एक प्रेम कहानी मेरी भी - रविंदर सिंह Ek Prem Kahani Meri Bhi - Hindi book by - Ravinder Singh
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एक प्रेम कहानी मेरी भी

रविंदर सिंह

प्रकाशक : पेंग्इन बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :208
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8680
आईएसबीएन :9780143417224

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एक प्रेम कहानी मेरी भी...

Ek Prem Kahani Meri Bhi (Ravinder Singh)

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

रविंदर सिंह बेस्टसेलिंग किताबों के लेखक हैं। उनकी पहली किताब आई टू हैड अ लव स्टोरी ने लाखों दिलों को छुआ है। कैन लक हैपेन ट्वाइस ? उनकी दूसरी किताब है। उड़ीसा के बुर्ला में अपना अधिकतर जीवन बिताने के बाद अब वे चंडीगढ़ में रह रहे हैं। रविंदर एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के बतौर देश की जानी-मानी आईटी कंपनियों में काम कर चुके हैं। फिलहाल वे हैदराबाद के इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस से एमबीए कर रहे हैं।

प्रभात रंजन हिंदी के चर्चित कहानीकार हैं। आपके दो कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा बहुवचन, आलोचना जैसी पत्रिकाओं के संपादन कार्य से जुड़े रहे हैं। आपने जनसत्ता में भी काम किया है और संप्रति अध्यापन कार्य कर रहे हैं। जानकी पुल नाम से एक ब्लॉग भी चलाते हैं।

दिन तो किसी तरह गुज़र जाते हैं
लेकिन रातें दर्द से भरी होती हैं
ज़ख़्म तो समय के साथ भर जाते हैं
लेकिन निशान रह जाते हैं
अपने आरामदेह बिस्तर पर पड़ा मैं
करवटें बदलता हूं और सोने की कोशिश करता हूं
लेकिन ख़याल मेरे दिमाग़ में उमड़ रहे हैं
और जमा हो गए हैं

बीते हुए दिनों की चुभती हुई रोशनी में
बिखर रहा हूं मैं टुकड़े-टुकड़े
मेरे जीवन का अंधेरा अंधेरे में ज़्यादा उजागर हो उठता है
और अब मैं उन सबको आवाज़ देने की कोशिश कर रहा हूं
दिल को ज़ुबान दे रहा हूं

पुनर्मिलन

मुझे वह तारीख अच्छी तरह याद है : 4 मार्च, 2006। मैं कोलकाता में था और हैप्पी के घर पहुँचने ही वाला था। सुबह से ही बड़ी कुलबुलाहट हो रही थी क्योंकि मैं अपने उन दोस्तों से तीन साल बाद मिलने जा रहा था जिनको एक ज़माने से ‘गैंग ऑफ फ़ोर’ कहा जाता था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद मनप्रीत, अमरदीप, हैप्पी और मैं पहली बार मिलने वाले थे।

होस्टल में पहले साल हैप्पी और मैं ए ब्लॉक भवन के चौथे माले पर अलग-अलग कमरों में रहते थे। एक ही माले पर रहने के कारण हम एक दूसरे को पहचानते तो थे लेकिन कभी एक-दूसरे से किसी तरह की बातचीत नहीं करना चाहते थे। मैं उसे ‘अच्छा लड़का’ नहीं समझता था क्योंकि उसे लड़ाई मोल लेने और अपनी मार्कशीट पर लाल रंग जुड़वाते जाने का शौक था। लेकिन दुर्भाग्य से, सेकेंड ईयर की शुरुआत में मैं होस्टल देर से लौटा और तब तक सभी कमरे दूसरे छात्रों को दिए जा चुके थे। मेरे पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं बचा कि मैं हैप्पी का रूममेट बन जाऊँ। और चूँकि जिंदगी अजीब होती है, चीज़ें नाटकीय ढंग से बदलीं और हम सबसे अच्छे दोस्त बन गए। जिस दिन हमास पुनर्मिलन तय हुआ उस वक्त वह दो सालों से टीसीएस कंपनी में काम कर रहा था और कंपनी के लंदन प्रोजेक्ट पर काम करते हुए मज़े उठा रहा था। हैप्पी को 6.1 फुट की लंबाई, भरा-पूरा शरीर और बला की सुंदरता मिली थी। और हैप्पी हमेशा खुश रहता था।

मनप्रीत, जिसे हम एमपी बुलाते, गोल-मटोल, गोरा-चिट्टा और स्वस्थ था। ‘स्वस्थ’ शब्द इस्तेमाल करूँ का कारण यह है कि अगर मैं उसके लिए सही शब्द ‘मोटा’ इस्तेमाल करूँ तो वह मुझे मार डालेगा, वह हम लोगों में पहला व्यक्ति था जो होस्टल में कंप्यूटर लेकर आया और उसकी उस मशीन में न जाने कितने कंप्यूटर गेम थे। असल में, यही कारण था कि हैप्पी और मैं उससे दोस्ती करना चाहते थे। एमपी काफी पढ़ाकू था। उसने स्कूल के दिनों में गणित ओलंपियाड जीता था और वह हमेशा उसके बारे में डींगें हाँका करता था। वह मोदीनगर का रहने वाला था, लेकिन जिस समय हम फिर से मिल रहे थे वे वह बंगलुरु में ओक्वेन के साथ काम कर रहा था।

