पटरंगपुर पुराण - मृणाल पाण्डे Patrangpur Puran - Hindi book by - Mrinal Pandey
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पटरंगपुर पुराण

मृणाल पाण्डे

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :163
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7876
आईएसबीएन :9788171190652

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रचनात्मक गद्य की गहराई और पत्रकारिता की संप्रेषणीयता से समृद्ध मृणाल पांडे की कथाकृतियों में जुड़ता एक नवीन सामाजिक उपन्यास...

Patrangpur Puran - A Hindi Book - by Mrinal Pandey

एक कुटुम्ब ठहरा पटरंगपुर में पाण्डे लोगों का। खाते-पीते पाटिया के पाण्डे ठहरे। सौ-एक जनों का कुटुम हुआ वह। भारी-भारी बरतनों में खाना पका के चार-चार बहुएँ एक परतीला नीचे उतारने वाली हुईं चूल्हे से। वार-पार फैली रसोई हुई उनकी। तभी, सुना, शहर में काली कुमूं के किसी गाँव का एक बामण थोकदार कचहरी के काम से आया। बाजार में उसने रहने का ठौर-ठिकाना पूछा, तो किसी ने, सुना, कह दिया कि उस गल्ली में पाटिया के पाण्डे लोगों का विराट् मौ (कुटुम्ब) परवार है, वहीं चले जाओ। महीना-छह महीना किसी को पता नहीं चलेगा कि तुम बाहरिए हो, करके। पटरंगपुरियों को ऐसे किसम के मजाक करने की, पट्ट रँगने वाले जुलाहों के जमाने की आदत ठहरी। थोकदार, सुना, सच्ची-सच्ची चला गया अपना टट्टू ले के वहाँ। सुभे का टैम था, धोती लगा के वह भी रसोई में बैठ गया। सुना, खाना उसे भी परसा गया, खाते बखत तब बोलना निषिद्ध ठहरा। बहुएँ चुपचाप, काना-पानी यथेच्छ दे गईं उसे। होते-होते छह महीने हो गए। थुमे (खम्भे) के पीछे बैठने वाला हुआ वह संकोच से, सो घर की औरतों ने नाम रख दिया थुमिया। थुमिया के हिस्से का खाना, बर्त के दिन की फराल (फलाहार), रात का दूध-सब्ब नियम से अलग रखा रहने वाला हुआ। मुकदमा जीत के थुमिया वापस गया अपने गाँव। कुछेक दिन औरतें आपस में ठसका के पूछती रहीं कि थुमिया नहीं जैसा दिखाई दे रहा है, करके। फिर घर-गिरस्थ के काम में सब बिलमी (विलय हो) गए।

–इसी पुस्तक से

रचनात्मक गद्य की गहराई और पत्रकारिता की संप्रेषणीयता से समृद्ध मृणाल पांडे की कथाकृतियाँ हिन्दी जगत में अपने अलग तेवर के लिए जानी जाती हैं। उनकी रचनाओं में कथा का प्रवाह और शैली उनका कथ्य स्वयं बुनता है।

‘पटरंगपुर पुराण’ के केन्द्र में पटरंगपुर नाम का एक गाँव है जो बाद में एक कस्बे में तब्दील हो जाता है। इसी गाँव के विकास-क्रम के साथ चलते हुए यह उपन्यास कुमायूँ-गढ़नवाल के पहाड़ी क्षेत्र के जीवन में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आए बदलाव का अंकन करता है। कथा-रस का सफलतापूर्वक निर्वाह करते हुए इसमें काली कुमायूँ के राजा से लेकर भारत को स्वतंत्रता-प्राप्ति तक के समय को लिया गया है।

