मैं आवारा बादल - प्रमोद तिवारी Mai Awara Badal - Hindi book by - Pramod Tiwari
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मैं आवारा बादल

प्रमोद तिवारी

प्रकाशक : हेलो प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :112
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 9061
आईएसबीएन :9789380306193

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मैं आवारा बादल...

Mai Awara Badal - A Hindi Book by Pramod Tiwari

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ये बादल ही मेरे गीत हैं...

मैं आवारा बादल मेरा पहला गीत संग्रह है। अपने प्रथम गीत संग्रह के बहाने मैं गीत से जुड़े अपने कुछ ‘आग्रहों’ को आपसे साझी करना चाहता हूँ। एक तो गीत मेरे लिए एहसास के स्तर पर हमेशा सहज ग्राही और अभिव्यक्ति के स्तर पर हमेशा बेहद कठिन रहा है। हालांकि जीवन में पहली बार जब भी मैंने कविता के रूप में कुछ भी लिखा होगा तो वह गीत की शक्ल जैसा ही होगा। क्योंकि मुझे होश आते ही यही लगा कि कविता माने गीत या कविता माने छंद विधान में तुक (काफिया) निर्वाह के साथ सरस अभिव्यक्ति। ऐसी अभिव्यक्ति, जिसे अगर कोई सुमधुर कंठ गुनगुना दे, तो हवा भी कुछ पल ठहर कर अपने कान लगा दे और खुद भी गुनगुनाने लगे, राह में अगर बांस का जंगल पड जाये तो बांसुरी सा बज उठे। इस तरह मैं छंद का घनघोर समर्थक हूँ और हिन्दी गीत कविता का छंदात्मक एवं ध्वन्यात्मक रूप-स्वरूप और स्वर ही मुझे श्रेष्ठ लगता है। मेरी दृष्टि में श्रेष्ठ काव्य वही है, जिसका भाव पक्ष प्रबलतम् हो और कलापक्ष सुंदरतम्। कला पक्ष से मेरा आशय शिल्प, छंद विधान तथा रुचिकर अभिनव प्रयोगों से है। छंद और शिल्प, कविता (गीत ) का अनुशासन है। वैसे भी जो बात जितनी अधिक अनुशासित और सहज विधि से कही-सुनी व पढ़ी-लिखी जाती है, वह मेरे लिए उतनी ही श्रेष्ठ होती है। आज दिन तक चाहें ग़ज़ल हो या गीत, मुझे भीतर तक वही नहला सके जो सरलता और सहजता से झरने की तरह बजे। अगर शिल्प अर्थात कलापक्ष के कारण कभी कहीं संप्रेषण में जटिलता लगी है तो मैंने उस गीत को अपने स्तर पर खारिज ही किया है, चाहे उसके पीछे कितने ही बड़े कवि का नाम हो या चाहे उस कविता (गीत) के पीछे कितना ही बड़ा नया या पुराना आंदोलन खडा हो। अनुशासन समर्थक होने के बावजूद गीत के भाव पक्ष के साथ छेड़-छाड़ मुझे कुबूल नहीं है। आखिर कविता (गीत) की आत्मा बसती तो भाव में ही है। मुझे लगता है कि किसी आदि कवि को छंद को तोड़ने की आवश्यकता पड़ी ही तब होगी, जब भाव को व्यक्त करने में अनुशासन, छंद (कला) आड़े आ रहा होगा। वास्तव में शिल्प, भाव का आभूषण है, सुंदरता है, न कि दुरुहता या खोट। निराला जी का जिक्र आता है कविता (गीत) को छंद से मुक्त करने वाले प्रथम ‘विद्रोही’ या प्रयोगवादी कवि के रूप में। लेकिन उन्होंने शायद यह सोचा नहीं होगा कि आने वाले समय में कविता (गीत) को पूर्णतः शिल्प मुक्त कर दिया जायेगा। इस कदर शिल्प मुक्त कर दिया जाएगा कि गद्य और पद्य में भेद करना मुश्किल होगा। शिल्प, छंद आदि की स्वतंतता कविता का ऐसा अराजक स्वरूप सामने ला देगी कि पाठक और श्रोता भाग खड़ा होगा। मैं खुद इस तरह के मुक्त गीतों और कविता से बेहद त्रस्त हूँ। बावजूद इसके कि गीत और कविता को मैंने भी आवश्यकतानुसार थोड़ा बहुत छंद से मुक्त किया है। बानगी के लिए कुछ रचनाएँ मैंने इस संकलन में शामिल भी की है। यहाँ एक बात और कहना चाहता हूँ। लोग बार-बार ‘सुन बे, गुलाब...’ ‘वह तोड़ती पत्थर’ जैसी कविताओं का हवाला देकर खुद को निराला का अनुगामी सिद्ध करने का जतन करते हैं। लेकिन, ऐसे कवियों को यह भी तो जान लेना चाहिए कि अगर निराला जी ने छंद मुक्त कविता को जना तो इसके लिये उन्होंने छंद युक्त कविता के शीर्ष को अपना गर्भग्रह भी बनाया है। वे छंद और शिल्प के सिद्ध शिरोमणि है लेकिन आज प्रयोग के नाम पर छंद का सत्यानाश करने वाले ज्यादातर कवियों को साधारण तुकबंदी तक का अनुमान नहीं है। जिसे छंद बांधना नहीं आता, वह उसे तोड़ कैसे सकता है। हालांकि इस तरह के कितने ही काव्य जीवी बड़े-बड़े कवि के रूप में स्थापित, पुरस्कृत और सुविधा सम्पन्न है। यह हिन्दी कविता, विशेष रूप से गीत के साथ बड़ा छल है। गीत के अनुशासन को, छंद विधान और तुकांतों के नियमों को अगर कवि समयानुसार उदार बनाते तो बात बनती। लेकिन अकवियो ने मान-सम्मान और यश प्राप्ति के लिये तंबू-कनात लगाकर छंद विधान को झंडा, डंडा देकर खदेड़ दिया। अब अगर ऐसा आवश्यक था, समय की मांग थी तो कविता के इस नये स्वरूप को परम्परा से जुड़ी गीत कविता के मुकाबले आज ज्यादा लोकप्रिय होना चाहिए। लेकिन क्या ऐसा है...? ऐसे में मैंने अपने हाल के गीतों में, जोकि आपको संग्रह के आरम्भ में ही पढ़ने को मिल जायेंगे, सहज अभिव्यक्ति, गढ़ भाव और अभिनव शिल्प के सहारे हर आम और खास तक पहुंचने का प्रयास किया है। मैं कितना सफल हुआ हूँ, कितना असफल यह आप बतायेंगे और समय...। वैसे मैं बेहद प्रसन्न हूँ कि हिन्दी कविता के श्रेष्ठतम् स्वरूप गीत पर मेरी भी एक किताब आ गई है। यह मेरे लिये कम बड़ी बात नहीं है। क्योंकि जब मैं नीरज रमानाथ अवस्थी, भारत भूषण, वीरेन्द्र मिश्र, किशन सरोज को पढ़-पढ़ और सुन-सुन भाव विभोर हो जाया करता था, तब सोच भी नहीं सकता था कि कभी खुद भी गीतकार कहला पाऊंगा। फिर ये आवारा बादल कहां से आ गये ? मैं अपनी गीत प्रक्रिया के बारे में सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ- ‘‘जब कभी अशआर (गीत) होते है हमारे आस-पास, धीरे-धीरे अंगुलियों से कोई सहलाता है, सर।’’ फिर भी सन् ८० के दशक में जब मैं घर परिवार के दायरे से बाहर आँखें खोल रहा था तो चारों ओर जीवन के विभिन्न रंग भिन्न-भिन्न चुनौतियों में बिखरे पड़े थे। हर चुनौती मेरे लिये असाधारण थी। तब तक मैंने ज़िंदगी के यथार्थ को तनिक भी महत्ता नहीं दी थी। हालांकि यह बात मुझ पर आज भी लागू होती है। बड़े-बूढ़े कहते है-‘कवि की यही गति है, यही नियति भी। मैंने कब पहला गीत लिखा मुझे याद नहीं। गीतों से मेरा प्रथम परिचय या तो फिल्मों के दर्द भरे नगमों की शक्ल में था या फिर उन दिनों फिल्मी गीतों की तर्ज पर गाये जाने वाले कीर्तनों की शक्ल में। फिल्मों में भी मैंने जब भी किसी कवि रूप को देखा तो वह प्रेम की छटपटाहट में दर्द भरी