अमनदीप का नामकरण एमपी ने ‘रामजी’ किया था। मुझे पता नहीं कि उसका यह अजीब नाम कब और क्यों पड़ा। हो सकता है शायद इसलिए क्योंकि वह स्वभाव का सीधा-सादा था। होस्टल में हम लोगों के विपरीत वह बिलकुल निशाचर नहीं था और उसके कमरे की बत्तियाँ ठीक 11 बजे बुझ जाती थीं। कभी-कभार एमपी, हैप्पी और मैं उसके कमरे के सामने 11 बजे से कुछ सेकेंड पहले खड़े हो जाते और गिनती शुरू कर देते, 10, 9, 8, 7, 6, 5, 4, 3, 2,1...और रामजी सो जाता। अमरदीप के बारे में बस एक ही रहस्यमयी बात थी कि वह साइकिल पर बैठकर कहीं जाता था, हर इतवार। उसने हमें कभी नहीं बताया कि वह कहाँ जाता था। जब भी हमने उसका पीछा करने की कोशिश की, उसे न जाने कैसे पता चल जाता और वह अपना रास्ता बदलकर हमें छका देता। आज भी हममें से कोई उस बारे में नहीं जानता। उस आदमी के बारे में सबसे अच्छी बात उसकी सादगी थी। और, सबसे बड़ी बात यह कि हमारे इंजीनियरिंग बैच के आखिरी सेमेस्टर का टॉपर था। वह हमारे ग्रुप की शान था। वह बरेली का रहने वाला था और तब वह एवाल्युसर्व में काम कर रहा था जब वह एमपी के साथ पुनर्मिलन के लिए हवाई जहाज से कोलकाता आया।

कॉलेज के बाद हम सब जीवन के ढर्रे में काफी बँध गए थे। एक दिन, हमें पता चला कि हैप्पी लंदन से दो हफ़्तों के लिए आ रहा था। सब फिर से मिलने के लिए उत्साहित थे। ‘कोलकाता में हैप्पी के घर पर 4 मार्च, 2006’ हमने फैसला किया।

आखिरकार, उस निर्धारित तारीख को मैं हैप्पी के घर की सीढ़ियाँ तेज़ी से चढ़ कर ऊपर गया। दोपहर के 12.30 बजे मैंने उसके दरवाजे को खटखटाया। उसकी माँ ने दरवाजा खोला और मुझे अंदर बुलाया। चूँकि मैं उसके घर कई बार जा चुका था। वो मुझे अच्छी तरह जानती थीं। हैप्पी के घर में बहुत अधिक औपचारिकताएँ नहीं होती थीं। मैं जब पानी पी रहा था उन्होंने मुझे बताया कि हैप्पी घर में नहीं था और उसका सेल फोन स्विच ऑफ था।

‘खूब ! और उसने मुझसे कहा था कि देर मत करना,’ मैं अपने आपसे बुदबुदाया।
कुछ देर बाद फिर दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई। दरवाज़ा खोलने के लिए मैं अपनी कुर्सी से उठा, क्योंकि हैप्पी की माँ किचेन में थीं। मैंने दरवाजा खोला तो कुछ इस तरह का शोर-शराबा होने लगा, ‘ओह...बुर्राह...हैंडसम... हा हा हा...ओहहा हा...!’ नहीं, यह हैप्पी नहीं था। एमपी और अमरदीप आये थे।

तीन सालों बाद कॉलेज के अपने दोस्तों से मिलना ऐसा उत्तेजक और पागलपन भरा होता है कि आपको इसका अंदाज भी नहीं रहता कि आप किसी और घर में हैं जहाँ आपको कुछ शिष्टाचार दिखाना चाहिए और शांत रहना चाहिए। लेकिन फिर इस पुनर्मिलन का सारा कारण ही यही था कि कॉलेज के दिनों को याद किया जाए और वह उसकी बेहतर शुरुआत थी। जब ड्राइंग रूम में हम सोफे पर बैठ गए तब एमपी ने हैप्पी के बारे में पूछा।

‘वह अपने घर में भी समय पर नहीं है, मैंने एमपी की ओर देखते हुए कहा और हम फिर से हँसने लगे। अगले करीब आधे घंटे तक हम तीनों बातें करते रहे, एक दूसरे का मजाक उड़ाते रहे और हैप्पी की माँ का बनाया हुआ लंच उड़ाते रहे। हाँ, हमने हैप्पी के बगैर ही खाना शुरू कर दिया था। यह सुनने में तो अच्छा नहीं लगता-लेकिन हमारे पास इसका ठोस कारण था-उसके बारे में यह कोई नहीं बता सकता था कि वह कब आएगा, इसलिए इंतजार करने का कोई मतलब नहीं था। कुछ देर बाद फिर दरवाजा खटखटाने की आवाज़ आई। दरवाजा हैप्पी की माँ ने खोला।’



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