स्त्री : यौनिकता बनाम आध्यात्मिकता - प्रमीला के.पी. Stree: Yaunikta Banam Aadhyatmikta - Hindi book by - Prameela K.P.
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स्त्री : यौनिकता बनाम आध्यात्मिकता

प्रमीला के.पी.

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 8162
आईएसबीएन :9788126719129

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समकालीन स्त्री-चिन्तन, लिंग-संवेदना, स्त्री-प्रकृति, स्त्री-यौनिकता, देह-विमर्श, सांस्कृतिक संक्रमण, सिनेमा आदि विषयों के समायोजन में हिन्दी में यह पहला प्रयास है।

Stree: Yaunikta Banam Aadhyatmikta by Prameela

हिन्दी में विमर्श-ग्रन्थों की दुर्दशा का एक कारण आत्ममंथन की जगह आत्मश्लाघा का होना है। छोटे-बड़े मंचों पर बड़ी-बड़ी बातें अवश्य की जाती हैं, पर रूढ़ियों में जकड़े व्यक्ति की नीयत उसका देह-भाषा और बातचीत से जाहिर हो ही जाती है। हिन्दी में उपलब्ध ज्यादातर विमर्श-ग्रन्थों का यही द्वन्द्व है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति-केन्द्रित अनुभवों से ऊपर उठकर समष्टि मनुष्य के व्यापक हित की ओर ध्यान केन्द्रित करने की जरूरत है।

आज प्रचलित सभी विमर्शों में स्त्री-विमर्श अपने सर्वव्यापी वैचारिक महत्त्व के कारण सबसे महत्त्वपूर्ण है। इसका ताल्लुक संसार की आधी आबादी से है। वह आबादी जिसकी रचनात्मक के सक्रिय योगदान से यह दुनिया अभी तक वंचित रही आई है; और जिसके योगदान को रेखांकित करने की कोई प्रविधि पुरुष की मनीषा ने अभी तक ईजाद नहीं की है। आज के स्त्री-विमर्श का यह दायित्व है कि वह सभी वर्गों के लोगों की चेतना को इल दिशा में संवेदित करे। स्त्री-विमर्श का सचेतन प्रयास होना चाहिए कि सांस्कृतिक जन-जीवन को समग्रता के साथ ग्रहण कर समष्टि चिन्तन को व्यापक रूप दिया जाए। प्रस्तुत किताब इसी प्रयास को महत्ता के साथ रेखांकित करती है।

यह किताब स्पष्ट करती है कि स्त्री-विमर्श के साथ मनुष्य-जीवन के सभी पक्षों व विषयों का उचित समायोजन हो, क्योंकि स्त्री-पक्ष और स्त्री-चिन्तन का सतत पुनरवाचन एक ऐतिहासिक जरूरत है। विज्ञान और संचार-क्रान्ति की सम्भावनाओं में डूबते-उतराते सांस्कृतिक-जनजीवन के समक्ष यह किताब स्त्री-विमर्श की राह तो प्रशस्त तो करती ही है, साथ ही यह उम्मीद भी करती है कि खुद के साथ समस्त जीवों की संवेदनात्मक तपिश व वैचारिक उधेड़बुन से उपजे कुछ तथ्य सामने आएँ, ताकि स्त्री-विमर्श को नव-अन्तरानुशासिक मार्ग से आगे बढ़ाया जा सके। इसमें संदेह नहीं कि समकालीन स्त्री-चिन्तन, लिंग-संवेदना, स्त्री-प्रकृति, स्त्री-यौनिकता, देह-विमर्श, सांस्कृतिक संक्रमण, सिनेमा आदि विषयों के समायोजन में हिन्दी में यह पहला प्रयास है।



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