टाइगर टाइगर - खुशवंत सिंह Tiger Tiger - Hindi book by - Khushwant Singh
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टाइगर टाइगर

खुशवंत सिंह

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2013
पृष्ठ :100
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 9040
आईएसबीएन :9789350641316

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टाइगर टाइगर...

Tyger Tyger - A Hindi Book by Khushwant Singh

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

टाइगर टाइगर एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कृति है। लेखक खुशवंत सिंह की लंबी लेखन यात्रा में उनका यह एकमात्र नाटक है और हिन्दी में यह पहली बार स्वतंत्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। इस रोचक नाटक में उनकी जानी-पहचानी शैली पढ़ने को मिलती है जिसमें थोड़ा मनोरंजन, थोड़ा कटाक्ष, थोड़ी शराब और थोड़ा शवाब सभी का मिश्रण है जो पाठक को शुरू से अंत तक बांधे रखता है।

एक संरक्षित जंगल के बीच आबादी से दूर एक होटल है जिसमें पर्यटक जंगली जानवर देखने आते हैं। विभिन्न देशों से आये अलग-अलग संस्कृति और मान्यताओं को मानने वाले पर्यटक, एक साथ जब इकट्ठे होते हैं तो समझो कि ‘ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ़ इंडियन राइटिंग’ खुशवंत सिंह के लिए एक चटपटी मसालेदार सामग्री तैयार है, जिससे बना रोचक नाटक, टाइगर टाइगर।

जाने-माने लेखक खुशवंत सिंह का एकमात्र नाटक है टाइगर टाइगर। यह नाटक पुरानी अप्रकाशित पाण्डुलिपियों के बीच में वर्षों तक दबा रहा है और सन् 1993 में प्रकाशित पुस्तक नॉट ए नाइस मैन टू नो में यह नाटक पहली बार सम्मिलित हुआ।

खुशवंत सिंह एक बहु-प्रतिभाशाली लेखक हैं जिन्होंने अलग-अलग विधाओं और विषयों पर भरपूर लिखा है। जहां एक ओर उन्होंने शराब और शवाब में डूबे औरतें और समुद्र की लहरों में जैसे बेस्टसैलर उपन्यास लिखे हैं तो दूसरी ओर भारत के विभाजन की पीड़ा को दर्शाते हुए ए ट्रेन टू पाकिस्तान जैसा दिल को छू लेने वाला उपन्यास भी लिखी है। सिख धर्म के प्रति उनकी बहुत श्रद्धा और आस्था है और उन्होंने सिख कौम पर एक बृहत् प्रामाणिक इतिहास लिखा है। उन्हें उर्दू शायरी से बहुत लगाव है और उन्होंने कई जाने-माने शायरों की शायरी का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया है। इसके अतिरिक्त खुशवंत सिंह ने भारत की संस्कृति, इतिहास और अनेक सामयिक विषयों पर भी लिखा है और व्यंग्य के मामले में तो वे अपने चुटकुलों के कारण मशहूर हैं हीं।

प्राक्कथन
यह अद्भुत नाटक

स्वयं अपनी और दूसरों की असलियत को बेसाख्ता उजागर करने वाले अति चर्चित, सर्वप्रिय पत्रकार खुशवंत सिंह ने कहानियाँ और उपन्यास भी लिखे-जिनमें से एक ‘ट्रेन टु पाकिस्तान’ बहुत प्रसिद्ध हुआ और उस पर फिल्म भी बनी। परन्तु वे खुद को लेखक नहीं मानते हैं-और अच्छा लेखक तो बिल्कुल भी नहीं-लेकिन उनका यह अद्भुत नाटक इस धारणा को गलत सिद्ध करता है। इस तीन अंकों के छोटे से नाटक की कहानी भी विचित्र है। इसे उन्होंने सत्तर के दशक में या जब कभी लिखा होगा, फिर कहीं रख दिया। न यह प्रकाशित हुआ, न खेला गया।

