प्रेम के नियम - रिचर्ड टेंपलर Prem ke Niyam - Hindi book by - Richard Templar
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प्रेम के नियम

रिचर्ड टेंपलर

प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :241
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8254
आईएसबीएन :978-81-317-5420

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मधुर और सुखद संबंधों की निजी निर्देशिका...

Prem ke Niyam - A Hindi Book - by Richard Templar

मधुर और सुखद संबंधों की निजी निर्देशिका
प्रेमपूर्ण और मज़बूत संबंध जीवन का आधार होते हैं। और कुछ लोग इस मामले में सचमुच माहिर होते हैं। वे अपनी पारखी नज़र से ऐसा साथी खोज लेते हैं, जो उन्हें सुखी बनाए। वे मुश्किल दौर में भी अपने दांपत्य जीवन को तरोताज़ा और बेहतरीन बनाए रखते हैं। वे आसानी से दोस्त बना लेते हैं और उनकी मित्रता, समय के लंबे इम्तिहान में उतरती है। वे एक शक्लिशाली और सहयोगी परिवार की धुरी होते हैं। उन्हें देखकर लगता ही नहीं कि इसके लिए उन्हें कोई कोशिश करनी पड़ रही है। लेकिन हममें से ज़्यादातर लोगों के लिए प्रेम करना इतना सीधा और सरल नहीं होता। प्रेम बुनियादी मानवीय भाव ज़रूर है, लेकिन जीवन में दूसरों के साथ तालमेल बैठाना हमेशा आसान नहीं होता।

क्या कुछ ऐसा है, जो ये लोग जानते हैं, पर हम नहीं जानते? क्या कुछ ऐसा है, जिससे हम सभी को फ़ायदा हो सके? जवाब है, हाँ। वे प्रेम के नियम जानते हैं।
प्रेम के नियम ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांतों का समूह है, जो मज़बूत, दीर्घकालीन और प्रेमपूर्ण संबंध बनाने और इन्हें क़ायम रखने में आपकी मदद करेंगे।
आप प्रेम के नियम के फ़ायदे महसूस करेंगे–और आपके आसपास का हर व्यक्ति भी।

नियम 1

अपने असल स्वरुप में रहें


जब भी आप किसी नए शख़्स से मिलते हैं, जो आपको सचमुच पसंद आया हो, तो क्या अपने बारे में ढोंग करने का मन नहीं करता? सामने वाले की नज़रें जो ढूँढ़ रही हैं, क्या वैसा दिखने के लिए मन नहीं ललचाता? आप वाकई दुनियादार दिख सकते हैं या शायद शक्तिशाली, ख़ामोश और रहस्यमय भी। ख़ामोश रहने से यह फ़ायदा भी होगा कि आप ग़लत समय पर चुटकुले नहीं सुनाएँगे और शर्मिंदा होने से बच जाएँगे।

सच तो यह है कि आप ढोंग नहीं कर सकते। एक-दो शामों या एक-दो महीनों के लिए भले ही ऐसा किया जा सकता है, लेकिन हमेशा के लिए नाटक करना बहुत भारी पड़ेगा। और वह शख्स आपकी पसंद है–आपकी पहली पसंद–जिसके साथ आप शायद अगली आधी सदी गुज़ारने वाले हैं। ज़रा कल्पना करें, पचास साल तक ख़ामोश रहने या अपने स्वाभाविक हास्यबोध को छिपाने का नाटक करना कैसा रहेगा?

यह नहीं होने वाला, है ना? और क्या आप सचमुच यह चाहते हैं कि आप ज़िंदगी भर नक़ली व्यक्तित्व का मुखौटा लगाकर रहें? कल्पना करें कि यह कैसा रहेगा, जब आप उसे खोने के डर से यह नहीं बता पाएँगे कि आपका वास्तविक स्वरूप वह नहीं है, जिसका आप ढोंग कर रहे हैं। और मान लें, उसे कुछ हफ़्तों, महीनों या वर्षों में जब पता चल जाए, और तब आप आख़िरकार सारी बात बताएँ? ज़ाहिर है, इससे वे ज़्यादा प्रभावित नहीं होंगे। आप भी नहीं होंगे, यदि आपको पता चले कि सामने वाला एक नक़ली चरित्र का नाटककर रहा था।

