सीक्रेट्स ऑफ़ द मिलियनेअर माइंड - टी. हार्व एकर Secrets of The Millionaire Mind - Hindi book by - T Harv Eker
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सीक्रेट्स ऑफ़ द मिलियनेअर माइंड

टी. हार्व एकर

प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :206
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7823
आईएसबीएन :978-81-8322-111

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दौलत के खेल में चौंपियन कैसे बनें...

Secrets of The Millionaire Mind - A Hindi Book - by Ajay Anuragi

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    ‘‘पाँच मिनट में मैं बता सकता हूँ कि भविष्य में आपके पास कितनी दौलत होगी !
    कैसे ?
    आपके व्यक्तिगत ‘धन और सफलता के ब्लूप्रिंट’ को देखकर।’’

    –टी. हार्व एकर

    इस जीवन बदलने वाली पुस्तक में आप सीखेंगे कि आप अपनी आमदनी कैसे बढ़ा सकते हैं और मिलियनेअर कैसे बन सकते हैं ? ऐसा करना आसान है ! बस इसके लिए आपको अपने धन के ब्लूप्रिंट को पहचानना और बदलना होगा। इन अचूक सिद्धांतों का प्रयोग करके टी. हार्व एकर ढाई साल में शून्य से मिलियनेअर बन गए थे। इस पुस्तक को पढ़ें और अमीर बनें !
    टी. हार्व एकर और सीक्रेट्स ऑफ़ द मिलियनेअर माइंड की प्रशंसा में
    ‘‘सीक्रेट्स ऑफ़ द मिलियनेअर माइंड यह रहस्य बताती है कि सिर्फ़ कुछ ही लोग अमीर क्यों बनते हैं, जबकि बाक़ी ज़िंदगी भर पैसे की समस्याओं से जूझते रहते हैं। अगर आप सफलता की मूल जड़ों के बारे में सीखना चाहते हैं, तो यह पुस्तक ज़रूर पढ़े।’’

    –राबर्ट जी. एलन, मल्टिपल स्ट्रीम्स ऑफ़ इन्कम के लेखक

    ‘‘टी. हार्व एकर जादुई हैं ! उनमें पाठकों को मंत्रमुग्ध करने, प्रेरित करने और ज्ञान देने की अद्भुत क्षमता है। उनकी जानकारी सीधे दिमाग़ में उतर जाती है। मैंने बहुत से लेखक और प्रशिक्षक देखे हैं, लेकिन और कोई भी टी. हार्व एकर जितना प्रभावी नहीं है !’’

    –जे कॉनरेड लेविन्सन, गुरिल्ला मार्केटिंग के लेखक

    ‘‘दौलतमंद बनने के विषय पर आपको इससे ज़्यादा शक्तिशाली, प्रभावी और व्यावहारिक पुस्तक पढ़ने को नहीं मिलेगी ! इसमें ऐसे विचार, ज्ञान और रणनीतियाँ भरी हैं, जो आपकी सोच और परिणामों को हमेशा के लिए बदल देंगी।’’

    –ब्रायन ट्रेसी, गेटिंग रिच युअर ओन वे के लेखक

    ‘‘अगर आप अपने जीवनसाथी से पैसों के कारण लड़ रहे हैं तो शायद आपके वित्तीय ब्लूप्रिंट अलग-अलग हैं। इस पुस्तक को पढ़ें और अपने संबंधों को मधुर होता देखें।’’

    –जॉन ग्रे, मेन आर फ़्रॉम मार्स, विमेन आर फ़्रॉम वीनस के लेखक

    सीक्रेट्स ऑफ़ द मिलियनेअर माइंड सफलता चाहने और सफलता पाने के बीच की पायदान को प्रकट करती है !

    क्या आपको कभी इस बात पर हैरानी हुई है कि कुछ लोग आसानी से अमीर क्यों बन जाते हैं, जबकि बाक़ी लोग ज़िंदगी भर आर्थिक मुश्किलों में फँसे रहते हैं ? क्या यह अंतर उनकी शिक्षा, बुद्धि, योग्यताओं, टाइमिंग, काम की आदतों, संपर्कों, क़िस्मत या नौकरी, बिज़नेस अथवा निवेश के चुनाव के कारण होता है ?
    सदमे भरा जवाब है : इनमें से किसी कारण नहीं !

