विचारों की शक्ति और सफलता - सत्य नारायण Vicharon Ki Shakti Aur Safalta - Hindi book by - Satya Narayan
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विचारों की शक्ति और सफलता

सत्य नारायण

प्रकाशक : दिव्यांश प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :197
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8990
आईएसबीएन :9789384657086

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ब्रायन ट्रेसी मंच के वक्ता सत्य नारायण की प्रभावशाली कृति

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हमारी मानसिक शक्ति का प्रयोग विचारों के ही माध्यम से होता है। हमारे मस्तिष्क की यह क्षमता है कि यह विचारों के विषय, उन विषयों की प्रकृति (सकारात्मक या नकारात्मक) तथा विचारों के निष्कर्ष का निर्णय कर सकती है, हम अपनी विचार प्रक्रिया को अनुशासित तथा चैनलाइज कर मनचाहे परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। हमें सप्रयास उन विचारों को चुनना चाहिए जो सकारात्मक हो, विधायक हों, क्योंकि जीवन सकारात्मकता से चलता है।

प्रस्तुत पुस्तक मूलतः विचारों की सकारात्मकता पर ही केन्द्रित है और विद्वान लेखक ने मानव-मन तथा विचार की तहों में जाकर मूल्यवान निष्कर्ष एवं संकेत प्रस्तुत किये हैं। सरल, स्पष्ट एवं बोधपूर्ण शैली में लिखित यह पुस्तक आपके लिए निश्चित रूप से पठनीय है।

लेखक के बारे में

सत्य नारायण, ब्रायन ट्रेसी प्रेरक समिति के संस्थापक एवं अध्यक्ष हैं। यह एक प्रेरक वक्ता एवं लेखक के रूप में वर्तमान समाज को दिशा देने का कार्य अनेकों माध्यमों से करते आए हैं। दैनिक समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में इनके प्रेरित करने वाले लेख कई वर्षों से छपते रहें हैं। इन्होंने स्कूल, काँलेज एवं सार्वजनिक स्थानों पर और सभाओं के मंचों पर सेमिनारों में अपने कार्यक्रमों को प्रस्तुत किया है। इनके जीवन का उद्देश्य ही है लोगों को लाभ पहुँचाना।

इन्होंने बी. एड., एम. ए. (समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र एवं दर्शनशास्त्र) एम. फिल. (राजनीतिशास्त्र) एवं मूल्य शिक्षा एवं अध्यात्म में पी.जी. डिप्लोमा, अध्यात्म में स्नातकोत्तर विज्ञान कोर्स एवं रेकी हीलिंग कोर्स किया है। फिलवक्त यह इसी क्षेत्र में अध्ययनरत् हैं।

समाज को बहुत कुछ सकारात्मक देने की प्रेरणा से नौकरी की तरफ से इनका ध्यान हट गया और इस संकल्प के साथ प्रेरण एवं लेखन के क्षेत्र में समर्पण कर दिया कि इनका जीवन समाज सेवा के लिए है। ‘‘विचारों की शक्ति और सफलता’’, इनकी पहली महान एवं अद्भुत पुस्तक है। जिसमें इन्होंने 20 वर्षों के अपने अनुभव को देने की कोशिश की है। इनका विश्वास है कि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद लोगों के जीवन में अवश्य सकारात्मक परिवर्तन होंगे और जीवन में वो सारी चीजें प्राप्त होंगी जिनकी लोगों को तलाश है।

प्रकाशकीय

यह पुस्तक विचारों की शक्ति को सफलताओं के सन्दर्भ में मूल्यांकन करती है। लेखक ने बहुत सूक्ष्मता तथा आत्मीय ढंग से विचारों से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा तथा इस ऊर्जा से मानवजीवन किस तरह से रूपांतरित होता है पर सरल, सुबोध तथा प्रभावकारी अध्ययन प्रस्तुत किया है। पूरी पुस्तक छोटे-छोटे अध्यायों में बांटी गई है। दुरुह विषयों को सरल उदाहरणों के साथ समझाने तथा स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है, जिससे यह पुस्तक साधारण शिक्षा-दीक्षा वाले व्यक्तियों से लेकर उच्च ज्ञान तथा क्षमता वाले लोगों को समान रूप से प्रभावित कर सकेगी।

