कोलाहल से दूर - टॉमस हार्डी Kolahal Se Dur - Hindi book by - Thomas Hardy
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कोलाहल से दूर

टॉमस हार्डी

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :381
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7873
आईएसबीएन :978-81-267-1416

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कोलाहल से दूर उपन्यास के केन्द्र में नायिका बाथशीबा एवरडीन और उसे अपने-अपने ढंग से प्रेम करनेवाले तीन व्यक्तियों की कहानी है...



उन्नीसवीं सदी के पूँजीवादी समाज के अनैतिक, मानवद्रोही चरित्र के बरक्स उदात्त मानवीय मूल्यों, गहरी मानवीयता और उच्च नैतिक आदर्श से ओत-प्रोत चरित्र खड़े करके मनुष्यता को दिशा देनेवाले उपन्यासकारों में टॉमस हार्डी का स्थान अग्रिम पंक्ति में है। उनके पात्र और उनका सामाजिक परिवेश अंग्रेजी साहित्य में जनवादी मूल्यों की स्थापना की अभिव्यक्तियाँ हैं। हार्डी के नायक और नायिकाएँ आम लोगों के बीच से आते हैं और उनमें नैतिक दृढ़ता तथा सौन्दर्य और समरसता की उच्च भावना है। हार्डी मूलतः कवि थे और उनके उपन्यास अंग्रेजी साहित्य की सर्वाधिक काव्यमय कथा-कृतियों में से हैं।

कोलाहल से दूर उपन्यास के केन्द्र में नायिका बाथशीबा एवरडीन और उसे अपने-अपने ढंग से प्रेम करनेवाले तीन व्यक्तियों—किसान से गड़रिया बना गैब्रिएल ओक, धनी किसान बोल्डवुड और उच्छृंखल सार्जेण्ट ट्राय—की कहानी है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि में हार्डी शहरों के कोलाहल से दूर ग्राम्य जीवन की जो तस्वीर खींचते हैं, वह उनका वास्तविक कथ्य है। अपनी विशिष्ट शैली में वह बीच-बीच में मानवीय व्यवहार, उसकी कमजोरियों, बदलते, वक्त और विवाह की संस्था पर टिप्पणियाँ करते चलते हैं। उपन्यास के अन्त में बाथशीबा सामाजिक प्रतिष्ठा में अपने से काफी नीचे गैब्रिएल से विवाह कर लेती है जिसके चरित्र को हार्डी ने उच्च मानवीय गुणों से नवाजा है। बाथशीबा के रूप में हार्डी ने जिस स्वतंत्र, आवेगपूर्ण और अपनी मर्जी से चलनेवाली स्त्री का चरित्र गढ़ा है, वह भी विक्टोरियन युग की कठोर मर्यादाओं को एक चुनौती थी।

तेजी से विकसित हो रहे शहरों को हार्डी पूँजीवादी सभ्यता की सभी बुराइयों के केन्द्र के रूप में देखते थे और इसके बरक्स देहात के जीवन को एक नैतिक आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते थे। इसलिए वह अपने उपन्यासों में ग्राम्य जीवन का सुन्दर वर्णन करते हैं। हार्डी की सबसे बड़ी वैचारिक सीमा यह थी कि वह यह नहीं देख पा रहे थे कि पूँजीवाद का नाश करनेवाली एकमात्र शक्ति—सर्वहारा वर्ग—भी शहरों में ही विकसित हो रहा है।