परिनिष्ठित हिन्दी के साथ-साथ पहाड़ी शब्दों और कथन-शैलियों का उपयोग इस उपन्यास को विशेष रूप से आकर्षक बनाता है, इसे पढ़ते हुए हम न केवल सम्बन्धित क्षेत्र के लोक-प्रचलित इतिहास से अवगत होते हैं, बल्कि भाषा के माध्यम से वहाँ का जीवन भी अपनी तमाम सांस्कृतिक और सामाजिक भंगिमाओं के साथ हमारे सामने साकार हो उठता है। कहानियों-किस्सों की चलती-फिरती खान विष्णुकुटी की आमा की बोली में उतरी ये कथा सचमुच एक पुराण जैसी ही ठहरी।

1
आदि पर्व


सुना त्रेतायुग की बात, लंका में बड़ी घमासान लड़ाई मची ठहरी। चहुँदिश मरामार, हकाहाक1 हो रहा ठहरा। तभी रामचन्द्र जी ने लंका-पति रावण के भाई कुंभकरण की खोपड़ी ख्याट्ट से काट के, भन्न करके दे भनकाई2 इधर उत्तर दिशा की ओर। तब कूर्म क्षेत्र नाम ठहरा इस जगह का। सख्त कछुए की पीठ जैसे पहाड़-ही-पहाड़ हुए यहाँ चारों ओर। पानी-हानी, पेड़-हेड़ का नाम नहीं ठहरा। उजाड़-बियाबान ठहरा सारा इलाका।

तो प्याँट्ट करके कुंभकर की खोपड़ी जो आके फूटी इस ठौर, तो सुना, और छलाछली खूनै-खून हो गया सब तरफ। उसी खून से बने ठहरे ये नदी-गधेरे, ताल-हाल इस इलाके में, लोहा नदी नहीं देखी ? अब तक कैसा लाल-लाल पानी है उसका ! कुंभकरण हुआ, बाणासुर हुआ, भीम का लड़का घटोतकच्छ हुआ–सबकी ही खून बहा ठहरा यहाँ, लडाइयाँ दिन-रात की ठहरीं उन दिनों, आमा हमें बताने वाली हुईं।

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1. होहल्ला
2. फेंकी

बिष्णुकुटी की आमा ठहरी इस पटरंगपुर शहर की सहसे पुरानी किस्सों की खान जैसी ठहरी उनके पास। देवी-देवताओं के किस्से, पितर-पूर्वजों के किस्से, परी-भूतों के किस्से, सुनते जाओ घंटों को, तब भी अब बस करो, जैसा कहने का मन ही नहीं होने वाला हुआ। सुनाने वाली भी ऐसे हुईं आमा, कि आँखों के आगे ऐन-मैन सारे जोद्धा-वीर आके खड़े जैसे ही जाने वाले हुए। मुनकट्टा1 भूत, उलटे पैरों वाली गधेर-मसान की डाकिनी और बरमंपिसाचों की कहानी कहने वाली हुई आमा, तो बाबा हो, औरै बदन के रोम-रोम खड़े जैसे हो जाने वाले हुए। वैसे जरा मनमौज़ी, जरा इक्की जैसी हुईं ही आमा। वे सभी बिष्णुकुटी वाले जरा वैसे ही जैसे ठहरे। मन हुआ तो घंटो बातों की झड़ी लगा देंगे, मन नहीं हुआ तो मेरी तरफ से तुम क्याप्प2 ?

आहा, पर जो कहो, पटरंगपुरियों के लिए बरगद के पेड़ जैसी छाया ठहरी आमा की। अपनी हरे रंग की आरामकुरसी में दो लट्ठी अगल-बगल धर कर, अहा महारानी जैसी बैठी रहने वाली हुईं घर के ऊपर के खंड में आमा। पिछले कुछेक, बरसों से, जब से उनके घुटनों में पानी जैसा भर गया ठहरा, ऊपर की मंजिल से नीचे नहीं आ सकने वाली हुईं वे, पर बिष्णुकुटी के उस ऊपर के कमरे में बैठे-बैठे भी खबर सारे पटरंगपुर शहर की रहने वाली हुई उन्हें। ऐसा भी नहीं, कि ज्यादा लोग-बाग हों आस-पास। नीचे के खंड में उनका परपोता सुरेन्द्र का लड़का नरेन्द्र और उसकी घरवाली हरमिन्दर—यही दो हुए, बस। कभी छुट्टी-हुट्टी में और घरवाले आके देख जाने वाले हुए, नहीं तो साल-भर आमा ठहरीं, और ठहरी उनकी विष्णुकुटी।