आप देखते है कि सफलता विषय पर लिखी गयी पुस्तकों से पूरा बाजार पटा है किंतु यह पुस्तकें अधिकांश भौतिकवादी जीवन दर्शन तथा आर्थिक समृद्धि को अर्जित करने पर ही केन्द्रित हैं। किंतु लेखक की यह पुस्तक विशेष रूप से आध्यात्मिक सूत्रों के रोजमर्रा की जिन्दगी में निहितार्थ को तो चित्रित करती है साथ ही पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता, मानव की सफलता के सामाजिक पारिवारिक तथा समष्टिगत निहितार्थों पर भी व्यापक रूप से प्रकाश डालती है और इस तरह एक सर्वांगीण या सम्पूर्ण सफलता की अवधारणा को सामने लाती है जिससे आपकी सफलता किस तरह एक सामाजिक सफलता का रूप ले सके। आज के भौतिक जीवनदर्शन तथा आपा-धापी में मनुष्य अपनी नैसर्गिकताओं को खोला जा रहा है। सम्बन्ध बोझिल तथा उबाऊ होते जा रहे हैं और पर्यावरण के प्रति असंवेदनशील आचरण ने वस्तुतः धरतीग्रह के ही संकटग्रस्त हो जाने का खतरा प्रस्तुत कर दिया है तो इस दशा में लेखक की इस पुस्तक ने बड़ी ही चतुराई से सफलता के साथ विचारों की परिधि में इन सभी विषयों को लाने का काम बखूबी किया है।

प्रत्येक अध्याय के अंत में ‘सफलता के नियम’ उपशीर्षक के अन्तर्गत लेखक ने जीवन अनुभवों, मूल्यों तथा प्रेरक बातों को प्रभावी ढंग से उद्धत किया है जिससे यह बातें विशेष ध्यानाकर्षण पा सकी है।

एक लम्बे अरसे से एक ऐसी पुस्तक की कमी महसूस हो रही थी जो मानव-सफलता का एकागी उल्लेख मात्र न करके एक विराट वैश्विक संदर्भ में सफलता को रख सके। और विचारों की सकारात्मकता द्वारा मानव जीवन तथा वैश्विक प्रभावों की पुनर्स्थापना करने का कार्य कर सके। साथ-साथ अब तक के मानव जीवन से प्राप्त आध्यात्मिक पूंजी तथा संवेदनशीलता के उच्च स्तर को ग्राह्य बना सके। इस अर्थ में लेखक की यह पुस्तक एक बड़ी सीमा तक इस कार्यभार को ठीक ढंग से उठा पायी है।

आशा है कि लेखक के इस व्यापक प्रयास को आप तक पहुंचाने का दिव्यांश पब्लिकेशंस का यह कार्य आपको वैचारिक, भावनात्मक तथा निश्चयात्मक रूप से सहयोग तथा सहायता पहुंचाने में सफल होगा। इसी शुभ कामना के साथ

- प्रकाशक

प्रस्तावना

‘विचारों की शक्ति और सफलता’ श्री सत्यनारायण की पहली पुस्तक है जिसे उन्होंने एक महान उद्देश्य से लिखा है। लेखक एक युवक है और अपने थोड़े जीवन में ही इन्होंने अनेक विषमताओं का सफलतापूर्वक सामना किया है। इसका मुख्य कारण उनके विचारों की शक्ति ही रहा है। अतः वे इस पुस्तक को लिखने के लिए सर्वथा उपयुक्त व्यक्ति हैं। जो बात स्वयं अपने अनुभव से लिखी जाती है, वह न केवल व्यवहारिक होती है किन्तु पाठक पर प्रभाव भी डालती है। प्रथम दृष्टता मुझे यह पुस्तक इसी श्रेणी की लगती है।

मैं स्वयं विचारों की शक्ति में बहुत विश्वास रखता हूं। सम्पूर्ण सृष्टि में मनुष्य ही मात्र ऐसा प्राणी है, जो लगभग हर समय चिंतन करता है। वास्तव में चिंतन ही एक ऐसा गुण है, जिसके कारण मनुष्य समस्त प्राणियों में सर्वोत्तम माना जाता है। मनुष्य के रूप में जन्म लेना एक दुर्लभ उपलब्धि है और इस उपलब्धि का पूर्ण सदुपयोग किया जाना चाहिए। इसका स्वाभाविक अर्थ यह निकलता है कि चिंतन के माध्यम से मनुष्य वह परम लक्ष्य प्राप्त कर सकता है, जिसे अन्य प्राणी नहीं कर सकते। अतः मनुष्य के जीवन में ‘विचारों’ का महत्व अत्याधिक है।

