मन मस्त हुआ - अल्हड़ बीकानेरी Man Mast Hua - Hindi book by - Alhad Bikaneri
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मन मस्त हुआ

अल्हड़ बीकानेरी

प्रकाशक : डायमंड पब्लिकेशन्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :150
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7928
आईएसबीएन :978-81-288-2645

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‘मन मस्त हुआ’ की कविताएँ पढ़ते समय आपको महसूस होगा कि आपने इस दौर के सर्वश्रेष्ठ हास्य-कवि की रचनाओं से साक्षात्कार किया है...

Man Mast Hua - A Hindi Book - by Alhad Bikaneri

अल्हड़ बीकानेरी की कविताओं से गुज़रते हुए आपको यह महसूस होगा कि आप एक आम-आदमी के जीवन चरित्र का विश्लेषण कर रहे हैं। इस दौर के सभी हास्य कवियों में अल्हड़ जी अपनी मौलिक-शैली और अनोखे प्रस्तुतिकरण की वजह से एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। उनकी कविताएँ सुनते समय जितना प्रभाव छोड़ती हैं, पढ़ते समय वे उससे भी अधिक व्यापक संदर्भों की व्याख्या करती हैं। अल्हड़ बीकानेरी एक छन्द-सिद्ध कवि हैं। वे शब्द की सामर्थ्य और उसकी शक्ति को अपनी कविताओं में विभिन्न छन्दों के द्वारा इस प्रकार स्थापित कर देते हैं कि हमारी हिन्दी भाषा और उसका प्रभाव विभिन्न मनोहारी बिम्बों के साथ, अनेक नवीन अर्थों की व्याख्या करता हुआ स्थापित हो जाता है। उन्होंने परम्परा के साथ-साथ जो नवीन प्रयोग किये हैं, वे उन्हें इस दौर के सर्वाधिक प्रगतिशील और सिद्ध हास्य-कवि के रूप में मान्यता प्रदान करवाते हैं। ‘मन मस्त हुआ’ की कविताएँ पढ़ते समय आपको महसूस होगा कि आपने इस दौर के सर्वश्रेष्ठ हास्य-कवि की रचनाओं से साक्षात्कार किया है।

–प्रवीण शुक्ल

इन्द्रप्रस्थ काण्ड

त्रिमूर्ति-वन्दन


स्वप्न में त्रिमूर्ति के शेरों को
झुका के शीश
बोला मैं–‘‘जयते सत्यमेव’’
मेरे राम जी

तभी तीन विकट विभूतियाँ
प्रकट हुईं
धन्य हो गया मैं, अतएव
मेरे राम जी

नेता, पूँजीपति, ब्यूरोक्रैट के
लिबास में थे
राहु, केतु और शनिदेव
मेरे राम जी

मूँड़ दिया राहू और केतु ने
कपाल मेरा
शनि ने बना दी मेरी शेव
मेरे राम जी

नेता


नेता हूँ, तभी तो भ्रष्टाचार की
कथाएँ सभी
मुझसे ही होती हैं आरम्भ
मेरे राम जी

मुखड़े पे मेरे, है भरत-सा
विनीत भाव
मन में दशानन-सा दम्भ
मेरे राम जी

पेलता रहा हूँ दण्ड सीने पे
विरोधियों के
झेलता रहा हूँ उपालम्भ
मेरे राम जी

अस्सी की उमर में, मैं तनके
खड़ा हूँ ऐसे
संसद-भवन का ज्यों खम्भ
मेरे राम जी

पूँजीपति


लोटा-डोर लेके, मेरे पुरखों
ने गाँव छोड़ा
आयी जब उनको सुमति
मेरे राम जी

कर के मुनीमी, मायानगरी
के सेठ बने
धीरे-धीरे हो गयी प्रगति
मेरे राम जी

मैंने भी पुलों के निर्माण में
लगायी पूँजी
जाग उठी मेरी भी नियति
मेरे राम जी

सत्ताधारी नेताओं की आरती
उतारते ही
देश का बना मैं पूँजीपति
मेरे राम जी

ब्यूरोक्रैट


ब्यूरोक्रैट हूँ मैं, ब्यूरोक्रेसी की
निभाऊँ क्यों न
सदियों पुरानी परिपाटी
मेरे राम जी

राजधानियों का दाना पानी है
पसन्द मुझे
पटना हो चाहे गुवाहाटी
मेरे राम जी

पूँजीपतियों से तो पुराना है
याराना मेरा
नेता जी रहे हैं सहपाठी
मेरे राम जी

काटी हो स्वतंत्रता-सेनानियों
ने जेल, यहाँ
नोटों की फ़सल मैंने काटी
मेरे राम जी

सत्ताधारी नेता


मंत्री बनते ही ऐसा छा गया
आतंक मेरा
छूते हैं चरण, दरबारी
मेरे राम जी

जनता से जान का है ख़तरा
तभी तो मुझे
घेरे हैं कमांडो सरकारी
मेरे राम जी

माना मैं चुनाव में जुटा सका
न बहुमत
फिर भी दिखायी होशियारी
मेरे राम जी

सकल विरोधियों के दलों में
लगा के सेंध
नेता मैं बना हूँ सत्ताधारी
मेरे राम जी

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