धब्बा - सुरेन्द्र मोहन पाठक Dhabba - Hindi book by - Surendra Mohan Pathak
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धब्बा

सुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :336
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7943
आईएसबीएन :9788176049573

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एक मामूली बेऔकात ‘धब्बा’ जो कत्ल के हल की बुनियाद बना

Dhabba - A Hindi Book - by Surendra Mohan Pathak

प्रकाश खेमका पर आरोप था कि वो अपनी मैगजीन ‘सरकता आंचल’ की ओट में ‘फ्रेंडशिप क्लब’ चलाता था।
वो इस इलजाम से मुक्त न हो पाता तो मैगजीन बन्द हो सकती थी। वो खुद बन्द हो सकता था।


धब्बा


शाम साढ़े आठ बजे के करीब सुनील यूथ क्लब पहुंचा।
लॉबी में एक स्टैण्ड पर एक नोटिस बोर्ड रखा था जिस पर प्लास्टिक के अक्षरों में दर्ज था :

मुशायरा

‘सरकता आंचल’ के सौजन्य से
केवल आमन्त्रित मेहमानों के लिये
स्वागतकर्त्ता : प्रकाश खेमका
समय : 8.00 सायं

उसने भीतर कदम रखा।
रिसैप्शनिस्ट सोनल सिक्का ने फीकी, बुझी हुई मुस्कराहट के साथ उसका स्वागत किया।
‘‘गुड ईवनिंग, सर।’’–वो बोली।
‘‘गुड ईवनिंग।’’–सुनील बोला–‘‘मुझे तुम्हारे भाई की मौत का अफसोस है।’’

उसके कपोलों पर आंसुओं की दो बूंदें ढुलक पड़ीं।
‘‘हौसला रखो। वक्त बड़े बड़े गम भुला देता है।’’
वो खामोश रही।
‘‘रमाकान्त कहाँ है?’’
‘‘आफिस में, सर।’’
रिसैप्शन के बाजू में ही रमाकान्त के आफिस का बन्द दरवाजा था जिसे ठेल कर सुनील ने भीतर कदम रखा।

अपनी एग्जीक्यूटिव चेयर पर अपने पसन्दीदा पोज में अधलेटा सा बैठा रमाकान्त बड़े तृप्तिपूर्ण भाव से चारमीनार के कश लगा रहा था। चेयर की पीठ फर्श से पैंतालीस डिग्री का कोण बनाती पीछे को झुकी हुई थी, मेज का एक नीचे का दराज खुला था जिस पर रमाकान्त ने अपने दोनों पांव टिकाये हुए थे और उसकी आंखें आधी बन्द थीं। उस स्थिति में उसे अधलेटा की जगह मुकम्मल लेटा भी कहा जा सकता था। आहट पाकर उसने आंखें पूरी खोलीं, सुनील को आया देखकर तत्काल दराज पर से पांव हटाये, एक पांव की ठोकर से दराज बन्द किया और कुर्सी पर सीधा हुआ।

‘‘आओ, प्यारयो’’–वो मधुर स्वर में बोला–‘‘जी आयां नूं।’’
‘‘थैंक्यू।’’
‘‘रखो तशरीफ।’’
सुनील उसके सामने एक विजिटर्स चेयर पर बैठ गया।
‘‘सानूं सजना बाज हनेरा’’–रमाकान्त तरन्नुम में बोला–‘‘ते चन्न भावें नित चढ़दा।’’

‘‘वाह!’’–सुनील बोला।
‘‘नहीं लबदे यार गवाचे, मिट्टी न फरोल कुड़िये।’’
‘‘मुशायरे का असर है।’’
‘‘आहो, यार। लेकिन मुकम्मल नहीं, वर्ना पंजाबी की जगह कुछ उर्दू में कहता।’’
‘‘मुशायरा!’’

