चैम्बूर का दाता - सुरेन्द्र मोहन पाठक Chembur Ka Data - Hindi book by - Surendra Mohan Pathak
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चैम्बूर का दाता

सुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :304
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7942
आईएसबीएन :9789380871080

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सुरेन्द्र मोहन पाठक का नवीनतम उपन्यास

Chembur Ka Data - A Hindi Book - by Surendra Mohan Pathak

मैं ही मुंसिफ हूं,
मैं ही मुजरिम हूं;
कोई सूरत नहीं रिहाई की।

ये था विमल उर्फ सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल का खुद अपना आकलन लेकिन अपने मुरीदों के लिए वो था चम्बूर का दाता

विमल सीरीज का 39वां शाहकार

पहला दिन शनिवार : 

नौ जनवरी


‘‘आगे क्या होगा?’’
विमल ने अपलक नीलम की तरफ देखा।
वो एक अहम सवाल था जिसका जवाब उसके पास नहीं था।
उसी घड़ी वो चैम्बूर में तुका के घर के सामने वाले मकान में उसकी पहली मंजिल पर मौजूद थे।

वो इमारत जब कभी विमल ने तुका के नाम से खरीदी थी तो उसका इरादा उस अहाते की बाकी छः इमारतें भी खरीद लेने का था ताकि वहां किसी बाहरी आदमी का दखल बाकी न बचता। प्रवेश के रास्ते के दहाने पर एक फाटक होता जो सदा बंद रहता और उस पर सदा मुस्तैद सशस्त्र पहरा रहता। उस जगह को विमल बखिया के निजाम के वक्त की ‘सी-व्यू’ की सिक्योरिटी की तर्ज पर महफूज देखना चाहता था ताकि वहां कोई दुश्मन परिंदा भी पर न मार पाता लेकिन उन सब इमारत को अंजाम देने की नौबत ही नहीं आयी थी। जिसके लिए उसने वो सब करना था, वही बाकी नहीं बचा था। तुकाराम शफा पाने के लिये परदेस गया तंदुरुस्त होकर लौटा तो मारा गया।

साथ में वागले भी।
अब तुकाराम का घर उसके नाम से चलते चैरीटेबल ट्रस्ट का आफिस था जिस पर उसी रोज एक बोर्ड टांगा गया था जिस पर दर्ज था :

कार्यालय अनिश्चित काल के लिये बंद है।
दोबारा खुलने की तारीख की सूचना स्थानीय
अखबारों के जरिये जारी की जायेगी।

‘‘जो होगा भला होगा।’’–विमल धीरे से बोला।
‘‘मसलन क्या?’’
‘‘जो भी होगा।’’
‘‘जिसकी तुम्हें खबर नहीं! भनक तक नहीं!’’
विमल खामोश रहा।

‘‘जवाब दो।’’–नीलम जिदभरे स्वर में बोली।
‘‘मेरे सामने एक मिशन है…’’
‘‘क्या नई बात है?’’
‘‘वो मिशन आखिरी है, ये नई बात है।’’

‘‘हर बार ऐसा ही बोलते हो। मेरी कर्मांमारी जिंदगी खत्म हो जायेगी, तुम्हारे मिशन खत्म नहीं होंगे।’’
‘‘तेरी जिंदगी ख़त्म हो जायेगी तो मेरी बाकी रहेगी? तेरी जिंदगी मेरी जिंदगी दो हैं!’’
‘‘नहीं हैं लेकिन तुम तो दो बनाने पर तुले हो!’’
‘‘खामखाह!’’

‘‘तुम्हारे सामने तो हमेशा ही मिशन है कोई न कोई। न हो तो गढ़ लेते हो। परोपकारी जो ठहरे। वो कहते नहीं हैं कि सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है!’’
‘‘कमाल है! तू साली मिडल फेल इतने फैंसी शेर कह लेती है!’’

‘‘पास। सौ बार बताया। और मुझे साली क्यों बोला?’’
‘‘बोल दिया तो क्या हुआ?’’
‘‘क्यों न हुआ? वैसे इतने भले मानस बनते हो! भले मानस हो तो ये लुच्ची बात क्यों तुम्हारे मुंह से निकली?’’
‘‘लुच्ची बात?’’

‘‘और नहीं तो क्या! वो तो शुकर है मेरी कोई बहन नहीं है वर्ना शर्तिया तुम्हारी उस पर निगाह होती।’’
‘‘ओये रहे रब दा नां, कहां से कहां पहुंचा दी बात तूने!’’
‘‘क्या गलत कहा मैंने?’’
‘‘गलत ही तो कहा! सरासर गलत कहा।’’

‘‘अच्छा! तो फिर क्यों बीवी देखकर साली याद आती है? क्योंकि अरमान मचलते हैं, ख्वाहिशें तड़पती हैं। और पता नहीं क्या क्या होता है! खुद बताओ।’’
‘‘ये तू बोल रही है?’’
‘‘और कौन है यहां तुम्हारे सामने? या आसपास भी?’’
‘‘अरी, कम्बख्त, तू सीरियस है या मजाक कर रही है?’’