सामान्य दृष्टि से चिंतन एक मानसिक प्रक्रिया है जो लगभग हर समय चलती रहती है। जब हमारी इन्द्रियों का सम्पर्क बाह्य जगत से होता है तो मन की यह प्रक्रिया और भी बढ़ जाती है। इस चिंतन का स्वरूप कैसा होगा, वह हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। एक मनुष्य का चिंतन समान परिस्थितियों में दूसरे मनुष्य से भिन्न हो सकता है। कुछ मनुष्य कठिन परिस्थितियों में भी शांत एवं आशान्वित रहते हैं, जबकि कुछ मनुष्य अनुकूल परिस्थितियों में भी अशांत एवं भयभीत रहते हैं। निःसन्देह प्रथम श्रेणी के मनुष्य दूसरी श्रेणी के मनुष्यों से उत्तम माने जायेंगे। इतिहास इस बात का साक्षी है कि अन्ततः वही लोग सफल हुए, जिन्होंने जीवन के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण अपनाया। ऐसे व्यक्ति न केवल अपने जीवन को उत्तम बनाते हैं, बल्कि उन सबको भी प्रेरणा देते हैं, जो उनके सम्पर्क में आते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अच्छे विचार ही मनुष्य को उसके लक्ष्य की ओर अग्रसर करते हैं और प्रत्येक मनुष्य को विचारों की शक्ति को समझना चाहिए।

कहने में यह बात बहुत सरल प्रतीत होती है, किन्तु व्यवहारिकता में कठिन है। वर्तमान परिस्थितियों में तो यह और भी कठिन प्रतीत होती है आज का मनुष्य अपने चारों ओर इतनी कठिनाईयां देखता है कि उसके मन में अधिकांशतः अस्वस्थ विचार ही आते है और स्वस्थ विचार उसे व्यवहारिक भी प्रतीत नहीं होते। हो सकता है अल्प समय के लिए यह विचारधारा ठीक भी हो, किन्तु अंततः अस्वस्थ चिंतन से किसी समस्या का समाधान नहीं होता और सफलता प्राप्त होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। वर्तमान समय में भी जो लोग सफलता प्राप्त करते हैं, वे अपने आशावान दृष्टिकोण, परिश्रम, साहस, ईमानदारी, विनम्रता, करुणा आदि गुणों के कारण करते हैं। यहां सफलता की परिभाषा में मतभेद हो सकता है, किन्तु सफलता की कोई भी परिभाषा ली जाय, स्वस्थ चिंतन उसके लिए आवश्यक है।

प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में सफल होना चाहता है और होना भी चाहिए। क्या यह संभव है ? अवश्य है, यदि हम अच्छे विचारों की शक्ति को समझें और स्वस्थ चिंतन के पथ पर चलें। यह प्रक्रिया बहुत सरल नहीं है किन्तु जीवन के कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांतों को समझने के बाद व उनको जीवन में उतारने पर सरल हो जाती है उसके बाद यदि विचलन होता भी है तो वह अल्प समय के लिए होता है और शीघ्र ही ऐसा व्यक्ति पुनः स्वस्थ चिंतन के पथ पर आ जाता है। एक बार इस पथ पर आकर बने रहने के लिए केवल सामान्य प्रयास की आवश्यकता होती है। किसी ने कहा है कि स्वस्थ विचार भोजन की तरह हैं जो उचित मात्रा में मन को मिलते रहने चाहिए और बिना विचारों के मन का कोई अस्तित्व ही नहीं रहेगा।

