868 भगवान् सूर्य - गीताप्रेस 868 Bhagwan Surya - Hindi book by - Gitapress
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868 भगवान् सूर्य

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :16
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 855
आईएसबीएन :81-293-0275-6

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भगवान सूर्य का वर्णन...

Bhagwan Surya - A Hindi Book by Gitapress - भगवान् सूर्य - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ॐ श्रीपरमात्मने नम:

भगवान् सूर्य

उदये ब्रह्मणो रूपं मध्याह्ने तु महेश्वर:। अस्तकाले स्वयं विष्णुस्त्रिमूर्तिश्च दिवाकर:।।

रात्रि की बड़ी बहन, आकाश की छोटी बेटी, वरुण की भगिनी, स्वर्ग की दुहिता उषा सुन्दरी एक युवती की भाँति प्रकाशमय नित्य नवीन परिधान पहने हुए सारे प्राणिसमूह को जगाती है। पैरवालों को अपने-अपने काम पर भेजती है तथा परवाले पक्षियों को आकाश में विचरण करने के लिये प्रेरित करती है। वह अपने अराध्य भगवान् सूर्य का मार्ग प्रशस्त करती है। ऋषीगण इसी काल में अपनी मुक्ति का मार्ग ढूँढ़ते हैं। एक ऋषि उषा से प्रार्थना करता है कि ‘यदि आप हमें परमात्मा का दर्शन न करा सकीं तो भला दूसरा कौन करा सकता है ?’ सुदूर क्षितिज पर विराजमान-सविता भगवान् की स्वर्णिम छटा किसके मन को आह्लादित नहीं करती ! भगवान् सविता का बालरूप- अरुणोदयकाल ऐसा प्रतीत होता है मानो पूर्व दिशा की गोद में स्थित मार्तण्डशिशु अपनी मधुर मुसकान से सारे संसार को मुग्ध करता हुआ किरणों के बहाने से पृथ्वी पर चलने अर्थात् चराचर जगत् को कार्य करने की प्रेरणा दे रहा हो।

जगत् की समस्त घटनाएँ तो सूर्यदेव की ही लीला-विलास हैं। एक ओर जहाँ भगवान् सूर्य अपनी कर्म-सृष्टि-रचनाकाल की लीला से प्रात:काल में जगत् को संजीवनी प्रदान कर प्रफुल्लित करते हैं तो वहीं दूसरी ओर मध्याह्मकाल में आप अपनी ही प्रचण्ड रश्मियों के द्वारा शिवरूप से सम्पूर्ण दैनिक कर्म-सृष्टि का आवश्यकतानुसार यथासंमय अपने में ही विलय करता है, ठीक उसी प्रकार भगवान् आदित्य मध्याह्नकाल में अपनी रश्मियों के द्वारा महेश्वररूप से सृष्टि के दैनिक विकारों को शोषित कर कर्म-जगत् को हृष्ट-पुष्ट, स्वस्थ और निरोग बनाते हैं। किं बहुना-जगत्-कल्याण के लिये भगवान् सूर्य की यह दैनिक विकार-शोषण की लीला भी भगवान् नीलकण्ठ के हलाहल पान का प्रतीक है। दिनभर सारे जगते में प्रकाश और आनन्द बिखेरकर सांध्यवेला में अस्ताचल की ओर जानेवाले भागवान् भास्कर का सौन्दर्य भी अद्भुत है। सायं-संध्या योगियों के ब्रह्म-साक्षात्कार सोपान है। अपने-अपने इष्टदेवों-गणेश, शिव, विष्णु, आदि का ध्यान भी सूर्यमण्डल में करने का शास्त्रीय विधान है।

इन्हीं कल्याणकारी भगवान् सूर्य की कृपा का ही परिणाम है प्रस्तुत पुस्तक- भगवान् सूर्य। इसमें बारह आदित्यों के चित्ताकर्षण चित्र के साथ-साथ प्रत्येक मास के सूर्य का ध्यान, वर्ण, आयुध, व्रत-उपासना तथा लीला कथा का सरस चित्रण है। धर्मप्राण जिज्ञासुओं के लिये इस पुस्तक में शास्त्रीय दृष्टिकों प्रस्तुत किया गया है। यह निश्चय ही भगवान् सूर्य के बहुआयामी स्वरूप के संबंध में विस्तृत जानकारी उपलब्ध करायेगा जो नयी होने के साथ-साथ उपयोगी भी सिद्ध होगी।
आशा है, सुहृद् पाठक इस पुस्तक का सदा की भाँति हार्दिक स्वागत करेंगे।