हाँ, तो आमा ही बताने वाली हुईं हमें, कि वही त्रेता युग का खून इस कलजुग तक आते-आते पानी बन गया ठहरा। और नरेन्द्र कहने वाला हुआ, कि कलजुग के आखिरी चरण तक यह पानी भी सब रसातल में चला जाएगा, और खाली कछुए की पीठ जैसे बज्जर नंगे पहाड़ और पाथर ही रह जाएँगे यहाँ करके। क्या पता हो, झक्की-हक्की जैसे हुए, मजाक-ही-मजाक में कभी भारी गहरी बात कह जाने वाले हुए बिष्णुकुटी वालेथ तभी उनकी जीभ से डरने वाले जैसे हुए लोब-बाग। ईश्वर की माया किसने जानी है, ऐसा भी हो ही सकने वाला हुआ। क्या पता, फिर से लंका-हंका कहीं दूसरी जगह लड़ाई हो जाए, और उड़ती हुई कोई खोपड़ी जैसी यहाँ आके प्याँट्ट करके फिर से फूट जाए ? बिधाता की सिरष्ट के नियम-हियम हम जैसी सीधी-सादी औरतें जान जो क्या सकने वाली हुईं ? अरे राजा जनक जैसे ज्ञानी भी अपनी लड़की के ललाट को बाँच नहीं सके जब, तो औरों की क्या कहो ?
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1.मस्तकहीन
2.जाने कौन ?

आमा ही हमें सुनाने वाली हुईं, कि इस जमाने से पहले के जमाने में थल-थल सब दूसरी किसम का ठहरा। मनुष्य भी तब और-और किसम के हुए। सुना, पहाड़ के बामणों के अगल-बगल तक पंख होते थे। फटाफटी पंख हलका के बनपंछी जैसे उड़ के घूमते रहने वाले हुए वे लोग, जब जैसी मन में आई। ऐसा पुन्न-परताप हुआ उनका, कि ठिक्क बरममहूरत में नहा के, ए बीच नदी में खड़े हो को, ऊँ भानवे नमः, अहिर्बुधन्याय नमः’ करके सूर्ज भगवान को अर्घ चढाने वाले हुए, तो साछात सूर्ज देवता खुद्द नदी के जल में चमचमान सोने के गोले के जैसे प्रकट हो पड़ने वाले हुए। नदियों की बालू से तक सोना निकलने वाला ठहरा तब। जमीन ऐसी ठहरी, सुना, कि बाएँ हाथ से आँख बन्द करके भी नाज छींट दो तो ऐसी फसल हो जानी वाली हुई, कि कहाँ जो धरो, वैसे जो सिमेटी। सालम में होने वाली हुई बासमती, खतेड़ा में चरस, मछियाड़ में गेहूँ, पाड़ास्यूं में दूध-दही। फिर कलरवाण की मूली, चौंसाल के पिनालू1 और गोस्नी का हरा धनिया पहाड़ों में वार-वार2 मशहूर ठहरे ही। नेम-धरम-पूजा-पाँती के पक्के ऐसे ठहरे हमारे पुरखे, कि थान-थान मन्दिर खड़े कर दिए। सुई-पट्टी में ठहरा सूर्ज देवता का मन्दिर, चम्फावत में घटोत्कच्छ का, घटकू देवता का; फिर शिव के भी ठहरे—शक्ति के भी ठहरे छौर-छौर अस्थान। आहा, भीमसेन ने बनाया ठहरा खुद्द अपने हाथ से अपने मरे लड़की की याद में घटकू देवता का वह मन्दिर। शिबौ !3 हिडिम्बा राछसी से हुआ ठहरा उसका वह छोकरा ! राछस ठहरा तो क्या ? अपना खून तो हुआ ही।
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1.अरबी
2.यहाँ से वहाँ
3.शिव-शिव !