‘‘कार्ड रूम के सामने वाले हॉल में। माडर्न तरीके से। जैसे किसी कारपोर्ट आफिस में बोर्ड आफ डायरेक्टर्स की मीटिंग हो।’’
‘‘फर्श पर चान्दनी बिछा कर नहीं? मसनद लगा कर नहीं?’’
‘‘नहीं। दायरे में मेज़ें सोफे कुर्सियां लगा कर। ड्रिंक्स के साथ।’’
‘‘आई सी।’’

‘‘शरोता कोई नहीं, माईंयवा…’’
‘‘क्या कोई नहीं?’’
‘‘शरोता। सुनने वाला।’’
‘‘ओह! श्रोता!’’
‘‘वही तो कहा मैंने! शुरू में एक बार झांकने गया था। एक बोलता है, बाकी सुनते हैं। भूतनी दे सारे शायर हैं, सारे शरोता हैं।’’

‘‘सरकता आंचल?’’
‘‘मैगजीन का नाम है।’’
‘‘सरकता आंचल!’’
‘‘हां। कहानियों की और शायरी की मंथली मैगजीन है।’’
‘‘लेकिन नाम सरकता आंचल?’’

‘‘आहो! रजिस्टर्ड मैगजीन है।’’
‘‘रजिस्ट्रेशन मिल गया?’’
‘‘जाहिर है कि मिल गया। जो सजेस्टिव मीनिंग तेरे जेहन में है, वो किसी की समझ में ही नहीं आया होगा–या किसी ने समझने की कोशिश ही नहीं की होगी–इसलिये मिल गया।’’

‘‘हूं। कहानियों की किस्म क्या होती है?’’
‘‘खुद देख। करन्ट इशु है मेरे पास।’’
रमाकान्त ने एक दराज से निकाल कर मैगजीन पेश की।
‘‘सूटा ला’’–वो बोला–‘‘फेर देख।’’

सुनील ने सहमति में सिर हिलाया और अपना लक्की स्ट्राइक का पैकेट निकाला। रमाकान्त ने अपने चालू सिग्रेट को तिलांजलि देकर नया सिग्रेट होंठों से लगाया, फिर उसने पहले सुनील का और फिर अपना सिग्रेट सुलगाया।
‘‘विस्की बोल अब।’’–वो बोला–‘‘नीट पियेगा या माशूक के साथ?’’
‘‘जैसे वड्डे भापा जी का हुक्म होगा, पी लूंगा लेकिन अभी ठहर के।’’

‘‘कोई मुजायका नहीं। ठहर के सही। विस्की पीने के बेहतरीन वक्त होते ही दो हैं। एक अभी, दूसरा ठहर के।’’
‘‘तुमने तो घूंट लगा लिया जान पड़ता है?’’
‘‘आहो, यार। मुशायरा शुरू हुआ तो खेमका के कहने पर जाकर बैठा न थोड़ी देर! तभी।’’
‘‘आई सी।’’
सुनील ने मैगजीन की तरफ तवज्जो दी।

उसके टाइटल पर बिपाशा बसु का बड़ा आकर्षक, सैक्सी पोज छपा हुआ था, भीतर तीन चौथाई पृष्ठों में सात आठ कहानियां थीं, आगे कुछ पृष्ठों में शायरी थी और आखिर के बाकी पृष्ठों में वर्गीकृत विज्ञापन छपे हुए थे।
पत्रिका का सम्पादक, प्रकाशक, मुद्रक, स्वत्वाधिकारी प्रकाश खेमका था और पते की जगह मैजेस्टिक सर्कल का एक पता छपा हुआ था।

सुनील ने पहली कहानी का शीर्षक पढ़ा। शीर्षक था : मेरी जवानी प्रेम दीवानी।
कहानी का लेखक था : धीर कुमार अधीर।
उसने एक जगह से कहानी की कुछ लाइनें पढ़ीं। लिखा था :

वो शीशे के आगे खड़ी थी और अपनी अन्तर घट तक प्यासी जवानी को निहार रही थी। उसने हौले से अपने ब्लाउज के बटन खोले और हौले से अपने उन्नत स्तनों को स्पर्श किया। तत्काल उसके सारे शरीर में कम्पकपी दौड़ गयी। उसने आंखें बन्द कर लीं और वो मयंक की कल्पना को अपने पहलू में साकार करने की कोशिश करने लगी। इतने से ही उस पर नशा तारी होने लगा और उसे लगने लगा कि उसके स्तनों को सहलाता हाथ उसका नहीं, मयंक का था।

तभी अपने पीछे उसे आहट सुनाई दी।
उसने घूम कर दरवाजे की तरफ देखा तो हरीश को भीतर दाखिल होते पाया। हरीश मुम्बई से आया उसके पिता के बचपन के दोस्त का लड़का था जो पिछले चन्द दिनों से दिल्ली में था और उनकी कोठी पर बतौर मेहमान उनके साथ रह रहा था। उसने घबराकर अपने वक्ष को ढंकने की कोशिश की।