इसका सबसे प्रतिनिधि उदाहरण है ‘कोलाहल से दूर’। उपन्यास के केन्द्र में नायिका बाथशीबा एवरडीन और उसे अपने-अपने ढंग से प्रेम करनेवाले तीन व्यक्तियों–किसान से गड़ेरिया बना गैब्रिएल औक, धनी किसान बोल्डवुड और उच्छृंखल सार्जेण्ट ट्राय–की कहानी है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि में हार्डी शहरों के कोलाहल से दूर ग्राम्य जीवन की जो तस्वीर खींचते हैं, वह उनका वास्तविक कथ्य है। अपनी विशिष्ट शैली में वह बीच-बीच में मानवीय व्यवहार, उसकी कमजोरियों, बदलते वक्त और विवाह की संस्था पर टिप्पणियाँ करते चलते हैं। उपन्यास के अन्त में बाथशीबा सामाजिक प्रतिष्ठा में अपने से काफी नीचे गैब्रिएल से विवाह कर लेती है जिसके चरित्र को हार्डी ने उच्च मानवीय गुणों से नवाजा है। बाथशीबा के रूप में हार्डी ने जिस स्वतंत्र, आवेगपूर्ण और अपनी मर्जी से चलनेवाली स्त्री का चरित्र गढ़ा है, वह भी विक्टोरियन युग की कठोर मर्यादाओं को एक चुनौती थी।

अध्याय एक

किसान ओक का विवरण : एक घटना


जब किसान ओक मुस्कुराता था तो उसके मुँह के कोने इतने फैल जाते थे कि कानों से उनकी दूरी बहुत कम रह जाती थी, उसकी आँखें सिकुड़कर दरार भर रह जाती थीं और उनके चारों ओर पंजों जैसी झुर्रियाँ दिखाई पड़ने लगती थीं जो उसके चेहरे पर ऐसे फैलती थीं जैसे उगते हुए सूर्य के अधकचरे चित्र की किरणें।

उसका नाम गैब्रिएल था और काम के दिनों में वह ठोस निर्णय, सहज गति, शालीन कपड़े पहननेवाला और आम तौर पर अच्छे चरित्र का आदमी था। इतवार के दिन वह अनिश्चित विचारोंवाला आदमी होता था, कुछ टाल-मटोल का आदी और अपने सबसे अच्छे कपड़ों और भारी-भरकम छाते में उलझन महसूस करता हुआ : कुल मिलाकर वह एक ऐसा व्यक्ति था जो नियमित रूप से चर्च की प्रार्थनाओं में जानेवाले गाँववालों तथा पियक्कड़ों की मंडली और लाओडीसिया के लोगों जैसी उदासीन आस्था के बीचवाली विशाल जगह में खुद को नैतिक रूप से रखकर खुश था–अर्थात वह चर्च जाता था लेकिन जब तक सभा प्रार्थना तक पहुँचती थी, वह अकेले में जम्हाई ले रहा होता और जब उसे प्रवचन सुनना चाहिए, वह सोचता कि रात के खाने में क्या होगा। या अगर जनमत के तराजू पर तोलें तो जब दोस्त और आलोचक झल्लाए होते तो उसे कुछ बुरा आदमी माना जाता था; जब वे खुश होते तो वह कुछ अच्छा आदमी होता; जब वे इन दोनों में से किसी भी स्थिति में नहीं होते तो वह ऐसा आदमी होता जिसका नैतिक रंग काले और सफेद के मिश्रण की तरह था।

चूँकि इतवार के दिनों के मुकाबले उसके काम के दिन छह गुना अधिक थे, इसलिए काम के कपड़ों में ओक की छवि विशेष रूप से उसकी अपनी थी–उसके पड़ोसियों के मन में हमेशा ऐसे ही कपड़ों में उसकी छवि बनती थी। वह एक नीची टोपी, जिसका निचला हिस्सा तेज हवाओं से बचाव के लिए सिर पर कसकर जमाने से फैल गया था और डा. जानसन मार्का ढीला-ढाला और पुराना-सा कोट पहनता था, उसके शरीर का निचला हिस्सा साधारण चमड़े के कसे पाजामें में कैद होता। उसके बूट इतने बड़े-बड़े होते थे कि पैरों के हर पंजे को ऐसी खुली और मजबूत कोठरी मिल जाती थी कि इनको पहननेवाला पूरे दिन नदी में खड़ा रह सकता था और उसे नमी का अहसास तक न होता–इनको बनानेवाला ईमानदार आदमी था जिसने बनावट में किसी भी कमी की भरपाई असीमित फैलाव और मजबूती से करने का प्रयत्न किया था।

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लाओडीसिया के लोगों की तरह उदासीन आस्था–लाओडीसिया के लोगों को ढीली-ढीली आस्था रखने के कारण सन्त जॉन ने फटकार लगाई थी।–अनु.

