुस्तक को लिखने में पूज्य पिताजी डॉ० सी० सोनी. प्राचार्य पी० जी० कालेज, खरगोन का पूर्ण सहयोग रहा है। वे एक अच्छे जौहरी हैं।

इसके अलावा लेखन कार्य में रत्न विज्ञान एवं ज्योतिष की सोधार्थी श्रीमती रत्नप्रभा राठौर के अभूतपूर्व सहयोग के कारण यह पुस्तक आपके हाथों में है। ये अपने नाम के अनुरूप ही रत्नों पर शोध कार्य कर रही हैं।
विशेष रूप से मैं श्री राजीव अग्रवाल जी, भारती पाकेट बुक्स का आभारी हूँ जिनकी लगन, तत्परता और सहयोग से यह पुस्तक आप तक पहुँची है।

डा. बसंत सोनी


रत्न : एक परिचय ऐतिहासिक रत्नों का पौराणिक महत्व


हमारे हिन्दू धर्म के सभी देवी-देवताओं के अलंकार रत्न ही थे अर्थात अनादिकाल से ही रत्न प्रचलन में हैं। भारत प्रचीन काल से आध्यात्मिक, भौतिक सभी प्रकार प्रकार से समृद्ध था। वैदिक काल में रत्नों का उपयोग किये जाने का उल्लेख प्राप्त नहीं है। अथर्ववेद में मणियों के उल्लेख मिलता है जो रत्न के अलावा अन्य भी वनस्पतियों की प्रजाति थी जैसे-उदुम्बर मणि।

गुप्तकाल में रत्नों को अत्यधिक महत्त्व मिला। यह समृद्धि का स्वर्ण-युग कहलाता है अतएव रत्नों का अधिकाधिक प्रयोग इस काल मे हुआ। महाकवि कालिदास ने शकुन्तला के अक्षय कौमार्य को ‘‘अनाविद् रत्न’’ की संज्ञा दी है एवं कुमारसम्भव में हिमालय को ‘‘अनन्त रत्न प्रभव’’ कहा गया है।
वात्स्यायन द्वारा लिखित ‘कामसूत्र’ की चौंसठ कलाओं में ‘रत्न-परीक्षा’ को भी एक श्रेष्ठ कला का महत्व दिया गया है। कौटिल्य के द्वारा रचित ‘अर्थशाशास्त्र’ के अनुसार जनसाधारण को भी रत्न-परीक्षण, रत्नों का उपयोग एवं इसके प्रभाव सम्बन्धित पर्याप्त ज्ञान था।
यह शाश्वत है कि प्रत्येक श्रेष्ठतम पदार्थ को रत्न की संज्ञा दी जाती है।

रत्नेन शुभेन शुभ भवति नृपाणं प्रनिष्ठम् शुभेन।
यस्मादतः परीक्ष्यं दैव रत्नाश्रित तज्ज्ञै।।


ऋग्वेद विश्व का सबसे प्राचीन ग्रन्थ माना जाता है। चूँकी ऋग्वेद के अनेक मंत्रों में रत्न शब्द का बार-बार उपयोग हुआ है अतएव रत्न शब्द की उत्पत्ति आधुनिक या मध्यकालीन युग न होकर अति प्रचीन युग की है।

अग्निमीले पुरोहित अज्ञस्य देवमृत्विजतम्।
हेस्तारं रत्न धात्तमम् ।। ऋ 1.1.1.।।

ऋग्वेद में रचित इस मंत्र में अग्नि को रत्नधात्तम् बताया गया है। इसी प्रकार कई बार अनेकों मंत्रों में रत्न शब्द का उपयोग किया गया है। वृहद संहिता’ ‘भाव-प्रकाश’ ‘रस रत्न समुच्चय’ और ‘आयुर्वेद प्रकाश इन ग्रन्थों में भी रत्नों के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई है। रत्नों को महिमामण्डित किया गया है। ये रत्न वैभव, सम्पन्नता के प्रतीक समझे जाते थे।

बाइबिल में भी रत्नों के विषय में लिखा गया है। ईसाइयों के चर्च में धर्मगुरु पोप का राजदण्ड भी कई बहुमूल्य रत्नजड़ित है। मुस्लिम दरगाहों और पीर-फकीरों के पास भी रत्नों का पर्याप्त ज्ञान था अर्थात मनुष्य के अस्तित्व में आने के बाद विकास के चरणाबद्ध क्रम में उसने आजीविका के साथ शारीरिक सौन्दर्य वृद्धि की ओर भी ध्यान दिया। जानवरों की हड़्डियों पक्षियों के रंग-बिरंगे पंख, मृत जानवरों की खालें और दाँत तथा कई प्रकार के पत्थर, इस प्रकार रत्न क्रमिक स्वरूप में अलंकरण का साधन बन गए।

ऋग्वेद में आए शब्द ‘रत्न धात्तम्’ का अर्थ है कि अग्नि रत्नों की उत्पादक है। रत्नों की उत्पत्ति में अग्नि सहायक है, यह बात वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी उचित ही है क्योंकि रत्न पृथ्वी के अन्दर किसी न किसी प्रकार की ताप प्रक्रिया के प्रभाव से ही अस्तित्व में आते हैं। विज्ञान के अनुसार भूगर्म में विभिन्न तत्व रासायनिक प्रक्रिया द्वारा आपस में मिलते हैं और रत्न बनते हैं। स्फटिक क्रिस्टल आकार, आभायुक्त आकृति धारण कर लेते हैं। विशेष परिस्थितियों एवं भूगर्भ में अत्यधिक अन्दर विशिष्ट ताप दाब के प्रभाव से इसमें अद्भुद गुण आ जाते हैं, निर्मित पदार्थ ही रत्न बन जाता है जोकि मानव को अपनी ओर सरलता पूर्वक आकर्षित कर लेता है।

रत्नों की उत्पत्ति के बारे में कई प्रकार के मत प्राचीन ग्रन्थों में हैं। जिस प्रकार ब्रह्मा के अश्रु द्वारा रुद्राक्ष और भगवान शिव के क्रोध से ज्वर की उत्पत्ति हमारे धर्म ग्रन्थों में लिखित है, उसी प्रकार रत्न की उत्पति भी वैदिक इतिहास समेटे है।
वृहत संहिता में निम्नलिखित रत्नों के गुण-दोष का वर्णन किया गया है-
(1) वज्र
(2) मरकत
(3) पद्रमराज
(4) वैदूर्य
(5) विमलक
(6) स्फटिक
(7) सौगन्धिक
(8) शंख
(9) इन्द्रनील
(10) कर्केतर
(11) रुधिर
(12) पुलक
(13) राजमणि
(14) शशिकान्त
(15) गोमेदक
(16) महानील
(17) पुष्पराग
(18) ज्योतिरस
(19) मुक्ता
(20) ब्रह्ममणि
(21) सम्यक
(22) प्रवाल।
‘वृहत संहिता’ पुराणों पर आधारित स्वरचित ग्रन्थ है, आचार्य वराहमिहिर ने इस ग्रन्थ में रत्नोंपत्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित वर्णन किया है-

रत्नानि बलाद्दैत्याद्दधिचित्तो ऽन्ये वदन्ति जातानि।
केचद्भुव स्वभावद्वैचित्रयं प्राहुरुपला नाम्।।


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