प्रकाशक

धाता सूर्य का ध्यान


धाता कृतस्थली हेतिर्वासुकी रथकृन्मुने।
पुलस्त्स्तुम्बुरुरिति मधुमासं नयन्म्यमी।।1।।
धाता शुभस्य मे दाता भूयोऽपि भूयस:
रश्मिजालसमाश्लिष्टस्तमस्तोमविनाशन:।।2।।

जो भगवान् सूर्य चैत्र मास में धाता नाम से कृतस्थली अप्सरा, पुलस्त्य ऋषि, वासु की सर्प, रथकृत यक्ष, हेति राक्षस तथा तम्बुरु गन्धर्व के साथ अपने रथ पर रहते हैं, उन्हें तथा हमारा पुन:-पुन: कल्याण करें। धाता सूर्य आठ हजार किरणों के साथ तपते हैं तथा उनका रक्त वर्ण है।

काशी के द्वादशादित्य
भगवान् सूर्य का काशीगमन तथा लोलार्ककी कथा

एक बार भगवान् शिव ने सूर्य को बुलाकर कहा- ‘सप्ताश्वाहन ! तुम मंगलमयी काशीपुरी को जाओ। वहाँ का राजा परम धार्मिक है। उनका नाम दिवोदास है। राजा के धर्मविरुद्ध आचरण से जिस प्रकार काशी उजड़ जाय, वैसा उपाय, करो। परंतु उस राजा का अपमान मत करना, क्योंकि धर्माचरण में लगे हुए सत्पुरुष का जो अनादर किया जाता हैं; वह अपने ही ऊपर पड़ता है और वैसा करने से महान् पाप होता है यदि तुम्हारे बुद्धिबल से राजा धर्मच्युत हो जाय, तब अपनी दु:सह किरणों से तुम नगर को उजाड़ देना। धर्माचरण में कोई छिद्र न ढूँढ़ सके और असफल होकर लौट आये। दिवाकर ! इस संसार में जितने जीव हैं, उन सबकी चेष्टाओं को तुम जानते हो, इसलिए लोकचक्षु कहलाते हो। अत: मेरे कार्य की सिद्धि के लिए तुम शीघ्र जाओ। मैं काशी को दिवोदास से खाली कराकर वहाँ निवास करता चाहता हूँ।’

भगवान् शिव की आज्ञा शिरोधार्य करके सूर्यदेव काशी गये। वहाँ बाहर-भीतर विचरते हुए उन्होंने राजा में थोड़ा-सा भी धर्म का व्यतिक्रम नहीं देखा। वे अनेक रूप धारण करके काशी में रहे। कभी-कभी उन्होंने नाना प्रकार के दृष्टान्तों और कथानकों के द्वारा अनेक प्रकार के व्रत का उपदेश करके नर-नारियों को बहकाने की चेष्टा की, किन्तु वे किसी को भी धर्मामार्ग से डिगाने में सफल नहीं हुए। इस प्रकार काशी में विचरते हुए सूर्य ने कभी किसी भी मनुष्य के धर्माचरण में किसी प्रकार का प्रमाद नहीं पाया।

दुर्लभ काशीपुरी को पाकर कौन सचेत पुरुष छोड़ सकता है। इस संसार में प्रत्येक जन्म में स्त्री, पुत्र, धन मिल सकते हैं, केवल काशीपुरी नहीं मिल सकती। इसी प्रकार काशी में धर्ममय प्रभावों को देखकर भगवान् सूर्य का मन काशी में रहने के लिए लोल अर्थात् चंचल हो उठा, इसलिये उनका काशी में लोलार्क नाम प्रसिद्ध हुआ। दक्षिण दिशा में असी संगम के समीप लोलार्क स्थित हैं, वे सदा काशी में रहकर काशी-निवासियों के योग-क्षेम का वहन करते हैं। मार्गशीर्ष मास की षष्ठी या सप्तमी तिथि को रवियोग होने पर मनुष्य वहाँ की यात्रा तथा लोलार्क-सूर्य का दर्शन करके समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, जो मनुष्य रविवार को लोलार्क-सूर्य का दर्शन करता है, उसे कोई दु:ख नहीं होता है।

