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च्युत  : वि० [सं०√च्यु+क्त] [भाव० च्युति] १. ऊपर से गिरा, चूआ, झड़ा या टपका हुआ। २. अपने उचित या नियत स्थान से उत्तर, गिर या हटकर नीचे आया हुआ। गिरा हुआ। पतित। जैसे–पदच्युत। ३. औचित्य की सीमा से हटकर अनौचित्य की सीमा में आया हुआ। जैसे–कर्त्तव्य-च्युत। ४. नष्ट-भ्रष्ट।
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च्युत-मध्यम  : पुं० [ब० स०] संगीत में दो श्रुत्तियों का एक विकृत स्वर जो पीति नामक श्रुति से आरंभ होता है।
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च्युत-षड्ज  : पुं० [ब० स०] संगीत में दो श्रुत्तियों का एक विकृत स्वर जो मंदा नामक श्रुति से आरंभ होता है।
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च्युत-संस्कारता  : स्त्री० [सं० च्युत्-संस्कार, ब० स०+तल्–टाप्] १. संस्कार से च्युत होने की अवस्था या भाव। २. साहित्य में काव्य या रचना का वह दोष जो व्याकरण विरुद्ध पदविन्यास करने पर होता है। साहित्यिक रचना का व्याकरण संबंधी दोष।
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च्युत-संस्कृति  : स्त्री० [कर्म० स०]]=च्युत संस्कारता।
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च्युत्मा(त्मन्)  : वि० [सं० च्युत–आत्मन्, ब० स०] जिसकी आत्मा या विचार औचित्य और मर्यादा की सीमा से गिरे हुए या पतित हों।
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च्युताधिकार  : वि० [सं० च्युत-अधिकार, ब० स०] अपने अधिकार, पद आदि से हटा या हटाया हुआ।
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च्युति  : स्त्री० [सं०√च्यु+क्तिन्] १. च्युत होने अर्थात् ऊपर से गिरने, चूने, झड़ने या टपकने की क्रिया, अवस्था या भाव। २. अपने स्थान से हट जाने विशेषतः नीचे आ जाने का भाव। पतन। ३. तत्परतापूर्वक कोई काम न करने की स्थिति। जैसे–कर्तव्य-च्युति। ४. अभाव। कमी। ५. गुदा। मलद्वार। ६. भग। योनि।
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