    अपनी ज़बर्दस्त पुस्तक सीक्रेट्स ऑफ़ द मिलियनेअर माइंड में टी. हार्व एकर यह दावा करते हैं, ‘‘पाँच मिनट में मैं बता सकता हूँ कि भविष्य में आपके पास कितनी दौलत होगी।’’ एकर आपके ‘‘धन और सफलता के ब्लूप्रिंट’’ को पहचानकर यह काम करते हैं। हम सभी के अवचेतन मन में धन का व्यक्तिगत ब्लूप्रिंट होता है और हमारे वित्तीय जीवन पर सबसे ज़्यादा प्रभाव इसी का पड़ता है। आप मार्केटिंग, सेल्स, सौदेबाज़ी, शेयर बाज़ार, रियल एस्टेट और वित्त की दुनिया के बारे में चाहे सब कुछ जानते हों, लेकिन अगर आपका धन का ब्लूप्रिंट सफलता के उच्च स्तर के लिए निर्धारित नहीं है, तो आपके पास कभी ज़्यादा पैसा नहीं रहेगा–और अगर किसी कारण रहा भी, तो शायद आप उसे जल्दी ही गँवा देंगे ! अच्छी ख़बर यह है कि अब आप स्वाभाविक और सहज सफलता उत्पन्न करने के लिए अपने धन के ब्लूप्रिंट को दोबारा निर्धारित कर सकते हैं।

    सीक्रेट्स ऑफ़ द मिलियनेअर माइंड में दरअसल एक नहीं, दो पुस्तकें हैं। पहला खंड यह स्पष्ट करता है कि आपके धन का ब्लूप्रिंट कैसे काम करता है। टी. हार्व एकर की बुद्धिमत्तापूर्ण सलाह, हास्य और भावनात्मक प्रबलता के असाधारण तालमेल से आप सीखेंगे कि आपके बचपन के प्रभावों ने आपकी आर्थिक तक़दीर को किस तरह तय किया है। आप यह भी सीखेंगे कि अपने ख़ुद के धन के ब्लूप्रिंट को कैसे पहचानना है और इसे कैसे ‘‘बदलना’’ है, ताकि आप न सिर्फ़ सफलता पा सकें, बल्कि इससे भी ज़्यादा महत्पूर्ण, इसे क़ायम रख सकें और लगातार इसका विस्तार कर सकें।

    खंड दो में आपका परिचय दौलत की सत्रह फ़ाइलों से होगा, जो विस्तार से बताती हैं कि अमीर लोग ज़्यादातर ग़रीब और मध्य वर्गीय लोगों से किस तरह अलग से सोचते और काम करते हैं। दौलत की हर फ़ाइल में कर्म करने के क़दम शामिल किए गए हैं, जिनका अभ्यास करके आप असल दुनिया में अपनी आमदनी नाटकीय रूप से बढ़ा सकते हैं और दौलत का संग्रह कर सकते हैं।

    अगर आर्थिक दृष्टि से आपका प्रदर्शन आपकी उम्मीद के अनुरूप नहीं है, तो आपके अपने धन के ब्लूप्रिंट को बदलना होगा। दुर्भाग्य से आपके धन का वर्तमान ब्लूप्रिंट ज़िंदगी भर आपके साथ रहेगा, जब तक कि आप इसे पहचान नहीं लेते और इसमें सुधार नहीं कर लेते। और इस असाधारण पुस्तक की मदद से आप यही कर सकते हैं। टी. हार्व एकर के अनुसार, यह आसान है। अगर आप अमीर लोगों जैसा सोचते और काम करते हैं, तो इस बात के आसार हैं कि आप भी अमीर बन जाएँगे!