अर्यमा सूर्य का ध्यान


अर्यमा पुलहोऽथोर्ज: प्रहेति: पुंजिकस्थली।
नारद: कच्छनीरश्च नयन्त्येते स्म माधवम्।।1।।

मेरुश्रृंगान्तरचर: कमलाकरबान्धव:।
अर्यमा तु सदा भूत्यै भूयस्यै प्रणतस्य मे।।2।।


वैशाख मास में सूर्य अर्यमा नाम से विख्यात हैं तथा पुलह ऋषि, उर्ज यक्ष, पुंजिकस्थली अप्सरा, प्रहेति राक्षस, कच्छनीर सर्प और नारद नामक गन्धर्व के साथ अपने रथ पर निवास करते हैं। मेरु पर्वत के शिखर पर भ्रमण करनेवाले तथा कमलों के वन को विकसित करनेवाले भगवान् अर्यमा मुझ प्रणाम करनेवाले का सदा कल्याण करें। अर्यमा सूर्य दस सहस्त्र किरणों के साथ तपते हैं तथा उनका पति वर्ण है।

उत्तरार्क सूर्य की महिमा


बलिष्ठ दैत्योंद्वारा देवता बार-बार युद्ध में परास्त हो जाते थे। देवताओं ने दैत्यों के इस अत्याचार से सदा के लिये छुटकारा पाने के उद्देश्य से भगवान् सूर्य की अराधना करने का निश्चय किया। उनकी अराधना से प्रसन्न होकर भगवान् सूर्य प्रकट हुए। अपने सम्मुख उपस्थित भगवान् सूर्य से प्रार्थना करते हुए देवताओं ने कहा- ‘प्रभो ! बलिष्ठ दैत्य कोई-न-कोई बहाना बनाकर हमपर आक्रमण कर देते हैं तथा हमें परास्तकर हमारे सब अधिकार छीन लेते हैं। हम असुरों के इस भयानक अत्याचार से मुक्ति प्राप्त करने के लिये आपकी शरण में आये हैं। आप इस कष्ट से मुक्त होने का हमें कोई उचित उपाय बतायें।’

भगवान् सूर्य ने विचारकर अपने से उत्पन्न एक शिला उन्हें दी और कहा कि ‘तुम लोग इसे लेकर वाराणसी जाओं और विश्वकर्मा द्वारा शास्त्रो के विधि से इस शिला की मेरी मूर्ति बनवाओ। मूर्ति बनाते समय इस तराशनेपर जो प्रस्तरखण्ड निकलेंगे, वे तुम्हारे दृढ़ अस्त्र-शस्त्र होंगे। उनसे तुम लोग दैत्यों पर विजय प्राप्त करोगे।’

देवताओं ने वाराणसी जाकर भगवान् सूर्य के निर्देशानुसार विश्वकर्मा द्वारा सुन्दर सूर्य मूर्ति का निर्माण कराया। मूर्ति तराशते समय उससे जो पत्थर के टुकड़े निकले, उनसे देवताओं के प्रभावशाली अस्त्र-शस्त्र बने। फिर देवताओं और दैत्यों का भयानक संग्राम हुआ। दैत्य भगवान् सूर्य की कृपा से प्राप्त अस्त्र-शस्त्रों की मार को न सह सके और परास्त होकर इधर-उधर गये। मूर्ति गढ़ते समय जो गंड्ढा बन गया था, उसका नाम उत्तरमानस या उत्तरार्ककुण्ड पड़ा। कालान्तर में एक अनाथ ब्राह्मण-कन्या ने उत्तरार्क सूर्य के समीप कठोर तपस्या की।

एक दिन भगवान् शिव-पार्वती लीलापूर्वक विचरण करते हुए वहाँ आये। दयामयी पार्वती देवी ने भगवान् शंकर से कहा- ‘प्रभो ! यह ब्राह्मण-कन्या बन्धु-बान्धवों से हीन है। आप वर देकर इसे अनुग्रहीत करें।’


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