शिकारी - अनिल मोहन Shikari - Hindi book by - Anil Mohan
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शिकारी

अनिल मोहन

प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :316
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 9402
आईएसबीएन :9788176049856

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प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मार्शल के चेहरे पर गम्भीरता नाच रही थी। उसकी निगाहें सामने बड़ी-सी स्क्रीन पर थीं जहां जगमोहन नजर आ रहा था। जगमोहन एक कमरे में बंद था। कमरे में सिंगल बेड और दो चेयर के अलावा कछ नहीं था। स्क्रीन पर इस समय जगमोहन झुंझलाया-सा दिखाई दे रहा था। कभी वो बेड पर बैठता तो कभी चेयर पर या वो बेचैनी-भरे ढंग से कमरे में टहलने लगता। बीते दस मिनट से मार्शल, जगमोहन पर निगाहे टिकाए हुए था। चेहरे पर सोच के भाव थे।

एकाएक मार्शल ने हाथ बढ़ाकर इंटरकॉम का बटन दबाया और बोला।
‘‘सतनाम।’’
‘‘यस मार्शल।’’ उधर से आवाज आई।

‘‘मेरे एजेंट गए ?’’

‘‘यस मार्शल। उन्हें गए बीस मिनट हो चुके हैं। इस वक्त पूरे ठिकाने पर सिर्फ चार-पांच ही लोग हैं। सब-के-सब उसी काम के लिए जा चुके हैं। इस काम पर पूरे बाईस लोग लग गए हैं। सतनाम की आवाज कानों में पड़ी।

‘‘वो इकट्ठे तो नहीं हैं ?’’
‘‘नो मार्शल। दो लोग दो-दो की टोली में हैं और चार एजेंट अकेले-अकेले हैं।’’
मार्शल ने कलाई पर बंधी घड़ी पर निगाह मारी।
दोपहर के 12 बजने वाले थे।
‘‘उन्हें पूरी तरह समझा दिया था न ?’’ मार्शल के होंठ भिंच गए।

‘‘मैं समझाने लगा तो वे बोले मार्शल उन्हें सब बता चुका है।’’
मार्शल के होंठ भिंच गए।
‘‘लेकिन मार्शल ये गम्भीर मसला है।’’ सतनाम की आवाज कानों में पड़ी - ‘‘शाम को होने वाली रैली में सी.आई.ए. के एजेंट प्रधानमंत्रीजी की हत्या करने में सफल भी हो सकते हैं। आप ये कार्यक्रम रद्द क्यों नहीं करवा देते।’’

‘‘सुबह से 15 बार पी.एम. हाउस से फोन करके रैली कैंसिल कराने को कह चुका हूं, परंतु शायद वे मेरी बात की परवाह नहीं कर रहे। प्रधानमंत्री का पी.ए. ओम तिवारी कहता है कि इस रैली में प्रधानमंत्रीजी का मौजूद रहना बहुत जरूरी है। ये रैली प्रधानमंत्री के नाम पर प्रचार की गई है। ऐसे में प्रधानमंत्री रैली में नहीं पहुंचे तो मजाक का विषय वन जाएगा। इससे पार्टी की छवि पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। चुनाव सिर पर हैं। वो बेवकूफ लोग ये बात गम्भीरता से नहीं सोच रहे कि अगर प्रधानमंत्री की हत्या कर दी गई इस रैली में तो देश को कितना बड़ा नुकसान होगा।’’

‘‘क्या हमारे लोग इस मामले को रोक सकते हैं।’’

‘‘रोक सकते हैं, बशर्ते कि उन्हें पता चल जाए कि सी.आई.ए. के हत्यारे कहां-कहां मौजूद रहकर प्रधानमंत्री की हत्या करने की सोच रहे हैं। परंतु लाखों की भीड़ में ये जान पाना सम्भव नहीं हो सकेगा। मैं जो कर सकता था मैंने किया और इस बात की पूरी खबर गृहमंत्रालय को दे दी है। वो जो ठीक समझेंगे, करेंगे।’’ मार्शल बेचैनी से कह उठा।

‘‘सी.आई.ए. के कितने हत्यारे प्रधानमंत्रीजी की हत्या करने, इंडिया पहुंचे हैं ?’’

‘‘आठ लोगों के आने की खबर है।’’ मार्शल ने कहा और इंटरकॉम के स्विच पर से उंगली हटा ली। इसके साथ ही मार्शल उठा और एक स्विच को ऑफ करते ही, रोशन स्क्रीन ऑफ हो गई।

मार्शल आगे बढ़ा और दरवाजा खोलकर बाहर गैलरी में आकर आगे बढ़ने लगा। चेहरे पर बेचैनी, गम्भीरता और गुस्सा भी नजर आ रहा था कि उसके मना करने के बावजूद भी प्रधानमंत्रीजी रैली में जा रहे हैं अगर वहां उनकी हत्या हो गई तो ये बुरी बात होगी। क्योंकि ऐसा हो जाने की खबर उसके पास पहले ही थी।

उसके कितनी बार कहने पर भी पी.ए. ओम तिवारी ने उसकी बात प्रधानमंत्रीजी से नहीं कराई थी। स्पष्ट था कि ओम तिवारी उसकी बात को ज्यादा गम्भीरता से नहीं ले रहा। अगर वो दिल से कोशिश करता तो प्रधानमंत्रीजी को इस रैली में जाने से रोक सकता था। उनका आज का प्रोग्राम रद्द हो सकता था।

दो मिनट बाद मार्शल एक दरवाजे के सामने ठिठका और दरवाजे के पास लगी नम्बर प्लेट में से कुछ बटन दबाए दरवाजा फौरन सरक कर खुलता चला गया।

मार्शल भीतर प्रवेश कर गया।
सामने ही टहल रहा जगमोहन उसे देखते ही ठिठका।
मार्शल ने दरवाजा बंद नहीं किया और कुर्सी पर जा बैठा।
जगमोहन ने खुले दरवाजे को देखा फिर मार्शल को।


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