870 गोपाल - गीताप्रेस 870 Gopal - Hindi book by - Gitapress
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870 गोपाल

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :18
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 845
आईएसबीएन :81-293-0678-6

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श्रीकृष्ण की बाललीलाओं का वर्णन...

Gopal A Hindi Book by Gitapress - गोपाल - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ

एक बार भगवान् श्यामसुन्दर गोपकुमारों के साथ खेल रहे थे। श्रीदामा, बलराम तथा मनसुखा आदि उनके साथ क्रीड़ा रसमयी क्रीड़ा का आनन्द ले रहे थे। इस खेल में एक बालक के हाथ में ताली मारकर भागता और दूसरा उसे पकड़ने का प्रयास करता था। बलराम ने कहा- ‘मोहन ! तुम मत भागो, तुम अभी छोटे हो, तुम्हारे पैरों में चोट लग जायगी।’

मोहन ने कहा-‘दाऊ ! भला, ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं अपने साथियों के साथ खेल में हिस्सा न लूँ। मैं दौड़ना जानता हूँ। मेरे शरीर में बहुत बल है। मेरी जोड़ी श्रीदामा है। वह मेरे हाथ में ताली मारकर भागेगा और मैं उसे पकड़ूँगा।’ श्रीदामा ने कहा- ‘नहीं, तुम मेरे हाथ में ताली मारकर भागो, मैं तुम्हें पकड़ता हूँ।’ इस प्रकार भगवान् श्यामसुन्दर श्रीदामा के हाथ में ताली मारकर भागे और श्रीदामा ने उन्हें पकड़ने के लिये उनके पीछे-पीछे दौड़ा। थोड़ी दूर जाकर ही उसने श्याम को पकड़ लिया। श्याम सुन्दर ने कहा- ‘मैं तो जान-बूझकर खड़ा हो गया हूँ। तुम मुझे क्यों छूते हो ?’

ऐसा कहकर, श्याम श्रीदामा से झगड़ने लगे। श्रीदामा ने कहा- ‘पहले तो तुम जोश में आकर दौड़ने खड़े हो गये और जब हार गये तो झगड़ा करने लगे।’ बलरामजी बीच में बोल पड़े- ‘इसके तो न माता है और न पिता ही। नन्दबाबा और यशोदा मैया ने इसे कहीं से मोल लिया है। यह हार-जीत तनिक भी नहीं समझता। स्वयं हारकर सखाओं से झगड़ पड़ता है।’ ऐसा कहकर, उन्होंने कन्हैया को डाँटकर घर भेज दिया।

मोहन रोते हुए घर पहुँचे। यशोदा मैया रोने का कारण पूछने लगीं। मोहन ने रोते हुए कहा- ‘मैया ! दाऊ दादा ने आज मुझे बहुत ही चिढ़ाया। वे कहते हैं कि तू मोल लिया हुआ है, यशोदा मैया ने तुझे भला कब जन्म दिया। मैया ! मैं क्या करूँ, इसी क्रोध के मारे खेलने नहीं जाता। दाऊ ने मुझे कहा कि बता तेरी माता कौन है ? तेरे पिता कौन हैं ? नन्दबाबा तो गोरे हैं और यशोदा मैया भी गोरी हैं। फिर तू साँवला कैसे हो गया ? ग्वाल-बाल भी मेरी चुटकी लेते हैं और मुस्कराते हैं। तुमने भी केवल मुझे ही मारना सीखा है, दाऊँ दादा को कभी डाँटती भी नहीं।’

मैया ने कन्हैया के आँसू पोछते हुए कहा- ‘मेरे प्यारे मोहन ! बलराम तो चुगलखोर है, वह जन्म से ही धूर्त है। तू तो मेरा दुलारा लाल है। काला कहकर दाऊं तुम्हें चिढ़ाता है। तुम्हारा शरीर तो इन्द्र-नीलमणि से भी सुन्दर है, भला, दाऊ तुम्हारी बराबरी क्या करेगा। श्यामसुन्दर ! मैं गायों की शपथ लेकर कहती हूँ कि मैं तुम्हारी माता हूँ और तुम ही मेरे पुत्र हो।’

गोविन्द का गो-प्रेम


गोपाल का गायों से प्रेम तो निराला ही था। गायों का गोकुल में जन्म भी उनके अनेक जन्मों के पुण्य का परिणाम था। वे कितनी भाग्यशालिनी थीं कि उन्हें श्रीकृष्ण का पुचकार-भरा प्रेम मिलता था। गोपाल बार-बार अपने पीताम्बर से गायों के शरीर की धूल साफ करते तथा तथा उन्हें अपने कोमल हाथों से सहलाते थे। गायों को भी श्रीकृष्ण को देखे बिना चैन नहीं मिलता था। वे बार-बार श्रीकृष्ण के दर्शन की लालसा से नन्दभवन के मुख्य दरवाजे की तरफ टकटकी लगाये देखा करतीं, ताकि जैसे ही श्रीकृष्ण निकलें वे अपनी आँखों को उनके दर्शन से तृप्त कर सकें। जब भी मोहन बाहर निकलते गायें उनके शरीर को अपनी जीभ से चाट-चाटकर अपना सम्पूर्ण वात्सल्य उनके ऊपर उड़ेलती रहती थीं। गायें भी यशोदा मैया से कम भाग्यशालिनी नहीं थीं, क्योंकि उन्हें कन्हैया को अपना दूध पिलाने का अवसर प्राप्त हो रहा था और बदले में कन्हैया का प्रेम मिल रहा था। गोकुल या व्रज में रज-कण भी बन जाना बहुत बड़े सौभाग्य की बात है। रसखान ने भगवान् से याचना करते हुए कहा है-


