निराकार : कुल-मूल-लक्ष्य - सरश्री Niraakaar - Kul Mool Lakshya - Hindi book by - Sirshree
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निराकार : कुल-मूल-लक्ष्य

सरश्री

प्रकाशक : तेजज्ञान ग्लोबल फाउण्डेशन प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :208
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8765
आईएसबीएन :9788184152760

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निराकार : कुल-मूल-लक्ष्य - खाली होने की कला - स्वज्ञान की विधि

Ek Break Ke Baad

निराकार का तीसरा तरीका

बारिश होती है तो उसका पानी किसी मटके में, किसी नदी में, किसी तालाब में आ गिरता है| एक कौआ मटके में गिरा हुआ पानी पीने के लिए उसमें पत्थर डालकर उसे ऊपर तक लाता है ताकि वह पानी पी सके| यह उसका तरीका है| दूसरा कौआ एक स्ट्रॉ (पाईप) पानी में डालकर पानी पीता है, अपनी प्यास बुझाता है| मगर चातक पक्षी शुद्ध पानी पीता है| जब तक बारिश नहीं गिरती तब तक वह प्यासा ही रहता हैऔर बारिश होने पर बारिश की बूँदों का ही सीधे सेवन करता है|

यह तीसरा तरीका है जिसमें न पत्थर डालने पड़े, न पाईप डालनी पड़ी, सीधे आसमान से गिरनेवाली बूँद को अपने अंदर ले लिया गया| इस तरह शुद्ध बूँद का सेवन करके जो आनंद प्राप्त होता है,उसे चातक ही बता सकता है|

यह पुस्तक (बूँद) तेजज्ञान सागर के अनमोल मोतियों में से एक है, जिसे हंस बनकर हमें चुगना है| कौआ बनकर बहुत जी लिए, अब हंस बनकर जीना है| अपने अंदर के आसमान के मोती पहचान कर पारखी बनें| ऐसा पारस आपको मिले, जिससे मोती बनाए जा सकें| अगर ऐसा कोई तरीका विश्‍व में उपलब्ध है तो उसे सीखकर पारस की परख पाएँ| हृदय ही वह स्थान है, जो सच्चे पारस की पहचान रखता है| इसलिए यह पुस्तक हृदय से पढ़ें और ‘तेज’ को अपनाएँ|
आकार से शुरू कर, निराकार को पाएँ...
संसार में रहकर, कमल को पाएँ...
कुछ नहीं पाकर, सब कुछ पाएँ...


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