मिस्टर ओक के साथ कलाई घड़ी के रूप में जो चीज होती थी उसे चाँदी की छोटी-मोटी दीवारघड़ी कह सकते थे। दूसरे शब्दों में, आकृति और इरादे से यह कलाई घड़ी थी और आकार-प्रकार से छोटी दीवारघड़ी। ओक के दादा से भी कई साल पहले के इस यन्त्र की खासियत यह थी कि या तो यह बहुत तेज चलता था या बिल्कुल नहीं चलता था। इसकी छोटी सुई कभी-कभी धुरी पर फिसल जाती थी और इस प्रकार मिनट तो पूरी शुद्धता से बताए जाते थे, पर घंटों के बारे में कोई भी निश्चित नहीं बता सकता था। अपनी घड़ी के ठहर जाने की खासियत का इलाज ओक ठोंक-पीटकर और हिलाकर कर लिया करता था और अन्य दो कमियों के दुष्परिणामों से अपना बचाव वह सूर्य और तारों को लगातार देखकर और उनसे तुलना करके तथा अपने पड़ोसियों की खिड़कियों के शीशे से अपना चेहरा सटाकर भीतर की हरे काँचवाली घड़ियों से घंटे का अन्दाज लगाकर करता था। यह भी बता देना उचित होगा कि ओक की घड़ी रखने की जेब उसके पायजामे के कमरबन्द (जो खुद भी उसकी फतूही के नीचे पर्याप्त ऊँचाई पर होता था) में कुछ ऊँचाई पर होने के कारण दुर्गम थी। इसलिए इस घड़ी को निकालने के लिए अनिवार्य रूप से शरीर को एक तरफ मोड़ना पड़ता था, इस कोशिश में मुँह और चेहरा भिंचकर लाल हो जाते थे, और फिर घड़ी को इसकी चेन से पकड़कर खींचा जाता था, जैसे कुएँ से बाल्टी खींची जा रही हो।

लेकिन कुछ विचारशील लोग, जिन्होंने किसी धूपभरी और अत्यन्त खुशनुमा सुबह उसको उसके किसी खेत से होकर गुजरते हुए देखा था, गैब्रिएल ओक को इन सबके बजाय उसके कुछ अन्य पक्षों के कारण जानते थे। कोई भी देख सकता था कि उसके चेहरे में यौवन के अनेक रंग और रेखाएँ परिपक्व होने तक बची रह गई थीं : उसके भीतर कहीं लड़कपन के भी कुछ अवशेष थे। उसकी लम्बाई-चौड़ाई उसकी उपस्थिति को रोबीला बनाने के लिए पर्याप्त थी, बशर्ते उनका सोच-समझकर प्रदर्शन किया जाता। लेकिन कुछ लोगों की एक आदत होती है, शहरी हों या ग्रामीण–जिसके लिए शरीर और ताकत से ज्यादा मन जिम्मेदार होता है : ऐसे लोग अपने चलने-फिरने का अन्दाज ऐसा बना लेते हैं कि उनका शरीर सिकुड़ा-सा लगता है। ओक ऐसी शालीनता से चलता था जो लगभग स्त्रैण थी और जो उसे मानो लगातार अहसास कराती कि इस दुनिया की जगह पर उसका ज्यादा अधिकार नहीं है। वह नम्रतापूर्वक चलता था, उसमें थोड़ा-सा झुकाव तो महसूस किया जा सकता था लेकिन यह झुके हुए कन्धों से साफ तौर पर अलग होता था। इसको उस आदमी के लिए एक कमी मान सकते हैं जो अपने मूल्यांकन के लिए अपनी क्षमता के बजाय रूप-रंग पर ज्यादा निर्भर हो जो ओक नहीं था। अभी-अभी वह जीवन के उस पड़ाव पर पहुँचा था जब ‘नौजवान’ विशेषण उस पर अब लागू नहीं हो सकता था। वह पौरुष के विकास के सबसे सुनहले समय में था क्योंकि अब उसकी बौद्धिकता और भावनाएँ स्पष्टतः अलग-अलग हो चुकी थीं : वह उस समय से आगे निकल आया था जब यौवन का प्रभाव बिना किसी भेदभाव के इनको आवेश में घुला-पिला देता है और वह अभी उस अवस्था तक भी नहीं पहुँचा था जब वे पत्नी और परिवार के प्रभाव से पूर्याग्रह के रूप में फिर से एक हो जाते हैं। संक्षेप में, वह अट्ठाइस का था और कुँवारा था।