इसकी खोज उनकी चुनी हुई रचनाओं का एक संग्रह प्रकाशित करने के काम में लगी नन्दिनी मेहता ने की-जो उसे अप्रकाशित पांडुलिपियों के ढेर में दबी हुई मिली। और इसे ‘नॉट ए नाइस मैन टु नो’ के प्रथम संकलन में प्रकाशित किया। इसका दूसरा संस्करण 2011 में छपा, लेकिन अब भी इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया है।

टाइगर टाइगर बर्निंग ब्राइट का यह हिन्दी अनुवाद पहली बार एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। हालाँकि इस देश और विशेषकर उत्तर भारत में नाटकों को महत्त्व नहीं दिया जाता, फिर भी अनेक दृष्टियों से यह अपूर्व है। इसमें अपने समय की ज़िन्दगी को, जिसमें भारत छोड़कर अपने देश गए अंग्रेजों, अमेरिकी पैसा और सभ्यता लेकर दुनिया भर में घूम रहे अमेरिकनों तथा उस समय के सबसे अनोखे, जीवन के प्रयोग कर रहे प्राणियों-जिन्हें ‘हिप्पी’ का रोचक नाम दिया गया और जिन्होंने सारी दुनिया में कुछ समय के लिए जबर्दस्त हलचल मचा दी, और जो अब गोआ के समुद्रतटों पर जिन्दगी के आखिरी वर्ष व्यतीत कर रहे हैं-बड़ी ऐतिहासिक समझ और रोचकता से चित्रित किया गया है।

यह नाटक ‘विद मैलिस टुवर्ड्स वन एंड ऑल’ के प्रसिद्ध सरदार साहब को श्रेष्ठ साहित्यकार की श्रेणी में ला खड़ा करने के लिए पर्याप्त है-कुछ इस तरह जैसे पूर्व प्रधान मंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के उपन्यास ‘इनसाइडर’ (हिन्दी में राजपाल एंड सन्ज़ द्वारा प्रकाशित ‘अन्तर्गाथा’) को प्राप्त हुआ। यह अद्भुत नाटक पढ़ते हुए विषयों के चुनाव और तीखी अभिव्यक्ति के लिए बरबस बर्नार्ड शॉ की याद आने लगती है।

यह नाटक अंग्रेज़ी में लिखा गया था, और यह उस समय सामने भी नहीं आया, इसलिए यह खेला नहीं जा सका। देश में अंग्रेज़ी नाटकों के मंचन की परम्परा नहीं के बराबर है। अब यह हिन्दी रूपान्तर में प्रकाशित हो रहा है-इसलिए इसे आसानी से खेला जा सकता है। लेखक को उनकी इस दीर्घायु में यह विशेष भेंट होगी।

पात्र-परिचय

यास्मीन अहमद : 22 वर्षीया रिसेप्शनिस्ट, पूर्व एयर होस्टेस
शार्दूल सिंह : 60 वर्षीय चोबदार, रिटायर्ड सिख सिपाही और शिकारी
ए. एन. माथुर : 35 वर्षीय भारत सरकार में डायरेक्टर ऑफ टूरिज़्म
महाराजा : 30 वर्षीय युवा
शामनगर के महाराजा
जैक कोनरान-स्मिथ : 25 वर्षीय लंबे बालों और दाढ़ीवाला अंग्रेज़ हिप्पी
एल्फ़ श्नेडरमैन : 60 वर्षीय अमेरिकी पर्यटक
मिसेज़ श्नेडरमैन : 55 वर्षीया एल्फ की पत्नी
होटल के कर्मचारी

दृश्य

(राष्ट्रीय संरक्षित वन के एक होटल का प्रवेश द्वार। एक तरफ़ रिसेप्शन की मेज़ रखी है, जिसके पीछे दीवाल पर चाभियाँ लटकाने और चिट्ठियाँ रखने के खाने और टेलीफोन का स्विच बोर्ड लगे हुए हैं। मेज़ पर होटल में ठहरने वालों के नाम-पतों का बड़ा-सा रजिस्टर और उसके साथ ‘ड्राई डे’ लिखा हुआ छोटा-सा बोर्ड रखा है, बगल में ‘एयर इंडिया महाराजा’ का पोस्टर और छोटे-मोटे होटलों की ज़रूरत की चीज़ें इधर-उधर पड़ी हैं।

