जौहर ज्वाला - सुरेन्द्र मोहन पाठक Jauhar Jwala - Hindi book by - Surendra Mohan Pathak
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जौहर ज्वाला

सुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशक : हार्परकॉलिंस पब्लिशर्स इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :270
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 9392
आईएसबीएन :9789351776291

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प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पूर्वाभास

विमल का अमृतसर का क्राइम का जोड़ीदार मायाराम बावा, बावजूद अपना कत्ल और सशस्त्र डकैती का अपराध कुबूल करने के, पुलिस को ये विश्वास नहीं दिला पाता कि दिल्ली में अरविन्द कौल के नाम से जाना जाने वाला सफेदपोश बाबू मशहूर इश्चिहारी मुजरिम सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल था। यूं दिल्ली पुलिस के चंगुल में फंसने से बाल बाल बचे विमल को उसके खास दोस्त और सी.बी.आई. के एन्टीटैरेरिस्ट स्कवायड के उच्चाधिकारी योगेश पाण्डेय की संजीदा राय ये होती है कि वो फौरन से पेशतर दिल्ली से कूच कर जाये क्योंकि मायाराम बावा चुप नहीं होने वाला था और अगर आज नहीं आया था तो कल पुलिस को उसकी बातों पर यकीन आ सकता था। विमल योगेश पाण्डेय की राय पर अमल करता है, वो माडल टाउन वाली कोठी, बमय सामान, खड़े पैर बेच देता है, सुमन वर्मा को वापिस गोल मार्केट की कोविल हाउसिंग सोसायटी में स्थित उसके फ्लैट में भेज देता है, अपने चार मास के दुधमुंहे बच्चे सूरज को सुमन के पास छोड़ता है और नीलम की जिद पर उसे साथ लेकर मुम्बई के लिये रवाना हो जाता है।

एयरपोर्ट पर विमल को सुमन से फोन पर वार्निंग मिलती है कि पुलिस फिर उसको फिराक में सुमन तक पहुंच गयी थी, लिहाजा वो जितनी जल्दी हो सके, दिल्ली से निकल जाये। एयरपोर्ट पर ही डाक के जरिये उसे इरफान की वार्निंग मिलती है कि उसकी मुम्बई से संक्षिप्त-सी गैरहाजिरी में होटल सी…व्यू पर ओरियन्टल होटल्स एण्ड रिजार्टस नामक कम्पनी ने, जो स्वयं को होटल का मालिक बताती थी, होटल को मुकम्मल तौर से खाली कराकर उस पर अपना कब्जा कर लिया था और ‘कम्पनी’ के भूतपूर्व सिपहसालार और होटल के वर्तमान सिक्योरिटी आफिसर श्याम डोंगरे का यूं कत्ल हो गया था कि कत्ल साफ-साफ गैंग किलिंग जान पड़ता था, लिहाजा हो सके तो वो वक्ती तौर पर मुम्बई में कदम रखने से परहेज करे। विमल इरफान को वार्निंग को नजरअन्दाज करके मुम्बई का प्लेन पकड़ लेता है।

‘कम्पनी’ का पतन अमरीकी माफिया के एशियन एम्पायर के चीफ कन्ट्रोलर रीकियो फिगुएरा को मुम्बई अन्डरवर्ल्ड के हालात में दखलअन्दाज होने के लिये मजबूर करता है। वो दुबई के ‘भाई’ से काठमाण्डू में मीटिंग करता है, वो ‘भाई’ को हुक्म देता है कि वो दिल्ली में गुरबख्श लाल की जगह लेने के लिये वहां के लोकल दादा लेखूमल झामनानी को तैयार करे और मम्बई में या तो सोहल को गजरे की जगह ‘कप्पनी’ का सरगना बनने के लिये मनाये या उसकी हस्ती मिटा दे।