‘‘तुम्हारा क्या खयाल है?’’
‘‘मेरा खयाल छोड़। कह कि मजाक कर रही है।’’
‘‘मजाक कर रही हूं…’’
‘‘शुकर है वाहे गुरु दा।’’
‘‘तुम्हारे कहने से कहा वर्ना…’’

‘‘वर्ना क्या?’’
‘‘थी तो मैं सीरियस ही।’’
‘‘दुर फिटे मूं।’’
‘‘अब क्या मिशन है तुम्हारे सामने?’’
‘‘है कोई। तेरी समझ में नहीं आयेगा।’’

‘‘क्यों! फारसी में बोलोगे?’’
‘‘अरे, तू इन बातों को नहीं समझती।’’

‘‘क्या नहीं समझती? क्यों नहीं समझती? है क्या समझने को? सिवाय इसके कि फिर कोई खून खराबा। फिर किसी के फटे में तुम्हारी टांग। फिर परोपकार का प्रेत तुम्हारे सिर पर सवार। वो जो सामने ‘बंद’ का बोर्ड टंगा है, सुना है वहां फरियादी आते हैं, फरियाद करते हैं, तुम सुनते हो और उन्हें राजी करके वापिस भेजते हो। चैम्बूर के दाता के नाम से जाने जाते हो। ऐसा है तो मैं भी वहां जा के खड़ी हो जाती हूं। फरियादी बन कर।’’

‘‘वो जगह बंद है।’’
‘‘परवाह नहीं। कभी तो खुलेगी!’’
‘‘ये एकाएक कैसी बातें करने लग गयी है तू?’’
‘‘मेरी बातों को छोड़ो। अपनी बात करो। तुम्हारे सामने तुम्हारा मिशन है। है तो मेरे लिये क्या हुक्म है?’’
‘‘हुक्म मानेगी?’’

‘‘नहीं मानूंगी तो क्या करूंगी? कोई चायस है मेरे पास!’’
‘‘तुझे…कुछ अरसा और…अज्ञातवास भुगतना होगा।’’
‘‘मुझे इस बात का अंदेशा था।’’
‘‘बस ये आखिरी बार…’’
‘‘हर बार आखिरी बार होती है।’’

‘‘आखिरी बार आखिरी बार।’’
‘‘कहने की बात है। बहलाने की बात है।’’
‘‘चंद रोज और मेरी जान फकत चंद ही रोज।’’
‘‘और नहीं बस और नहीं, तेरा बिछोड़ा और नहीं।’’
‘‘देख, सुन…’’

‘‘मैंने तुम जैसा जालिम मर्द नहीं देखा।’’
‘‘क्या बोला?’’

‘‘ठीक बोला। मेरे को, सूरज को, सोते छोड़ कर चले गये। मेरे पर तो न सही, दुधमुंहे बच्चे पर भी तरस न खाया। कभी पास न रखा। हमेशा दूर दूर ही करते रहे। कभी यहां छुप जा, कभी वहां गर्क हो जा; कभी यहां बैठ कर सुबह दोपहर शाम मेरी बाट जोह, कभी वहां दफा होकर विरह की अगन में भसम हो। मर। आधी रात को चौंक कर सोते से जागती हूं कि चन्न मेरा कुंडा खड़का रहा है और मैं अभागी कर्मांमारी सोई पड़ी हूँ। रात को चांद बादलों में जा छुपता है तो ये उम्मीद भी खत्म हो जाती है कि सूरज का बापू भी उस घड़ी चांद को देख रहा होगा। हिमाचल में मेरे गांव हरीपुर में मेरा पिता रात को कभी घर नहीं आता था तो मेरी मां रूंधे कण्ठ से एक गाना गाया करती थी, ‘वे तू इक वारी पौड़ी चढ़ माहिया, वे तू इकवारी वेड़े वड़ माहिया, वे मैं मंदा कदी न बोलां’। सरदार जी, मैंने तो कभी मंदा नहीं बोला, फिर मुझे ये सजाये किसलिये…’’

वो फफक कर रो पड़ी।
विमल ने खींच कर उसे अपने अंक में भर लिया।
‘‘कोई सजा नहीं, सोहनयो।’’–वो उसके कान के पास मुंह ले जाकर बोला–‘‘समझो कि इम्तहान की घड़ी है…’’

‘‘मैंने कोई इम्तहान नहीं देना।’’–नीलम बड़ी कठिनाई से बोल पायी–‘‘मैंने कोई इम्तहान पास नहीं करना। मैंने तुम्हारे पास रहना है। बस!’’
‘‘और मेरे में नुक्स निकालने हैं!’’