जिस खेत में आज की सुबह वह मौजूद था वह नॉरकॉम्ब हिल नामक एक छोटी-सी पहाड़ी की ढलान पर था। इस पहाड़ी के एक ऊँचे स्कन्ध से एमिन्स्टर और चॉक-न्यूटन को जोड़नेवाला मुख्य मार्ग गुजरता था। झाड़ियों के ऊपर से यूँ ही नजर दौड़ाते हुए ओक के अपने सामने की ढलान पर एक सुसज्जित स्प्रिंगदार गाड़ी आते देखी। वह पीले रंग की थी और चमक-दमक से ध्यान खींचती थी। वह गाड़ी घरेलू सामान और खिड़की पर रखे जानेवाली गमलों से लदी थी और इन सबके ऊपर एक युवा और आकर्षक स्त्री बैठी थी। गैब्रिएल ने यह दृश्य आधे मिनट से ज्यादा नहीं देखा था कि यह वाहन ठीक उसकी आँखों के सामने आकर ठहर गया।

‘‘गाड़ी का पिछला तख्ता गायब है, मैडम’’, गाड़ीवान ने कहा।
‘‘तब तो इसका गिरना मैंने सुना है,’’ लड़की ने कोमल लेकिन साफ सुनाई पड़नेवाले स्वर में कहा। ‘‘जब हम पहाड़ी पर आ रहे थे तो मैंने एक आवाज सुनी थी जिसका कारण मैं नहीं समझ पाई थी।’’
‘‘मैं दौड़कर वापस जाता हूँ।’’
‘‘जाओ,’’ उसने जवाब दिया।
समझदार घोड़े पूरी तरह शान्त खड़े रहे और गाड़ीवान के कदमों की आहट धीरे-धीरे दूर होती गई।

लदे हुए सामान के सबसे ऊपर लड़की उलटकर रखी हुई मेजों और कुर्सियों के बीचोबीच एक बलूत के पीढ़े के सहारे बिना हिले-डुले बैठी थी। सामने निरेनियम, मेहँदी और कैक्टस के गमले सजे थे और पिंजरे में एक कैनरी चिड़िया थी। ये सारी चीजें सम्भवतः अभी-अभी खाली किए गए घर से लाई गई थीं। मूँज की टोकरी में एक बिल्ली भी थी जो टोकरी के थोड़े-से खुले हुए ढक्कन से अधमुँदी आँखों से देख रही थी और अगल-बगल के पक्षियों को प्यार से निहार रही थी।

