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शब्द का अर्थ

वैदंभ  : पुं० [सं० विदंभ+अण्] शिव का एक नाम।
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वैद  : पुं०=वैद्य।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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वैदक  : पुं०=वैद्यक।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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वैदग्ध (दग्ध्य)  : पुं० [सं० विदग्ध+अण्, विदग्ध+ष्यञ्] १. विदग्ध या पूर्ण पंडित होने की अवस्था,धर्म या भाव। पांडित्य। विद्वान। २. कार्य कुशलता। दक्षता। पटुता। ३. चातुरी। चालाकी। ४. रसिकता। ५. शोभा। श्री। ६. हाव-भाव।
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वैदर्भ  : वि० [सं० विदर्भ+अण्] १. विदर्भ देश का। २. विदर्भ देश में उत्पन्न। ३. बात-चीत करने में चतुर। पुं० १. विदर्भ का राजा या शासक। २. दमयंती के पिता भीमसेन। ३. रुक्मिणी के पिता भीष्मक। ४. वाकचातुरी। ५. मसूड़ा फूलने का रोग।
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वैदर्भक  : पुं० [सं० विदर्भ+अण्+कन्] विदर्भ का निवासी।
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वैदर्भी  : स्त्री० [सं० विदर्भ+अण्+ङीष्] १. संस्कृत साहित्य में साहित्यिक रचना का वह विशिष्ट प्रकार या शैली जो मुख्यतः विदर्भ और उसके आस-पास के देशों में प्रचलित थी, और जो प्रायः सभी गुणों से युक्त सुकुमार वृत्तिवाली तथा सर्वश्रेष्ठ मानी जाती थी। करुणा श्रृंगार आदि रसों के लिए यह विशेष उपयुक्त मानी गई है। २. अगस्त्य ऋषि की पत्नी। ३. दमयन्ती। ४. रुक्मिणी।
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वैदांतिक  : वि० [सं० वेदान्त+ठक्—इक] वेदांत जाननेवाला। वेदांती।
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वैदारिक  : पुं० [सं० विदार+ठक्-इक] सन्निपात ज्वर का एक भेद।
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वैदिक  : वि० [सं० वेद+ठक्-इक] १. वेद-संबंधी। वेद का। जैसे—वैदिक काल, वैदिक कर्म। २. जो वेदों में कहा गया हो। पुं० १. वह जो वेदों में बतलाये हुए कर्मकांड का अनुष्ठान करता हो। वेद में कहे हुए कृत्य करनेवाला। २. वह जो वेदों का अच्छा ज्ञाता या पंडित हो।
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वैदिक-धर्म  : पुं० [सं० कर्म० स०] आर्यो का वह धर्म जो वेदों के युग में प्रचलित था। (इसमें प्रकृति की उपासना पितरों का पूजन, यज्ञकर्म, तपस्या आदि बातें मुख्य थी, और जादू-टोने या मंत्र-तंत्र का भी कुछ प्रचलन था)।
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वैदिक-युग  : पुं० [सं० कर्म० स०] वह युग या समय जब वेदों की रचना हुई थी और वैदिक धर्म प्रचलित था।
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वैदिश  : वि० [सं० विदिशा+अण्] १. विदिशा सम्बन्धी। विदिशा का। २. विदिशा में होनेवाला। पुं० विदिशा का निवासी।
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वैदिश्य  : पुं० [विदिशा+ष्यञ्] विदिशा के पास का एक प्राचीन नगर।
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वैदुरिक  : पुं० [सं० विदुर+ठक्-इक] १. विदुर का भाव। २. विदुर का मत या सिद्धान्त।
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वैदुष  : पुं० [सं० विद्वस्+अण्] विद्वान। पंडित।
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वैदुष्य  : पुं० [सं० विद्वस्+ष्य़ञ्] विद्वत्ता। पांडित्य।
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वैदूर्य  : पुं० [सं०] १. हरे रग के रत्नों का एक वर्ग। (बेरिल)। २. लहसुनिया नामक रत्न। (लैपिस लेजूली)।
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वैदेशिक  : वि० [सं० विदेश+ठक्-इक] १. विदेश में होनेवाला। २. विदेशों से संबंध रखनेवाला। पुं० विदेशी व्यक्ति।
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वैदेश्य  : वि०=वैदेशिक।
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वैदेहक  : पु० [सं० वैदेह+कन्] १. वणिक। व्यापारी। २. एक प्राचीन वर्णसंकर जाति।
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वैदेही  : स्त्री० [सं० विदेह+अण्+ङीष्] १. विदेह राजा जनक की कन्या, सीता। २. वैदेह जाति की स्त्री। ३. पिप्पली। ४. रोचना।
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वैद्य  : पुं० [सं० विद्या+अण्] १. पंडित। विद्वान। २. आयुर्वेद का ज्ञाता। ३. आयुर्वेद द्वारा निर्दिष्ट चिकित्सा पद्धति के अनुसार चिकित्सा करनेवाला। ४. एक जाति जो प्रायः बंगाल में पाई जाती है। इस जाति के लोग अपने आपको अंबष्ठसंतान कहते हैं। ४. वासक। अडूसा। वि० वेद संबंधी। वेद का।
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वैद्यक  : पुं० [सं० वैद्य+कन्] वह शास्त्र जिसमें रोगों के निदान और चिकित्सा का विवेचन हो। आयुर्वेद।
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वैद्याधर  : वि० [सं० विद्याधर+अण्] विद्याधर-सम्बन्धी।
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वैद्युत्  : वि० [सं० विद्युत+अण्] विद्युत-सम्बन्धी। बिजली की।
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वैद्रुम  : वि० [सं० विद्रुम+अण्] विद्रुम-सम्बन्धी। मूँगे का।
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