तुलसी दोहावली - राघव रघु Tulsi Dohawali - Hindi book by - Raghav Raghu
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तुलसी दोहावली

राघव रघु

प्रकाशक : ग्रंथ अकादमी प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 8748
आईएसबीएन :9789381063170

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यह पुस्तक तुलसी को समर्पित है, जो अपनी रचनाओं द्वारा हमारा मार्गदर्शन करते हैं, हमें सामाजिक व आध्यात्मिक रूप से श्रेष्ठ बनने की शिक्षा देते हैं।

Tulasi Padawali - A Hindi Book - by Raghav Raghu

हिन्दुओं के पवित्र ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास को उत्तर भारत के घर-घर में अकूत सम्मान प्राप्त है। राम की अनन्य भक्ति ने उनका पूरा जीवन राममय कर दिया था। हालाँकि उनका आरंभिक जीवन बड़ा कष्टपूर्ण बीता, अल्पायु में माता के निधन ने उन्हें अनाथ कर दिया। उन्हें भिक्षाटन करके जीवन-यापन करना पड़ा। धीरे-धीरे वह भगवान् श्रीराम की भक्ति की ओर आकृष्ट हुए। हनुमानजी की कृपा से उन्हें राम-लक्ष्मण के साक्षात् दर्शन् का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने ‘रामचरितमानस’ की रचना आरंभ की।

‘रामलला नहछू’, ‘जानकीमंगल’, ‘पार्वती मंगल’, ‘कवितावली’, ‘गीतावली’ ‘विनयपत्रिका’, ‘कृष्ण गीतावली’, ‘सतसई दोहावली’, ‘हनुमान बाहुक’ आदि उनके प्रसिद्ध ग्रंथ हैं।

यह पुस्तक उन्हीं तुलसी को समर्पित है, जो अपनी रचनाओं द्वारा हमारा मार्गदर्शन करते हैं, हमें सामाजिक व आध्यात्मिक रूप से श्रेष्ठ बनने की शिक्षा देते हैं।

तुलसी को वाणी, उनकी रचनाएँ मन को छू लेनेवाली हैं; हमें मार्ग दिखानेवाली हैं। इनका संदेश हमारा पाथेय है।

राघव ‘रघु’


प्राचीन भक्ति-कवियों की रचनाओं का अध्ययन कर उनकी रचनाओं को जनमानस तक पहुँचाने में विशेष अभिरुचि। संप्रति स्वतंत्र लेखन।

अपनी बात


हिन्दुओं के पवित्र ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास को उत्तर भारत के घर-घर में अकूत सम्मान प्राप्त है, जो भगवान् श्रीराम को प्राप्त है। राम की अनन्य भक्ति ने उनका पूरा जीवन राममय कर दिया था। हालाँकि उनका आरंभिक जीवन बड़ा कष्टपूर्ण बीता, अल्पायु में माता के निधन ने उन्हें अनाथ कर दिया। उन्हें भिक्षाटन करके जीवन-यापन करना पड़ा। धीरे-धीरे वह भगवान् श्रीराम की भक्ति की ओर आकृष्ट हुए। हनुमानजी की कृपा से उन्हें राम-लक्ष्मण के साक्षात् दर्शन् का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने ‘रामचरितमानस’ की रचना आरंभ की। उन्हें ब्राह्मण वर्ग का कोपभाजन भी बनना पड़ा; लेकिन अंत में भगवान् राम की कृपादृष्टि से उनके विरोधियों को मुँह की खानी पड़ी और समाज में उन्हें मान-सम्मान मिलने लगा। इतनी कठोर स्थिति में भी इतनी महान् रचना का सृजन सचमुच दैवी आशीर्वाद ही कहा जा सकता है।

इसके बाद राम, सीता और हनुमान की स्तुति-स्वरूप उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की, जैसे-‘रामलला नहछू’, इसमें श्रीराम के यज्ञोपवीत का वर्णन है। इसका रचनाकाल सं. 1616 वि. माना जाता है; ‘जानकीमंगल’, इसमें नाम के अनुकूल सीताजी के विवाह का वर्णन है; ‘पार्वती मंगल’, इसमें पार्वतीजी के विवाह का वर्णन है। इनके अलावा ‘गीतावली’, ‘विनयपत्रिका’, ‘कृष्ण गीतावली’, ‘सतसई दोहावली’, ‘हनुमान बाहुक’ आदि उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।

लेकिन जिस ग्रंथ ने उन्हें लोकप्रिय बनाया, वह रामचरितमानस ही है। यही वही प्रसिद्ध ग्रंथ है जिसका परायण समस्त भारत में करोड़ों लोग करते हैं। इसमें रामकथा बड़े ही सुंदर एवं मौलिक ढंग से कही गई है। ‘रामचरितमानस’ की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उत्तर भारत के मध्य क्षेत्र से उत्पन्न यह कथा भारतवासियों को ही नहीं, अपितु दुनिया भर के लोगों को किसी-न-किसी रूप में प्रेरित करती आ रही है।

यह पुस्तक उन्हीं तुलसी को समर्पित है, जो अपनी रचनाओं द्वारा हमारा मार्गदर्शन करते हैं, हमें सामाजिक व आध्यात्मिक रूप से श्रेष्ठ बनने की शिक्षा देते हैं। जो रचनाएँ उन्होंने निजी कष्ट-निवारणार्थ लिखीं, आज वे सार्वजनिक कष्ट-निवारण का माध्यम और वंदनीय हैं। यह लोक-विश्वास एवं जन-आस्था ही है कि उनकी रचनाओं में लोग अपना भौतिक, लौकिक व आध्यात्मिक कल्याण न केवल देखते हैं, बल्कि पाते भी हैं।



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