1538 महाभारत की प्रमुख कथायँ - गीताप्रेस 1538 Mahabharat ki Pramukh Kathayein - Hindi book by - Gitapress
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1538 महाभारत की प्रमुख कथायँ

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :35
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 863
आईएसबीएन :81-293-0896-7

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प्रस्तुत है महाभारत के प्रमुख कथाओं का वर्णन...

Mahabharat Ki Pramukh Kathayein a hindi book by Gitapress- महाभारत की प्रमुख कथायँ - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पुरुवंशका बालक

पुरुवंश के प्रवर्तक थे राजा दुष्यन्त। वे अपनी प्रजा का शासन बड़ी योग्यता के साथ करते थे। उनके राज्य में पाप तो कोई करता ही नहीं था। सभी धर्म के प्रेमी थे, इसलिये धर्म तथा अर्थ दोनों ही स्वतः प्राप्त थे। एक दिन महाबाहु राजा दुष्यन्त आखेट के लिये  अपनी चतुरङ्गिणी सेना के साथ वन में गये उसे पार करने पर उन्हें महर्षि कण्व का आश्रम दिखायी पड़ा। सबको आश्रम के द्वार पर ही रोककर दुष्यन्त अकेले ही आश्रम गये। आश्रम को सूना देखकर उन्होंने ऊँचे स्वर में पुकारा- ‘यहां कौन है ?’ उनकी आवाज सुनकर लक्ष्मी जी के समान सुन्दर कन्या तपस्विनी  के वेष में आश्रम से निकली। थोड़ी देर वार्तालाप करने के बाद दुष्यन्त ने जान लिया कि यह शकुन्तला नामवाली राज कन्या है। राजा दुष्यन्त उसके अनुपम रूप को देखकर उस पर मोहित हो गये, राजा ने गान्धर्व-विधि से शकुन्तला का पाणिग्रहण कर लिया। उन्होंने शकुन्तला को बार-बार विश्वास दिलाया कि ‘वे शीघ्रातिशीघ्र उसे राजमहल में बुलवा लेंगे।’ इस प्रकार कहकर वे अपनी राजधानी वापस चले गये।

समय पर आश्रम में ही शकुन्तला के गर्भ से पुत्र उत्पन्न हुआ। इस शिशु के जन्म लेते ही आकाश से फूलों की वर्षो होने लगी, देवगण दुन्दुभियाँ बजाने लगे तथा अप्सराएँ मधुर स्वर में गाती हुई नाचने लगीं। महर्षि कण्वने विधिपूर्वक उसके जातकर्म आदि संस्कार किये। वह बालक देव कुमार-जैसा था। उस शिशु के दांत सफेद तथा बड़े नुकीले थे, कन्धे सिंह के -से थे, दोनों हाथों में चक्र का चिन्ह था तथा सिर बड़ा और ललाट ऊँचा था। नेत्र मनोहर, अलकें  लुभावनी थीं तथा मुखमण्डल पर अपूर्त तेज था। छः वर्ष की अवस्था होते-होते वह बालक अद्भुत-से-अद्भुत कार्य करने लगा। कभी तो वह वन के सिंह बाघ आदि हिंसक पशुओं को पकड़ लाता तथा कुछ को पेड़ से बाध देता था। कभी किसी के ऊपर चढ़कर दूसरे को डाँटता था तो कभी उनके साथ खेलता और दौड़ लगाता था। उनके बच्चे भी इसके लिये मिट्टी के खिलौने की तरह थे, उनकों बगल में दबाये हुए घूमता फिरता था। जिन हिंसक पशुओं को देखकर बड़े-बड़ों को पसीना आ जाता था, उनकों यह नन्हा-सा बालक भेड़-बकरी की तरह घुमाता-फिराया करता था। इतना ही नहीं आश्रम में राक्षस-पिशाचों को भी पा जाने पर उन्हें बिना अस्त्र-शस्त्र के मुक्के से ही मार-मारकर भगा देता था। विशाल-से-विशाल दैत्य  भी इस बालक का सामना न कर पाते थे।
 