ग़ज़लें, नज़्म या गीत गुनगुनाता ही दिखा। ईश्वर की कृपा से प्रेम की छटपटाहट का भाव उन दिनों मेरे पास भरपूर था। बस, मैं कापी और कलम लेकर जुट गया। जो जी में आया लिख मारा और दोस्तों-यारों में सुना कर वाहवाही ले ली। तभी मेरी मुलाकात गीत के एक और रूप से हुई, जो कवि सम्मेलनों के मंच पर था। गीत उन दिनों अखबारों और पत्र-पत्रकाओं में भी सम्मान से स्थापित था। मंचों और पत्र-पत्रकाओं में गीतों को सुन-पढ़कर लगा कि मैं अभी तक कवि और कविता, गीत और गीतकार के असली रूप-स्वरूप से अनभिज्ञ हूँ। मैंने खुद कोशिश की और अपने अग्रज कवि शिव कुमार सिंह कुँअर, सुमन दुबे, विजय किशोर मानव और शतदल के सान्निध्य में गीत के अनुशासन को जाना। गीत के अनुशासन का पता चला तो पहले की भरी पड़ी डायरियाँ कूड़ेदान की हो गईं। और मैं एक गीत की तलाश में पूरे मन से भटकने लगा। लेकिन गीत का सिरा मेरे हाथ नहीं लग रहा था। मेरे बड़े भाई समान मानव जी मौलिकता के बड़े काइल हैं। मैं जब भी कोई गीत लिखता, वे मुझे टोक देते। कभी नीरज का प्रभाव उन्हें दिखता तो कभी किशन सरोज, भारत भूषण का। और यह सच भी था। गीत के साथ-साथ ग़ज़लों में भी मैं कलम डुबोये था। अपेक्षाकृत गीत के ग़ज़लों में मैं खुद को सहज लगता। मेरी पहचान एक ग़ज़लगो कवि के रूप में बनने लगी। और वर्षों मुझे ग़ज़लकार कहकर पुकारा गया। मैं अपनी पहचान से खुश था लेकिन गीत पर वश न चलने से मै भीतर-भीतर अधूरा था। मेरा कभी कोई, किसी क्षेत्र में न तो गुरु रहा, न उस्ताद। मैंने अगर किसी को चाहा भी तो संभव नहीं हो सका। जो सीखा संगत से सीखा। अंग्रेजों को सुना, पढ़ा और उनका जो-जो अच्छा लगा उसे साधने लगा। मैंने अपनी पसंद के गीतों में एक समानता देखी कि सभी सरल और तत्काल ज़ुबान पर चढ़ जाने वाले रहे। चाहे गीत मंच पर हो या कागज पर। मुझे जब तक यह बात समझ में आई तब तक मै टुकड़ों-टुकड़ों में सौ के आस-पास गीत लिख चुका था। इसीलिए यह संग्रह आपको तरह-तरह की भंगिमाओं वाला लगेगा। गीत मेरे भले ही चाहें जैसे हों लेकिन हैं ये मेरी पैंतीस बरस की काव्य यात्रा की एक झलक। एक तरह से यह गीत संग्रह मेरे जीवन की राग यात्रा भी है। इस यात्रा के प्रति मेरा सिर्फ इतना निष्कर्ष है कि जो भी है, जैसा है समय-समय पर जिया गया मेरे जीवन का हिस्सा है।

मैं आवारा बादल की प्रस्तुति के लिए मैं अपने सभी शुभ चिंतकों, आलोचकों, दोस्तों, परिवारजनों के प्रति हृदय से आभारी हूँ, विशेष रूप से अपनी माँ प्रभावती तिवारी का, जिन्होंने हमेशा मेरे कवि रूप को आशीष दिया और धर्मपत्नी मीनाक्षी का, जिसने वे सारे क्षण मेरे गीतों को दे दिये, जिन क्षणों में उसे खुद गीत सा रचना था। साथ ही युवा प्रतिभा अलका यादव का भी जिन्होंने संकलन की पांडुलिपि तैयार करने, उसे सजाने-संवारने में न सिर्फ अपना बहुमूल्य समय, श्रम और हुनर दिया बल्कि संकलन की प्रथम पाठक और श्रोता बनकर मेरा विश्वास भी बढ़ाया। ईश्वर ने चाहा तो आपसे फिर मुलाकात होगी, इसी तरह नये-नये आवारा बादलों के साथ। क्योंकि ये आवारगी और बादल ही मेरे गीत हैं।

शेष शुभ...

प्रमोद तिवारी


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