जो पशु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मझारन।
पाहन हौं तो वही गिरिको जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर धारन।।


कन्हैया गायों को माँ की तरह प्यार करते थे। इसी से मौका मिलते ही उनके पास चले जाते थे।
एक दिन कन्हैया सुबह-सुबह नन्दभवन से निकलकर गोशाला में पहुँच गये। वहाँ पर एक गाय उन्हें अपना दूध पिलाने के लिये उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। वात्सल्य-स्नेह से उस गाय का दूध अपने-आप चू रहा था। गाय की दृष्टि एकटक नन्दभवन के दरवाजे पर लगी थी, ताकि श्रीकृष्ण बाहर निकलें और वह उन्हें अपना दूध पिलाकर अपना जीवन सार्थक कर सके।
इधर यशोदा जी कन्हैया को चारों तरफ देख रही

थीं। वे बार-बार गोपाल को पुकार रही थीं। कान्हा ! ओ कान्हा ! तू कहाँ गया, अरे जल्दी से आ भी जा। मैं कबसे तेरी प्रतीक्षा कर रही हूँ, लेकिन कन्हैया होता तब न सुनता, वह तो अपनी मैया माँ का दूध पी रहा था। यशोदा उसे पुकारती हुई सोच रही थीं, पता नहीं लाला कहाँ चला गया है। उसने अभी तक कलेवा भी नहीं किया है। खिड़की से बाहर झाँककर उन्होंने देखा कि कान्हा गैया माता के थन में मुँह लगाकर दूध पी रहा है। गाय कन्हैया का सिर चाट रही है। यशोदा मैया ने कहा कि गैया माँ ! तू धन्य है। मैं तो अभी कन्हैया के कलेवा की चिन्ता कर रही थी और तूने उसे दूध भी पिला दिया। मैं तुम्हें शत-शत नमन करती हूँ।

ब्राह्मण पर श्रीकृष्ण-कृपा


एक दिन नन्द-यशोदा के यहाँ एक तत्त्वज्ञ ब्राह्मण आये। वे भगवान् के अनन्य भक्त थे। उन्हें देखकर यशोदा मैया को बड़ा ही आनन्द हुआ। मैया ने बड़ी ही श्रद्धा-भक्ति से ब्राह्मण के पैर धोकर उन्हें बैठने के लिये सुन्दर आसन दिया। कन्हैया को बुलाकर उन्होंने विप्र देवता के चरणों में साष्टांग प्रणाम करवाया। कन्हैया को देखते ही ब्राह्मण देवता आश्चर्यचकित रह गये। उनके नेत्र एकटक उस भुवनमोहन की छवि-माधुरी में डूबते-उतराते रहे। फिर अपने आपको सँभालकर उन्होंने कहा- ‘यशोदा ! तुम्हारा लाल कोई साधारण बालक नहीं है, यह तो कोई अवतारी पुरुष लगता है। इसका सुयश गाकर युग-युग तक लोग भवसागर से तरते रहेंगे।’ मैया ने कहा- ‘ब्राह्मण देवता ! आप कन्हैया को आशीर्वाद दें कि भगवान् इसकी हर विपत्ति से रक्षा करें। ब्राह्मणों का आशीर्वाद अमोघ होता है। इसलिये आप इस बालक पर कृपा करें। भगवन् ! बचपन से ही इसके ऊपर एक-से-एक विपत्ति आ रही है, पता नहीं, विधाता ने इसके भाग्य में क्या लिखा है ?’

ब्राह्मण ने कहा- ‘यशोदा ! तुम्हें इसकी चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है। यह बालक गौ, विप्र तथा धर्म का संरक्षक होगा। संसार की कोई भी विपत्ति इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगी। इसका तो नाम लेकर लोग सम्पूर्ण विपत्तियों से मुक्ति पा जायँगे। यह बालक दुष्ट-संहारक तथा भक्त-उद्धारक होगा।’
कुशलोपरान्त यशोदा ने कहा- ‘भगवन् ! आप जो भी प्रसाद पाना चाहें, बना लें। मैं आपके इच्छानुसार व्यवस्था कर दूँगी।’ विप्रदेव ने खीर बनाने की इच्छा प्रकट की और यशोदा जी ने तत्काल उनके आदेशानुसार सब चीजें सुलभ करवा दीं।


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