एक दिन एक महाबलशाली दैत्य उस बालक के पास आया। वह अन्य दैत्यों की दुर्दशा को देखकर अत्यन्त  क्रोध से भरा था। छोटा-सा बालक देख उसने इसे अपने हाथों में धर दबोचना चाहा, किंतु इसके पहले ही उसकी नीयत समझकर उस बालक ने बड़ी फुर्ती के साथ उसे पकड़ लिया अब क्या था, दोनों एक दूसरे को मार डालने की चेष्ठा में लग गये। बालक ने अपनी बाँहों में उसे इतनी दृढ़ता पूर्वक जकड़ रखा था कि अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी वह दैत्य निकल न पाया अन्त में निकलने का कोई चारा न देख वह दैत्य जोर- जोर से चिल्लाकर उसे डराने-धमकाने लगा। किंतु जितना ही वह चिल्लाता था उतना ही वह बालक उसे जोर से दबाता था। धीरे-धीरे भंयकर दबाव के कारण वह दैत्य मल-मूत्र करने लगा। दुष्यन्त कुमार ने बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के ही उसे खेल-खेल में मार गिराया। इस अद्भुद कार्य को देखकर सभी आश्रमवासी उसके बलकी प्रसंशा करने लगे तथा उसका नाम ‘सर्वदमन’ रख दिया; क्योंकि वह सब जीवों का दमन कर देता था। आगे चलकर यही सर्वदमन ‘भरत के नाम से प्रसिद्ध हुआ और इसी के नाम से इस भूखण्डका नाम  ‘भारत’ हुआ।

विलक्षण गुरू दक्षिणा  


आचार्य द्रोणका अपमान उनके सहपाठी पञ्चाल नरेश द्रुपद ने यह कहकर कर दिया कि ‘एक राजा की तुम्हारे-जैसे- श्रीहीन और निर्धन मनुष्य के साथ कैसी मित्रता ?’ इस तरह राजा द्रुपद से अपमानित हो बदला लेने की भावना से आचार्य द्रोण हस्तिनापुर में राजकुमारों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देने लगे। राजा द्रुपद का व्यवहार इन्हें सदैव दुःख देता था। एक दिन आचार्य द्रोणने अपने शिष्यों से कहा कि मेरे मन में एक कार्य करने की इच्छा है। शिक्षा प्राप्त करने के बाद कौन उसे पूरा करेगा ? सब चुप हो गये; परन्तु अर्जुन ने उस कार्य को पूरा करने का संकल्प किया। इस पर प्रसन्न होकर आचार्य ने उन्हें अपना सर्वश्रेष्ठ शिष्य होने का आशीर्वचन दिया।

द्रोणाचार्य से शिक्षा पाने के लिये सहस्त्रों राजकुमार एकत्र होने लगे। द्रोणाचार्य की प्रशंसा सुनकर निषादराज हिरण्यधनुका पुत्र एकलव्य  भी वहां आया। पर कौरवों के कारण आचार्य ने उसे निषादपुत्र समझकर शिष्य नहीं बनाया। किंतु ‘जहाँ’ चाह होती है वहाँ राह निकल आती है’- एकलव्य ने वन से लौटकर उनकी मिट्टी की मूर्ति बनायी तथा उसी में ही उसने गुरु की परमोच्च भावना रखकर उसके सामने धीरे-धीरे अभ्यास के बलपर धनुर्विद्या में बड़ी  अच्छी कुशलता प्राप्त कर ली। एक दिन शिकार की खोज में इधर-उधर विचरने लगे। कुत्ता भी घूमता-घामता उस ओर जा पहुँच गया, जहाँ एकलव्य अभ्यास कर रहा था। मैंले-कुचैले काले रंग के आदमी को हाथ में धनुष-बाण लिये देखकर कुत्ता वहीं पर खड़ा होकर ‘भौ-भौं’ करके भूँकने लगा। अपने अभ्यास में आया व्यवधान देखकर एकलव्य ने इतनी फुर्ती से बाण चलाया कि कुत्ते को चो़ट नहीं लगी पर उसका मुँह बाणों से भर गया। अब वह भौक नहीं सकता था, उसी अवस्था में कुत्ता पाण्डवों के पास  लौट आया। सबने सोचा यह कार्य तो हममें से कोई भी नहीं कर सकता। आखिर वह सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है कौन ? खोज की गयी। सबने देखा कि द्रोणाचार्य की मूर्ति के सामने एक भारी-भरकम आदमी निरन्तर आश्चर्य जनक गति से बाण छोड़ रहा है। कठिन-से कठिन लक्ष्य का भेदक भी कर रहा है। सभी ने आकर द्रोणाचार्य से कहा कि आपने तो मुझसे कहा था कि तुमसे बढ़कर मेरा कोई भी शिष्य न होगा। फिर आपका यह शिष्य अस्त्रविद्या में मुझसे बढ़कर  कुशल तथा पराक्रमी  कैसे हुआ ?
आचार्य गहरे सोच में पड़ गये। कुछ-समय तक वे सोचते विचारते रहे; फिर सव्यसाची अर्जुन को साथ ले एकलव्य के पास गये।