श्री सत्यनारायण ने अपनी पुस्तक में उपरोक्त वास्तविकता को प्रतिपादित किया है। छोटे-छोटे 64 अध्यायों में उन्होंने जीवन के लगभग प्रत्येक पक्ष को लिया है और रुचिकर ढंग से उसकी व्याख्या की है। उन्होंने इस बात को स्थापित किया है कि जीवन के प्रत्येक पक्ष में विचारों की शक्ति काम करती है और यदि हम उस शक्ति का उपयोग करते हैं तो उस पक्ष को प्रभावित कर सकते हैं। नि संदेह स्वस्थ विचारों की शक्ति सकारात्मक होती है और हमें सफलता की ओर अग्रसारित करती है। इसके विपरीत अस्वस्थ विचारों की शक्ति विनाशकारी होती है और हमें असफलता की ओर ढकेलती है। यह लगभग उसी प्रकार है जैसे आणविक शक्ति का उपयोग जिसे हम सृजन एवं विध्वंस दोनों में लगा सकते हैं।

इस पुस्तक की शैली भी रुचिकर है। लेखक ने प्रत्येक अध्याय को छोटे-छोटे अंशों में विभक्त किया है और अंत में ‘सफलता के नियम’ शीर्षक से सद्विचार व्यक्त किये है। मेरे विचार में ये सद्विचार स्वयं में एक पुस्तक संकलित कर सकते हैं। हो सकता है पुस्तक में कुछ बातों को बार-बार कहा गया हो, किन्तु इस प्रकार की पुस्तक के लिए ऐसा होना भी उपयोगी है। एक महान कवि ने लिखा है :

‘करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते, सील पर पड़त निसान’।।

अच्छे विचार भी मन में तभी स्थायी स्थान लेते है जब उनको बार-बार सुना जाय, पढ़ा जाय एवं गुणा जाय। मैं आशा करता हूं यह पुस्तक ऐसा करने में सफल होगी।

वर्तमान समय में अच्छी पुस्तकों की बहुत आवश्यकता है। यों तो आज बाजार में प्रेरणात्मक पुस्तकों की बाढ़ सी आ गई है और पाठक को यह तय करना कठिन हो गया है कि कौन सी पुस्तक पढ़ी जाय। अधिकांश पुस्तकें धनार्जन के उद्देश्य से केवल संकलित की जाती है। ऐसी पुस्तकों का प्रभाव नगण्य ही होता है। केवल वही पुस्तकें जो अनुभव के आधार पर मन से लिखी जाती हैं, अपना प्रभाव छोड़ती है। जैसा पूर्व में उल्लेख किया गया है, यह पुस्तक इन शर्तों को पूरी करती है अतः अपना प्रभाव पाठकों पर डालेगी, इसका मुझे पूर्ण विश्वास है।

यहां दो शब्द पुस्तक के प्रकाशक ‘दिव्याश पब्लिकेशन्स’ के बारे में कहना आवश्यक है। यह प्रकाशक अभी नया ही कहा जायेगा किन्तु इसने अपना व्यवसाय एक अच्छे उद्देश्य से प्रारंभ किया है। इसके द्वारा प्रकाशित सभी पुस्तकें सकारात्मक विषयों पर होती हैं और इस पुस्तक को भी इसी उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। सामान्यतः किसी भी लेखक द्वारा अपनी पहली पुस्तक को प्रकाशित कराना सरल नहीं होता। किन्तु इस पुस्तक का प्रकाशन स्वयं में विचारों की शक्ति का एक प्रतीक है। इसके लिए श्री नीरज अरोड़ा एवं उनके साथी भी बधाई के पात्र है। नीरज जी कबीर शांति मिशन के वरिष्ठ आजीवन सदस्य है और मिशन की सफलता में उनका बड़ा योगदान है। कबीर शांति मिशन की स्थापना ही समाज में सकारात्मक सोच विकसित करने हेतु की गई थी। इस प्रकार यह पुस्तक मिशन के उद्देश्यों की पूर्ति की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।

अन्त में मैं श्री सत्य नारायण को पुनः हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं। श्री सत्य नारायण से मैं केवल एक बार ही मिला हूं और मैंने इन्हें अपने नाम के अनुरूप पाया है। ईश्वर इनके उत्साह एवं प्रेरणा को बनाये रखें ताकि वे निरन्तर समाज की निःस्वार्थ सेवा करते रहें। पाठकों को मेरा परामर्श है कि इस पुस्तक को अनेक बार पढ़ें।

- राकेश कुमार मित्तल

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