872 श्रीकृष्ण - गीताप्रेस 872 Srikrishna - Hindi book by - Gitapress
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872 श्रीकृष्ण

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :19
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 864
आईएसबीएन :81-293-0680-8

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प्रस्तुत है श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन...

Srikrishna A Hindi Book by Gitapress - श्रीकृष्ण - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कुवलयापीड-उद्धार

कंस ने भगवान् श्रीकृष्ण को मार डालने के उद्देश्य से ही धनुषयज्ञ का आयोजन किया था। श्रीकृष्ण पुरवासियों से धनुषयज्ञ का स्थान पूछते हुए कंस की रंगशाला पहुँचे। उन्होंने कंस के रक्षकों के रोकने पर भी बायें हाथ से धनुष को उठा लिया और सबके देखते-देखते उसके दो टुकड़े कर डाले। जब धनुष के रक्षकों ने श्रीकृष्ण को मारने के लिये घेर लिया तो श्रीकृष्ण ने धनुष के उन्हीं टुकड़ों से उन सबको यमलोक भेज दिया।

जब कंस ने सुना कि श्रीकृष्ण और बलराम ने धनुष तोड़ डाला तथा रक्षकों का संहार कर डाला तो वह बहुत घबड़ाया। उसे रात में बहुत देर तक नींद नहीं आयी। उसे मृत्युसूचक बहुत-से अपशकुन दिखायी देने लगे। उनके कारण उसे बहुत चिन्ता हो गयी। चारों तरफ श्रीकृष्ण-बलराम के रूप में उसे अपनी मृत्यु दिखायी देने लगी। किसी तरह नाना प्रकार की आशंकाओं में उसने जागते हुए रात बितायी।

दूसरे दिन कंस ने श्रीकृष्ण को फिर मारने की इच्छा से मल्ल-क्रीड़ा का आयोजन किया। राज- कर्मचारियों ने रंगभूमि को भलीभाँति सजाया। तुरही, भेरी, आदि बाजे बजने लगे। लोगों के बैठने के स्थान को झंडियों और बन्दनवारों से सजाया गया। सब लोग यथास्थान बैठ गये। राजा कंस अपने मन्त्रियों के साथ श्रेष्ठ सिंहासन पर जा बैठा। पहलवानों के ताल ठोंकने के साथ बाजे भी बजने लगे। चाणूर, मुष्टिक आदि कंस के प्रधान पहलवान अखाड़े के आस-पास आकर बैठ गये। इसी समय भोजराज कंस ने नन्द आदि गोपों को बुलाया। उन लोगों ने कंस को तरह- तरह की भेंटें दीं और फिर यथास्थान बैठ गये।
भगवान् श्रीकृष्ण ने रंगभूमि के दरवाजे पर पहुँचकर देखा कि वहाँ कुवलयापीड नामक हाथी खड़ा है। उन्होंने अपनी कमर कस ली और महावत को ललकारा—‘महावत ! ओ महावत !! हम दोनों को रास्ता दे दो, नहीं तो मैं हाथी के साथ तुझे भी यमराज के घर पहुँचा दूँगा। भगवान् श्रीकृष्ण के धमकाने पर महावत तिलमिला उठा। उसे तो श्रीकृष्ण को मार डालने का आदेश था ही। उसने अंकुश की मारसे कुवलयापीड को क्रोधित कर श्रीकृष्ण की ओर बढ़ाया। कुवलयापीड ने श्रीकृष्ण को झपटकर अपनी सूँड़ में लपेट लिया। श्रीकृष्ण उसे जोर से एक घूसा जमाकर उसके पैरों के बीच जा छिपे। उसके बाद वे उस बलवान् हाथी की सूड़ पकड़कर उसे सौ हाथ तक घसीट लाये। सबके देखते-देखते भगवान् श्रीकृष्ण ने एक हाथ से कुवलयापीड की सूंड़ पकड़कर उसे धरती पर पटक दिया। उसके गिर जाने पर खेल-खेल में पैरों से दबाकर उसके दोनों दाँत उखाड़ लिये और उन्हीं दातों से हाथी और महावत दोनों का काम तमाम कर दिया।

भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम ने जिस समय हाथी के दाँतों को लाठियों की तरह अपने कंधों पर रखकर रंगभूमि में प्रवेश किया, उस समय उनकी शोभा देखने ही योग्य थी। जब कंस ने देखा कि इन दोनों ने कुवलयापीड को मार डाला तब उसकी समझ में यह बात आ गयी कि इनको जीतना बड़ा कठिन है। उस समय वह और भी घबड़ा गया। रंगभूमि में चारों तरफ श्रीकृष्ण –बलराम की ही चर्चा होने लगी।

कंस-वध


भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम के रंगभूमि में आने पर चाणूर एवं मुष्टिक ने उन्हें मल्लयुद्ध के लिये ललकारा। श्रीकृष्ण चाणूर और बलरामजी मुष्टिक से जा भिड़े। भगवान् श्रीकृष्ण के अंगों की रगड़ से चाणूर की रग-रग ढीली पड़ गयी। उन्होंने चाणूर की दोनों भुजाएँ पकड़ लीं। और बड़े वेग से कई बार घुमाकर धरती पे दे मारा। चाणूर के प्राण निकल गये और वह कटे वृक्ष की भाँति गिरकर शान्त हो गया। बलरामजी ने मुष्टिक को एक घूँसा जमाया और वह खून उगलता हुआ पृथ्वी पर गिरकर मर गया। देखते-ही-देखते कंस के पाँचों प्रमुख पहलवान श्रीकृष्ण और बलराम द्वारा मारे गये। भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी की इस अद्भुत लीला को देखकर दर्शकों को बड़ा आनन्द हुआ। चारों ओर उनकी जय-जयकार और प्रशंसा होने लगी, परन्तु कंस को इससे बहुत दुःख हुआ। वह और भी चिढ़ गया। जब उसके प्रधान-प्रधान पहलवान् मारे गये और बचे हुए भाग गये तब उसने बाजे बन्द करा दिये। कंस ने अपने सेवकों को आज्ञा दी कि वसुदेव के लड़कों को बाहर निकाल दो, गोपों का सारा धन छीन लो और नन्द को बन्दी बना लो तथा वसुदेव-देवकी को मार डालो। उग्रसेन मेरा पिता होने पर भी शत्रुओं से मिला हुआ है। इसलिये उसे भी जीवित मत छोड़ो।

कंस इस प्रकार बढ़-चढ़ कर बकवाद कर ही रहा था कि भगवान् श्रीकृष्ण फुर्ती से उछलकर उसके मंचपर सामने आ गये तब वह तलवार लेकर उठ खड़ा हुआ है और श्रीकृष्ण पर चोट करने के लिये पैतरा बदलने लगा। जैसे गरुण साँप को पकड़ लेता है, वैसे ही श्रीकृष्ण ने कंस को पकड़ लिया। कंस का मुकुट गिर गया। भगवान् ने केश पकड़कर उसे मंच से धरती पर पटक दिया।
फिर श्रीकृष्ण स्वयं उसके ऊपर कूद पड़े। उनके कूदते ही कंस की मृत्यु हो गयी।
कंस निरन्तर शत्रुभाव से श्रीकृष्ण का ही चिन्तन करता रहता था। वह खाते-पीते, उठते-बैठते अपने सामने भगवान् श्रीकृष्ण को ही देखता रहता था। इसके प्रभाव से उसे सारुप्य मुक्ति की प्राप्ति हुई। सबके देखते-ही-देखते उसके शरीर से एक दिव्य तेज निकलकर श्रीकृष्ण में समा गया।

कंस के मरते ही कंक इत्यादि उसके छोटे भाई श्रीकृष्ण और बलराम को मारने के लिये दौड़े। बलरामजी ने क्षणभर में उनका काम तमाम कर डाला। उस समय आकाश में दुन्दुभियाँ बजने लगीं। ब्रह्मा, शंकर तथा इन्द्रादि देवता बड़े आनन्द से भगवान् श्रीकृष्ण पर पुष्पों की वर्षा करते हुए उनकी स्तुति करने लगे।
कंस और उसके भाइयों की स्त्रियाँ अपने पतियों की मृत्यु पर विलाप करती हुई वहाँ आयीं। भगवान् श्रीकृष्ण सारे संसार के जीवनदाता है। उन्होंने कंस की रानियों को समझाकर ढाढ़स बँधाया। तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण ने मरने वालों की लोक रीति के अनुसार क्रिया-कर्म की व्यवस्था करवा दी।


