1647 देवीभागवत की प्रमुख कथाएँ - गीताप्रेस 1647 Devi Bhagwat ki Pramukh Kathayein - Hindi book by - Gitapress
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1647 देवीभागवत की प्रमुख कथाएँ

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :35
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 862
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है देवीभागवत की प्रमुख कथाओं का वर्णन...

Devi Bhagvat Ki Pramukh Kathayein a hindi book by Gitapress - देवीभागवत की प्रमुख कथाएँ - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भगवान् विष्णु के हयग्रीवावतार की कथा

एक समय की बात है। हयग्रीव नामका एक परम पराक्रमी दैत्य हुआ। उसने सरस्वती नदी के तटपर जाकर भगवती महामाया की प्रसन्नता के लिये बड़ी कठोर तपस्या की। वह बहुत दिनोंतक बिना कुछ  खाये भगवती के मायाबीज एकाक्षर महामन्त्र का जप  करता रहा। उसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हो चुकी थीं। सभी भोगों का उसने त्याग कर दिया था। उसकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती ने उसे तामसी शक्ति के रूप में दर्शन दिया। भगवती महामायाने उससे कहा- ‘महाभाग ! तुम्हारी तपस्या सफल हुई। मैं तुमपर परम प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो भी इच्छा हो मैं उसे पूर्ण करने के लिये तैयार हूं। वत्स ! वर माँगो।’

भगवती की दया, और प्रेम से ओतप्रोत वाणी सुनकर हयग्रीव की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। उसके नेत्र  आनन्द के अश्रुओं से भर गये। उसने भगवती की स्तुति करते हुए कहा-‘कल्याणमयी देवि ! आपको  नमस्कार है। आप मयामाया हैं। सृष्टि, स्थिति और संहार करना आपका स्वाभाविक गुण है। आपकी कृपा से कुछ भी असम्भव नहीं हैं। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे अमर होने का वरदान देने की कृपा करें।’

देवी ने कहा- ‘दैत्यराज ! संसार में जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है। प्रकृति के इस विधान से कोई नहीं बच सकता है। किसी का सदा के लिये अमर होना असम्भव है। अमर देवताओं को भी पुण्य समाप्त होनेपर मृत्यु लोक में जाना पड़ता है। अतः तुम अमरत्वके अतिरिक्त कोई और वर माँगो।’
 
हयग्रीव बोला- ‘अच्छा तो हयग्रीव के हाथों ही मेरी मत्यु हो। दूसरे मुझे न मार सकें। मेरे मनकी यही अभिलाषा है। आप उसे पूर्ण करने की कृपा करें।’ ‘ऐसा ही हो’ यह कहकर भगवती अन्तर्धान हो गयी। हयग्रीव  असीम  आनन्दका  अनुभव करते हुए। अपने घर चला गया। वह दुष्ट देवीके वरके प्रभाव से अजेय  हो  गया। त्रिलोकी में कोई भी ऐसा नहीं था, जो उस दुष्ट को मार सके। उसने ब्रह्माजी से वेदों को छीन लिया और देवताओं तथा मुनियों को सताने लगा। यज्ञादि कर्म बन्द हो गये और सृष्टि की व्यवस्था बिगड़ने लगी। ब्रह्मादि देवता भगवान् विष्णु के पास गये, किन्तु वे योग निद्रा में निमग्र थे। उनके धनुष की डोरी चढ़ी हुई थी। ब्रह्माजी ने उनको जगाने के लिये वम्री नामक एक कीड़ा उत्पन्न किया। ब्रह्माजी की प्रेरणा से उसने धनुष की प्रत्यंचा काट दी। उस समय बड़ा भयंकर शब्द हुआ और भगवान विष्णु का मस्तक कटकर अदृश्य हो गया। सिर रहित भगवान के धड़को देखकर देवताओं के दुःख की सीमा न रही। सभी लोगों ने इस विचित्र घटनाको देखकर भगवती की स्तुति की। भगवती प्रकट हुईं। उन्होंने कहा—‘देवताओं चिन्ता मत करो मेरी कृपा से तुम्हारा मंगल ही होगा। ब्रह्माजी एक घोड़े का मस्तक काटकर भगवान के धड़ से जोड़ दें। इससे भगवान का  हयग्रीवावतार होगा।
वे उसी रूप में दुष्ट हयग्रीव दैत्यका वध करेंगे।’ ऐसा कहकर भगवती अन्तर्धान हो गयीं।

भगवती के कथनानुसार उसी क्षण ब्रह्माजी ने एक घोड़े का मस्तक भगवान् के धड़ से जोड़ दिया।  भगवती के कृपाप्रसाद से उसी क्षण भगवान विष्णु का हयग्रीवावतार हो गया। फिर भगवान का हयग्रीव दैत्य से भयानक युद्ध हुआ। अन्त में भगवान के हाथों हयग्रीव की मृत्यु हुई। हयग्रीवको मारकर भगवान ने वेदों को ब्रह्माजी को पुनः समर्पित कर दिया और देवताओं तथा मुनियों का संकट निवारण किया।