यही होटल की लॉबी है। रिसेप्शन की मेज़ के बगल में एक सोफ़ा, तीन आरामदेह कुर्सियाँ और एक लंबी मेज़ पड़ी है। कमरे में सजावट के लिए फूलदार गमले रखे हैं और हरी-भरी क्यारियाँ बनी हैं।

प्रवेश द्वार के ठीक सामने दीवाल पर दो बड़े पोस्टर लगे हैं जिनमें एक पर पं. जवाहरलाल नेहरू की तस्वीर विदेशी आगन्तुकों का विशेष रूप से स्वागत करते हुए लगी है, दूसरी में ताजमहल की तस्वीर और उसके नीचे ‘विज़िट इंडिया’ लिखा है-और इन दोनों के बीच मुँह फाड़कर चिंघाड़ते एक चीते का सिर लटका हुआ है।

मेज़ के पीछे रिसेप्शनिस्ट लड़की रजिस्टर पर सिर झुकाए हुए लिखने में लगी है।
प्रवेश द्वार की सीढ़ियों के बगल में वर्दी में लैस चोबदार पैरों के बीज बंदूक दबाये बैठा है।)
(नोट : होटल के बाहर का फाटक लोहे का बना है जिसे दिन के समय खोला जा सके।)

चोबदार : मिस साहब जी, मुझे यह बताओ-घने जंगलों के बीचोंबीच होटल बनवाने की क्या तुक है ? आप तो दुनिया भर में घूमे फिरे हो। हमारी सरकार जो भी करती है उसमें आपको क्या तुक नज़र आती है ?

रिसेप्शनिस्ट : (चश्मा उतारकर) भले आदमी, ज़रा धीरज रखो। आज पहला ही दिन है। यहाँ दुनिया भर से लोग हमारे जंगली जानवरों को देखने आएँगे...

(तभी स्विच बोर्ड में खनक होती है) अब देखो, क्या कहा मैंने।
(लाइन जोड़ती है) गुड ईवनिंग, होटल वाइल्ड लाइफ।
(खड़खड़ाती आवाज़) हाँ, हाँ होटल वाइल्ड लाइफ।
(चोबदार से कहती है) टेलीफ़ोन वाले लाइन चेक कर रहे हैं।
(लाइन अलग करती है) तो शार्दूल सिंह, मैं कह रही थी कि दुनिया भर से पैसे वाले हज़ारों साहब लोग यहाँ आएँगे।

चोबदार : अच्छा जी ठीक है, अब मेरी दूसरी बात का जवाब दो। आपने अपने इस गुलाम को यह बंदूक तो पकड़ा दी। अब आप कहते हो कि यह संरक्षित जंगल है, यहाँ गोली न चलाना।

रिसेप्शनिस्ट : तुम्हारा यहाँ काम होगा लोगों को सफ़ेद चीते और घूमते हुए शेर, हाथी, गैंडे वगैरह दिखाना। इन्हें मारना नहीं होगा तुम्हारा काम। तुम्हारी पुरानी बन्दूक इन्हें डराने के लिए है सिर्फ, मारने के लिए नहीं।

चोबदार : (एक नली की अपनी बदूंक को घुमाते हुए) नई बंदूक है जी, मिस साहब और बंदूक अगर सिर्फ आवाज़ ही करे-ठह और चोट न मारे तो जानवर भी उसकी इज़्त्न नहीं करेंगे। फिर आप क्या करोगे। मैं कहता हूँ...।

रिसेप्शनिस्ट : होटल वाइल्ड लाइफ़, गुड ईवनिंग ! (खड़कती आवाज़, वह हाथ से फ़ोन का मुँह दबा लेती है) फिर वही लोग हैं, टेलीफोन वाले। इन्हें ज़रा भी समझ नहीं है। (टेलीफ़ोन वालों की नकल करते हुए कहती है) टेस्टिंग, टेस्टिंग, टेस्टिंग। वन, टू, थ्री, फ़ोर (टेलीफोन में बोलती है) यस, यस-हाँ, शार्दूल सिंह, तुम क्या कह रहे थे ?


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