माता-पिता को बन्धनमुक्त कराना



कंस के अन्तिम संस्कार की व्यवस्था करने के बाद भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम जी ने जेल में जाकर अपने माता-पिता को बन्धन से छुड़ाया और उनके चरणों की वन्दना की। परन्तु वसुदेव और देवकी ने उन्हें ईश्वर समझकर हृदय से नहीं लगाया। वे सोच रहे थे कि हम भगवान् को अपना पुत्र कैसे समझें।

भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि माता-पिता को मेरे भगवद्भाव—(ऐश्वर्यका) ज्ञान हो गया है; इसलिये माता-पिता को मोहित करने के लिये अपनी योगमाया को आदेश किया। फिर भगवान् श्रीकृष्णने अपने बड़े भाई बलरामजी के साथ अपने माता-पिता के चरणों में झुककर प्रणाम किया। उसके बाद उन्होंने कहा—‘पिताजी !, माताजी ! हम आपके प्रिय पुत्र हैं। आपलोग हमारे लिये सदैव चिन्तित रहा करते थे। दुर्भाग्यवश हमें आपके पास रहने का सौभाग्य नहीं मिला। इसलिए हमें माता-पिता के लाड़-प्यार से वञ्चित रहना पड़ा। माता-पिता ही इस शरीर को जन्म देते हैं और इसका लालन-पालन करते हैं। यदि कोई मनुष्य जीवनभर माता -पिता की सेवा करता रहे, तब भी वह उनके उपकार से उऋण नहीं हो सकता। जो पुत्र सामर्थ्य रहते भी अपनी माता-पिता की सेवा नहीं करता, उसके मरने पर यमदूत उसे उसके शरीर का ही मांस खिलाते हैं। जो अपने माता-पिता, गुरु, ब्राह्मण और शरणागत का भरण-पोषण नहीं करता वह जीता हुआ भी मुर्दे के समान है। पिताजी ! हमारे इतने दिन व्यर्थ गये, क्योंकि दुष्ट कंस के कारण हम आपकी सेवा न कर सके। हाय ! पापी कंसने आप दोनों को कितने दुःख दिये। आप हमें क्षमा करें और अपनी सेवा का अवसर दें। अब हम आप दोनों को छोड़कर कहीं नहीं जायेंगे।’

विश्वात्मा श्रीकृष्ण की वाणी से वसुदेव-देवकी मोहित हो गये। भला, भगवान् की योगमाया के प्रभाव से बिना उनकी इच्छा कौन मुक्त हो सकता है। इसलिये वसुदेव-देवकी का तत्त्वज्ञान क्षण भर में लोप हो गया।

जब भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने मता-पिता से क्षमा माँगी तो वसुदेव-देवकी का पुत्र-स्नेह पुनः उमड़ पड़ा। उन्होंने श्रीकृष्ण-बलराम को हृदय से चिपकाकर प्यार किया, बार-बार उनके मुखपर चुम्बनों की झड़ी लगा दी। भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम को पाकर वसुदेव और देवकी का हृदय परमानन्द से भर गया। वे भगवान् के स्नेहपाश में बँधकर पूर्णतः मोहित हो गये। उनकी आँखो से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी। यहाँ तक कि आँसुओं के कारण गला रुँध जाने से वे कुछ बोल भी न सके। आज उनके सम्पूर्ण जीवनकी तपस्या का फल मिल गया। वे पुत्र-प्रेम के असीम समुद्र में आकण्ठ डूब गये। चारों ओर से आती हुई श्रीकृष्ण-बलराम की जय-जयकार उनके कानों में मधुर रस घोलने लगी।


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