869 कन्हैया - गीताप्रेस 869 Kanhaiya - Hindi book by - Gitapress
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869 कन्हैया

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :19
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 851
आईएसबीएन :81-293-0677-8

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भगवान श्रीकृष्ण के जीवन पर आधारित कथा...

Kanhaiya - A Hindi Book by Gitapress - कन्हैया - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भगवान् श्रीकृष्ण

जब –जब संसार में पाप बढ़ता है तथा धर्म की हानि होती है तब-तब सर्वशक्तिमान भगवान श्रीहरि का अवतार होता है वे अवतार लेकर धर्म की स्थापना करते है साधुओं को निर्भय करते है दुष्टो का विनाश करते है तथा अपने भक्तों को सुख देते है उनके आलावा उनके जन्म-कर्म के वास्तविक रहस्यों को कोई नहीं जानता। उनकी मायाका खेल ही जीवके जन्म, जीवन और मृत्यु का कारण है।

पृथ्वी का भार उतारने के लिये द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा में अवतार लिया उन्होंने ऐसी-ऐसी लीलाएँ कीं, जिनके वर्णन में बड़े-बड़े देवता तथा ऋषि-मुनि भी असमर्थ हैं। भगवान ने पृथ्वी का भार उतारने के साथ अपने पवित्र यश का विस्तार किया जिनका गान और श्रवण करने से दुख और शोक और अज्ञान सब नष्ट हो जाते हैं। उन्होंने अपनी प्रेमभरी मुस्कान और मधुर चितवन से मनुष्यलोक को आनन्दसे सराबोर कर दिया।

भगवान् श्रीकृष्ण का स्यामल शरीर अत्यन्त सुन्दर था। उनके मुख कमल की शोभा तो निराली ही थी उनके कान सुन्दर कुण्डलों से सुशोभित थे। उनकी एक-एक मुस्कानपर सभी नर-नारी न्योछावर हो जाते थे।
लीला पुरुष भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार तो लिया वसुदेव के घर, परन्तु नन्दबाबा तथा ग्वाल-बालों को अपनी बाल-लीला का सुख देने के लिये वहां से नन्द के घर चले आये। उनकी बाल लीला तथा सुन्दर चितवन से गोप-गोपिकाएँ धन्य हो गयीं। बचपन से ही प्रभु श्रीकृष्ण ने लीलापात्र से कंसके द्वारा भेजे गये राक्षसों का वध करना शुरू कर दिया, छठी के दिन ही उनके वध के लिये आयी पूतना का उन्होंने देखते-ही-देखते संहार कर दिया। तृणावर्त, केशी, अरिष्टासुर, बकासुर, प्रलम्बासुर धेनुकासुर-जैसे महाबलवान् राक्षस श्रीकृष्ण के द्वारा यमलोक सिधार गये। उन्होंने कालियानाग को नाथकर उसके सहस्र फणों पर नृत्य किया तथा यमुनाके पवित्र जलको कालियानाग के विषसे मुक्त कर दिया। गोवर्धन धारण कर श्रीकृष्ण ने इन्द्र के गर्वको चूर-चूर कर डाला। वज्रकी गोपिकाओं को उन्होंने रासनृत्य के द्वारा आनन्दित किया।

भगवान् श्रीकृष्ण गोकुलमें अपनी लीलाओं का प्रयोजन पूरा कर मथुरा लौट आये। वहां उन्होंने कंस तथा उनके क्रूर सहयोगियो का संहारकर अपने माता-पिताका कारागार से उद्धार किया उग्रसेन को पुनः राजा बनाया कंस के संबन्धी बड़े-बड़े असुर राजाओं का सेना सहित संहार किया। भगवान श्री कृष्णने जब जरासंधकी तेईस अक्षौहिणी सेनापर सहज ही विजय प्राप्त कर ली, उस समय बड़े-बड़े देवताओं ने उन पर नन्दनवन के फूलों की वर्षो के साथ उनके इस महान कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

उन्होंने अपनी योगमाया के व्दारा सोते हुए अपने सम्बन्धियों तथा पुरवासियों को द्वारका पहुंचा दिया, कालयवन के सामने से भागकर अपना रणछोड़ नाम सार्थक किया। मुचुकुन्दके द्वारा श्रणमात्र में कालयवनकों भस्म करा दिया तथा उन्हें अपना दर्शन देकर कृतार्थ किया। द्वारका में रहकर उन्होंने अपना विवाह किया तथा हजारों पुत्र उत्पन्न किये। कौरव और पाण्डव के परस्पर कलह में उन्होंने पृथ्वीका बहुत सा भार हल्का कर दिया तथा संसार में अर्जुन के विजयका डंका बजवा दिया। उद्वव को आत्मज्ञान का उपदेश करने के बाद उन्होंने सहज भावसे अत्याचारी बने यदुवंशका भी संहार करवा दिया। इसके बाद वे महायोगी भगवान् श्रीकृष्ण अपने परमधाम पधारे।