    अपने सिखाए सिद्धांतों पर अमल करके टी. हार्व एकर सिर्फ़ ढाई साल में शून्य से मिलियनेअर बन गए ! एकर पीक पोटेंशियल्स ट्रेनिंग के प्रेसिडेंट हैं, जो उत्तर अमेरिका में सफलता का प्रशिक्षण देने वाली तेज़ी से विकसित हो रही है कंपनी है। ज़मीन से जुड़ी सच्चाइयों और भावनात्मक उत्कटता के अनूठे समन्वय के साथ एकर की हास्यबोध से भरी शैली प्रतिभागियों को मंत्रमुग्ध कर देती है। दुनिया भर से लोग उनके सेमिनारों में हिस्सा लेने आते हैं और वीकएंड प्रोग्राम के लिए आने वाले लोगों की संख्या अक्सर 2,000 से ज़्यादा होती है। अब तक एकर के प्रशिक्षण ने 25 लाख से भी ज़्यादा लोगों के जीवन को स्पर्श किया है। यहाँ पहली बार अपनी इस क्रांतिकारी पुस्तक में वे सफलता के अपने आज़माए हुए रहस्य बता रहे हैं। इसे पढ़ें और अमीर बनें !

    ‘‘यह टी. हार्व एकर कौन है
    और मुझे यह पुस्तक क्यों पढ़नी चाहिए ?’’


    मेरे सेमिनारों की शुरुआत में लोगों को झटका लगता है, जब मैं उनसे यह कहता हूँ, ‘‘मेरे एक भी शब्द पर भरोसा मत करना।’’ मैं यह सुझाव क्यों देता हूँ ? क्योंकि मैं सिर्फ़ अपने अनुभव से ही बोल सकता हूँ। मैं जो भी अवधारणाएँ और ज्ञान के विचार बताता हूँ, वे अपने आप में सच या झूठ, सही या ग़लत नहीं हैं। मैं तो बस इतना बताता हूँ कि इन सिद्धांतों पर चलने से मुझे और मेरे हज़ारों विद्यार्थियों को जीवन में क्या आश्चर्यजनक परिणाम मिले। बहरहाल, मुझे पूरा यक़ीन है कि अगर आप इस पुस्तक में दिए गए सिद्धांतो का प्रयोग करेंगे, तो आपके जीवन में आमूलचूल परिवर्तन हो जाएगा। इस पुस्तक को सिर्फ मनोरंजन के लिए न पढ़ें। इसे तो इस तरह पढ़ें, मानो आपकी पूरी जिंदगी इस पर निर्भर हो। फिर आप अपने जीवन में इन सिद्धांतों को आज़माकर देखें। जो सिद्धांत आपके लिए कारगर साबित हो, उसे जारी रखें। जो कारगर साबित न हो, उसे छोड़ दें।

    ज़ाहिर है, इस मामले में मैं पूर्वग्रह का शिकार हो सकता हूँ, लेकिन मेरा मानना है कि धन के मामले में यह आपके द्वारा पढ़ी गई सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक हो सकती है। मैं जानता हूँ कि यह बड़बोलापन लग सकता है, लेकिन सच्चाई तो यही है कि यह पुस्तक सफलता की आपकी इच्छा और उसकी प्राप्ति के बीच की खोई हुई कड़ी के बारे में बताती है। जैसा शायद आप अब तक की ज़िंदगी में जान ही चुके होंगे, इच्छा और उपलब्धि के बीच बहुत बड़ा फ़ासला होता है।

    बेशक आपने दूसरी पुस्तकें भी पढ़ी होंगी, सीडी या टेप्स सुने होंगे, कई कोर्सों में गए होंगे और रियल एस्टेट, शेयर बाज़ार या बिज़नेस के क्षेत्र में अमीर बनने की ढ़ेर सारी तकनीकें सीखी होंगी। लेकिन क्या हुआ ? ज़्यादातर लोगों के मामले में ज़्यादा कुछ नहीं हुआ ! उनमें तो बस थोड़े समय के लिए ऊर्जा की एक लहर आई और इसके बाद वे जल्दी ही पुरानी स्थिति में लौट आए।

    आख़िरकार, एक जवाब मिल गया है। यह सरल है, यह नियम है और आप इसे ग़लत साबित नहीं कर सकते हैं। असल बात यह है : अगर आपके अवचेतन मन का ‘‘वित्तीय ब्लूप्रिंट’’ सफलता पाने के लिए ‘‘निर्धारित’’ (set) नहीं है, तो आप चाहे जितनी सीख लें, चाहे जितना जान लें, चाहे जो कर लें, किसी चीज़ से ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।