मधु कैटभ की कथा

प्राचीन समय की बात है। चारो ओर जल ही-जल भरा था, केवल भगवान विष्णु शेषनाग की शय्यापर सोये हुए थे। उनके कान के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो महापराक्रमी दानव उत्पन्न हुए। वे सोचने लगे कि हमारी उत्पत्तिका कारण क्या है ? कैटभ ने कहा-भैया मधु ! इस जल में हमारी सत्ताको कायम रखने वाली भगवती महाशक्ति ही हैं। उनमें अपार बल है। उन्होंने ही इस जलतत्त्वकी रचना की है। वे ही परम आराध्य शक्ति हमारी उत्पत्ति का कारण हैं’ इतने में ही आकाश में गूँजता हुआ सुन्दर ‘वाग्बीज’ सुनायी पड़ा। उन दोनों ने सोचा कि यही भगवतीका महामन्त्र है। अब वे उसी मन्त्र का ध्यान और जप करने लगे। अन्न और जलका त्याग करके उन्होंने एक हजार वर्षतक कठिन तपस्या की। भगवती महाशक्ति उनपर प्रसन्न हो गयीं। अन्त में आकाशवाणी हुई- दैत्यों ! तुम्हारी तपस्या से मैं प्रसन्न हूँ इच्छानुसार वर माँगो !’

आकाशवाणी सुनकर मधु और कैटभने कहा- ‘सुन्दर व्रतका पालन करनेवाली देवि ! तुम हमें स्वेच्छा मरणका वर देने की कृपा करो।’ ‘दैत्यों मेरी कृपा से इच्छा करने पर ही मौत तुम्हें मार सकेगी। देवता और दानव कोई भी तुम दोनों भाइयों को पराजित नहीं कर सकेंगे।’

 देवी के वर देने पर मधु और कैटभ को अत्यन्त अभिमान हो गया। वे समुद्र में जलचर जीवों के साथ क्रीड़ा करने लगे। एक दिन अचानक प्रजापति ब्रह्माजीपर उनकी दृष्टि पड़ी। ब्रह्माजी कमल के आसनपर विराजमान थे। उन दैत्यों ने ब्रह्माजी से कहा- ‘सुव्रत ! तुम हमारे साथ युद्ध करो। यदि लड़ना नहीं चाहते तो इसी क्षण यहां से चले जाओ; क्योंकि यदि तुम्हारे अन्दर शक्ति नहीं है तो इस उत्तम आसनपर बैठने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है।  मधु और कैटभकी बात सुनकर ब्रह्माजी को अत्यन्त चिन्ता हुई। उनका सारा समय तपमें बीता था। युद्ध करना उनके स्वभाव के प्रतिकूल था। भयभीत होकर वे भगवान विष्णु की शरण गये। उस समय भगवान विष्णु योगनिदामें निमग्न थे। ब्रह्माजी के बहुत प्रयास करने पर भी उनकी निद्रा नहीं टूटी। अन्त में उन्होंने भगवती योगनिद्राकी स्तुति करते हुए कहा- ‘भगवती ! मैं मधु और कैटभ के भयसे भयभीत होकर तुम्हारी शरण में आया हूँ। भगवान विष्णु तुम्हारी माया से अचेत पड़े हैं। तुम सम्पूर्ण जगतकी माता हो। सभी का मनोरथ पूर्ण करना तुम्हारा स्वभाव है। तुमने ही मुझे जगत्स्रष्टा बनाया है। यदि मैं दैत्यों के हाथ से मारा गया तो तुम्हारी बड़ी अपकीर्ति होगी। अतः भगवान् विष्णुको जगाकर मेरी रक्षा करो।’

ब्रह्माजी की प्रर्थना सुनकर भगवती भगवान विष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु और हृदय से निकलकर आकाश में स्थित हो गयीं और भगवान उठकर बैठ गये। तनन्तर उनका मधु और कैटभसे पांच हजार वर्षोंतक घोर युद्ध हुआ, फिर भी वे उन्हें परास्त करने में असफल रहे। विचार करने पर भगवान को ज्ञात हुआ कि इन दोनों दैत्यों को भगवती ने इच्छामृत्यु का वर दिया है। भगवती की कृपा के बिना इनको मारना असम्भव है। इतने में ही उन्हें भगवती योगनिद्राके दर्शन हुए। भगवान ने रहस्य पूर्ण शब्दों में भगवती की स्तुति की। भगवती ने प्रसन्न होकर कहा- ‘विष्णु ! तुम देवताओं के स्वामी हो। मैं इन दैत्यों को माया से मोहित कर दूँगी, तब इन्हें मार डालना।’
भगवती का अभिप्राय समझकर भगवान् ने दैत्यों से कहा कि तुम दोनों के युद्ध से मैं परम प्रसन्न हूँ। अतः मुझसे इच्छानुसार वर माँगो। दैत्य भगवती की माया से मोहित हो चुके थे। उन्होंने  कहा- ‘विष्णो ! हम याचक नहीं है, दाता हैं। तुम्हें जो माँगना हो हमसे प्रार्थना करो। हम देनेके लिये तैयार हैं।’  भगवान् बोले- ‘यदि देना चाहते हो तो मेरे हाथों से मृत्यु स्वीकार करो।’ भगवती की कृपा से मोहित होकर मधु और कैटभ अपनी ही बातों से ठगे गये। भगवान विष्णों ने दैत्यों के मस्तकों को अपने जाघोंपर रखकर सुदर्शन चक्र से काट डाला। इस प्रकार मधु और कैटभका अन्त हुआ।