कारागार में श्रीकृष्णावतार


कंस को मगध नरेश जरासंध तथा अनेक बलशाली राजाओंका सहयोग प्राप्त था। उनकी मदद से वह यदुवंशियोंका नाश करने लगा। यदुवंशी कंसके अत्याचारसे भयभीत होकर दूसरे देशों में जाकर बसने लगे। उसने-एक-एक करके देवकी के छः पुत्रोंकी हत्या कर डाली। अन्तमें सातवें गर्भ के रूप में भगवान् शेष जी देवकी के गर्भ में थे। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया को आदेश दिया कि तुम इस समय देवकी के गर्भ में स्थिति शेषजी को रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दो मैं सम्पूर्ण कलाओं के साथ देवकी का पुत्र बनूंगा और तुम नंदगोप की पत्नी यशोदा के गर्भ से जन्म लेना। भगवान के आदेश से योगमायाने वैसा ही किया।

कुछ दिनों बाद देवकी के शरीर की कान्ति से बन्दीगृह जगमगाने लगा, यह देखकर कंसने सोचा कि इस बार अवश्य ही इसके गर्भ में मेरे प्राणों के ग्रहण विष्णु ने प्रवेश किया है। परन्तु एक तो यह स्त्री है और दूसरे मेरी बहन है और तीसरे गर्भवती है इसको मारने से मेरी कीर्ति नष्ट हो जाएगी। इसलिये मैं इसका वध नहीं करूँगा। कंस इतना अधिक दुष्ट था कि वह देवकी को आसानी से मार सकता था। पर इस समय उसने स्वयं ही क्रूरता का विचार छोड़ दिया। अब विष्णु के प्रति वैर ठानकर उनके जन्म की प्रतीक्षा करने लगा।

आखिर प्रतीक्षा का समय समाप्त हुआ। भगवान् के अवतार की शुभ घड़ी आ गयी। रोहणी का पावन नक्षत्र था। आकाश के सभी नक्षत्र तारे, शान्त और सौम्य हो गये निर्मल आकाश में तारे जगमगा रहे थे, पृथ्वी की छटा निराली हो गयी। आज बहुत दिनों बाद पृथ्वी के स्वामी भगवान् उनका भार हरण करने के लिये अवतार ले रहे थे। इसलिये वह पलक-पाँवड़े बिछाकर तथा हृदय को खोलकर प्रभु के दर्शन के लिये तैयार हो गयीं।

जिस समय भगवान के अवतार का अवसर आया स्वर्ग में देवताओं की दुन्दुभियाँ अपने-आप बज उठीं। किन्नर और गन्धर्व मधुर स्वरमें गाने लगे। अप्सराएँ नृत्य करने लगी बड़े-बड़े देवता और ऋषि आनन्द से भरकर पुष्पो की वर्षा करने लगे। जल से भरे हुए बादल गर्जना करने लगे भद्र पद से कृष्ण पक्ष की घोर अंधेरी आधीरातों को तीनों लोकों के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण देवकीके गर्भ से प्रकट हुए।

वसुदेव जी ने देखा, उनके सामने एक अद्भुत बालक हैं। उनके नेत्र कमल के सामान कोमल और विशाल हैं। वह चार सुन्दर हाथो में शंख, चक्र, गदा और कमल लिये हुए है। उसके गले में कौस्तुभ मणि झिलमिला रही है। उसके श्यामल सुन्दर शरीर पर मनोहर पीताम्बर फहरा रहा है उसके कमर में करधनी की लड़िया लटक रही है। आभूषणों से सुशोभित बालक के अंग-अंग से अनोखी छटा छिटक रही है। जब वसुदेव ने देखा कि मेरे पुत्र में साक्षात श्रीहरि आये है तो उनके आनन्द का ठिकाना न रहा। उसका रोम-रोम आनन्द से भर गया मन-ही-मन उन्होंने ब्राह्मणों को दस हजार गायें देने का संकल्प कर डाला। श्रीकृष्ण की अंगकान्ति से सूतिका गृह जगमगाने लगा। वसुदेव ने श्रीहरि के चरणों में शीश झुका दिया और स्तुति करने लगे। उनका सारा भय जाता रहा। माता देवकी ने कहा- ‘प्रभो ! पापी कंस को कहीं या मालूम न हो जाये कि आपका जन्म मेरे गर्भ से हुआ है आपके लिये मैं कंस से बहुत डर रही हूँ। आप अपने इस रूप को छिपाकर बालक रूप में हो जाइये।’


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