वह सुन्दरी कुछ समय तक अपनी जगह पर आलसपूर्वक इन्तजार करती रही और उस शान्ति में सिर्फ कैनरी पक्षी की अपने पिंजरे की डंडियों पर इधर-उधर उछल-कूद करने की आवाज सुनाई पड़ती थी। फिर उसने ध्यान से नीचे की ओर देखा। पक्षी को नहीं, बिल्ली को भी नहीं; कागज में बँधे एक लम्बे पैकेट को जो इन दोनों के बीच पड़ा था। उसने मुड़कर देखा कि गाड़ीवान आ रहा है या नहीं। अभी भी वह दिखाई नहीं पड़ रहा था; और उसकी आँखें घूमकर वापस पैकेट पर आ गईं, लगता था कि उसका ध्यान अन्दर की वस्तु पर था। आखिरकार उसने पैकेट को उठाकर अपनी गोद में रखा और कागज का आवरण खोल दिया; एक छोटा-सा गोल आईना निकला जिसमें वह खुद को निहारने लगी। उसके होंठ खुले और वह मुस्कुराई।

यह एक सुहावनी सुबह थी और सूर्य की किरणें उसके गहरे लाल रंग के जैकेट को सिन्दूरी आभा प्रदान कर रही थीं और उसके चमकीले चेहरे और काले बालों में मधुर दीप्ति का रंग भर रही थीं। उसके चारों ओर भरे हुए मेहँदी, जिरेनियम और कैक्टस के पौधे ताजे और हरे-भरे थे और ऐसे पर्णहीन मौसम में घोड़ों, गाड़ी, फर्नीचर और लड़की के पूरे दृश्य में इनसे एक विशेष प्रकार का बसन्तकालीन आकर्षण भर गया था। गौरैया कस्तूरा पक्षियों और अनदेखे किसान, जो कि इसके अकेले दर्शक थे, के सामने ऐसे प्रदर्शन की बात अचानक उसके मन पर क्यों सवार हुई, क्या ये मुस्कुराहट इस कला में उसकी क्षमता को जाँचने के लिए बनावटी रूप में शुरू हुई—कोई नहीं जानता; पर इसका समापन निश्चित तौर पर वास्तविक मुस्कान में हुआ; वह अपने पर शरमाई, और अपने प्रतिबिम्ब को शर्माते देख, शर्म से और भी लाल हो गई।

ऐसे काम के लिए आम तौर पर निर्धारित जगत और उपयुक्त अवसर, यानी शयनकक्ष के श्रृंगार के समय के बजाय खुले में यात्रा के समय के इस परिवर्तन ने इस मामूली गतिविधि को ऐसी नव्यता प्रदान कर दी जो मूल रूप से इसकी अपनी नहीं थी। तस्वीर बड़ी कोमल-सी थी। औरत की पारम्परिक दुर्बलता सूर्य के प्रकाश में विचरण करने से मौलिकता की ताजगी में ढँक गई थी। ओक ने जब यह दृश्य देखा तो अपनी सहृदयता के बावजूद रूखा निष्कर्ष निकाले बिना नहीं रह सका। उसे देखने की कोई जरूरत नहीं थी। उसने न अपने टोप को सही किया, न अपने बालों को हाथ लगाया और न गाल के किसी गढ्डे को दबाकर बराबर किया। एक भी काम ऐसा नहीं किया जिससे यह संकेत मिलता कि शीशा उठाने के पीछे उसका ऐसा कोई इरादा था। उसने अपने को केवल प्रकृति की एक सुन्दर नारी रचना के रूप में देखा। ऐसा लगता था कि उसके विचार सुदूर उन सम्भावित नाटकों की ओर तैर गए थे जिसमें पुरुष भूमिका निभाएँगे–सम्भावित विजयों के दृश्य—ये मुस्कुराहटें उस अवस्था की थीं जो बताती थीं कि हृदयों की हार-जीत की कल्पना की गई थी। फिर भी, यह केवल अटकलबाजी थी और यह पूरा घटनाक्रम इतनी धीमी गति से प्रस्तुत किया गया था जिससे यह कहना जल्दबाजी लगे कि इसमें इरादे की जरा भी भूमिका थी।

गाड़ीवाले के लौटने के कदमों की आहट सुनाई पड़ी : उसने शीशे को कागज में लपेटा और दोनों को उसी जगह पर दुबारा रख दिया।