    इस पुस्तक के पन्नों में हम आपके सामने यह रहस्य खोलेंगे कि कुछ लोगों का अमीर बनना और बाक़ी लोगों का ग़रीब बने रहना क्यों तय होता है। आप सफलता, दोयमता (mediocrity) या वित्तीय असफलता के मूल कारणों को समझेंगे। ज़ाहिर है, इसके बाद आप अपने भविष्य को बेहतर बनाने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। इस पुस्तक में आपको यह जानकारी भी मिलेगी कि बचपन में हम पर पड़े प्रभाव किस प्रकार हमारा वित्तीय ब्लूप्रिंट तैयार करते हैं और हमें असफलता दिलाने वाले विचारों तथा आदतों की ओर ले जाते हैं। इस पुस्तक में हमने कुछ सशक्त घोषणाएँ (declarations) बताई हैं, जिनकी मदद से आप अपने दिमाग़ के भीतर रखी बेकार की ‘‘दौलत की फ़ाइलों’’ को बदल लें, ताकि आप भी अमीरों की तरह सोंच सकें– और सफल हो सकें। इस पुस्तक में आप अपनी आमदनी बढ़ाने और दौलत बनाने की व्यावहारिक, क़दम-दर-क़दम रणनीतियाँ भी सीखेंगे।

    इस पुस्तक के खंड एक में हम स्पष्ट करेंगे कि हममें से हर व्यक्ति को पैसे के बारे में सोचने और काम करने के लिए किस तरह कंडीशन किया गया है। यहाँ हम धन के मानसिंक ब्लूप्रिंट को बदलने की चार मुख्य रणनीतियों की रूपरेखा भी बताएँगे। खंड दो में हम यह जाँच करेंगे कि पैसे के बारे में अमीर, मध्य वर्गीय और ग़रीब लोगों की सोच में क्या अंतर होता है। यहाँ हम सत्रह दृष्टिकोण और तरीक़े बताएँगे, जिनसे आपकी आर्थिक स्थिति हमेशा के लिए बदल जाएगी। पूरी पुस्तक में हम अपने हज़ारों विद्यार्थियों से मिले पत्रों और ई-मेल्स के चुनिंदा उदाहरण भी देंगे, जिन्होंने द मिलियनेअर माइंड इनटेंसिव सेमिनार में भाग लेने के बाद अपने जीवन में ज़बर्दस्त सफलता हासिल की है।

    तो मेरा अनुभव क्या है ? मैं कहाँ से आ रहा हूँ ? क्या मैं हमेशा से सफल था ? काश ऐसा ही हुआ होता !

    आपमें से कई लोगों की तरह मुझमें भी बहुत सी ‘‘क्षमता’’ (potential) नज़र आती थी, लेकिन परिणाम नज़र नहीं आते थे। मैंने दुनिया की तमाम पुस्तकें पढ़ीं, तमाम टेप सुन डाले और हर सेमिनार में गया। मैं वाक़ई, वाक़ई, वाक़ई सफल होना चाहता था। मुझमें ‘‘सफल’’ होने का एक तरह से जुनून था, हालाँकि मैं यह नहीं जानता था कि मैं सचमुच क्या चाहता हूँ। क्या यह धन की चाहत थी, स्वतंत्रता की चाहत थी, कुछ हासिल करने का एहसास था या माता-पिता के सामने यह साबित करने की तमन्ना थी कि मैं भी कुछ कर सकता हूँ ? चाहे जो हो, बीस साल की उम्र के बाद मैंने कई अलग-अलग बिज़नेस शुरू किए। हर बिज़नेस दौलत के सपनों के साथ शुरू होता था, लेकिन परिस्थितियाँ और परिणाम बद से बदतर होते जा रहे थे।

    जीतोड़ मेहनत करने के बाद भी मैं कंगाल ही बना हुआ था। मुझे ‘‘कंगाली का भयंकर रोग’’ था : मैंने मुनाफ़े नाम की चीज़ के बारे में सुना तो था, लेकिन यह मुझे कभी दिखी नहीं थी। उस वक़्त मैं सोचा करता था, ‘‘काश मुझे सही बिज़नेस मिल जाए, सही घोड़ा पहचान में आ जाए, तो मैं कामयाब हो जाऊँगा।’’ लेकिन मैं ग़लत था। कोई चीज़ काम नहीं कर रही थी... कम से कम मेरे लिए। और उस वाक्य के आख़िरी हिस्से ने आख़िरकार मुझे भीतर तक हिला दिया। मैं सोचने लगा कि मैं जिस बिज़नेस में था, उसमें बाक़ी लोग सफल हो रहे थे, फिर मैं क्यों कड़का था ? ‘‘श्रीमान क्षमतावान’’ की हालत ख़राब क्यों थी ?