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आपको कभी-कभार व्यक्तित्व निखारने की कोशिश नहीं करनी चाहिए या खुद को थोड़ा बेहतर बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हम सभी को हर समय ऐसा करते रहना चाहिए और यह हमारे प्रेम-जीवन तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। सच है, आप थोड़े ज़्यादा व्यवस्थित या कम नकारात्मक होने की कोशिश कर सकते हैं। अपने व्यवहार को बदलना अच्छी बात है। यह नियम आपके मूलभूत व्यक्तित्व को बदलने के बारे में है। यह कोशिश कामयाब नहीं होगी और आप इसका नाटक करने की कोशिश में उलझकर रह जाएँगे।

तो अपने असल स्वरूप में रहें। बेहतर होगा कि आप इसी समय सारा ख़ुलासा कर दें। और यदि उसे आपके जैसे व्यक्ति की तलाश नहीं है, तो ज़्यादा गहरे संबंध में जाने से पहले ही उसे यह पता चल जाएगा। और पता है क्या होगा? हो सकता है सामने वाले को दुनियादार व्यक्ति दरअसल पसंद ही न हों। शायद शक्तिशाली और ख़ामोश लोग उन्हें रास ही न आते हों। शायद वे आपके स्वाभाविक हास्यबोध को ही ज़्यादा पसंद करें। शायद वे ऐसे व्यक्ति के साथ रहना चाहते हों, जिसे थोड़ी परवाह और देखभाल की ज़रूरत हो।

देखिए, यदि आप नाटक करते हैं, तो आप किसी ऐसे व्यक्ति को आकर्षित कर लेंगे, जो दरअसल आपके व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं होगा। ज़ाहिर है, इससे आपको या उन्हें कोई फ़ायदा नहीं होने वाला। याद रखें, कहीं न कहीं कोई न कोई ज़रूर है, जो बिलकुल आप जैसा इंसान ही चाहता है–आपके तमाम दोषों और असफलताओं के साथ। और मैं आपको एक और बात बताना चाहूँगा वह इन्हें दोष और असफलताओं के रूप में देखेगा भी नहीं। वह तो इसे आपके अनूठे आकर्षण का हिस्सा मानेगा। और वह सही होगा।
आगे बढ़ने से पहले बिगड़ चुके संबंधों से हुए नुकसान की भरपाई कर लें

ज़िंदगी हम सबको धक्का मारती है और चोट पहुँचाती है। यह अवश्यंभावी है। हममें से कुछ लोगों को दूसरों से ज़्यादा बुरी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। ज़ाहिर है, ज़ख़्मों से ही हमारा चरित्र निर्मित होता है, इसलिए लंबे समय के लिहाज से वे बुरे नहीं होते। लेकिन अल्पकाल में हम सभी को मैदान में दोबारा दाख़िल होने से पहले स्वस्थ होने के लिए समय की ज़रूरत होती है।

यदि आपके आख़िरी संबंध की वजह से आपकी भावनाएँ हिचकोले खा रही हैं, तो बेहतर यही होगा कि किसी नए प्रेमी या जीवनसाथी की तलाश से पहले आप बिगड़ चुके संबंधों के कारण हुए नुक़सान की भरपाई कर लें। वरना आप उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप नहीं दिखा पाएँगे और यदि आप ख़ुद में ही उलझे रहे, तो उन पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाएँगे।

यदि आप अपने नए संबंध में कोई ग़लती कर देते हैं (और यह हम सभी के साथ होता है), तो आप पहले से भी ज़्यादा ज़ख़्मी हो जाएँगे। और भले ही आपको कोई परवाह करने वाला प्रेमपूर्ण व्यक्ति मिल भी जाए, तब भी आप दोनों ही इस तथ्य के कारण संकट में आ सकते हैं कि आपमें से एक, नया संबंध शुरू करने के लिए अभी तैयार नहीं है।

मेरी एक मित्र है, जो एक संबंध के टूटने के बाद भावनात्मक टूटन महसूस कर रही थी। फिर उसे एक प्यारा सा इंसान मिला–अच्छे दिल वाला, ख़ुश रखने वाला, सुरक्षा देने वाला। जैसा मेरी उस मित्र ने सोचा था, वह वैसा ही था। अगले कुछ सालों तक उस आदमी ने उसकी देखभाल की, जब तक कि वह दोबारा आत्मविश्वास से भरपूर एक स्वतंत्र महिला नहीं बन गई। और इसके बाद क्या हुआ? इसके बाद उनके संबंध ने दम तोड़ दिया। उस शख़्स ने ऐसी महिला के साथ तो प्रेम नहीं किया था। बहुत से मर्दों को आत्मविश्वासी, स्वतंत्र महिलाएँ पसंद होती हैं, लेकिन वह उनमें से नहीं था। उसे तो ऐसी महिलाएँ पसंद थीं, जो नाज़ुक हों और जिन्हें देखभाल की ज़रूरत हो।

