पातंजल योगसूत्र योगदर्शन - नन्दलाल दशोरा Patanjal Yogsutra Yogdarshan - Hindi book by - Nandlal Dashora
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पातंजल योगसूत्र योगदर्शन

नन्दलाल दशोरा

हरीश प्रधान

प्रकाशक : रणधीर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8743
आईएसबीएन :08186955178

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पातंजल योगसूत्र योगदर्शन...

Patanjal Yogsutra Yogdarshan - Nandlal Dashora

पातंजल योगसूत्र : योगदर्शन

 

कोई भी सच्चा सम्बन्ध सजातीय तत्त्व से ही हो सकता है, विजातीय से नहीं। ईश्वर का सजातीय तत्त्व आत्मा ही है। अतः उसी से उसका प्रत्यक्ष अनुभव हो सकता है, अन्य जड़ तत्त्वों से नहीं।

इस शास्त्र में प्रकृति के चौबीस भेद एवं आत्मा और ईश्वर-इस प्रकार कुल छब्बीस तत्त्व माने गये हैं; उनमें प्रकृति तो जड़ और परिणामशील है अर्थात् निरन्तर परिवर्तन होना उसका धर्म है तथा मुक्तपुरुष और ईश्वर-ये दोनों नित्य, चेतन, स्वप्रकाश, असंग, देशकालातीत, सर्वथा निर्विकार और अपरिणामी हैं। प्रकृति में बँधा हुआ पुरुष अल्पज्ञ, सुख-दुःख का भोक्ता, अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने वाला और देशकालातीत होते हुए भी एकदेशीय सा माना गया है। इस ग्रन्थ में पुरुषविशेष को ईश्वर का प्रतिपादन करके उसकी शरणागति को आत्मसाक्षात्कार का कारण बताया है। ग्रन्थ में बहुत ही थोड़े शब्दों में आत्मकल्याण के बहुत ही उपयोगी और प्रत्यक्ष उपाय बताये गये हैं। ग्रन्थ का रहस्य समझने के लिये इसे आद्योपान्त पढ़कर उस पर विचार करें।

प्रत्येक साधक को इस ग्रन्थ में बताये हुए साधनों का श्रद्धापूर्वक सेवन करना चाहिये।

 

भूमिका

 

योग का अर्थ है ‘मिलना’, ‘जुड़ना’, ‘संयुक्त होना’ आदि। जिस विधि से साधक अपने प्रकृति जन्य विकारों को त्याग कर अपनी आत्मा के साथ संयुक्त होता है वही ‘योग’ है। यह आत्मा ही उसका निज स्वरूप है तथा यही उसका स्वभाव है। अन्य सभी स्वरूप प्रकृति जन्य हैं जो अज्ञानवश अपने ज्ञान होते हैं। इन मुखौटों को उतारकर अपने वास्तविक स्वरूप को उपलब्ध हो जाना ही योग है। यही उसकी ‘कैवल्यावस्था’ तथा ‘मोक्ष’ है। योग की अनेक विधियाँ हैं। कोई किसी का भी अवलम्बन करे अन्तिम परिणाम वही होगा। विधियों की भिन्नता के आधार पर योग के भी अनेक नाम हो गये हैं जैसे-राजयोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, संन्यासयोग, बुद्धियोग, हठयोग, नादयोग, लययोग, बिन्दुयोग, ध्यानयोग, क्रियायोग आदि किन्तु सबका एक ही ध्येय है उस पुरुष (आत्मा) के साथ अभेद सम्बन्ध स्थापित करना। महर्षि पतंजलि का यह योग दर्शन इन सब में श्रेष्ठ एवं ज्ञानोपलब्धि का विधिवत् मार्ग बताता है जो शरीर, इन्द्रियों तथा मन को पूर्ण अनुशासित करके चित्त की वृत्तियों का निरोध करता है। पतंजलि चित्त की वृत्तियों के निरोध को ही ‘योग’ कहते हैं क्योंकि इनके पूर्ण निरोध से आत्मा अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है।...

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