    इसलिए मैंने गंभीरता से चिंतन किया। मैंने अपनी असली धारणाओं की जाँच की और यह पाया कि हालाँकि मैं कहता ज़रूर था कि मैं सचमुच अमीर बनना चाहता हूँ, लेकिन इसे लेकर मेरे मन में कुछ चिंताएँ थीं, जिनकी जड़ें बहुत गहरी थीं। मैं दरअसल बहुत डरा हुआ था। इस बात से कि मैं असफल हो सकता हूँ या इससे भी बुरी बात यह कि सफल होने के बाद अपनी सारी दौलत गँवा दूँगा, जिससे मैं सचमुच मूर्ख साबित हो जाऊँगा। इस तरह मैं अपनी उस छवि को भी मटियामेट कर डालूँगा, जो लोगों में मेरे प्रति बनी हुई थी : मेरी ‘‘कहानी’’ कि मुझमें इतनी सारी ‘‘क्षमता’’ थी। अगर बाद में यह पता चले कि मुझमें आवश्यक क्षमता ही नहीं थी और मैं संघर्ष भरा जीवन जीने के लिए अभिशप्त हूँ, तो क्या होगा?

    क़िस्मत की बात देखिए कि उसी मोड़ पर डैडी के एक बहुत अमीर दोस्त ने मुझे कुछ सलाह दी। वे मेरे माता-पिता के घर ‘‘लड़कों’’ के साथ ताश खेलने आए थे और उन्होंने गुज़रते समय मुझे देख लिया। यह तीसरी बार था, जब मैं अपने माता-पिता के घर रहने आया था और मैं ‘‘सबसे निचले दर्जे की जगह’’ यानी बेचमेंट में रह रहा था। मुझे लगता है कि डैडी ने मेरे दुख भरे जीवन के बारे में उनसे शिकायत की थी, क्योंकि मुझे देखते समय उनकी आँखों में उसी तरह की सहानुभूति थी, जैसी आम तौर पर अत्येष्टि के समय शोक-संतप्त परिजनों के लिए होती है।

    उन्होंने कहा, ‘‘हार्व, मेरी शुरुआत भी वैसी ही थी, जैसी कि तुम्हारी है, पूरी तरह तबाही।’’ बहुत बढ़िया, मैंने सोचा, इससे मुझे बहुत बेहतर महसूस हुआ। मुझे उन्हें जता देना चाहिए कि मैं व्यस्त हूँ.... दीवार से उखड़ते पेंट को देखने में।

    उन्होंने आगे कहा : ‘‘लेकिन फिर मुझे कुछ सलाह मिली, जिसने मेरी ज़िंदगी बदल दी और मैं तुम्हें भी वही सलाह देना चाहूँगा।’’ ओह नहीं, फिर से पिता-पुत्र का भाषण आ गया, हालाँकि यह आदमी तो मेरा पिता भी नहीं है ? आख़िरकार उन्होंने कहा : ‘‘हार्व, अगर तुम अपनी इच्छा के अनुरूप सफल नहीं हो पा रहे हो, तो इसका मतलब सिर्फ़ यह है कि कोई ऐसी चीज़ है, जो तुम नहीं जानते हो।’’ उस वक़्त मैं बहुत ढीठ युवक था, इसलिए मैं सोचता था कि मैं हर चीज़ के बारे में बहुत कुछ जानता था, लेकिन अफ़सोस ! मेरा बैंक अकाऊंट तो कुछ और ही कह रहा था। तो आख़िरकार मैं सुनने लगा। उन्होंने आगे कहा, ‘‘क्या तुम जानते हो कि ज़्यादातर अमीर लोग काफ़ी हद तक एक जैसे तरीक़ों से सोचते हैं ?’’