‘पहाड़गंज थाने वाले अरविन्द कौल को छोड़ चुकने के बाद महसूस करते हैं कि वे उसके साथ आये योगेश पाण्डेय और उसकी हिमायत में थाने पहुंचे उसके एम्पलायर शिवशंकर शुक्ला का कुछ ज्यादा ही रौब खा गये थे। लिहाजा वो नये सिरे से, खामोशी से कौल की तफ्तीश में लगते हैं तो सब-इन्सपेक्टर जनकराज को मालूम होता है कि कौल घर और दफ्तर से गायब था, उसकी बीवी नीलम का कहीं पता नहीं था और सुमन वर्मा नाम की कुंआरी लड़की के पास एक चार महीने का बच्चा था जो कि कौल और नीलम की औलाद हो सकता था। इस बात से बेखबर, कि नीलम विमल के साथ चली गई थी, वो इस उम्मीद में सुमन को निगरानी शुरू करा देता है कि देर सबेर मां बच्चे के पास लौट के आयेगी, वो नीलम को गिरफ्तार कर लेंगे और उसी से कबूलवायेंगे कि कौल कहां गायब हो गया था।

उंगलियों के निशानों के एक लम्बे जंजाल के बाद जनकराज ये स्थापित करने में कामयाब हो जाता है कि कौल वास्तव में सोहल था और मायाराम ने उसकी बाबत जो कुछ भी कहा था, बिल्कुल सच कहा था, बिल्कुल सच कहा था। तब कौल की बाबत शुक्ला से सवाल किया जाता है तो वो कहता है कि कौल उसकी नौकरी छोड़ कर वापिस सोपोर चला गया था। उसे बताया जाता है कि कौल सोपोर नहीं, मुम्बई गया था तो शुक्ला इस बाबत अनभिज्ञता जाहिर करता है।

विमल और नीलम मुम्बई पहुंचते हैं तो एयरपोर्ट पर मुस्लिम वेशभूषा अख्तियार करके अताउल्लाह खान नाम के शारजाह के एक अन्य मुसाफिर और उसके पासपोर्ट पर उसे लेने आये उसके बेटे मोहसिन खान की मदद से निर्विघ्न एयरपोर्ट से निकलते हैं और मालाबार हिल पर स्थित एक लोकल इन्डस्ट्रियलिस्ट शेषनारायण लोहिया की शरण में पहुंचते है। पहले ही विमल की इरफान और विक्टर से मुलाकात हो चुकी होती है जो कि इस बात की तसदीक करते हैं कि एयरपोर्ट पर कुछ लोग उसकी निगरानी के लिये मौजूद थे जो कि उसके मुस्लिम बहुरूप में उसे पहचान नहीं पाये थे। इरफान से उसे मालूम होता है कि जो कम्पनी होटल सी-व्यू पर काबिज हुई बैठी थी, उसका मैनेजिंग डायरेक्टर महेश दाण्डेकर एक हल्का, जरायमपेशा आदमी था जो कि गजरे की मौत के बाद ‘कम्पनी’ की उजड़ी गद्दी पर काबिज होने के सपने देख रहा था और उसने खुद या ‘भाई’ की शह पर श्याम डोंगरे का कत्ल करवाया हो सकता था।

विमल लोहिया से ओरियन्टल होटल्स एण्ड रिजार्टस नामक कम्पनी की बाबत, उसके निजाम को बाबत और उसके एम.डी. महेश दाण्डेकर की बाबत जानकारी हासिल करता है। वो लोहिया को बताता है कि अपने किसी व्यक्तिगत लाभ के लिये वो खुद भी होटल सी-व्यू पर - ‘कम्पनी’ पर नहीं - काबिज होने का तमन्नाई था और ऐसा वो राजा गजेन्द्र सिंह नामक एक नई शख्सियत को सामने लाकर करना चाहता था। लोहिया उसकी अपने दोस्त और ओरियन्टल के एक डायरेक्टर राजेश जठार से मुलाकात कराता है जो कि उसे ओरियन्टल, एम.डी. महेश दाण्डेकर और ओरियन्टल के होटल सी-व्यू की बाबत आइन्दा इरादों से ताल्लुक रखती बहुत मार्के की बातें तो बताता ही है, उसकी आइन्दा होने वाली बोर्ड मीटिंग के बारे में भी बताता है जहां कि विमल राजा गजेन्द्र सिंह के प्रतिनिधि के तौर पर जाने का फैसला करता है।

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