गैंडा, कत्ल-ए-आम - वेद प्रकाश शर्मा Gainda, Katla-a-aam - Hindi book by - Ved Prakash Sharma
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गैंडा, कत्ल-ए-आम

वेद प्रकाश शर्मा

प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :346
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 9411
आईएसबीएन :9789383600397

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प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

- ‘‘कौन बोल रहा है ?’’ रिसीवर उठाते ही विकास ने पूछा।
- ‘‘गैंडा।’’ दूसरी तरफ से गुर्राहट भरे स्वर में कहा गया।
- ‘‘त-तुम... ?’’ विकास चौंककर उछल पड़ा और जल्दी से बोला - ‘‘लेकिन - तुम तो जेल में थे ?’’

- ‘‘अगर जेल में फोन करोगे तो तुम्हें पता लगेगा कि मैं अब भी जेल में ही हूं।’’
गैंडा की आवाज विकास लाखों में पहचान सकता था - ‘‘ल... लेकिन...।’’
- ‘‘लेकिन क्या... ?’’
- ‘‘इस वक्त मैं ग्रीन पार्क स्थित पब्लिक टेलीफोन बूथ नम्बर सोलह से बोल रहा हूं...।’’

विकास ने कड़े स्वर में पूछा - ‘‘क्या मतलब ?’’

- ‘‘मतलब भी समझ जाओगे बेटे - वक्त आने दो।’’ गैंडा की आवाज गुर्राहट भरी थी - ‘‘इस वक्त केवल वह सुनो जो कहने के लिए मैंने फोन किया है। यहां ग्रीन पार्क इलाके में एक हत्या हो गई है। हत्यारा तुमसे बात कर रहा है - ये हत्या तुम्हारे एक चेतावनी है।’’

- ‘‘तुमने हत्या की है ?’’ विकास ने पूछा - ‘‘क्यों ?’’
- ‘‘क्योंकि मरने वाला पाकिस्तान का जासूस था ?’’

गैंडा के जवाब पर विकास पहले से भी ज्यादा बुरी तरह चौंक पड़ा, बोला - ‘‘तुमने हत्या की है और वह भी पाकिस्तान के जासूस की - क्यों ? तुम खुद भी तो पाकिस्तानी जासूस हो। लगता है दोस्त कि मुझसे टकराने के बाद तुम्हारे दिमाग का कोई पुर्जा ढीला हो गया है।’’

धीरे से हंसा गैंडा। ऐसा लगता था जैसे - सचमुच कोई गैंडा खिलखिला पड़ा हो, बोला - ‘‘मैं पाकिस्तानी जासूस हूं नहीं बेटे, बल्कि था - था इसलिए क्योंकि अब नहीं रहा हूं। तुम्हें याद है न कि मैं पाकिस्तान के ही, भारत के प्रधानमंत्री से संबंधित जजमैंट चुराकर भागा था। तुमने मुझे ‘लुहार’ में घेर लिया था। मेरे ही कारण सारे लुहार को मौत की भट्टी में झोंक दिया था तुमने, उस वक्त ट्रांसमीटर पर मैंने अपने चीफ से बातें की थीं - पाकिस्तानी सीक्रेट सर्विस के उस चीफ से, जिसके आदेशों पर गैंडा ने अपनी जिंदगी को न जाने कितनी बार खतरे में डाला था। मैं खुद गिनकर नहीं बता सकता बेटे कि अपने देश यानी पाकिस्तान के लिए, मैंने कितनी बार मौत से कुश्ती लड़ी है, म...मगर मेरे देश ने मुझे क्या दिया... जानते हो उस वक्त ट्रांसमीटर पर पाकिस्तानी सीक्रेट सर्विस के उस हरामजादे चीफ ने मुझे क्या आदेश दे दिया था-यह कि लुहार को बचाने के लिए मैं अपने-आपको तुम्हारे हवाले कर दूं - मेरे देश ओर मेरे चीफ ने मेरी जिंदगी इतनी ही महत्वपूर्ण समझी थी-इतनी कि खुद को बचाने के लिए उन्होंने मुझे मौत के हवाले हो जाने का आदेश दे दिया।’’

- ‘‘उन हालातों में कोई भी देश अपने जासूस को यही आदेश देता।’’

- ‘‘हूं...।’’ फीकी-सी हंसी की आवाज के बाद, गैंडा का स्वर - ‘‘तुम नहीं समझोगे... इस वक्त तुम्हारी सेहत के लिए केवल इतना ही समझना काफी है कि गैंडा के जितने बड़े दुश्मन तुम हो...उतना ही बड़ा दुश्मन पाकिस्तान भी है...। गैंडा की जिंदगी के अब केवल दो ही मकसद हैं - पहला, अपने हाथ से तुम्हारा कत्ल करना ! दूसरा...पाकिस्तान को नेस्तानाबूत करना। ये मत समझना कि गैंडा चुपचाप बैठा है - तुम्हारी जेल की चारदीवारियां गैंडा को रोक नहीं सकती। विकास...ग्रीन पार्क जाओ...वहां मौजूद लाश तुम्हें यकीन दिला देगी कि गैंडा अपने दोनों दुश्मनों से एक साथ टकराने के लिए निकल पड़ा है...।’’

- ‘‘म-मगर।’’

- ‘‘तुम भी संभलकर रहो...।’’ विकास की बात बीच में ही काटकर गैंडा कहता चला गया - ‘‘तुम जानते हो कि चैलेंज देना और कबूल करना गैंडा का सबसे प्रिय खेल रहा है। बहुत जल्दी गैंडा तुम्हारे देश में - कुछ ऐसा करने वाला है, जैसा शायद पूरी दुनिया में पहले कभी नहीं हुआ।’’


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