रूक गई धरती - वेद प्रकाश शर्मा Ruk Gayi Dharti - Hindi book by - Ved Prakash Sharma
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रूक गई धरती

वेद प्रकाश शर्मा

प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :224
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 9377
आईएसबीएन :9788184910704

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प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

काहिरा।

काहिरा के एक होटल में।

‘‘तुम्हारा नाम टुम्बकटू है ?’’ एक गंजे, काले और कद्दावर आदमी ने पूछा।

‘‘जी हां।’’ बडे ही अदब से टुम्बकटू ने गर्दन झुकाकर कहा - ‘‘आप जैसे लोगों की जर्रानवाजी है, वर्ना बंदे की क्या बिसात है, खड़ी हुई खाट है।’’

‘‘हमारे साथ चलो।’’ यह आदेश गंजे ने कठोर लहजे में दिया था।

‘‘आपका हुक्म सिर-आंखों पर।’’ कहने के साथ ही उनकी आशा के विपरीत टुम्बकटू खड़ा हो गया।

गंजा अकेला नहीं था। उसके चार अन्य साथियों ने टुम्बकटू की सीट को चारों ओर से घेर रखा था। उन सभी के हाथ जेबों में थे और टुम्बकटू को यह भांपने में जरा भी देर न लगी थी कि उन हाथों में रिवॉल्वर हैं।

शायद उनमें से किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि टुम्बकटू इतनी आसानी से उनके साथ चलने के लिए तैयार हो जाएगा। यही कारण था कि प्रश्नपूर्ण दृष्टि से वे एक-दूसरे को देखने लगे। अभी वे ठीक से कोई आपसी संकेत कर भी नहीं पाए थे कि टुम्बकटू ने कहा-‘‘मेरे लिए क्या हुक्म है सरकार ?’’

‘‘चलो।’’ गंजा गुर्राया।

‘‘चलो।’’ कहने के साथ ही टुम्बकटू ने अपना पैर आगे बढ़ा दिया। एक ही कदम में वह उनके घेरे से काफी दूर हो गया था, जबकि तब तक जब तक कि उनमें से कोई कुछ समझता, गन्ने जैसे उस व्यक्ति ने चार कदम का फासला तय कर लिया था।

‘‘ठहरो !’’ गंजा गर्जा।

इस तरह रुक क्या टुम्बकटू मानो चाबी के खिलौने की चाबी समाप्त हो गई हो। फिर घूम गया।

हाथ सीने पर रखकर किसी वेटर की तरह झुका, बोला - ‘‘हुक्म बन्दापरवर !’’

वे पांचों तेजी से उसके करीब आए। हाथ जेब से बाहर आ चुके थे और सभी हाथों में नंगे रिवॉल्वर थे। टुम्बकटू पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, जबकि हॉल में देते अन्य लोगों के चेहरे पीले पड़ गए थे। आंखों में आतंक था।

उनमें से अधिकांश जानते थे कि उस गन्ने जैसे व्यक्ति को घेरने वाले काहिरा के वे माने हुए गुण्डे हैं। जिनमें से किसी पर हाथ डालने का साहस पुलिस विभाग से संबंधित एक भी व्यक्ति आज तक नहीं कर पाया है।

हां - तब से, जब से टुम्बकटू उस हॉल में आकर बैठा था - वहां मौजूद सभी व्यक्ति उसे आश्चर्यजनक दृष्टि से देख रहे थे। देखते भी क्यों नहीं ? धरती पर टुम्बकटू नवां आश्चर्य था। पतला-ठीक गन्ने जैसा पतला शरीर ! झाडू की सींक जैसी टांगें सलाई जैसी क्लाइयां ! उसके जिस्म पर एक कोट होता था, ऐसा लगता था, जैसे वह कोट किसी हैंगर पर लटक रहा हो। कोट टैक्निकलर था - दुनिया का एक भी रंग ऐसा नहीं था, जो उसके कोट में देखने को न मिल जाए !

स्वयं को चन्द्रमा का निवासी कहने वाला टुम्बकटू अदब के साथ गंजे के सामने खड़ा था, जबकि गंजे ने कहा था - ‘‘धीरे चलो।’’

‘‘बहुत अच्छा परवरदिगार !’’ कहकर वह इस तरह मुड़ा मानो दो एकड़ खेत के बीच खड़ा अकेला गन्ना हवा के एक झोंके पर लहरा उठा हो, वह दरवाजे की तरफ बढ़ा। ऐसी गति से कोई चींटी भी क्या चलेगी !

बहुत ही धीमे।

इतना कि उन पांचों को इतना आहिस्ता चलना कठिन हो गया। गंजे से रहा नहीं गया तो उसने झपटकर रिवॉल्वर उसकी पीठ पर सटा दी और बोला - ‘‘जरा तेज चलो।’’ टुम्बकटू एक दम इस तरह तेज चला कि उसकी रिवॉल्वर से दस गज आगे निकल गया। यह विचार दिमाग में आते ही गंजे ने फायर झोंक दिया कि टुम्बकटू भाग रहा है, मगर टुम्बकटू वहां था कहां ?

गोली हॉल की दीवार का प्लास्टर उतारकर शहीद हो गई।

‘‘ये क्या बात हुई बड़े भाई, एक गोली का नुकसान कर दिया ना ?’’

न सिर्फ उन पांचों ने, बल्कि हॉल में मौजूद सभी लोगों ने पलटकर उस आवाज की दिशा में देखा... तो... हैरत में डूबी चीखों से गूंज उठा हॉल।

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