काने-कूबड़े, झूठे-लबार, लम्पट-बैभिचारी, जैसे भी हों, पर अहा, वंशधर की ममता कोई कम जो क्या होती है ? आमा को ही देख लो। दुनिया लाख औगुनि गिनाए उनके देबिया, हरिया, सुरेन के, खुद्द अपने मुक्ख से एक शब्द जो कभी आमा ने उनकी बुराई में कहा हो। ठीक ही ठहरा, भीतरृही-भीतर लड़ाई-झगड़े किस घर में नहीं होते, तुम्हीं कहो ? घर के ही झगड़े से तो, सच्ची कहो तो, नींव ही पड़ी ठहरी इस पटरंगपुर शहर की। हुआ कि नहीं ?

आमा ही बताने वाली हुईं हमें, कि बहुत समय पहले एक हुए रामदज्जी करके ! बामणपुत्र ठहरे ! परम रूपवान खुद ठहरे, वैसी ही लम्बी चौड़ी रूपसी घरवाली ठहरी उनकी ! माँ उनकी मातर1 ठहरी सौतेली ! शादी के सात साल बाद बहू की लड़की हुई, तो औरी जो कांड कर दिया उसने, हाय हाय चिहड़ी हो गई करके ! लड़की को तब चिहड़ी कहने वाले हुए बड़े लोग, घिन के मारे। खार खाने वाले हुए वे औरतजात से ! रामदज्जी वैसे सर उठा के, क्या ? ऐसा भी पूछने वाले नहीं हुए कभी, पर इस बात पर वे, सुना, चमक गए ! शादी के सात साल बाद तो उनकी लड़की हुई ठहरी, औरी जो ग्रह पड़े ठहरे उत्तम ! कहाँ से चौक पूरती, पंजीरी, गोंदपाक पकाती महतारी, कहाँ यह पुराण जो ले बैठी ! बस कुछ कहा-सुना तो नहीं, पर सुना उसी बखत टप्प औरत का हाथ पकड़ा, बच्ची को डाले2 में धर कर सिर पर रखा, और उड़ते-उड़ते दोनों जने यहाँ आ गए। पुरुखों खेत-भकार3 धिनाली4 सब त्याग दिए। अहा बाप होते तो ऐसा करने देते ? पर होना ही होगा, हो करम में ! राजडा दशरथ ही रामचन्द्र का हाथ थाम सके थे क्या ?
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1.अलबत्ता
2.टोकरे
3.बखार
4.गाय-बैल

सौतेली माँ का क्या हुआ, पूछते हो ? चला, उनका बंस आगे तक चला–बाद को पटरंगपुर में ही उनके पोते-होते सब आके बसे, पर फले जो क्या ? लड़की का लड़का, गाय की बछिया नहीं पनपी उनके वहाँ ! कन्याकुमारी का निरादर जो किया ठहरा। आगे उन्हीं के बंस में हुए हंसादत्त और मुर्दी, दोनों भाई-बहन घोर पागल हो के गए। दुर्गी का रघुवा अँगरेज की लड़ाई में खेत रहा, हंसादत्त की बहू घोर ‘छे’1 रोग में गई, रोते की अक्सीडेंट में टाँग टूटकर तीन इंच छोटी हो गई, पोती का लड़का गिरीश डिप्टी घूसखोरी में पकड़ा जा कर कल-परसों जेल चला गया। घूस, सुना, बड़े अफसर ने खाई थी। पर जेल तो डिप्टी ही जाते हैं ना ! अब कहो ?
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1. टी.बी.।


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