महामुनि शुकदेव एवं तत्त्वज्ञानी जनक



पुत्रप्राप्ति की कामनासे भगवान् व्यासने भगवान शंकरकी उपासना की, जिसने फलस्वरूप उन्हें शुकदेवजी पुत्ररूप में प्राप्त हुए। व्यासजी ने सुकदेवजी  के जातककर्म, यज्ञोपवीत आदि सभी संस्कार सम्पन्न किये। गुरुकुल में रहकर शुकदेव जी शीघ्र ही सम्पूर्ण वेदों एवं अखिल धर्मशास्त्रों में अद्भुत पाण्डित्य प्राप्त कर लिया। गुरुगृह से लौटने के बाद व्यासजी ने पुत्र का प्रसन्नता पूर्वक स्वागत किया। उन्होंने शुकदेवजी से कहा- ‘पुत्र ! तुम बड़े बुद्धिमान हो। तुमने वेद और धर्मशास्त्र पढ़ लिये। अब अपना विवाह कर लो और गृहस्थ बनकर देवताओं तथा पितरों का यजन करो !’

 
शुकदेव ने कहा- पिताजी ! गृहस्थाश्रम सदा कष्ट  देनेवाला है। महाभाग ! मैं आपका औरस पुत्र हूँ आप मुझे इस अन्धकार्पूर्ण संसार में क्यों ढकेल रहे हैं ? स्त्री, पुत्र, पौत्रादि सभी परिजन दुःख पूर्ति के ही साधन हैं। इनमें सुखकी कल्पना करना भ्रममात्र है। जिसके प्रभाव से अविद्याजन्य कर्मोंका अभाव हो जाय, आप मुझे उसी ज्ञान का उपदेश करें।’
व्यासजी ने कहा—‘पुत्र ! तुम बड़े भाग्यशाली हो। मैंने देवी भागवत की रचना की है। तुम इसका अध्ययन करो। सर्वप्रथम आधे श्लोक में इस पुराण का ज्ञान भगवती पराशक्ति ने भगवान विष्णु को देते हुए कहा है—‘यह सारा जगत मैं ही हूँ, मेरे सिवा दूसरी कोई वस्तु अविनाशी है ही नहीं। भगवान विष्णु से यह ज्ञान ब्रह्माजी को मिला और ब्रह्माजी ने इसे नारद जी को बताया तथा नारदजी से यह मुझे प्राप्त हुआ। फिर मैंने इसकी बारह स्कन्धों में व्याख्या की। महाभाग ! तुम इस वेदतुल्य देवीभागवत का अध्ययन करो। इससे तुम संसार में रहते हुए माया से अप्रभावित रहोगे।

व्यासजी के उपदेश के बाद भी जब शुकदेवजीको शान्ति नहीं मिली, तब उन्होंने कहा—‘बेटा ! तुम जनक जी के पास मिथिलापुरी में जाओ। वे जीवन्मुक्त ब्रह्मज्ञानी हैं। वहाँ तुम्हारा अज्ञान दूर हो जाएगा। तदन्न्तर तुम यहाँ लौट आना और सुख पूर्वक मेरे आश्रम में निवास करना।’

व्यासजी के आदेश से शुवदेवजी मिथिला पहुँचे। वहाँ द्वारपाल ने उन्हें वहाँ रोक दिया, तब काठ की भाँति मुनि वहीं खड़े हो गए। उनके ऊपर मान-अपमान का कोई असर नहीं पड़ा। कुछ समय बाद राजमंत्री उन्हें विलास भवन में ले गए। वहाँ शुकदेवजी का विधिवत आतिथ्य सत्कार किया गया, किन्तु शुकदेवजी का मन वहाँ भी विकार शून्य बना रहा। अन्त में उन्हें महाराज जनक के समक्ष प्रस्तुत किया गया। महाराज जनक ने उनका आतिथ्य सत्कार करने के बाद पूछा—‘महाभाग ! आप बड़े निःस्पृह महात्मा हैं। किस कार्य से आप यहाँ पधारे हैं, बताने की कृपा करें।’
शुकदेवजी बोले –‘राजन् ! मेरे पिता व्यासजी ने मुझे विवाह करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने की आज्ञा दी है। मैंने उसे बंधन कारक समझकर अस्वीकार कर दिया। मैं संसार बंधन से मुक्त होना चाहता हूँ। आप मेरा मार्गदर्शन करने की कृपा करें।’
महाराज जनक ने कहा-‘परंतप ! मनुष्य को बंधन में डालने और मुक्त करने में केवल मन ही कारण है। विषयी मन बंधन और निर्विषयी मन मुक्ति का प्रदाता है। अविद्या के कारण ही जीव और ब्रह्म में भेदबुद्धि की प्रतीत होती है।

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