यही सबसे बड़ा ख़तरा है। भले ही आप अपने लिए आदर्श जीवनसाथी खोज लें, लेकिन वह आपकी वर्तमान स्थिति के हिसाब से ही आदर्श होगा, आपके भावनात्मक रूप में स्वस्थ होने के बाद नहीं–जैसे कि आप सचमुच हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि ऐसे संबंध कभी कारगर नहीं हो सकते, लेकिन यह बहुत, बहुत दुर्लभ होता है।

तो ख़ुद पर एक एहसास करें। जब आपके ज़ख़्म भर रहे हों, तो कहीं जाकर छिप जाएँ। अपने मित्रों और परिवार के साथ का आनंद लें। कमोबेश सामान्य होने का इंतज़ार करें और इसके बाद ही नए जीवनसाथी की तलाश शुरू करें। जब आप इसकी शुरुआत करें, तो किसी ऐसे व्यक्ति को चुनने की कोशिश करें, जिसके जख़्म भी अच्छे से भर चुके हों–क्योंकि ज़ाहिर है, यह नियम दूसरे ध्रुव पर भी उतना ही लागू होता है। इस तरह आप दोनों ही एक-दूजे के वास्तविक स्वरूप को देख सकेंगे और अपने संबंध को उस तरह शुरू कर सकेंगे, जिस तरह आप इसे आगे बढ़ाना चाहते हैं।
आप साथी के साथ तब तक खुश नहीं रहेंगे,
जब तक कि अकेले खुश न रह सकते हों

मैं एक ऐसी महिला को जानता था, जो हमेशा किसी न किसी से प्रेमसंबंध जोड़कर रखती थी। आप ऐसे इंसानों को तो जानते ही होंगे–हो सकता है आप भी ऐसी ही प्रवृत्ति के हों। जैसे ही एक संबंध टूटता, तो दूसरा शुरू हो जाता। मैंने उससे एक बार इसका कारण पूछा। उसने बताया कि उसे अकेले रहना पसंद नहीं, इसलिए वह इसकी नौबत ही नहीं आने देती। जब मैं धीरे-धीरे उसे अच्छी तरह जानने लगा, उस समय उसका एक पुरुष के साथ प्रेमसंबंध चल रहा था। वैसे तो वह बिलकुल सभ्य था, लेकिन वह उसे वैसा प्रेम नहीं दे रहा था, जिसकी वह हक़दार थी। मैंने उससे पूछा कि वह इस रिश्ते को क्यों झेल रही है। उसने धैर्य से जवाब दिया कि उसके पास कोई विकल्प नहीं है। एकमात्र विकल्प अकेले रहना था, जिसे वह बर्दाश्त कर नहीं सकती थी।

अंत में हालात सचमुच बदतर हो गये और उस पुरुष ने उसे छोड़ दिया। उस महिला को आशंका थी कि अब वो अवसाद ग्रस्त हो जाएगी। वह इसके लिए तैयार भी थी। करीब एक महीने बाद मैंने उससे पूछा कि उसके हाल-चाल कैसे हैं। उसने बताया, ‘फ़िलहाल तो ठीक हैं। हालाँकि मैंने सोचा था अब तक मैं पूरी तरह टूट जाऊँगी, लेकिन ज़ाहिर है, इसमें उम्मीद से ज़्यादा समय लग रहा है।’

मुझे लगता है कि छह महीने बाद जाकर आख़िर उसे समझ आ गया कि दरअसल उसे कोई अवसाद नहीं होगा और न ही वह भावनात्मक रूप से टूटेगी। इसके तीन महीने बाद वह एक आकर्षक आदमी से मिली, जो गंभीर था और जल्द से जल्द उसके साथ रहना चाहता था, लेकिन महिला ने प्रतिरोध किया। वह अकेले ही बड़े मज़े में थी।

इस कहानी में मुख्य बात यह है कि वह ख़राब संबंधों में रही और उसने जबरन आलोचना बर्दाश्त की, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसे अकेले रहने से डर लगता था।

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