जब यह गाड़ी आगे बढ़ गई तो गैब्रिएल उस जगह से हट गया जहाँ से वह देख रहा था और सड़क पर नीचे उतरते हुए इस गाड़ी के पीछे-पीछे पहाड़ी की तलहटी से कुछ दूर चुंगी-फाटक तक आया जहाँ वह गाड़ी अब चुंगी के भुगतान के लिए रुकी थी। अभी इस फाटक और उसके बीच बीस कदम बाकी ही थे कि उसे कुछ वाद-विवाद सुनाई पड़ा। यह गाड़ीवाले लोगों और चुंगी-फाटकवाले आदमी के बीच दो पेंस के अन्दर को लेकर था।

‘‘मालकिन की भतीजी इस सामान के साथ हैं और वह कहती हैं कि मैंने तुझे बहुत दे दिया, मक्खीचूस; और अब इससे अधिक वह नहीं देंगी।’’ ये गाड़ीवाले के शब्द थे।
‘‘अच्छी बात है, तो मालकिन की भतीजी नहीं जा सकती,’’ फाटक बन्द करते हुए चुंगी-फाटक के रखवाले ने कहा।

ओक ने बारी-बारी से दोनों विवादियों की तरफ देखा और सोच में डूब गया। दो पेंस बहुत ही महत्वहीन था : धन के रूप में तीन पेंस की कुछ कीमत थी–इसको तो एक दिन की मजदूरी के खासे हिस्से का नुकसान माना जा सकता था और यह मोल-तोल का मामला हो सकता था; लेकिन दो पेंस–‘‘ये लो,’’ उसने आगे बढ़कर फाटक के रखवाले के हाथ में दो पेंस देते हुए कहा, ‘‘इस युवती को जाने दो।’’ उसने उसकी ओर देखा, युवती ने उसके शब्द सुने और नीचे देखा।

गैब्रिएल का रूप-रंग अपने पूरे स्वरूप में उस चर्च, जिसमें वह जाता था, कि एक खिड़की पर प्रदर्शित सन्त जॉन के सौन्दर्य और जूडस इस्केरिअट की कुरूपता के ठीक बीचोबीच इस कदर मिलता था कि उसके चेहरे की एक भी ऐसी रेखा नहीं चुनी जा सकती थी जिसे उसकी खासियत या बुराई कहा जा सके। लगता है लाल जैकेट और काले बालोंवाली लड़की ने भी ऐसा भी सोचा, क्योंकि उसने लापरवाही से उसके ऊपर निगाह डाली और अपने आदमी से गाड़ी आगे बढ़ाने को कहा। हो सकता है कि किसी सूक्ष्म पैमाने पर उसे गैब्रिएल के प्रति आभार की भावनाएँ महसूस हुई हों, लेकिन उसने इनको व्यक्त नहीं किया : ज्यादा सम्भावना यही है कि उसने ऐसी कोई भावना महसूस ही न की हो क्योंकि उसको आगे जाने का रास्ता दिलाकर ओक ने उसी बिन्दु पर उसे पराजित कर दिया था, और हम जानते ही हैं कि औरतें इस प्रकार के अहसान को किस तरह से लेती हैं।

फाटक के रखवाले ने दूर जाती गाड़ी का मुआयना किया, ‘‘खूबसूरत औरंत है,’’ उसने ओक से कहा।
‘‘लेकिन इसकी अपनी कमियाँ भी हैं,’’ गैब्रिएल ने कहा।
‘‘सच है, किसान।’’
‘‘और उनमें सबसे बड़ी है–वही, जो हमेशा होती है।’’

‘‘लोगों से भाव-ताव करना; यही है न !’’
‘‘अरे नहीं !’’
‘‘तब क्या है ?’’

इस मनमोहक यात्री की उपेक्षा से शायद थोड़ा खीझे हुए गैब्रिएल ने अपनी निगाह क्षणभऱ के लिए झाड़ियों के ऊपर उस तरफ दौड़ाई जहाँ उसने युवती का प्रदर्शन देखा था। और कहा, ‘‘अहंकार !’’

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