प्रेम गली अति संकरी - शाजी जमा Prem Gali Ati Sankaree - Hindi book by - Shazi Zaman
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प्रेम गली अति संकरी

शाजी जमा

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :104
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 8181
आईएसबीएन :9788126723027

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नाम के बावजूद, परम्परागत मायने में ये कोई प्रेमकथा नहीं

Prem Gali Ati Sankaree by Shazi Zaman

नाम के बावजूद, परम्परागत मायने में ये कोई प्रेमकथा नहीं, क्योंकि ये किसी तर्कसंगत (दुनियावी मायने में तर्कसंगत) मुक़ाम तक नहीं पहुँचती, लेकिन ये ज़रूर ज़ाहिर करती हैं कि कोई भी दृष्टिकोण - आधुनिक या परम्परागत - इंसानी ताल्लुक़ात की बारीकी, पेचीदगी और उसके ‘डाइनेमिक्स’ को पूरे तौर पर समझा पाने में सक्षम नहीं है।

‘प्रेम गली अति साँकरी’ की शुरुआत लंदन के इंडियन वाई. एम. सी. ए. से होती है एक रूहानी बहस के साथ - एक बहस जो कबीर और कल्पना को एक-दूसरे से क़रीब लेकिन इतिहास में बहुत दूर और समाज में बहुत गहरे तक ले जाती है।

कहानी का हर पात्र - कबीर, कल्पना, मौलाना, शायर, प्रोफेसर - अपने आप में एक प्रतीक है। इन पात्रों के लन्दन की एक छत के नीचे जमा हो जाने से परिवेश की परतें खुलती जाती हैं, और कबीर और कल्पना के बीच धूप-छाँव के ताल्लुक़ात से ‘जेंडर रिलेशंज’ की हजारों बरस की आकृति- और विकृति- दिखती जाती है। वो ‘बातों के सवार’ होकर न जाने कहाँ-कहाँ तक चले जाते हैं।

इंडियन वाई. एम. सी. ए. की नाश्ते की मेज़ से शुरु होने वाली कहानी का आख़िरी (फिलहाल आख़िरी) पड़ाव है लन्दन का हाईगेट सीमेट्री - कार्ल मार्क्स की आख़िरी आरामगाह - जहाँ बहस है मार्क्स, क्लास और जज़्बात की। कल्पना का यह आरोप कि मार्क्स ने जगह ही नहीं छोड़ी इन्सानी रूह के लिए, ‘बातों के सवार’ को मजबूर करता है यह सोचने के लिए कि क्या हालात और जज़्बात होते हैं जो हमेशा लोगों को करीब और दूर करते रहे हैं।

‘‘ऐसा सबद कबीर का, काल से लेत छुड़ाय’’, तुमने कहा।
‘‘कार्ल से लेत छुड़ाय’’, मैंने एक ठहाका लगाकर कहा।
ख़ामोश क़ब्रिस्तान में ठहाका काफ़ी देर तक और दूर-दूर तक गूँजता रहा। बातों के सवार आसमान के बदलते हुए रंग को देखते रहे।



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