‘‘कोई जरूरत नहीं।’’–हरीश मुस्कराता हुआ बोला–‘‘जो नजारा शीशा कर सकता है, वो मैं नहीं कर सकता?’’
‘‘तु…तुम…यहां!’’
‘‘हां। मैं यहां।’’
‘‘दरवाजा नॉक तो करना था!’’
‘‘नॉक करता तो ये नजारा कैसे होता! नाओ।’’–वो आगे बढ़ा।
‘‘नो!’’–तत्काल वो बोली–‘‘तुम जाओ यहां से।’’

‘‘जरूर। हुक्म सर माथे। लेकिन पहले जरा…’’
हवा के झोंके की तरह वो उसके पीछे पहुंचा और उसने उसे अपनी बाहों में दबोच लिया। उसकी दोनों हथेलियां उसके उरोजों पर पड़ीं और वहीं कस गयीं।

‘‘छोड़ो! छोड़ो!’’–वो उसकी पकड़ में छटपटाई।
‘‘हाथ पांव पटकने बन्द कर, साली। तू क्या समझती है कि ट्रेलर अपनी मर्जी से दिखा कर अब पूरी फिल्म देखने से मुझे रोक लेगी?’’
‘‘मयंक तुम्हारा खून कर देगा।’’
‘‘बुला ले। आवाज दे। आया तो छोड़ दूंगा।’’

सुनील ने उस कहानी को पढ़ना बन्द किया और मैगजीन को बीच में से खोला। वहां से जो कहानी शुरू होती थी उसका शीर्षक था ‘नयना नीर भरे’ और लेखक का नाम था रसिक लाल जामनगरी।
‘‘क्या मौगजीन है भई ये?’’–सुनील उसे वापिस मेज पर डालता बोला।
‘‘तू देख। तू बता क्या मैगजीन है!’’
‘‘सैमीपोर्नो जान पड़ती है।’’

‘‘ठीक पहचाना। काकाबल्ली, सैमी से ज्यादा पोर्नो होगी तो बैन लग जायेगा।’’
‘‘धीर कुमार अधीर। रसिक लाल जामनगरी। मैंने तो इन लेखकों का कभी नाम नहीं सुना।’’
‘‘कहीं हो तो सुने!’’
‘‘क्या मतलब?’’

‘‘ये नाम और बाकी लेखकों के नाम सब फर्जी हैं।’’
‘‘फर्जी नाम भी किसी के तो होंगे! कोई तो इन कहानियों को लिखता होगा!’’
‘‘सम्पादक के हैं। वो लिखता है।’’
‘‘तुम्हारा मतलब है सारे के सारे नाम प्रकाश खेमका के हैं और वो ही इन नामों से सब कहानियां लिखता है?’’
‘‘यही मतलब है मेरा।’’

‘‘सारी मैगजीन प्रकाशक सम्पादक प्रकाश खेमका लिखता है?’’
‘‘शायरी नहीं। शायरी के मुशायरे कराता है।’’
‘‘बिकती है ये मैगजीन?’’
‘‘हां। लेकिन किसी और ही वजह से।’’
‘‘वो क्या हुई?’’

‘‘मालको, मैगजीन के एण्ड में जो क्लासीफाइड ऐड्स हैं वो बड़े पर्सनल टाइप के हैं। इनमें से किसी का जवाब देने के लिये जवाब के साथ एक कूपन लगाना पड़ता है जो कि मैगजीन के आखिर में टाइटल की बैक पर छपता है। उस कूपन को वहाँ से काटने के लिये मैगजीन खरीदनी पड़ती है। बीस रुपए की कीमत अदा करके। क्या समझा?’’
‘‘क्या समझाना चाहते हो?’’

‘‘कोई शख्स दस ऐड्स का जवाब देगा तो उसे दस कूपन हासिल करने के लिए दस मैगजीन खरीदनी पड़ेंगी। पन्द्रह ऐड्स का जवाब देगा तो पन्द्रह मैगजीन खरीदनी पड़ेंगी। अब समझा?
‘‘हां।’’
‘‘शुकर है।’’

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