उन्होंने देखा उनकी मूर्ति बनी है और उससे पूछ-पूछकर एकलव्य बाण चलाने का अभ्यास बड़ी निष्ठा से कर रहा है। द्रोणाचार्य उसे देखकर आश्चर्य चकित हो गये और मन-ही-मन उसकी प्रशंसा करने लगे। इतने में एकलव्य का ध्यान अर्जुन के साथ खड़े गुरु द्रोणाचार्य की तरफ गया। उसने दौड़कर जमीन पर मस्तक रखकर अपनी गुरुभक्ति दिखायी। हाथ जोड़कर एकलव्य उनके सामने खड़ा हो गया और पूछा कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?’ किन्तु द्रोणाचार्य के मन में इस समय तो कुछ और ही चल रहा था। उन्होंने कहा- ‘वीर ! यदि तुमने मुझे गुरू मानकर शिक्षा ग्रहण की है तो मुझे गुरुदक्षिणा दो।’ एकलव्य ने कहा ‘गुरुदेव मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं हैं, जो गुरु के लिये अदेय हो। आप आज्ञा करें।’ द्रोणाचार्य ने उससे दाहिने हाथ का अगूँठा माँग लिया। इतना दारुण वचन सुनकर भी वह न तो घबराया न उसने कुछ सोच-विचार ही किया।
उसने तुरन्त ही प्रसन्नमन से तलवार से अपना दाहिना अगूँठा काटकर उन्हें दे दिया। एकलव्यकी निष्ठा तथा गुरुभक्ति देखकर द्रोणाचार्य का हृदय भर आया।

द्रौपदी-स्वयंवर


राजा द्रुपद के मन में यह लालसा थी कि मेरी पुत्री का विवाह किसी-न-किसी प्रकार अर्जुन के साथ हो  जाय। परन्तु उन्होंने यह विचार किसी से प्रकट नहीं किया। अर्जुन को पहचानने के लिये उन्होंने एक ऐसा धनुष बनवाया, जो किसी दूसरे से झुक न सके। इसके अतिरिक्त आकाश में एक ऐसा कृतिम यन्त्र टँगवा दिया, जो चक्कर काटता रहता था। उसी के  ऊपर बेधने का लक्ष्य रखवाकर यह घोषणा करा दी कि जो वीर इस धनुषपर डोरी चढ़ाकर इन घूमने वाले यन्त्र के छिद्र के भीतर से लक्ष्यवेध करेगा, वहीं मेरी पुत्री द्रौपदी को प्राप्त कर सकेगा। सब ओर चहारदीवारी थी, उसके  भीतर  ऊँचे और श्वेत रंग के गगनचुम्बी महल बन हुए थे। विचित्र चँदोवेसे उस सभा भवनको सब ओर से सजाया गया था। फर्श तथा दीवारों पर मणि एवं रत्न जड़े थे। सुखपूर्वक चढ़ने हेतु सीढ़ियाँ लगी थी। बड़े –बड़े आसन तथा बिछावन आदि बिछाये गये थे। बहुमूल्य अगरु-धूपकी सुगन्ध चारों ओर फैल रही थी। उत्सव के सोलहवें दिन ऋषि-मुनि, देशके राजा, राजकुमार, ब्राह्मण तथा प्रजाजनों से सभामण्डप खचाखच भर गया। कौरवों के षड्यन्त्र के कारण पाण्डव भी ब्राह्मणवेष में ब्राह्मण मण्डली में जा बैठे। द्रुपकुमारी कृष्णा अपनी कुछ प्रमुख सखियों सहित सुन्दर वस्त्र और आभूषणों से सज-धजकर हाथों में सोने की वरमाला लिये मन्दगति से रंगमण्डपमें आकर खड़ी हो गयी। इसी बीच द्रौपदी का भाई धृष्टद्युम्न अपनी बहिन के पास खड़े होकर मधुर एवं प्रिय वाणी यह कहकर- ‘जो इस धनुष-बाण से लक्ष्य का भेदक करेगा उसे द्रौपदी वरमाला पहनायेगी’-जाकर अपने स्थान पर बैठ गया।

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