‘‘नहीं। तुम्हारे में नुक्स होंगे तो निकालूंगी न? तुम तो पारस पत्थर हो। पारस पत्थर में कौन नुक्स निकाल सकता है! मैं तो अपने करमों के बखिये उधेड़ रही हूं। सोच रही हूं कैसी सुहागन हूं मैं जिसे अपने सुहाग का साथ नसीब नहीं।’’

‘‘नीलम! नीलम! मैंने तुझे पहले ही कहा था, चेताया था कि मवाली की बीवी बेवा मरती है।’’
‘‘मवाली की न! मैंने किसी मवाली से शादी नहीं की।’’
‘‘तो किससे की?’’
‘‘एक भले, नेक, एतबारी, गुरां दा खौफ खाने वाले, दो टाइम गुरुद्वारे जाके मत्था टेकने वाले वाहे गुरु के खालसे से।’’

‘‘ऐसा ही था मैं।’’–विमल आह भर कर बोला–‘‘रह न पाया। तूने मुझे पारस पत्थर कहा, गलत कहा। पारस पत्थर से लोहा छूता है तो सोना हो जाता है। मैं तो कोयला हूं जो दहकता है तो जलाता है, बुझता है तो राख बन कर मुंह सिर पर उड़ता है।’’

‘‘शुभ शुभ बोलो। तुम मेरे लिये पारस पत्थर से भी बढ़कर हो।’’
‘‘और तेरे से आगे मेरी दुनिया खत्म है।’’
‘‘फिर बिछोड़ा क्यों?’’
‘‘क्योंकि वाहे गुरु की यही मर्जी है। जेवड़ भावे तेवड़ होय।’’
‘‘क्या मर्जी है वाहे गुरु की? बिछोड़ा?’’

‘‘कहते दिल हिलता है लेकिन हां।’’
‘‘और तुम्हें ये बात मालूम थी?’’
‘‘थी तो सही!’’
‘‘फिर कल सुबह उस चण्डाल के डेरे पर ये क्यों कहा था कि अब हम जियें या मरें, तीनों–मैं तुम और सूरज–एक साथ रहेंगे?’’

‘‘ख्वाहिश जाहिर की थी। ख्वाब देखा था।’’
‘‘ये क्यों कहा था कि अगर जलते घर में ही बसेरा करना था तो मैं तुम्हारे से अलग किसलिये? सूरज हमारे से अलग किसलिये?’’

‘‘जज्बाती होकर कहा था। वो ऊंच नीच विचारे बिना कहा था जो बाद में विचारी। तू बात को यूं समझ कि फिलहाल हमारे बीच फासला जरूरी है, बिछोड़ा जरूरी है तेरी और सूरज की सलामती के लिये। मेरा दिल हिलता है, कलेजा मुंह को आता है ये सोच के कि तुझे कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा?’’
‘‘तुम्हें कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा?’’

‘‘मुझे कुछ नहीं होगा। वाहे गुरु भली करेंगे। तुझे कुछ नहीं होगा। सूरज को कुछ नहीं होगा। जिसके सिर पर दशमेश पिता का हाथ हो, क्योंकर उसे कुछ हो सकता है! जिसके सिर ऊपर तू स्वामी, वो दुख कैसे पावे।’’
विमल ने कसकर नीलम को अपने साथ लिपटा लिया।
कुछ क्षण यूं ही गुजरे।

‘‘तेरी ये खामखयाली है’’–फिर वो धीरे से बोला–‘‘जो कि दूर होनी चाहिये कि मैं तेरे बिना सुखी हूं। तू मेरी जिंदगी की पहली और आखिरी मुराद है, मन्नत है, फिर मैं तेरे बिना अपना तसव्वुर कैसे कर सकता हूं! कोई साधु सन्यासी वैरागी ऐसे जंगल जंगल नहीं भटका होगा जैसे मैं तेरी तलाश में नंगे पांव चल कर वैष्णोदेवी पहुंचा था। बखिया के जुल्मात के जेरेसाया हुई तेरी मौत की खबर सुनने के बाद मैं कल्याण में मर ही चला था जब कि तुका ने मुझे–शराब में गोते लगाते मुझे–निश्चित मौत से उबारा था। जब दूसरे बखिया इकबाल सिंह ने मुझे बताया था कि नीलम मरी नहीं थी तो मुझे लगा था कि किसी ने मेरे कानों में अमृत घोला था, मुझे लगा था मुझे खुदाई मिल गयी थी। दिल्ली के दादाओं से तुझे छुड़ाकर लाया था तो मुझे लगा था कि तभी मेरी शादी हुई थी और मैं तुझे विदा कराके ले जा रहा था। अब आज देख क्या हुआ?’’


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