    मैंने कहा, ‘‘नहीं, मैंने दरअसल इस बारे में कभी सोचा ही नहीं।’’ इस पर उन्होंने जवाब दिया, ‘‘यह सटीक विज्ञान तो नहीं है, लेकिन ज़्यादातर मामलों में अमीर लोग एक ख़ास तरीक़े से सोचते हैं और ग़रीब लोग बिलकुल अलग तरीक़े से सोचते हैं। सोचने के इन तरीक़ों से उनके काम तय होते हैं और कामों से परिणाम तय होते हैं।’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘अगर तुम उसी तरह सोचो, जिस तरह अमीर लोग सोचते हैं और वही काम करो, जो अमरी लोग करते हैं, तो क्या तुम्हें यक़ीन है कि तुम भी अमीर बन सकते हो ?’’ मुझे याद है कि मैंने कमज़ोर आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया था, ‘‘लगता तो ऐसा ही है।’’ इसके बाद उन्होंने कहा, ‘‘तो तुम्हें बस अमीर लोगों के सोचने के तरीक़े की नक़ल करनी है।’’

    मैंने संदेह से पूछा, ‘‘तो इस वक़्त आप क्या सोच रहे हैं ?’’ उनका जवाब था, ‘‘मैं सोच रहा हूँ कि अमीर लोग अपने वादे निभाते हैं और मुझे इस वक़्त तुम्हारे डैडी से किया वादा निभाना है। वे लोग मेरा इंतजार कर रहे हैं। मिलते हैं !’’ हालाँकि वे तो बाहर चले गए, लेकिन उनकी बातें मेरे दिल में उतर गईं।

    दूसरी कोई भी चीज मेरे जीवन में काम नहीं कर रही थी, इसलिए मैंने सोचा कि कुछ नया करने में क्या हर्ज़ है। मैं पूरे दिल से अमीर लोगों और उनके सोचने के तरीक़े के अध्ययन में जुट गया। मस्तिष्क की अंदरूनी कार्यविधि के बारे में मैं जितना सीख सकता था, मैंने सीखा। बहरहाल, मैंने अपना ध्यान मूलतः धन और सफलता के मनोविज्ञान पर केंद्रित किया। मैंने पाया कि यह सच था : अमीर लोग दरअसल ग़रीब और मध्य वर्गीय लोगों से अलग तरीक़े से सोचते हैं। अंततः, मेरी समझ में आने लगा कि मेरे विचार किस तरह दौलत से दूर रख रहे हैं। इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि मैंने कई सशक्त तकनीकें और रणनीतियाँ सीखीं, जिनका इस्तेमाल करके मैंने अपने दिमाग़ की दोबारा कंडीशनिंग की, ताकि मैं अमीर लोगों की तरह सोच सकूँ।

    आख़िरकार मैंने कहा, ‘‘इस बारे में उठापटक बहुत हो गई, अब ज़रा इसे परख भी लिया जाए।’’ मैंने एक और नया बिज़नेस शुरू करने का फ़ैसला किया। चूँकि सेहत और व्यायाम में मेरी ख़ासी दिलचस्पी थी, इसलिए मैंने उत्तर अमेरिका में एक रिटेल फ़िटनेस स्टोर खोला, जो वहाँ खुले ऐसे शुरुआती स्टोर्स में से एक था। मेरे पास नाम मात्र को भी पैसा नहीं था, इसलिए बिज़नेस शुरू करने के लिए मुझे अपने वीज़ा कार्ड से 2,000 डॉलर उधार लेने पड़े। मैंने अमीर लोगों की मॉडलिंग से जो सीखा था, मैं उसका इस्तेमाल करने लगा। मैं उनकी कारोबारी और चिंतन दोनों तरह की रणनीतियों पर अमल करने लगा। मैंने सबसे पहला काम यह किया कि मैं अपनी सफलता के लिए समर्पित हो गया और जीतने के लिए खेलने लगा। मैंने क़सम खाई कि मैं इस काम पर पूरा ध्यान केंद्रित करूँगा और इस बिज़नेस को छोड़ने के बारे में तब तक सोचूँगा भी नहीं, जब तक कि मैं मिलियनेअर या इससे ज़्यादा न बन जाऊँ। यह मेरी पुरानी कोशिशों से बिलकुल ही अलग नज़रिया था, क्योंकि पहले मेरी सोच हमेशा अल्पकालीन रहती थी, इसलिए मेरा ध्यान अच्छे अवसरों या मुश्किलों के सामने आने पर भटक जाता था।


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