हाथी की नाक लंबी क्यों ? ऊँट की पीठ पर कूबड़ क्यों ? - अनिल चन्द्रा Hathi Ki Nak Lambi Kyon? Uont Ki Peeth Par Kubar K - Hindi book by - Anil Chandra
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हाथी की नाक लंबी क्यों ? ऊँट की पीठ पर कूबड़ क्यों ?

अनिल चन्द्रा

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :52
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7860
आईएसबीएन :81-7043-662-1

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बच्चों के लिए पांच कहानियों का संग्रह...

Hathi Ki Nak Lambi Kyon? Uont Ki Peeth Par Kubar K - A Hindi Book - by Anil Chandra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


अनुक्रम


  • हाथी की नाक इतनी लंबी क्यों है ?
  • तेंदुए की खाल पर चकत्ते क्यों है ?
  • ऊँट की पीठ पर कूबड़ क्यों है ?
  • व्हेल मछली छोटी-छोटी मछलियों को क्यों खाती है ?
  • बगुला क्यों भैंस की पीठ पर सवार होता है ?

  • हाथी की नाक इतनी लंबी क्यों है ?


    यह उन दिनों की बात है जब हाथी के सूँड़ नहीं हुआ करती थी। उसकी बस एक काली, भद्दी-सी, फूली हुई, कुछ-कुछ जूते के आकार की नाक हुआ करती थी जिसे वह हिला-डुला तो सकता था, लेकिन जिससे वह कोई चीज़ उठा नहीं सकता था।

    उन्हीं दिनों कुंतल नाम के देश में, जिसे आज कर्नाटक कहते हैं, हाथी के एक चुलबुले और मनचले बच्चे ने जन्म लिया जिसमें हर बात जानने का ज़बरदस्त कुतूहल था। अपने इस कुतूहल के कारण वह हरेक से कुछ न कुछ पूछता ही रहता था। एक बार उसने एक बड़ी-सी मादा शुतुरमुर्ग से पूछ ही डाला, ‘‘यह तो बताओ मौसी, तुम्हारी दुम में ये इतने थोड़े-से पंख क्यों हैं ?’’ और पता है यह सुनकर उस बड़ी-सी मादा शुतुरमुर्ग ने क्या किया ? उसने अपने सख़्त पंजे से हाथी के उस बच्चे को पीछे से एक ज़ोर का झांपड़ मारा। इसके बाद वह हाथी का बच्चा अपने लंबू ‘चाचा’ जिराफ़ के पास गया और लगा उससे पूछने कि उसकी चमड़ी पर इतने धब्बे क्यों है ? चाचा जिराफ़ को ताव आ गया और उसने अपने कठोर खुर से उसे पीछे से एक दुलत्ती झाड़ी। अब हाथी के बच्चे ने अपने मुटल्ले ‘मामा’ हिपोपॉटमस से पूछा ‘‘मामा, तुम्हारी आँखें इस तरह लाल क्यों है ?’’ और हिपोपॉटमस मामा ने भी अपने चौड़े-से खुर से उसे पीछे से एक जमाई। लेकिन बार-बार झांपड़ खाने पर भी हाथी का बच्चा अपनी आदत से बाज़ न आया।

    एक दिन ऐसा हुआ वह हाथी का बच्चा अपना जंगल छोड़कर एक जगह से दूसरी जगह घूमता रहा। घूमते-घामते वह एक दूसरे जंगल में जा पहुँचा। वहाँ कावेरी नाम की नदी के किनारे पर एक मगरमच्छ रहता था।

    मगरमच्छ को देखकर हाथी का बच्चा फड़क उठा। ‘‘मगर मामा, मगर मामा,’’ उसने मगरमच्छ से पूछा, ‘‘यह तो बताओ कि तुम आज भोजन में क्या लेने जा रहे हो ?’’ यह कहते हुए हाथी का बच्चा अपना सिर मगरमच्छ के बड़े-बड़े जबड़ों वाले मुँह के पास ले गया जिससे दुर्गन्ध आ रही थी।

    ‘‘सबसे पहले एक हाथी के बच्चे का सिर,’’ मगरमच्छ बुदबुदाया और अपने दाँतों के बीच उस हाथी के बच्चे की नाक पकड़ ली।

    हाथी के बच्चे को यह बहुत बुरा लगा और उसने नाक से बोलते हुए कहा, ‘‘छोड़ों मेरी नाक, दुख रही है।’’
    मगरमच्छ ने कुछ मगरमच्छ के आँसू बहाए और बोला, ‘‘प्यारे दोस्त, तुम जिस नाक से बोल रहे हो उसे तुमने अगर अभी खींचकर बाहर नहीं निकाला तो मैं तुम्हारा भुरता बना दूँगा।’’

    हाथी का बच्चा भौंचक्का होकर अपने पुट्ठों पर बैठ गया और लगा खींचकर अपनी नार छुड़ाने। उसने इतना खींचा, इतना खींचा कि उसकी नाक खिंच कर बड़ी होने लगी।

    वह ऐसा कर ही रहा था कि मगरमच्छ सरक कर पानी में चला गया और अपनी दुम पटक-पटक कर पानी की मलाई बनाता रहा। पर हाथी का बच्चा अपनी नाक को खींचता ही रहा जब तक उसमें और खींचने की शक्ति नहीं रही।


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