बदसूरत - वेद प्रकाश शर्मा badsurat - Hindi book by - Ved Prakash Sharma
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बदसूरत

वेद प्रकाश शर्मा

प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :238
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 9364
आईएसबीएन :9788184910728

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प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हर बड़ा लेखक, अपने ‘सृजनात्मक जीवन’ में, जिन तीन सच्चाईयों से अनिवार्यतः भिडंत लेता है, वे हैं - ‘ईश्वर’, ‘काल’ तथा ‘मृत्यु’ ! अलबत्ता, कहा जाना चाहिए कि इनमे भिड़े बगैर कोई लेखक बड़ा भी हो सकता है, इस बात में संदेह है ! कहने की जरूरत नहीं कि ज्ञान चतुर्वेदी ने अपने रचनात्मक जीवन के तीस वर्षों में, ‘उत्कृष्टता की निरंतरता’ को जिस तरह अपने लेखन में एकमात्र अभीष्ट बनाकर रखा, कदाचित इसी प्रतिज्ञा ने उन्हें, हमारे समय के बड़े लेखकों की श्रेणी में स्थापित कर दिया है ! हम न मरब में उन्होंने ‘मृत्यु’ को रचना के ‘प्रतिपाद्य’ के रूप में रखकर, उससे भिडंत ली है !

कृष्ण पक्ष की काजल-सी रात्रि ने अपना प्रभुत्व जमा लिया था। सन्नाटा अन्धकार का साथी बनकर उसके साथ था, परन्तु बंबई एक्सप्रेस धड़धड़ाती हुई न केवल अन्धकार का सीना चीर रही थी बल्कि इन्जन के अग्रिम शीर्ष पर रोशन लाइट के झाग अन्धकार के माथे पर कलंक बनकर आगे बढ़ रहे थे।

अम्बर पर बादलों का एकाधिकर था - इन बादलों के गर्भ से गिरती हुई नन्ही बूंदें मानो वातावरण को जगाना चाहती थीं। परन्तु इन सब प्राकृतिक परिस्थितियों से बेखबर मधुरिमा की अपनी पतली और गोरी अंगुलियों ने भी हाथ में दबी पुस्तक का पृष्ठ पलटा और पुनः ध्यानमग्र होकर पढ़ने लगी। इस समय वह लापरवाही के साथ रिजर्व कम्पार्टमेंट की बर्थ पर लेटी कोई किताब पढ़ रही थी।

मृगनयनों वाली मधुरिमा के होंठों के स्थान पर मानो कमल की कोमल पत्तियां रखी थीं। गोरे-चिकने मस्तक पर काले रंग की एक बिंदिया उसके सौंदर्य में चार चांद लगा रही थी।

गठे हुए सुडौल संगमरमरी जिस्म पर चुस्त कुर्ता और चुस्त पायजामा था जिसमें से उसका एक-एक अंग मानो इस कैद से छुटकारा पाना चाहता हो। लम्बी-घनी व काली लटें उसके वक्षस्थल पर लापरवाही के साथ बिखरी हुई थीं।

उसकी गोरी-गोरी उंगलियों ने उस पुस्तक को सम्भाल रखा था जिसके ‘बैंक टाइटल’ पर पुस्तक के लेखक का चित्र था तथा नीचे-लेखक-‘प्रकाश’ लिखा हुआ था।

सहसा मधुरिमा ने उस पृष्ठ के बीच उंगली फंसाई जिसे वह पढ़ रही थी तथा पुस्तक बन्द करके एक भरपूर अंगड़ाई ली और फिर उसको दृष्टि के चित्र पर पड़ी।

पुस्तक के लेखक का चित्र ‘बैक कवर’ पर था। लिखते हुए लेखक के चित्र को विचित्र-सी निगाहों से देखने लगी। चित्र के नीचे लिखा था -

- लेखक - प्रकाश !’
चित्र की खूबसूरती को वह अपने नयनों में बसाने लगी।
चित्र से भी स्पष्ट था कि लेखक की आयु बीस-इक्कीस वर्ष के मध्य थी।


न जाने क्यों मधुरिमा की यह चित्र बेहद सुन्दर लगता था ? न जाने क्यों प्रकाश के चित्र पर दुष्टि पड़ते ही उसका दिल तेजी से धड़कने लगता था।

वह इस प्रकाश के विषय से अधिक कुछ नहीं जानती थी। जानती थी तो सिर्फ उसके लिखे उपन्यासों को, जिन्होंने हृदय में अपना एक स्थान बना लिया था। उसे प्रकाश के उपन्यास ऐसे लगते थे - मानो स्वयं उसी के जीवन का एक अंग हों।

वह चित्र में खो गई। दिल चाहता था कि बस उसे ही देखती रहे। उसके मन में एक मीठा-मीठा दर्द उठता-एक ऐसी टीस जो उसे आराम देती, एक ऐसी कसक जो उसे बहुत प्रिय थी। वह उसे देखती रही तथा भावनाओं का एक अम्बार उठता रहा।

यही तो है वह लेखक जो उपन्यासों में वास्तविकता भर देता है। यह जानती थी कि प्रत्येक लेखक जो कुछ लिखता है, जिन शब्दों को वह कागज़ पर बिखेरता है, वह उसके दिल की गहराई से उठने वाली भावनाएं होती हैं। उसके अपने विचार होते हैं और उपन्यासों में लिखे प्रकाश के आदर्श कितने महान थे, वह प्रकाश के इन्हीं आदर्शों से प्रेम करती थी।

वह चित्र को निहारे जा रही थी।
तभी-
झनाक...क...क !
सहसा एक जोरदार ध्वनि हुई।


वह मधुर कल्पना से बाहर आई और जैसे ही उसने ध्वनि की दिशा में देखा-उसके कण्ठ से चीख निकल गई। वह बद्हवास-सी आंखें फाड़े उस इन्सान को देख रही थी जिसने कपार्टमेंट की खिड़की का शीशा तोड़ा था और ट्रेन के निरन्तर गतिशील रहने पर भी अन्दर प्रविष्ट होता जा रहा था।

वह भयभीत हो गई। पुस्तक उसके हाथ से छूट गई।

अभी वह कुछ समझ भी न पाई थी कि वह एक छलांग के साथ अन्दर आ गया और बड़े अन्दाज के साथ कूल्हों पर हाथ रखकर प्यासी-वासनामयी निगाहों से उसे घूरने लगा।

मधुरिमा के शरीर से एक झुरझुरी दौड़ गई। वह जान गई कि शक्ल-सूरत से शरीफ और सुन्दर नजर जाने वाला यह युवक कोई अच्छा आदमी नहीं है क्योंकि पहली बात तो उसके आने का ढंग और फिर उसकी वेशभूषा !

उसके शरीर पर काले चमड़े की एक जरकिन थी जिसकी अगली जिप खुली हुई थी, गले में ताल रंग का रूमाल अटका हुआ था।
वह इस नवयुवक से अत्यन्त भयभीत हो गई थी। अपना समस्त साहस बटोरकर वह बोली-‘‘कौन हैं आप ?’’

- ‘‘मैं रूप का भंवरा हूं मेरी जान !’’ यह दो कदम आगे बढ़कर निहायत ही बद्तमीजी के साथ बोला। उसकी वासनामयी निगाह मथुरिमा के बदन पर फिसल रही थी।

उसके इस वाक्य पर वह कांप गई। पीछे हटी तथा अपने आंचल से वक्षस्थल को छिपाने का प्रयास करती हुई बोली-‘‘आप यहां क्यों आये हैं ?’’


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